
- October 31, 2026
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(कहानी, ललित निबंध, लोककथा, इतिहास के साथ ही अन्य साहित्य लेखन के लिए ख्यात रहे डॉ. मंगल मेहता (31.10.1931) की इस कहानी से पहले जानिए कि हूण तिब्बत की घाटियों में बसने वाली जाति थी। जिसने यूरोप, ईरान पर आधिपत्य किया। फिर भारत में प्रयास किये। सन् 499 ई. में हूणों के राजा तोरमाण ने गुप्त साम्राज्य के पश्चिमी भाग गंधार, काश्मीर, पंजाब, राजपूताना, मालवा और काठियावाड़ पर पूर्ण अधिकार कर लिया। उसके बाद उसके पुत्र मिहिरकुल ने राज्य सम्हाला। वह बड़ा ही अत्याचारी था। पहले बौद्ध था, बाद में कट्टर शैव बना। दशपुर (अब मंदसौर) के यशोधर्मन ने सन् 532 ई. में उसे हराया। उसे अपना राज्य छोड़कर काश्मीर भाग जाना पड़ा। उसी घटना के आधार पर मालवी में लिखी गयी यह कहानी 1976 में प्रकाशित मालवी गद्य में प्रकाशित हुई थी।)
विवेक मेहता की प्रस्तुति....
अण-भींग्यो हूको तलक: मंगल मेहता की मालवी कथा
सूरज नाराण ने जातां-जातां पाछे नार्यो। ठगठगा रह ग्या। धरती का मनख, जनावर, परेवा सब हाथ पग हलावता मेनत में भिड़या था। अणा की मेनत की मठठ पर पाणी फरीग्यो। राती-पीली-तडम्बी नरमाती किरणां देखीने चम्पा को एक फूल हँसी पड़यो। वी हरमाता चल्या गया। अंधारा की लेरां रई-रई ने आवती री।
गाड़यां ने आमली, लीमड़ी, आमड़ी का रूंख देखीने मुकाम कीदो। बलदयाने बावड़ी पर बई ने पाणी बतायो। वणा की बंधी तकी घंट्यां गीत का कड़ावा हरीखी, हुवावणी लागती थी। दो गाड़्यां ने हात मनख। दसोर का माजी सा. ‘गौतमनाथ’ का दर्सन करीने पधारी रया था। भजन, देवदर्सन में लाग्या रेता था। गाड़यां अणी तरे ती ऊभी कीदी की रस्ता के आड़ी आड़ वइ जा। दूसरी आड़ी बलद बाँधी दीदा। चारो-पूरो नाखी दीदो। बीच में असल चौगान वई ग्यो। एक चाकर ने खोड़या ती जगां साफ करी दीदी। पाणी को छड़काव करी दीदो। हालरयां वछाई दीदी, ऊपर जाजम।
‘विराजो’
माजीसा गाड़ी ती नीचे उतरया। यें वें चोख्यो। बोल्या -‘गाड़ी में बैठा बैठा पग बंधी ग्या, थोड़ी देर हरूं फरूंगा।’
माजीसा जात्रा में गाम में मुकाम नी देता था। एकटेम रसोड़ा अरोगता था। जोग लागी जा तो एक कटोरो दूध पी लेता था। कणी ने ‘ऊ’ नी केता था, पण मजाल जो काम में जरा ढिलाई आई जा, चाकर ऐल-फेल करवा लागे।
नीला चादोबा में वाटकां जूं दरपता दरपता तारा झांकवा लाग्या। चाकर ने चारा-पूराती मशाल लगाई ने लोड़ाकी हाँट में लगाई ने वणीने जमीन में गाड़ी दीदी। फोरो पातरो उजास वइ ग्यो। मशाल की झार नाचवा लागीने ओछाला ने नचावा लागी।
चाकर बाजोट ने पाणी को मम्मण लई आयो। घूमता-घूमता माजीसा रुकी ग्या। बोल्या- ‘गाम तो रणियारो लागे। गाम की गत गोयराती। लोग बाग मेनती मालम पड़े’
‘हाँ,अन्नादाता ! धम्माजी के हेमाड़ा को गाम है’
‘जदीज। हुणता था के वणां को ‘चोकोरो’ मोती नीपजे, आज आंखां ती देखी लीदो’
‘दन रात दौड़ता रे। काम इज काम। हुवती वगत घोड़ा की पीठ छोड़ता वेगा। खोटी नीत वारा की अठे नी चाले। खूब धाक, दुश्मणां ने भूलोट कराइ दीदी। वणी जगां की नाम ‘भूलोट’ वइ ग्यो। अतरा हुंश्यार, वीर, मरद….’
