
- October 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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#नयेसुर... इस अंक में नियमित ब्लॉग्स के अलावा जो भी सृजन है, सब बाक़ायदा विद्यार्थियों के द्वारा। इस अंक में चार पीढ़ियों के वो रचनाकार शामिल हैं, जो उम्र के विभिन्न पड़ावों पर किसी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत हैं। हमउम्र जब वरिष्ठ नागरिक कहे जा रहे हैं, तब विद्यार्थी बनी इस लेखक ने अपनी स्मृतियों से उन कहानियों को संजोने का बीड़ा उठाया है, जिनमें भारतीय लोक धड़कता रहा है...
मधु सक्सेना का संकलन....
मालवी लोककथाएं: नानी वाली कहानियां
1. चल चल री म्हारी टूटी
एक गड़रियो थो। ऊ रोज बकरी चरावा जंगल जाय थो। वा के रस्ता में राजा नरेश सिंह जी को महल पड़े थो। महल के दरवाजा के ऊपरी मंजिल पर राजा को दरबार लगे थो।
एक दिन गड़रियो उनांग से हिट्यो तो दरबार लग रियो थो।
राजा दरबारियों से सवाल पूछ रियो थो। उनके उत्तर से ख़ुश हो के इनाम दे रियो थो। ऊ गड़रियो नीचे से सुन रियो थो। सबका उत्तर सुनवा के बाद गड़रियो अपनी लंगड़ी बकरियां से जोर से बोल्यो- ‘चल चल री म्हारी टूटी, पांच ही बातां झूठी।’
कह के बकरियां हाँकवा लग्यो। राजा और दरबारी सबने या बात सुनी। राजा ने सिपाहियों को आदेश दियो- ‘गड़रियो हमारी बात झूठी कसां बोल रियो? पकड़ के लाओ ऊनि एं।’
सिपाही दौड़या दौड़या गया और गडरियाँ एं पकड़ के राजा के सामने पेश कियो।
राजा ने गड़रिया से कई- ‘कसां के रियो थो पांच ही बात झूठी, बता? थारी बात गलत निकली तो तोय फांसी पे लटका दागां।
गड़रियो हाथ जोड़ के बोल्यो- ‘महाराज म्हारी बात सुनके आप सबें गलत लगे तो फांसी पे चड़वा दीजो।’
राजा बोल्यो- ‘कओ अपनी बात’
गड़रियो- ‘तमने पेलो सवाल पूछ्यो- फूल में फूल कायको फूल..? तो दरबारीन में से कई कि फूल में फूल गुलाब को फूल तो सरासर गलत है महाराज।
राजा – कसां गलत?
गड़रियो- गुलाब को फूल कई काम को नी। थोड़ी सी खुश्बू थोड़ी देर में बखर जाए। फूल में फूल कपास को फूल… जा से सूत बना के कपड़ा बने। वी काम आए मनक के।
राजा- या बात तो सांची कई तूने। और आगे बता।
गड़रियो- दुसरो सवाल थो, बल में बल किनको बल? वा को जवाब दियो दरबारी ने की बल में बल भाई को बल। या भी बा सरासर झूठी। सांची तो ये कि बल में बल अपनी भुजाओं का बल। भाई हमेशा साथ थोड़े ही रेगो। मुश्किल में अपना बल ही काम आयगो।
राजा- या बात भी थारी सांची। आगे बोल।
गड़रियो- तीसरी बात तमने पूछी कि जोत में जोत काहे की जोत। तो दरबारिन बोल्या कि जोत में जोत सूरज की जोत। या तो सरासर झूटी बात महाराज।
राजा- कसां झूटी?
