book reading, reader, book, tube in london
#नयेसुर... इस अंक में नियमित ब्लॉग्स के अलावा जो भी सृजन है, सब बाक़ायदा विद्यार्थियों के द्वारा। इस अंक में चार पीढ़ियों के वो रचनाकार शामिल हैं, जो उम्र के विभिन्न पड़ावों पर किसी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत हैं। ख़ास तौर से प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में ये बातें घर-घर तक पहुंचने की हक़दार हैं, जो इस क्षेत्र में ख़ासा अनुभव रखने वाली एक विद्यार्थी के मन में उठती हैं...
आकांक्षा त्यागी की कलम से....

सीखने-सिखाने की आदत और आनंद

            एक दोस्त ने अपनी बच्ची की लिखाई का फ़ोटो भेजकर चिंता ज़ाहिर की कि इसको लगातार दोहराये शब्दों की वर्तनी भी ठीक से नहीं पता!

मैंने याद किया कि वो पढ़ने की शौक़ीन रही है, तो जानना चाहा क्या वो ख़ुद अब इतने साल बाद भी पहले की तरह नॉवल्स पढ़ती है। उसने कहा “कभी-कभी”। मेरी दोस्त की तरह जितने लोग भी पढ़ने के शौक़ीन हैं, वे समझते हैं कि उस पढ़ने में कितना आनन्द है। एक अलग माहौल में खो जाना, पात्रों की दुनिया को उतना ही अपना बनाना जितना हमारी दुनिया है। एक नये परिवेश में अलग-अलग कहानियों द्वारा घूमना और लगातार नये एहसासों की करवटें!

नॉन-फिक्शन या जानकारी-परक किताबों में भी सीखने का आनंद, नया ज्ञान गढ़ने के मौक़े, उन पर और उत्सुक होकर लोगों से नये संवाद करना, उससे जुड़ी ख़बरें या इतिहास को जोड़ पाने की ख़ुशी!

हम इस आनंद और आदत तक ऐसे ही अचानक एक दिन नहीं पहुँचते हैं। इस पर सतत काम किया होता है। अपने आसपास किताबें होने से यात्रा शुरू होती है। फिर आसपास ऐसे लोग होते हैं, जो हमेशा पढ़ते दिखते हैं। कुछ लोग जिनके पास हमेशा पढ़ने की सुविधा नहीं होती, वे लोग तय समय पर किताब के साथ दिखते हैं–जैसे हर रात सोने से पहले! फिर लोग अपनी इस आदत पर बात करते दिखते हैं जैसे सुबह की चाय के साथ अख़बार ज़रूरी है, सोने से पहले रोज़ पढ़ना ही होता है! फिर ऐसे लोगों से जब घर के बच्चे बात करते हैं, तो उनकी बातों में कहानी और किताबों के क़िस्से और जानकारी होती हैं। यह जानकारी एकदम नयी होती है, जिससे बच्चों को उन लोगों से बात करने में मज़ा आने लगता है। वे समझते हैं इनसे बात करेंगे तो कुछ नया सुनने को मिलेगा। बच्चे उनसे और रुचि लेकर बातें करते हैं।

bengaluru, bengaluru reads, cubbanreads, book lovers

धीरे-धीरे बच्चे भी किताबों की तरफ़ आकर्षित होते हैं। ऐसे में सभी का एक कॉमन समय जिसमें वे सब पढ़ते हों, अपने आप बन जाता है। या पढ़ें कभी भी, एक-दूसरे के साथ बैठकर पढ़े पर चर्चा करने के लिए समय निकालते हैं। यह समय एकाएक सबके लिए, ख़ास तौर पर बच्चों के लिए बहुत मूल्यवान हो जाता है, जब वे अपनी नयी जानकारी, अनुभव, ज्ञान अपने शब्दों में सबको सुनाएंगे। इस चर्चा के लिए अगर सभी वयस्क उतनी ही दिलचस्पी से भाग लें, जैसे बच्चे तो सबको आनंद आता है।