‘लाखीणो आदमी’-माजीसा ने जुवाब दीदो। वी हाथ पग धोवा लाग्या। जगरो चेती ग्यो थो। दार वाटयां की त्यारी चाली री थी। एक जणो गाम ती दूध, चावेतो सामान लेवाग्यो। एक सावचेती ती ऊभो थो।
कुल्ला करया के चाकर ‘हस्ताड़ो’ लइ आयो। पीवा को पाणी छाणी ने लई आयो। घूंट खाण पाणी पी ने विछावणां पर आई बैठा। कंडया में ती भगवान को चितराम काड़यो। आंखां मीची ने ‘नाम-ठाम’ लेवा लागा।
‘कूण ?’ – रखवारो बोल्यो।
‘म्हू धम्मो। कठाती आई रया भई ? दोई गाड़यां है भई। पड़ाव गांम में नाखता ?’
‘पायलागों अन्नदाता। दसोर का मजीसा जात्रा ती पधारया’
‘दसोर का माजीसा, वा भई वा। जा ने संदेश पोंछाव के धम्मो चाकरी में ऊभो है। नचीता रे, म्हू चौकसी राखूंगा, पूरो विसास कर’
चाकर पाछो आई ने वणां ने लइ ग्यो।
‘चरण छूवूं माजी सा.’
‘जीता रो, जग में जस लो’-माजीसा, आपणी जगां ती उठी बैठा व्या,आगे बोल्या-‘पधारो, बिराजो’
‘कई भूल वी व्हे तो छमा करो। कांकड़ में मुकाम कीदो या बात जची नी। मेरे गांम।’
माजी सा. हँसी पड़या। बोल्या- ‘कुंवरजी, ओलमा रेवा दो। आपको जस हुणती थी, आज आंखां ती देखी लीदो। भगवान आपने खूब जस दे। एक म्हाके बी…’ – बोलता-बोलता माजीसा. छाना माना वई ग्या।
वणां ने दूरा ती झुकी ने धोक भी दीदो।
‘जीता रो, यो कई करो। म्हुं लुगाई की जात, कां पाप में घसीटो। आप राजा।’
‘बड़ा सदा बड़ा रै। वणां की आसीस ती जनम कारथ व्है।’
‘वात याद आईगी। आपका दादा सा दसोर ती चल्या आया था, खटपट वईगी थी। वणां ने यें राज थाप्यो, ठाठ-बाठ कीदो। देसदेस में नाम उजागर कीदो’
‘आपकी बात काटूंगा नी। जस आपको भी घणो है। काने भणकार पड़ी है। घर का लोग-टाबर तक आपको नाम जपता रे। म्हां की विवशता, दसोर आई ने दर्सन नी करी सक्या। आप बारकां की खबर लो -या विनती है’
‘म्हू जात्रा में गाम में नी ठेरूं। दसोर में भी प्रसादां ती अलग रुं। धरती मां आप लोगां की, आप लोग अणी का रखवारा। अणी को दीदो खई रया, अणी की सौरम लूटी रया। आवतांज म्हने आपकी भोमका को वखाण कीदो,का रे भई?’ चाकर के आड़ी नारयो। फेर बोल्या-‘यो भी जस गातो लाभ लुई रयो थो’
कंई रूप, कंई डीलडौल, होना की मूरत जाणे। ओप भलको मारे। वचनां में अमरत, सुभाव में ढीमोपण, हिंवड़ो आगे की वात होचे। मनती सबके वाते, आसीस फूटती, सागू-साग कल्याणी देवी। देखतो-देखतो आदमी बंधी जा। माजीसा. का बदनती हँसी की उजास ने आणंद की गंध उमगती रे। बापड़ो अंधारो तक न्याल वइग्यो।
धम्माजी अवश्या वई ग्या। वणां ने फेर माजी सा के धोक दीदी। रज उठाई ने माथे चढ़ाई। बोल्या- ‘म्हारो जनम धन्य वई ग्यो। अठे मुकाम दीदो, म्हारो बड़ो भाग। चोकोरो पवित्तर वई ग्यो ‘- बोलता-बोलता गलगल्या वई ग्या।
‘संगेती-साथी, परिवार, घर आणंद में? इरावल का लोग मजा में?’
‘आप पधारो, देखो। खामी पर फटकारो, काम पर आसीसो’।
चाकर आई ऊभो व्यो।
‘कां भई ? बोल’
‘दो जात्री बान्ने ऊभा है दरसन वात्ते’
‘जात्री ? राते ?’- बदन पर छाया छवाई नी छवाई के पाछी जाती री।
‘घणो क्यो, पण अड़या है। मथराजी-गोपाचल आड़ी ती आई रया। आपका दरसन वात्ते दसोर भी रुक्या था। घोड़ा का असवार, जोश भरया, बड़ा घराना का मालम पड़े’
‘राते तो कणीती नी मलूं हूं, मालम है, फेर ?’
