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नियमित ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

आलापचारी: मां-बेटी के रिश्तों का नया रूप

              रजनी गुप्त हिंदी की जानी-मानी, चर्चित कथाकार हैं। उनके दस उपन्यास और नौ कहानी संग्रहों के अलावा अनेक आलोचनात्मक कृतियां भी प्रकाशित हुई हैं। उनके उपन्यासों में ‘कहीं कुछ और’, ‘किशोरी का आसमां’, ‘नये समय का कोरस’, ‘तिराहे पर तीन’ और कहानी संग्रहों में ‘अस्ताचल की धूप’, ‘सतह पर चांद’ और ‘फ़्रेम से बाहर’ विशेष चर्चित रहे। उनकी आलोचनात्मक कृतियां ‘सुनो तो सही’, ‘बहेलिया समय में स्त्री’ और ‘कथा में हस्तक्षेप’, स्त्री विमर्श और कथा-समीक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

उनका नया लघु उपन्यास ‘आलापचारी’ इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। स्त्री केंद्रित यह कथानक केवल एक पारिवारिक आख्यान नहीं है। मध्यवर्गीय सामाजिक परिवेश में गुंथी यह कहानी आज के समाज का चित्र प्रस्तुत करती है, जिसकी सच्चाई पाठक को बहुत दूर ले जाती है। यह सामाजिक तनाव और ​जटिल होते पारिवारिक रिश्ते उत्तर-आधुनिक समाज में हो रहे बदलाव का परिणाम हैं जहां परंपरागत ढांचा ही टूट रहा है, बिखर रहा है। पीढ़ियों का अंतराल और उनके बीच के संबंध हमेशा से एक नियमबद्ध सच्चाई रही है। इस उपन्यास में परंपरागत अवधारणा से अलग, परिवार के बीच मां और बेटी के बीच के संबंधों को आधार बनाकर लिखा गया यह आख्यान एक नये धरातल पर है।

उपन्यास के केंद्र में निधि है, जिसे बचपन से गाने का शौक़ रहा है। यह गुण उसने अपनी मां से पाया। उसकी मां भी संगीत का शौक़ रखती थीं और सुर-साधक थीं, लेकिन परंपरागत परिवार के बीच उनकी यह प्रतिभा खो गयी। परिवार के बीच यह सब मर्यादा-विरुद्ध था। उन्होंने अपनी बेटी निधि में यह गुण और कंठ का सुरीलापन पहचाना और तय किया कि व​ह निधि को विरासत में मिली इस ईश्वरीय देन को नष्ट नहीं होने देंगी। अम्मां निधि को अपने जान-पहचान के गायकों के पास ले जाती कि “इन संगतकारों संग कुछ देर बैठोगी तो सुर पकड़ना सीख जाओगी”। निधि स्वयं भी संगीत की साधिका है। नौवीं तक आते-आते उसने संगीत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना लिया और ग्यारहवीं में जब थी, तब पहली रिकॉर्डिंग दूरदर्शन में हुई। “ठुमरी, भजन, दादरा, छोटा ख्याल, बड़ा ख्याल, ध्रुपद, तराना जैसे रागों पर गाने की शुरूआत हो गयी। मौसम के अनुसार रचनाएं गले से निकलतीं, कभी गीत, कभी ग़ज़ल तो कभी क्लासिकल मगर मेरी आत्मा बसती थी लोक-संगीत में।” यह निधि का आत्मकथ्य उसकी पूरी प्रतिभा और संगीत-प्रेम को बयान करता है।

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इस संगीतमय सफ़र के दौरान ही अमन से उसका परिचय हुआ, जो उसके गायन से बेहद प्रभावित हो गया था। सम्मोहन जैसी स्थिति थी। दूसरी ओर, उसके पिता और भाई उसके संगीत के विशेष रूप से सार्वजनिक आयोजनों में गाने के विरुद्ध थे। उसे अब पारिश्रमिक भी मिलने लगा था। अत: वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थी। लेकिन अम्मा की सलाह पर शैक्षिक पढ़ाई पूरी वह इंटर कॉलेज में प्रवक्ता पद पर नियुक्त हो गयी। इसके साथ-साथ दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा अन्य मंचों पर भी उसके कार्यक्रम होते।