गड़रियो बोल्यो- जोत में जोत सूरज की जोत नी होय… जोत में जोत आंख्या की जोत। आंख्यां में जोत नी होयगी तो सूरज के सामने भी कईं नी दिखेगो। याने जोत में जोत आंख्यां की जोत।
राजा ने ख़ुश होके कई। तू तो बड़ो बुद्धिमान है, आगे बोल…
गड़रियो बोल्यो- चौथी बात तमने पूछी कि दूध में दूध किसका दूध तो दरबारिन बोल्या की दूध में दूध गे को दूध… या भी बात झूटी असल में दूध में दूध माँ को दूध। सबसे पैलां तो इंसान और जिनावर माँ को दूध पिये वा से ही पले। गाय को दूध सबें थोड़ी मीले।

राजा खुश होके बोल्यो- अब आखिरी बता।
गड़रियो केवा लाग्यो- तमने पाँचवो और आखिरी सवाल पूछ्यो थी कि ज्ञान में ज्ञान काय को ज्ञान… तो दरबारिन बोल्या ज्ञान में ज्ञान शास्त्रों का ज्ञान। या तो गलत है नी? ज्ञान में ज्ञान अपनी बुद्धि का ज्ञान। शास्त्र हर जगह काम नी आवे अपनी बुद्धि और समझ हर जगह।
या बात है महाराज जा से ही मैंने कई कि पांच ही बात झूटी।
राजा ने ख़ुश होके गड़रिया एँ खूब इनाम दियो और अपनो दरबारी बना लियो।
—–*—–
2. बज म्हारी ढोलक ढमक-ढमक
एक समय की बात है एक गांव में एक ऊंदरो रेतो थो।
वाको नाम चंपू थो। वा की पूंछ घनी लम्बी थी।
ऊ जद भी खेलवा जाय तो वाका साथी ऊनि एँ चिढाय कि- ‘थारी पूंछ तो घनी लम्बी है। जा थारी पूंछ कटा के आ। पूँछ कटा के नी आयो तो तोय नी खिलाएंगे।”
चंपू रोते-रोते घर आ जाय। वाकी महतारी से सिकायत करे। ओकी माँ समझा दे की पूंछ थोड़ी कटवाई जाए।
असा कुछ दिन निकल गया। एक दिन तो सारा ऊंदरान ने चंपू एं खूब चिढायो की जा पूंछ कटा ले।
चंपू एं भी घनो गुस्सो आ गयो। ऊ सुतार के यहां गयो। सुतार लकड़ी का सामान बना रियो थो। चंपू उनद्रों बोल्यो- “सुतार काका, सुतार काका… म्हारी पूंछ घनी लम्बी है।छोरा छोरी मोय चिढाय। खेले भी नी म्हारे साथ। म्हारी पूंछ काट दो तम।”
सुतार बोल्यो- “सुन रे चंपू। तू जिद करे तो पूंछ तो काट दुआं, पन फिर जोड़वा की मत कीजे। जुड़ेगी नी पाछे।”
चंपू बोल्यो- ‘नी कहूँ काका। तम तो काट दो।
सुतार ने कही- “एक बार फिर सोच ले। पूंछ कट जाएगी तो जुड़ेगी भी नी और उगेगी भी नी।”
चंपू बोल्यो- “तू तो काट दे काका। छोरा-छोरी चिढाय तो मोय सरम आये।”
सुतार ने पूंछ काट के फेंक दी। चंपू खुस हो गयो और अपने साथियों के पास खेलवा चल्यो गयो।
वाकी कटी पूंछ देख के सब हंसवा लाग्या। पूंछ कट्यो, बन्डो कह-कह के चिढावा लग्या। चंपू दुखी हो गयो।
दोड़यो-दोड़यो सुतार के पास गयो। केवा लाग्यो- “सुतार काका म्हारी पूंछ जोड़ दे।”
सुतार बोल्यो- “कटी पूँछ थोड़ी जुड़े। तोसे पैलां ही की थी मैंने। अब भग याँ से। मोय काम करवा दे।”
चंपू एं गुस्सा आ गयो। ऊ सुतार की एक छिपटी लेके भग गयो।
चंपू छिपटी ले के जा रियो थो तो वाने देखी की एक डोकरी अपना बाल तोड़-तोड़ के चूला में बाल री थी और रोटी बना री थी।
चंपू बोल्यो- “यो कई कर री डोकरी माँ? बाल क्यों बाल री है?
“म्हारे पास लकड़ी नी है बालवा के लाने। रोटी कसा बनाऊं?”
डोकरी माँ दुखी हो के बोली.. चंपू ने छिपटी डोकरी को दे दी। डोकरी ने पूछ्यो कि- वापस तो नी मंगेगो?
“नी मंगूगाँ।”
डोकरी ने छिपटी जला के चंदिया (छोटी रोटी) बना ली। छिपटी जल गयी।
चंपू आके डोकरी से बोल्यो- “ला डोकरी माँ… म्हारी छिपटी दे।”
“वा तो जल गई, अब काँ से लाऊं? तोसे पेलाँ ही की थी कि माँगजे मत फिर।”
चंपू एं गुस्सा आ गयो। वो डोकरी के कटोरदान में से एक चंदिया ले चलो गयो।
रास्ता में चंपू ने देखी कि कुम्हार को एक छोरो रो रियों।
चंपू ने कुम्हार से पूछी- “छोरो काय बी रो रियो?”