चाकर ऊभो थो।
‘धम्माजी आपणां वंश का, देवरलाल। धरम का अवतार। अणां की भोमका में मुकाम कीदो, अणांती मलवा की वात दूसरी…’।
‘म्हूं विनती करुं?’
‘बोलो’।
‘म्हूं सेवा में हूँ, नचिता रो। वी दूराती आया, दसोर भी रुक्या। दरसन के वात्ते। बुलावा में कंई बांधो नजर नी आवे’
‘जा भई, बुलाई लाव। घोड़ा मुकाम पर बांधजे। रसोई-पाणी करावजे। साव-चेती राखजै। पारवती का नाथ, लाज थारे हाथ’
‘राम-राम। चरण छूआं’ – केता दोई ने धरती पै माथा टेक्या।
‘राम-राम। कठाती आई रया, कठे जावोगा ?’
वणां ने धम्माजी आड़ी देख्यो,छाना माना वई ग्या।
एक ने भगवान शिव की मूरत भेंट कीदी।
हाथ में फरसो, भगवान को तेजवान रूप, जाणे तीसरी ऑंख खुलवावारी।
‘मथरा-गोपाचल ती आई रया। मांडलिकजी ने पठायो’
‘आगे बोल, अठे कोई परायो नी है’
‘तोरमाण के अथ्याचार की वातां हुणी वेगा। वणी को छोरो भी डेढ़ो हत्यारो निकरयो। नाम भगवान शिव को ले पण मनखां की हत्या करे। गाम का गाम बारी नाख्या। लोग मारया ग्या। धरती उजाड़ खंड वईगी। बारक बिलखे, लगायां आसूंडा नाखे, वणांती रोवा की नी वणी आवे’
दूसरो बोलवा लाग्यो- ‘अन्नादाता, म्हाने भेज्यो के देस में, मंडल में, विषय में, जठे-जठे भी वीर, धरमी, करमी व्हे वणां ने जगावो, चेतावो, नोतो। अत्याचारी ने ललकारे। धरती मां ने मोक्ष देवाड़े। परम भट्टारक, महाराजाधिराज, सकल उत्तरा-पथनाथ, बालादित्य भानुगुप्त महाराज भी…’
धम्माजी हँसी पड़या। ऊ बोलतो-बोलतो चुप वई ग्यो। धम्माजी ने आपणी भूल मालम पड़ी, बोल्या- ‘आगे बोल भई’
‘दसोर को नाम हुण्यो। हूरज मंदर भरतखंड में उजास करी रयो। वीर, साहसी मनखां की कमी नी अठे। दसोर रुक्या था, देख्यो वठे तो कई सावचेतीपण नी लाग्यो। हत्या, अत्याचार को बदलो लई सके असो मालम नी पड़यो। छिमा करो, बात जीभ पर आईगी। आस लई आया था। बढ़तो-बढ़तो हत्यारो अठे भी आई सके, हुण्यो, लोग रस रंग में डूब्या है।’
‘भीड़-पीड़ की कलपना नी है-हांची वात। अवन्ती विदिशा, ऐरिकेण, कतराई, बड़ा राज, वी कई करी रया भई ! हिमालाती बिरमपुत्तर तक कई जोश नी-कां भई? गोविन्दगुप्तजी को नाम हुण्यो-वी तो छाना-माना नी बैठी सके? महाराजा, राजा, उपराजा, मांडलिक, सामंत, सेनापति कतराई है-फेर ?’
‘त्यारी चाली री है। लाखां की सेना ने नया-नया आयुध लई ने आयो है मिहिरकुल। हत्यारा को नाम लेतां धिन वै। त्राही-त्राही मचाई दीदी। अठे बैठी ने नी होची सकां। आंखों ती देखी ने आई रया। दसोर को नाम हुण्यो थो। यशोधर्मन जी को नाम हुण्यो थो। वी वीरां ने नोती सके, सेना सजावे…’
माजीसा. बोल्या कोनी। धम्माजी धूरा में रींगटा मांडता रया-आढ़ा-टेढ़ा।
‘कणी की वात करी रया?’ -जाण करी ने माजी सा. ने पूछयो।
‘यशोधर्मन की वात थी। जणां पां आपणी इरावल है। वीर, साहसी, जणां को नाम हुणतां घोड़ा तक पाणी पीणो छोड़ी दे। देस-देस में जणां का न्याय को जस है’
‘हमजी। धम्माजी की वात करी रया’ -मुस्कराता बोल्या- ‘ई बैठा तो है’।
दोई उचकी पड़या। दूरा जई माथो टेक्यो। धरती पर बैठी ग्या।
‘अरे, वठे नी अठे बैठो।’
‘भूल पर ध्यान मती लगावो, छिमा करो’ -दोई बोल्या।
‘देवर लाल, म्हारी बात पर भी ध्यान मती दो। आदमी के हामें जस गावाती उमर ने जस कम व्है-यो जाणूं हूँ, पर अचान्चक ई वात करवा लाग्या, म्हने आणंद आई रयो थो तो रोक्यो कोनी…’
‘कीड़ी पर पंसेरी की मार। कांटा में घसीटवा लागा आप तो। म्हूं तो दसोर को चाकर, आपको चाकर…’
‘हुण रे भई, थारी वात हुणी। वखत पर वणी आवेगा सब करांगा। दसोर आपणो नाम नी डूबवा देगा। कां धम्माजी !’