अमन उसकी ज़िंदगी में आया। शुरूआती विरोध के बाद दोनों परिवारों की सहमति बनी और दोनों का विवाह हो गया। अमन के परिवार वाले भी परंपरावादी थे। उन्हें निधि के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, परिवार के सम्मान और मर्यादा के विरुद्ध लगता। फिर उनके जीवन में वन्या आयी, उनकी संतान। परिवार के झंझट और छोटी बच्ची की देखभाल और फिर परिवार जनों का विरोध… लेकिन अमन ने निधि का साथ दिया। बच्ची की देखभाल, घर-गृहस्थी के काम और स्वयं निधि का असमंजस उपन्यास में निधि के वैवाहिक जीवन में पति का यह सहयोगपूर्ण रवैया और लगातार निधि को ‘स्पेस’ देने का प्रयास एक नया सामाजिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, हालांकि बाद में अमन पीछे लौटता दिखायी देता है। वह मुखर विरोध तो नहीं करता लेकिन ख़ामोशी अख़्तियार कर लेता है और स्वयं में सिकुड़ जाता है।

वास्तविक समस्या निधि के जीवन में शुरू होती है, जब बेटी वन्या बड़ी होने लगती है। एक ओर इक्कीसवीं सदी की युवा पीढ़ी की आत्मकेंद्रित मानसिकता है तो दूसरी ओर वन्या का अपनी मां निधि का अति महत्वाकांक्षी होना और घर से बाहर गतिविधियों में संलग्न रहना बिल्कुल पसंद नहीं। यह उलझाने वाला विरोधाभास है। वन्या को अपनी दोस्तों की तरह, घर में रहने वाली, हर समय अपने बच्चे और पति की सेवा में लगी रहने वाली मां की ज़रूरत है। वन्या को लगता है कि उसकी मां ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए उसकी तथा उसके पिता अमन की उपेक्षा की है। वन्या ने कभी अपनी भावनाओं को छिपाने का प्रयास भी नहीं किया। अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वह जब भी तनावपूर्ण स्थिति में होती, निधि को अपने व्यंग्य-बाणों से आहत करती रहती। यह स्थिति निधि के लिए और असह्य हो जाती है, जब उसके पति अमन मौन धारण किये रहते हैं और इस रूप में बेटी का समर्थन करते हैं। वह अमन जो शादी से पहले निधि के संगीत के शौक़ और उसके बाहर जाकर कार्यक्रमों में हिस्सा लेने का समर्थन करता था और परिवार के लोगों से लड़ जाता था, अब निधि की ओर से पूरी तरह निस्पृह है।

निधि ने घर-परिवार की बहुआयामी इन समस्याओं और तनावों के बीच अपने संगीत का कैरियर नहीं छोड़ा। वह उस मुक़ाम पर है, जहां से पीछे लौटना संभव नहीं। बावजूद इसके कि उसने परिवार की, पति और बेटी के प्रति ज़िम्मेदारियों का भरसक निर्वाह किया। निधि दूरदर्शन में, संस्थाओं और संगीत समारोहों में आमंत्रित की जाती है और उसका नाम बहुत सम्मानपूर्वक लिया जाता है। वन्या को लगता है कि उसकी मां की, इन कार्यक्रमों के माध्यम से दूसरे पुरुषों के साथ मित्रता है और हो सकता है कि अंतरंगता भी हो। वह खुले तौर पर अक्सर ऐसे आरोप भी लगाती रहती है।

