
- September 28, 2025
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
महात्मा गांधी और नवरात्रि
हमारी संस्कृति में वर्ष में दो बार नवरात्रि वह सुअवसर होता है जब हम अपना मन-तन का कंप्यूटर रिफ्रेश और रिफ्रेगमेंट कर लेते हैं। नवरात्र पर्व व्रत, आत्मसंयम, पूजा, साधना और धार्मिक अनुष्ठान का पर्व है। दशहरे पर रावण दहन बुराइयों के अंत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
समाज यह सत्य याद रखे इसलिए हर साल सार्वजनिक रूप से रावण जलाया जाता है। गुजरात में गरबा नृत्य के उत्सव होते हैं। गांधीजी ने कभी “नवरात्रि व्रत” को धार्मिक पारंपरिक रूप से नहीं किया, पर वे राजनीति में सदैव अनशन और उपवास की ताक़त से ही विजय प्राप्त करते रहे। उनके जीवन में व्रत, त्याग और त्योहारों के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रहा है।
गांधीजी ने अपने आत्मानुशासन के प्रयोगों में व्रत को महत्वपूर्ण भूमिका दी। उनकी आत्मकथा, “सत्य के प्रयोग” (The Story of My Experiments with Truth) में वर्णन है कि किशोरावस्था में माँ से प्रेरणा लेकर वह वैष्णव और शिव व्रतों का पालन किया करते थे। ज्यों-ज्यों उनकी समझ विकसित हुई, व्रत उनके लिए सिर्फ़ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का माध्यम बन गया।
उनके व्रतों की सूची बताती है उन्होंने राजनीतिक अथवा सामाजिक कारणों से अनेक लंबे अवधि के उपवास किये। चौरी-चौरा घटना के बाद हिंसा की निंदा के लिए, हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक उथल-पुथल के समय शांति बहाल करने के लिए, अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ व अन्य अनेक अवसरों पर गांधी जी ने उपवास को ही अपना अस्त्र बनाया। गांधी की विचारधारा में यह द्वंद्व नहीं कि व्रत धर्म से बाहर हो, बल्कि उन्होंने व्रत के धार्मिक और नैतिक आयाम को स्वीकार किया, उसे महत्व दिया।
ऐसा कोई इतिहास नहीं कि गांधीजी ने विशेष रूप से नवरात्रि व्रत को राजनीतिक या सार्वजनिक रूप से मनाया हो। त्यौहारों में भाषण देना या धार्मिक आयोजनों का नेतृत्व करना उनकी फ़ितरत में नहीं था। इतिहास मिलता है लंदन में भारतीय समुदाय के एक दशहरा उत्सव आयोजन में, जहाँ गांधी जी और विनायक दामोदर सावरकर को “दशहरा समारोह” का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिला, उस अवसर पर गांधी ने भगवान राम की अहिंसात्मक भूमिका की चर्चा की थी और उन्होंने शर्त रखी कि भाषणों में धार्मिक-राजनीतिक प्रचार न हो। इस प्रकार दशहरा के धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में भी गांधी जी की उपस्थिति अधर्म पर धर्म की विजय के प्रवक्ता रूप में मिलती है।
उन्होंने त्याग, सत्य, अहिंसा, आत्मनियंत्रण के जो मूल्य दिये वे भारतीय संस्कृति से ही प्रेरित थे। गांधी जी ने नवरात्रि व्रत या दशहरा उत्सव को पारम्परिक भक्तिपूर्ण तरीक़े से प्रमुखता नहीं दी, परन्तु उनके विचार में आत्मशुद्धि और स्वयं को सामाजिक लक्ष्य से जोड़ने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई, उसमें यही नवरात्रि, दशहरा जैसे पर्वों की पारंपरिक साधना रही। यदि गांधी के सिद्धांतों का अनुकरण किया जाये, त्याग, संयम, अहिंसा, सभी के लिए समान भाव से दशहरा, नवरात्रि पर्व मनाया जाये तो हम गांधी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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