‘आपको आसीस तो यो सीस त्यार है’
‘जाओ विसराम करो। आगे कठे जाओगा?’
‘गुर्जर देश’।
‘ठीक। कांकड़ है- कंई खामी व्हे तो ध्यान मती दीजो। थांकी मूरत को ध्यान है। वणी का भाव ने अरथी री हूँ। शिवजी-हाथ में फरसो, तेजवान, तीसरी ऑंख खुलवावारी है ने दुश्मन… म्हू पेर रातती चाली पडूंगा, थीं तो रुकोगा, भाग फाटयां पाछा चालोगा’
‘आपके जागतां चाली पड़ांगा। ठेरवा की वेरां नी है अबार’- दोई चल्या ग्या।
‘पारवती का नाथ, लाज थारे हाथ। आप ध्यान लगावजो, त्यारी करजो। बुलावा पे दसोर के हाथे आवजो। म्हूं भी लोगां ने चेताऊंगा, भेरा करूंगा। जाणजो के सेनापति आप हो। वायरक्खितजी का नाना दत्तजी की भांत। वणां को जस गमकाई रयो है। वणां ने मठ वणावा की मानेती कई दीदी, भीड़ आई पड़ी। मठ आछो वण्यो। कुंद का फूलां के माफक गणा तो बुद्धजी के धरम के कारण वणी ने श्रमणी केवा लागा। छोड़ो इ बातां। कदी नी खूटे। दसोर को मान थांके हाथे है। कई कू?’ आपणी जगां ती उठयो। कंडया में ती पूजा को कंकू निकारयो ने वणी को हुक्को तलक करी दीदो। ‘धरती माता की आण की वात, लाज को सवाल है। छोरा-छाबरा, लुगायां-लोग ने हत्यारा ती वंचावणो है’
धम्माजी हक्का-बक्का। झुकी ने चरण छुया, चरण रज माथे चढ़ाई।
‘आगे चरण नी छूआ दूंगा। जीत्यां पछे असीसूंगा’।
‘कुँवर…’
‘जाणूं जनम ती। दसोर की चौकसी राखी ले-घणी वात। अबार इज वी कई कइ ग्या ? वीर आगो पाचो ध्यान में जरूर राखे पर ऊंडा नी उतरे। ललकार हुणीने मूंडो दुबकाई ने नी पड़या रे। डकारे ने ललकारवा वारा घमंडीने पछाड़े। आच्छी वात, पधारो, रात घणी उतरी आई’
धम्माजी धीरे-धीरे चाल्या।
सागू साग देवी। आपणो जाण्यो करावे। भार आई पड़यो। कदी नी होच्यो थो के… भगवान लाज थारे हाथ है।
°°°°°
हुणनोज थो। माजी सा हुणी रया था।
आरया में भगवान विराज्या था। हाथ में फरसो, तेजसी रूप, दुश्मणां पर तीजी ऑंख खुलवाज वारी जाणे…..