कुम्हार ने की- “वाएँ भूख लगी और रोटी नी है घर में।”
चंपू- ले म्हारे पास है चंदिया। ख्वा दे।
कुम्हार- मत दे। फिर मंगेगो तो काँ से लाऊंगो छोरो खा लेगो तो!
चंपू- नी मंगूगां।
कुम्हार ने चंदिया छोरा एँ ख्वा दी। अब चंपू बोल्यो- म्हारी चंदिया दे वापस।
कुम्हार- अब काँ से लाऊं? छोरो खा गयो चंदिया तो।
तोसे पैलां ही की थी कि माँगजे मत।
चंपू ने गुस्सा में कुम्हार के घर से हंडिया उठा ली और चल दियो।
रास्ता में वाने देखी की एक ग्वालो जूता में पड़िया को दूध लगा रियो थो।
चंपू ने वा से पूछी- क्यों दादा, जूता में पड़िया को दूध क्यों निकाल रिया?
ग्वालो बोल्यो- म्हारे पास बर्तन नी है। कांय में निकालतो? तो जूता में निकालवा लग्यो।
चंपू ने अपनी हंडिया देते हुए कई- ले दादा ए में दूध निकाल ले।
ग्वाला ने कई- रेवा दे। हंडिया फुट गई तो? तू फिर मंगेगो तो काँ से लाऊंगो?
चंपू- नी मंगूगां। ले ले।
ग्वालो हंडिया में दूध निकालवा लग्यो भैंस को। भैंस ने लात मारी तो हंडिया फूट गई।
चंपू गुस्सा में बोल्यो- ला दादा म्हारी हंडिया दे।
ग्वाला भी चिढ़ के बोल्यो- अब काँ से लाऊं थारी हंडिया। वा तो फुट गई। तोसे पैलां ही की थी कि फिर मत मांगजे।
चंपू वाकी भैंस लेकर चल दियो। अब रास्ता में एक नई लाड़ी जा री थी। वा पैदल ही जा री थी। चंपू एं दया आ गई। लाड़ा से के वा लाग्यो- नई लाड़ी के पैदल ले जा रियो। लाड़ी थक के रुक-रुक जा री। शरम नी आ रही?
लाडो बोल्यो- कईं करूं? म्हारे पास गाड़ी घोड़ा तो है नी। काय पे बिठाउँ?
चंपू बोल्यो- ‘ले म्हारी भैंस पे बिठा दे।’
लाडा ने कई- रेवा दे। भैंस एँ कईं हो जायगो तो? तो कईं करूँगाँ?
चंपू ने कई- कईं नी होय। तम तो बिठा दो लाड़ी को।’
लाडा ने अपनी लाड़ी को भैंस पे बिठा दिया।
थोड़ी दूर ही चली भैंस, ठोकर लगी, गिरी और मर गई…
चंपू उन्द्रे ने गुस्से से कहा- ला मेरी भैंस दे वापस।
लाडा के की- वा तो मर गई। अब काँ से लाऊं?
चंपू ने की- फिर थारी लाड़ी के ले जाऊँ?
लाडा ने की- ले जा भाई।
चम्पू लाड़ी एं लेके चल दियो..
थोड़ी दूर गयो तो वाने देख्यो एक ढोली जोर-जोर से रो रियो।
चंपू ने पूछी- काईं लाने रो रियों ढोली दादा?
ढोली बोल्यो- म्हारी घरवाली मर गई। वा के बिना कसां रहूँगो।
चंपू ने कई – या लाड़ी के रख ले। तोय दिक्कत नइं होगी।
ढोली ने कही- या के बदले कईं लेगो?