ऐसा नहीं कि इसकी अपनी चुनौती नहीं हैं। दिनचर्या जब छूट जाती है, नये अनुभव और टीवी, फ़ोन का कंटेंट जकड़ता है तो ज़ाहिर है कि पढ़ने जैसी पैसिव रुचि पीछे रह जाती है। फिर हममें से कई इस चुनौती से पार पाने की रोज़ कोशिश करते हैं – कि कुछ समय मिले तो पढ़ लें, आज से पढेंगे, कल से शुरू करेंगे! ऐसे में कुछ तरीक़े कारगर होते हैं… जैसे रोज़ दस मिनट पढ़ना – ऐसा टारगेट बनाना जो बहुत भारी न लगे, फिर एक-एक मिनट करके बढ़ाना, या कोई ऑडियो बुक सुनना, बुक क्लब से जुड़ना या किसी को पढ़कर सुनाने को कहना या इसको काम के रूप में लेना।

यह वह आनंद है, हम जिससे भले ही कुछ समय के लिए छूट जाते हैं पर बड़े जतन करते हैं, उस तरफ़ फिर से मुड़ने के लिए। इस आनंद की अनुभूति ही पढ़ने की आदत में तब्दील हो जाती है। और इसके लिए आपने अलग से कोई पहाड़ भी नहीं खोदा होता!

यह है सिखाने का मंत्र

परिवार के बच्चों ने गर्मी की एक दोपहर कहा “चलो, ऊनो खेलते हैं।” मैंने कहा “मुझे नहीं आता”। सारे के सारे टूट पड़े “तो कोई बात नहीं, बहुत आसान है हम सिखा देते हैं”। एक ने नियम बताना शुरू किया, बीच में दूसरे से उनकी पुष्टि की। तीसरे ने बीच-बीच में कुछ बातें जोड़ना शुरू किया। फिर एक ने कहा, हम एक राउंड खेलकर दिखा देते हैं, और फिर नियम बता देंगे। और बच्चों के एक राउंड के बाद हम बड़े भी ऊनो में जुड़ते चले गये और दोपहर से देर शाम हो गयी।

बच्चों को नये बच्चों को जोड़ने के लिए खेल बार-बार सिखाने होते हैं। वे अपने घेरे को बड़ा करते रहते हैं और सीखना-सिखाना बढ़ता रहता है। जब बड़े लोग बच्चों को सिखाना चाहते हैं तो कई बार मौखिक रूप से थ्योरी अनुसार सिखाते हैं। ऐसे परम्परागत तरीक़े कुछ कौशलों के लिए, या एक स्तर पर आने के बाद के लिए सटीक भी होते हैं। अमूमन देखा गया है कि हमने जैसे सीखा था… तीस-चालीस साल पहले, हम वैसे ही सिखा रहे हैं जबकि यह पीढ़ी बहुत आगे की है। संचार माध्यम, तकनीकी विकास और उसके चलते भाषा बहुत अलग तरह से उपयोग में ली जाती है।

शुरूआत में, अधिकाँश कौशलों के लिए डेमो और अभ्यास ज़रूरी हैं। बच्चों को जो सिखाना है, उसको उनके सामने करके दिखाने से, उनको शामिल करने से और उन्हें बार-बार अभ्यास के अवसरों के लिए व्यवस्थित और अनुकूल समय देने से वे बेहतर और जल्दी सीखते हैं। शिक्षण में demo करके दिखाना, साथ में अभ्यास करवाना और धीरे-धीरे बच्चों को जोड़ियों और अकेले में काम करने के तरीक़ों के लिए एक औपचारिक सिद्धांत बताया गया है- Gradual Release of Responsibility। संक्षेप में जी.आर.आर., जिसका सीधा अर्थ है कि सीखने की ज़िम्मेदारी पहले वयस्क की, फिर साथ में अभ्यास से धीरे-धीरे बच्चों पर जाती है। इसको कक्षा या घर में एक सूत्र से याद रखा जा सकता है – I Do, We Do, You Do।

book reading, reader, book, tube in london

उदाहरण के तौर पर अगर बच्चे को पढ़ने की आदत डलवानी है, तो हर रोज़ एक तय समय पर ख़ुद किताब लेकर बैठें और हो सके तो उसको पढ़कर सुनाएँ। अगर हम मोबाइल पर ज़्यादा समय बिताएंगे तो यह शिकायत कि बच्चे किताब नहीं उठाते– असभ्य है। अगर आप चाहते हैं कि बच्चों की अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा दोनों बेहतर हों, तो आप दोनों भाषाएं उत्कृष्ट स्तर की इस्तेमाल में लाएं।

अगर आप ग़ौर करें तो रंगमंच या खेलकूद के व्यावसायिक प्रशिक्षणों में इन तकनीकों को कई बार इस्तेमाल किया जाता है, जहां कोच या विशेषज्ञ करके दिखाते हैं और इस तरह प्रशिक्षु को ट्रेनिंग मिलती है।

ऐसे कई परिवार और शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं, जो “करके देखते हैं” मन्त्र को व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में इस्तेमाल में लाते हैं। और ज़ाहिर है कि वे बच्चे उच्च-भाषाई कौशलों की तरफ़ जाते दिखायी देते हैं। ये बच्चे सिर्फ़ पढ़ाई ही नहीं, बाक़ी जीवन के पहलुओं पर भी तर्क के साथ बड़ों से चर्चा करते देखे जाते हैं। चलिए फिर, यही तरीक़ा अपनाकर देखें!