कुँवरजी भरया वादरा हरीखा आया ने तड़ातड़ वरसवा लाग्या। माजी सा रई-रई ने मनू मन हँसी रया था।
कुसुमाल, गाद्यां का नार, हाथ वतावा को अवसर आयो तो रीं रीं करी रया। मन को कई करो। सत्ता को लालच असोज वे। छूटे नी। आपणी ऐब ने दबाड़े, दूसरां की भलाई में ऐब करी ने परचारे। आछो खाणो, पेरनो, ओढ़नो, ऊंची मेड़यो को रेणी छूटी जा। अणी ती मन डाबकडूब करतो रे। भागणो पड़े-दन ने दन, रात ने रात नी गणनी पड़े। अणी वात्ते ठेको लइरया। शांति की पोंकाड़ पाड़ी रया। असाज लोग हांची झूठी करे। चोर ने साहूकार वणावे। हांची क्यो-ऊंदरा ला में नी बरे कदीज।
‘आपको हुकम राख्यों तो मौत गरे पड़ी। नी मठ वणावा की मानेती देता, नी वू राक्कस आवतो। हुण्यो के गाम-गाम उजाड़तो, ला लगावतो आई रयो। वाद्दी की लपटां जूं वणी की सेना तैस-नैस करती बढ़ी आई री। आपणी छोटी सी सेना ? दसोर का ऊंचा-ऊंचा भवन, कमलां शोभ्या सरवर, वाग-बगीचा, घाट-मंदर अणा सब को कई वेगा ? हुण्यो के आप जातरा पर पधारया था तो धम्माजी आपती मल्या। या वात भी मिहिरकुल पां पोंछी। आप तो भोरा-आप हरीखा सब ने हमजो। कंई विनंती करुं, धम्माजी का दांत दसोर पर है। म्हने मटियामेट करणो छावै। वणां का दादाजी भी कम कुचमाती नी था’
‘आपणी-आपणी हमज है कुँवरजी। जातरा के वखत वणां के हेमाड़े मुकाम कीदो थो। वणी वखत राते थोड़ीक देर वात्ते आया था। विनती करता था-गाम में चालो। परोड़े तो बठाती चाली पड़या था। वी ने वणां का हंगेती दसोर के नाम वात्ते लड़े तो आनंद की वात। वी दसोर नी लई सके। थां भी कंई कम हो सूरमा। दसोर की कमान आपणे हाथे राखो। वणां ने आगे मोकलो। जोश ने मान वात्ते सेनापति वणाइ दो। आपणां वंश का। अणी वात्ते म्हूं राजी करी लूंगा। ललकार आई तो पाछे पग देणो ठीक नी। दसोर कदी कायर नी रयो। सुखां के खातर जीवणो धिक्कार है। हेमत नी, तो नी धन रे, नी ढोल्यो रे, नी सुख-शांति। हेमत की बारी है। आप वीर, हमजवार, म्हूं लुगाई की जात-भीतां में बंद रेवा वारी, हवा लागे तो अक्कल भी उकसे। आदमी भांत-भांत का मनख देखे, तरे-तरे का ती काम पड़े-रगरग ने राई-राई हमजी जा। काम पड़े तो आंखां में ती काजर काड़ी लावे। वादरा ने फाड़या पछे टांको भी दई दे। काचो मन कां करो ? दसोर को बच्चों-बच्चों थांके हाथे। तन, मन, धन देगा। म्हूं भी भागदौड़ करुंगा। एक पल भी बेकार मती खोवो। काम में लागो, त्यारी करो, पधारो। धम्माजी दसोर का मालक नी वेई सके-खातरी राखजो।’
कँवरजी उठया। रुक्या-कई केणो छावता था पण वगर बोल्यां चल्या ग्या।
माजी सा घूमवा लाग्या। मन में उकारयां उठी री थी।
‘पारवती का नाथ। लाज थारे हाथ। कूण है?’
नानीकसी नानी आई ऊभी वी।
‘खीमजी ने मोकल’
‘अन्नदाता’
खीमजी आई ऊभा व्या।
‘वीजरी की चाल जावो ने भूत्यारा की चाल आवो। धम्माजी ने बुलाइ लावो। यो कणी ने मालम नी वेणी छावै।’
‘अन्नदाता’
माजी सा घूमता रया। बोल्या-अरे, हुणो तो’
फेर वा नानी आई। बोल्या- ‘घोड़ो त्यार कराव’
घणां दन बाद माजी सा ने घोड़ा ने याद कीदो।
घोड़ा पर बैठी ने बोल्या- ‘म्हूं तो जीमूंगा नी, पर रसोई त्यार राखजो। खीमजी के हाथे वारा ने पूरो आदर दीजो’
घोड़ो दौड़ावता दूधी ताल आड़ी निकरी आया? डावे बाजू थेलियो ताल लेरां लई रयो थो। यें का मानेता लोगां ती मली लेगा तो कतराई जुझारू त्यार वई जागा। एक के लारे पचास त्यार।
गाम में पोंछया तो लोग न्याल वई ग्या। अतरी उमर में माजी सा घोड़ा पलाणी ने पधारया- खजीत वड़ी वात है।
‘चालो रे चालो, जूझवा चालो’-हांक पड़ीगी।