चंपू ने सामने टँगी ढोलक देख के कही- या ढोलक दे दे दादा।
ढोली ने खुशी-खुशी ढोलक दे दी।
चंपू ऊंदरा खुश होकर पेड़ की डाल पे बैठ गयो और ढोलक बजा-बजा के जोर-जोर गीत गावा लग्यो…
पूँछ कटाई में छिपटी लायो
छिपटी से मैं चंदिया लायो
चंदिया से मैं हंडिया लायो
हंडिया से मैं पड़िया लायो
पड़िया से मैं लड़िया लायों
लड़िया से मैं ढोलकी लायों
बज मेरी ढोलक ढमक-ढमक
—–*—–
3. अरे मेरे भान
एक आदमी थो, दूसरे गांव जा रियो थो। ठंड का दिन था। वा समय मोटर नी चले थी लोग आवाजावा के लाने बैलगाड़ी में या घोड़ा पर जाए था। तो ऊ आदमी घोड़ा पे जा रियो थो।
चलता चलता रस्ता में रात हो गई। उन्ही एं जंगल में ही रात रुक्नो पड़यो। वाने पास में रखी रोटी और चना निकालया। रोटी खुद ने खाई और चना घोड़ा एं ख्वा दिया।
एक ऊंची जगह टीला पर वाने अपनी दरी बिछाई और सो वा लाग्यो। अपने सामने ही एक पेड़ से घोड़ी एं बांध दियो ताकि वा पे निगरानी रखि सके।
आधी रात बीती ही थी कि उन आदमी एं ठंड लगवा लगी। ठंड बढ़वा लगी। ऊने के ओड़वाँ के लाने कईं नी थो। वाने अपनी पगड़ी निकाली और ओढ़ ली। पन वासे भी ठंड नी मिटी।
इत्ते में चाँद भी निकल आयो। ऊ आदमी कदी चाँद एँ देखे कदी घोड़ी को। आदमी सोचवा लाग्यो कि म्हारे पास घोड़ी के बदले खोल (रजाई) होती तो ठंड नी लगती, बिना काम की है घोड़ी। अब कल घोड़ी एँ बेंच के खोल ले लूंगा।
मुश्किल से रात बीती ठिठुरते ठिठुरते। जैसे तैसे सवेरो हुओ। थोड़ी देर में सूरज निकल आयो। चाँद डूब गयो।
धूप लगी तो वा आदमी की ठंड मिटी। वाने सूरज देवता के हाथ जोड़े और हुएं कहने लग्यो-
अरे मेरे भान
तूने बचाये मेरे प्राण
रात को तो उग्यो थो एक शँखढपोल
बिकावत थो घोड़ी
और लिवावत थो खोल।
यही कहते कहते वो आदमी अपने रस्ते चल दियो।
—–*—–
4. मोटी रानी, पतली रानी
एक बुढ़िया थी। वा को एक बेटो थो। बहुत भोलो थो। जो मन मे आये बोल भी देतो थो। वाको नाम भी भोला थो। एक बार की बात है, वहां के राजा की सवारी निकल री थी हाथी पर। भोला ने कदी हाथी नी देख्यो थो। राजा को हाथी पर देख के वो जोर जोर से केवा लाग्यो- ‘इत्ता बड़ा ऊंदरा पे क्यों बैठ्यो राजा? तोय डर नी लग रियो? कूद जा, कूद जा।’
राजा हंसवा लग्यो। सेनिकों ने उन भोला एं दूर हटायो तब जा के सवारी निकली।
राजा के दो रानी थी। एक मोटी थी एक पतली थी।
दूसरे दिन की बात है। राजा रोटी जीम रियो थो। जीमता-जीमता राजा एं भोला की बात याद आ गई। राजा हंसवा लाग्यो। दोई रानी पंखा झल री थी। राजा एं हंसता देख बोली कि हमें भी बताओ क्यों हँसया। राजा ने भोला की पूरी बात बताई तो दोई रानी भी हंसवा लागी।
दोई रानी केवा लागी कि हमे भी मिलनों है भोला से।
राजा ने मना करी, की- ‘ऊ पागल है कईं भी कर बठेगो तो तम दोई एं गुस्सा आ जायेगो।’
पन रानियाँ नी मानी। जिद करवा लागी। राजा ने उनकी बात मान के सिपाही भेज दिया भोला को बुलाने और खुद दरबार में चल्यो गयो।
भोला की माँ एं पतो चल्यो की भोला को रानियों ने बुलायो है तो वा डर गई। वा जाने थी कि भोला भोत गेबलयो है।
गरीब भोला तो एक कपड़ा को टुकड़ों लपेट लेतो थो। और कपड़ा था ही नी वा के पास।
मां ने पड़ोसी से वा की नई धोती ले के भोला के कमर पे लपेट दी। और भोला एं समझावा लगी कि- ‘धोक कर लीजे रानी साहिबान को। फिर वी जैसा वी करे तू भी वसों ही कर जे। कोई गलती मत कर जे… हो!’