उपन्यास में एक और पात्र है स्मृति, जो निधि की अंतरंग सहेली हुआ करती थी। लंबे अर्से बाद उससे मुलाक़ात। दोनों सहेलियों के ढेर सारे दुख-दर्द। आपस की बतरस और समस्याओं से रू-ब-रू होने की कोशिश। दरअसल निधि, वन्या, उसका पति कौस्तुभ, स्मृति, विजित और वांछा, सभी आज के समय को रेखांकित करते प्रतिनिधि पात्र हैं। विजित और वांछा का भी प्रेम विवाह है। विजित अपने माता-पिता के साथ वांछा के फ़्लैट में रहता है। आफ़िस में देर तक काम करने वाली वांछा से, जो संतान भी नहीं चाहती, विजित के मां-बाप को अनेक शिकायतें हैं… जैसी कि परंपरा होती है। अंत में एक दिन वांछा अपने पति विजित को अपने घर से निकल जाने को कहती है। वांछा अपने पति से अधिक कमाती है और एमबीए है। यह भी एक परिदृश्य है।

दरअसल आज समाज का हुलिया बदल गया है, विशेष रूप से मध्यवर्ग के संदर्भ में। दोनों पति-पत्नी पढ़े-लिखे हैं, जिसमें सूचना-तकनीकी क्षेत्र प्रमुख हैं। विदेशी कंपनियों में नौकरी जहां 12-12 घंट का काम। तनावपूर्ण माहौल। ‘सिंगल चाइल्ड’ आज के आधुनिक जीवन का मंत्र है। बिना मेड-सर्वेंट के घर नहीं संभलता। लाख कोशिश करें, मां-बाप पूरा समय घर-बच्चे को नहीं दे पाते। ऐसी परिस्थितियों में बच्चे पलते हैं तो कहीं न कहीं मां के अंदर अपराध बोध की भावना तो रहती है। इसकी भरपाई दूसरे रूप में होती है। बच्चे की हर मांग पूरी। उन्हें अपना काम करने की आदत नहीं। किसी प्रकार की ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं। आस-पास के वातावरण और सामाजिकता से बेख़बर। आत्मकें​द्रित जीवन। यही समस्या वन्या के साथ है और वन्या जैसी इक्कीसवीं सदी की युवा पीढ़ी के साथ है, जिसकी ओर लेखिका ने संकेत किया है। उपन्यास में वन्या को अपनी मां से ईर्ष्या भी है कि उन्हें समाज में और कला-जगत में सम्मान मिला है। हालांकि यह स्थिति विरल है। आम तौर पर बच्चे, विशेष रूप से लड़कियां अपने मां-बाप के प्रति संवेदनशील होती हैं, विशेषकर मां के साथ मित्रवत संबंध होते हैं लेकिन आज के पूंजीवादी समाज में, बाज़ारवादी संस्कृति के बीच मानवीय रिश्ते इसी तरह टूटते हैं।

वन्या अपनी पसंद के लड़के से शादी करती है। उसकी इच्छा थी कि मां-बाप लंबा-चौड़ा दहेज दें और ऐसा ही होता है। कुछ समय बाद वन्या और उसके पति के बीच भी टकराव की स्थिति आती है। वन्या को अपनी सास पसंद नहीं, क्योंकि वे उसे अपने घर के रीति-रिवाज सिखाना चाहती है। कौस्तुभ, उसका पति चाहता है कि वन्या कभी उसके लिए, उसकी पसंद का खाना बनाये। ये बेहद साधारण बातें हैं जो रिश्तों को संवेदनशील बनाती हैं। नयी पीढ़ी में इसी संवेदनशीलता का अभाव है। आधुनिकता के अर्थ अराजकता में बदल गये हैं और हर व्यक्ति अपने अकेलेपन के साथ अंधेरे से जूझ रहा है लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा।

रजनी गुप्त का उपन्यास ‘आलापचारी’ इन्हीं सवालों से जूझते हुए नयी और पुरानी पीढ़ी के द्वंद्व को सामने लाता है और विशेष रूप से मां और आधुनिक बेटी के बीच तनाव को रेखांकित करता है। लेखिका को इस नितांत नये विषय पर कलम चलाने के लिए बहुत बधाई।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

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