माजी सा के लारे कुँवरजी भी आवता तो और वात वणी आवती। हुण्यो रे भई, धम्माजी भी पूरी त्यारी करी रया। बेटो ‘मेरकुल’ आवणो भूली जागा। मां को दूध याद आई जागा- मूंडे-मूंडे वातां, तरे-तरे की वातां। उमावा भरी वातां। मालवा ने मालवी के परिचै की वातां।
आवतां आवतां माजी सा ने पेर रात चलीगी।
धम्माजी बैठा था, ऊभा व्या। वणा ने याद आइगी। दूरा ती राम-राम कीदी।
‘राम-राम। जरा बान्ने निकरीगी थी। देर वईगी। लोग आपणे मेंज मगन के जगत देस आड़ी भी ध्यान है-देखूं तो’
‘ठीक’
‘एक पल भी बेकार खोवणो पाप है। बखत असी आई पड़ी। आपको काम ठीक चाली रयो।’
‘भगवान की किरपा है। गाम-गाम में उमंग है। शस्तर की त्यारी है। अन्न भी भरी रयां हां। भाग, दाय, वसूली लीदो है। मुट्ठी-मुट्ठी ने मटकी-मटकी धान और वसूली रयां हां। धन की जरूर कमी रेगा…’
‘धन की कमी नी वेवा दूंगा। खातर राखजो। एक-एक मनख को सहजोग लो। वणां को काम, राजी-खुशी सहयोग देगा। अबार एक काम ती याद कीदा’
‘अन्नदाता’
‘कुँवर ने भरम है के आप…’
‘हमज्यो, म्हूँ म्हारे हेमाड़ा में मगन दसोर आड़ी नजर नी नाखूंगा। वणां की वात पर आपने विसास आइ ग्यो कई ? हाँची वात-गोडो पेट आड़ीज नमे। म्हारी भी विनती है- घणी वातां रची ने परचारी रया। असा में काम कसरूं व्हे। महूं तो मन हमजाई लूं, सबर राखी लूं पण दूसरां को कई करूं। टांग खैरी रया। फां फंसाई रया।’
माजी सा बोल्या-‘देवर लाल, म्हने हमजवा को जतन करो। म्हूं आंधो कूकर, घट्टी के ओरे-दोरे जूंनी हूं। पूतती वालो म्हने दसोर है। वणी की साख वाली है। कुँवर आया था, आपणो रोवणो रोइग्या। म्हने वणाने हमजायो-वो सूरमां आपणे में मगन। तन, मन, धनती दसोर का नाम पर जूझेगा। पाछे नी रेगा। थी होंपोगा तो आगे की कमान हमारेगा। वी राजी वई ग्या। या खबर देणी थी। हुण्यो के मिहिरकुल एक दो मीना में आइ पड़ेगा। मच्छराज, हाड़ौती ने चामली-दूरी कतरीक रई गई? पूरी त्यारी रैणी छावै’
‘दसोर को नाम प्यारो है। म्हारे पै भरोसो लावजो। एक दूसरा की टांग खेंचवाती शत्रु ने लाभ मलेगा’
‘या वात वणां ने कई दूंगा। म्हारो विचार है, वणी ने आपणा हेमाड़ा में ती घुसवा दो’
‘चोखी वात। म्हूं भी असोज होचूं हूं। म्हूं भी भटकतो रयो। चामलां की पूरी भोमका ने रूंदी लीदी’
‘चामलां की खो में जुझारू बैठाइ दां, चौकसी राखे। वू आयो के चारी आड़ी ती टूटी पड़े। मारकाट मचाई दे ने चौक नी बंधवा दे। जीत का नशा में भान भूल्यो तो हे ही…. ‘
‘चितोड़ नगरी, नपाण्यो, कांठल, वागड़, यूं हमजो धरऊ, लंकऊ-सब आड़ी को लाभ मली जागा। लोगां के डीले एक बार भैरूजी छड़ी जा फैर नचीता’
‘म्हूं भी घूमती रूंगा। दसौर की लाज थांकी-म्हांकी लाज की वात। कुँवर की कणी वात पर ध्यान मती दीजो। सूरमां छाया के ओछला ती डरपी मरे कई। वणां ने मीठा भोजन, आछा पैरण, रागरंग की चिंता हे-अणी ती दुखी वई रया। सत्ता को सुख असोज मन वणई दे। अबार वणां के मन में कई कुशंका नी वेवा देणी। देस को रखवारो आपणाज बेटा बालूडा में उरझयो रे, वणां कीज वात चलावतो रे तो देस के हाथे धोखा करे। नरक में जगां नी मले असा ने। थांके विसास पर तो म्हने घूघरा बांध्या है। मनती कई री या वात…’
‘म्हारे आड़ी ती कोई कमी नी रेगा। आगे भगवान है’
‘ठीक। भोजन अरोगो’
धम्माजी हँसी पड़या। बोल्या- ‘आप म्हारो नेम भी जाणता व्होगा’
‘मुरजी। नोरतां पछे चामलां के भड्ड में जई जमणो है। धन, धान शस्तर, लोग कणी की कमी नी वेगा। नचीता रीजो। राम-राम’
‘राम-राम’
‘पारवती का नाथ, लाज थारे हाथ’
घोड़ा की टापां भी थोड़ीक देर हुणाती री। रात, अंधारी रात, रात को हत्यारो हन्नाटो….