भोला ने हांमी भरी और सिपाइओं के साथ चल दियो।
राज महल में सिपाही भोला एं दोई रानी के सामने ले गयो। दोई रानी कुर्सी पे बैठी थी। भोला को मां की बात याद आ गई। वो ने सोची प्रणाम करूँ तो कई कसां समझेगी कि कुन को प्रणाम किया… तो वाने अपनी अक्ल लगाई और हाथ जोड़ के बोल्यो- ‘मोटी रानी तोय प्रणाम। पतली रानी तोय प्रणाम।’
भोला की शक्ल और प्रणाम करने का तरीका देखकर रानियों को हँसी आ गई। भोला को भी माँ की बात याद आ गई कि जैसे दोई रानी करें वैसा ही कर जे।
भोला ने देख्यो रानी हँस री थी तो ऊ भी हँसवा लाग्यो, उनकी नकल करके।
ऊने की हरकत देख के रानी जी जोर से हँसवा लागी। भोला भी जोर से हँसवा लाग्यो।
दोई रानी को और जोर से हँसी आवा लगी। भोला भी और जोर से हँसवा लाग्यो।
रानियां पेट पकड़ के हंसवा लगी तो भोला भी पेट पकड़ के हँसवा लाग्यो।
दोई रानी अपनी हँसी रोकने की कोशिश करने के लिए अपना साड़ी का पल्लू मुँह में दबा कर हँसी रोकने की कोशिश करने लगी।
भोला के पास तो पल्लू नइं था वो तो धोती लपेट के आया था। उसने अपनी धोती निकाली और मुँह में दबाकर हँसने लगा।
रानियों ने उसे निर्वस्त्र देखा तो सिपाही को बुलाकर उसे धक्का देकर महल से निकलवा दिया।
भोला को समझ ही नी आयो कि गलती कहाँ हुई। वो तो माँ के कहे अनुसार कर रियो थो।
शाम को राजा आये तो उन्हें सारी बात पता चली। उनने दोई रानी से कही कि – मैं तो पेला ही के रियो थो पगलो है ऊ तो। तम दोई ही जिद कर री थी वा से मिलवा की।

दोई रानी के की अपनी गलती मान ली। दोई रानी और राजा यो किस्सों याद करके नरई दिन तक हंसता रिया।
—–*—–
5. बदला
एक गांव में बामन और ठाकुर अड़ोसी-पड़ोसी था।
बामन के घर में प्याज लसुन तक नी खाय था पन ठाकुर के यहाँ प्याज लसुन, मांस मच्छि सब खाये था। बामन चिड़े थो ठाकुर की इनी बात से।
बामन मना करतो की मांस मच्छि मत बनाया और खाया करो। पन ठाकुर नी माने थो। ऊ बामन एं चिड़ावां और बना बना खाय थो और अपना रिश्तेदार को बुला बुला के भी खवाय थो। दोई में तनातनी चले थी।
एक बार ठाकुर के घर मिजबान आया। नरई जना आ गय्या तो थाली कम पड़ गई। ठकुराइन बामन के याँ थाली माँगवा गई।
बामन ने थाली तो दे दी पन शर्त रखी कि- मांस मच्छि मत खाजो म्हारी थाली में।
ठकुराइन ने की- हओ नी ख़्वायेगा। कह के थाली ले गई ।
दूसरे दिन ठाकुर को छोरो थाली वापस करवा बामन के घर गयो। बामन ने थाली ले के पूछ्यो- काईं खायों म्हारे याँ की थालिन में?
ठाकुर को छोरो बोल्यो- मांस मच्छि खायों।
बामन एँ जोर से गुस्सा आई। ऊ चिल्ला के बोल्यो- तम दुष्ट लोग म्हारे यहां की थाली ले जा के मांस मच्छि खाओ हो तो मैं तमारे याँ की थाली मंगा के वा में गू खाऊंगा।
छोरो और मोहल्ला वाला सब हँसवा लाग्या। जद बामन एं समझ आई कि गुस्सा में ऊ काईं बोल गयो। ऊ झट घर के अंदर घुस गयो और दरवाजो बन्द कर लयों… सब जना भोत देर तक हंसता रिया।

मधु सक्सेना
मूलतः कविता में मन रमता है और गाहे-ब-गाहे गद्य लिखती हैं। कभी व्यंग्य तो कभी लेख, समीक्षा और कहानी का रुख़ करती हैं। तक़रीबन आधा दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित हैं और अनेक मंचों से काव्य पाठ कर चुकी हैं। समवेत संकलनों में कविता, कहानी संकलित हैं। कतिपय संकलनों का संपादन भी आपके नाम है। अपने दिवंगत पति एवं परिजनों की स्मृति में आपने साहित्यिक/सामाजिक सम्मान स्थापित किये हैं। उम्र के सातवें दशक में हिंदी साहित्य में एम.ए. कर रही हैं।
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