गप्प, लॉजिक और कहानी का सफ़र

हमारे आस-पास कुछ बच्चे ऐसे दिखते हैं, जो पूरी स्पष्टता और पूरे अर्थबोध के साथ अपनी बात रख पाते हैं। बड़ों तक को आश्चर्य होता है कि 4 साल का बच्चा इतने विवरण और इतने सुगठित वाक्यों के साथ अपने मन को अभिव्यक्त कैसे कर पा रहा है। वास्तव में, ऐसे बच्चों को देखकर आप यह समझ सकते हैं कि वह किन बड़ों के बीच में रहकर पल्लवित हो रहा है।

यदि बच्चों को लगातार सुना जा रहा होता है, उनके सवालों पर ध्यान से, ईमानदारी से जवाब दिया जा रहा होता है, तो बच्चे चार साल की उम्र तक (यानी औपचारिक स्कूल जाने से पहले से) लॉजिक और क्रम का पूरा ख़याल रख पाते हैं। कहानी सुनाने, गप्प मारने, अपनी बात रखने, अपने सपने समझाने या किसी चित्र को बनाने के पीछे की सोच को बताने में भाषा का भरपूर उपयोग कर पाते हैं। वे विशेषण, विस्मयादि-बोधक शब्द, विवरण सबको शामिल करके अपनी बात कह पाते हैं। अनेक प्रकार के भावों को वे वाचिक रूप से व्यक्त कर पाते हैं। शर्त यह है कि पूरे ध्यान से, समय देकर उनकी बातें सुनी जाएँ और उन पर एक शिष्ट ढंग से प्रतिक्रिया दी जाये।

अगर बच्चों पर अनावश्यक रोक-टोक न की जाये और भाषा के भरपूर उपयोग का माहौल दिया जाये तो अधिकाँश बच्चे जो भी गतिविधि कर रहे होते हैं, उसके साथ बोलते हुए पाये जाते हैं। जब खेलते हैं, तो एक उम्र तक अपने आप बड़बड़ाते रहते हैं, या फिर जो काम करते हैं वह भी बोल-बोलकर। अगर फ़िल्म या कोई एनिमेशन आदि देखते हैं तो उसकी कहानी वे एक्शन, भाव, आवाज़ में उतार-चढ़ाव के साथ दोहराते हैं। लगातार बड़ों से कुछ पूछते हैं, जानना चाहते हैं।

यह कौशल बच्चों में विकसित किया जा सकता है। शुरूआती स्तर से ही भाषा और अभिव्यक्ति में बच्चों को नैसर्गिक रूप से सक्षम बनाया जा सकता है। क्या आपके घर/आस-पास के बच्चे समृद्ध शब्दावली, स्पष्ट उच्चारण व भाव-भंगिमा के साथ स्वयं को व्यक्त करते दिख रहे हैं?

akanksha tyagi, आकांक्षा त्यागी

आकांक्षा त्यागी

शिक्षा के बाद पहले 6 साल पत्रकारिता रहीं आकांक्षा पिछले क़रीब 15 वर्षों से शिक्षा में नवाचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। यानी बच्चों के बीच गयीं, पढ़ने-सीखने-सिखाने के तौर-तरीक़ों पर काम किया। फिर पढ़ाने-सिखाने वालों यानी शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया। कभी शोधकर्ता के रूप में राष्ट्रीय स्तर तक के प्रोजेक्ट लीड किये। साहित्य, कला और सिनेमा में रुचि रखते हुए अब दोबारा अध्ययन की तरफ़ हैं। इन दिनों मेरठ विश्वविद्यालय से योग संबंधी पाठ्यक्रम में मास्टर्स कर रही हैं।

1 comment on “सीखने-सिखाने की आदत और आनंद”

  1. Pingback: अंक – 55

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!