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रात पसरती जई री थी।
गाम में कठेक नानकडया दीवा टमकता था।
चाकर ने घोड़ो हमारयो। आम्बावारी वावड़ी पर सब पोंछया। रूंखड़ा के नीचे माजी सा एक आडी पसरी ने बैठा था- थकेलो गराई रया था। चालिसेक कोस को फेरो वई ग्यो थो। जुझारू लोगां ने त्यार करणा, मौकाबन्दी करणी, धान, शस्तर पुगावणां।
‘अन्नदाता, गेला में हुण्यो के आपणी जीत खजीत है। पेले पार जुद्ध घमसाण चाली रयो’
माजी सा हुणता रया।
‘घणी मारकाट मची री। शत्रु सेना एक पाउन्डो आगे नी बढ़ी सकी।’
‘रसोई को लम्बो खटकरम मती करजो। आज तो थूं भी थाकीगी व्हेगा। पन्ने लक्को ने घोड़ी में वक्को’
‘नी सा, म्हारा ती डेढ़ी फेरी तो आपने कीदी’
‘एक आई ने चौकसी करी ग्यो-कूण हो. कठे जावोगा, कठाती आया, कणी काम पै निकरया, हंडे कतरा आदमी…’
माजी सा एक आखर नी बोल्या। अतरोज क्यो-‘यशोधर्मन’
वू झुक्यो ने माथो नवायो- ‘छिमा करो। और सेवा ?’
‘होंप्यो काम कर। काम में जरा भी पोलमपट्टी मती राखजै। जा भई’
रसोई अरोगी। पग लम्बा कीदा था के घोड़ा की टापां हुणावणी शुरू वी। उठी बैठा व्या।
‘राम राम माजी सा। होदतां-होदतां घणो भटको पड़्यो’
कोई आवाज नी आई।
‘म्हूं हूं धम्मो’
‘पधारो। डाबे बाजू नीकरी आवो। अरे घोड़ा हम्मार’
तीन, चार घोड़ा आई ऊभा व्या।
‘आप अबार अठे कां ? आपने तो वठे वेणो छावतो। या तो चोखी वात नी है’
‘घबराओ मती। मन छोटो-मोटो मती करो। काम वई ग्यो। कठे हे रे भई माजी सा के चरणां में नाख’
एक घोड़ा पर ती मुश्क्यां बंध्यो आदमी ने उतारयो। वणी का हाथ खोली दीदा।
‘माथो टेक राक्कस। यो मिहिरकुल है। काश्मीर ती लगाई ने नरमदा मैय्या तक आतंक मचावा वारो हत्यारो। गाम-गाम उजाड़वा वारो चांडाल, जगां-जगां ला लगावा वारो राक्कस, लाखां ने मौत के मूंडे मलावा वारो अत्याचारी। यो पहाड़ां पै हाथी धकेलाई ने वणी की दरदभरी चींघाड़ को आणंद लेतो थो’
‘कई वात करी रया हो, देवरलाल ? विसास नी आवे। कोई छल तो नी है?’
‘पड़ताल करी लीदी। चांमला के वठे जुद्ध चाली रयो है। अणी ने चरणां में पटकणो थो जो लई आयो। हीदो ऊभा रे, मरयो-मरयो कई ऊभो है’
‘पारवती का नाथ जय हे। थारी अराधना में कंई कसर नी राखूंगा नाथ’
शिव को नाम हुणतोई वो चौंकी पड़यो। मुरदा पै जाणे अमरत का छांटा पड़ी ग्या। झुकी ने परणाम्यो-‘म्हूं भी भगवान शिव को सेवक। म्हारो माथो वणां के सिवा कणी के आगे नी झुक्यो। आपने परणाम करुं।’
‘हुण जो कक्कजी का लाड़ला वासुलजी, वातां तो आछी करे। फेर अतरो गरब कां? अत्याचार कां? सबमें भगवान की दीदी आतमा है’
‘सत्ता को नशो अशोज् व्हे’
‘म्हूं दोयां के चरणां मैं म्हारी लेराती वालां की लटा में अटक्या फूल अरपूं माथो झुकाइने। तोरमाण राजा को बेटो मिहिरकुल, जणी के हामे पर्वतराज को मान भी खंडत वई ग्यो। जणी को शीश त्रिपुरारी भगवान शिव के सिवा कणी का चरणां में नी झुक्यो वो आज शिवभगत आपके चरणों में… शीश नवायो’
‘थूं समराट हे रे? असो-कसो? और असो-कसो भगवान को सेवक। भगवान तो दुष्टां को दलन करे, थूं लोगां ने मारे, तावड़े, धिक्कार हे थारो जनम। थारी मां लाजां मरती व्हेगा। मां के हिवड़ा की वात म्हूं जाणू हूं।’
‘यो तरकल्यो दांतां में, आपकी गौ, छिमा करो। आगे कणी की हत्या नी करुंगा। आपका राज हामे नी नारूंगा।’- व्हू फेर झुक्यो।
‘बोलो धम्माजी !’
‘राजमाता आप, म्हूं आपको चाकर, आपने काम होंप्यो थो…’
‘दोष म्हारो, सजा म्हने दो। सेना की हत्या बन्द करावो। म्हूं पाछो नी नारूंगा। पंछीड़ा तक ने नी सतावूंगा। मारकाट बन्द कराओ। यो तरकल्यो मूंडा में’
‘जा कारो मूंडा कर ! पाछे मती नारजै, नी तो फेर बांदरो वणाई दांगा’
ऊभो वई ने वणी ने फेर माथो झुकायो।
‘कुँवर नी मानेगा। वणां के मन में अणी ती नवा नवा गोटा उठेगा’
‘वी दसोर का ऊंचा परसादां में बैठा है। लड़वा नी आया। मौत के हामे थी हो। सेनापति थी हो। फेर वात करुंगा, अबार अवसर नी है….’
‘हिमाल्या, लौहिता जण तक म्हारी धाक वठा तक आपकी यश गंध फैलाइगी। राज को पसारो वइ ग्यो। आज वीर, शिरोमणी, जनेन्द्र, नराधिपति यशोधर्मन जी के आगे माथो नमाऊं’
वासुलजी बोली पड़यया-‘जनेन्द्र, नराधिपति, राजाधिराज, परमेश्वर विष्णुवर्द्धन यशोधर्मनजी की जय’
सब जय जयकार करी पड़यां।
‘आपकी वात राखणो म्हारो धरम है। जा भाग राक्कस। देख्यो दसोर को शौर्य? एक-एक टाबर नार है। सूरमा सूरज को शौर्य मंद वइ जा असो दसोर, थूं बापड़ो कंई है। मारकाट बंद कराइ दो। सेना ने पाछी फेरो। पाछे मती नारजै रे।’
‘अन्नदाता !’
‘माजी सा एक विनती’
‘बोलो’
‘आशीष छांवूं। चरणां की रज’- धम्माजी ने धोक दई दीदी।
चाकर, सैनिक सावचेती वइ ग्या था। व्हू जनावर कई बदी करी बैठे।
‘थांको जस नी भूलूंगा। चीरो गड़ाउंगा। वणी पर खोदाऊंगा। वासुलजी, थी लिखजो, पुरावा थी होज’ -माजी सा ने वणां ने बाथ में भरी लीदा। माजी सा ने वा वात मलीगी जणी की दरकार वणां ने वरसां वरसां ती थी। तारा ठगठगा रई ग्या। काल ऊभो रइ ग्यो। वायरो चालणो भूली ग्यो।
बाथ ती निकर्या। हमरी ने बोल्या-‘म्हूं दसोर नी आऊंगा। म्हूं म्हारा हेमाड़ा में। सत्ता को लालच बड़ो कसैलो व्हे। मनख-मनख नी गणावे। आपणा-पराया कणी को भान नी रे। जिद्दी अलग वई जा। हमजै के आखा जगत ती ज्यादा अक्कल वणी में। मठठ भी खूब व्हे। तरे-तरे की मथटोडां करे। हांच-झूंठ करे, कोकद रचे। दसोर को नाम राखणो थो, आपकी वात राखणी थी। वंश की वात को सवाल थो। भगवान ने लाज राखी। कंई विनती करुं -म्हने घणो दझायो। लांछन पर लांछन लगाया। म्हूं शत्रुती मल्यो तको हूँ। वणी ने बुलावा में म्हारोज हाथ है। लोगां का मारवामें भी म्हारी राय है। मिहिरकुल और म्हूं एक मता को हूं। दसोर पर ताक राखी रयो हूँ। घणी वाता… दसोर को मान बढ़यो। आपकी आशीश थी। बांधो तो मुश्क्यां। समराट थूं भाग, म्हूं राजा नी, कई नी, राज की रीत नी जाणूं, छिमा करजौ’
मिहिरकुल फेर दोयां का चरणां में झुक्यो। रज उठाई, माथे चढ़ाई। जैजैकार कीदी। ‘आपको दीदो जीव, आपकी इच्छा परवाणे जीवेगा। कणी ने नी सतावेगा। माजीसा आपकी जय हो’
अजाणीं जगां, रात को कारो उजास, नी राजा, नी सामंत, नी दरबार, नी ठाठबाठ, बस आठ दस जणां-बड़ी बात वई गी। नी कागद, नी पुरावो, बापड़ो इतिहास गोताइ ग्यो। आगे भी गोतातोज रेगा। शाणां ने डाया अणी नर नाहर की आण के आगे गोताताज रेगा।

विवेक मेहता
पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ, 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470
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