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इस स्तंभ में 21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन...
नियमित ब्लॉग (भाग-14) मानस की कलम से...

भावेश जोशी और हमारे सुपरहीरो

            2017 में एक फ़िल्म आयी— न्यूटन। फ़िल्म का सार बहुत सरल था, लेकिन उसका सवाल बहुत बड़ा था—अगर हम सब अपना-अपना काम ईमानदारी से करते रहें, तो शायद हमें किसी सुपरहीरो की ज़रूरत ही न पड़े।

दिक़्क़त यही है कि ऐसा होता नहीं है।

हम अपना काम ईमानदारी से नहीं करते, व्यवस्था अपना काम ठीक से नहीं करती और कई बार जिस व्यक्ति से उम्मीद होती है, वही निराश कर देता है। ऐसे में हमारे भीतर एक ‘काश’ जन्म लेता है कि—कोई आये और सब ठीक कर दे। कोई ऐसा, जो भ्रष्टाचार ख़त्म कर दे, अपराधियों को सज़ा दे, व्यवस्था को बदल दे और हमें हमारे हिस्से की लड़ाई लड़ने की ज़रूरत ही न पड़े।

बस इसी जगह एक सुपरहीरो पैदा होता है।

सुपरहीरो की लोकप्रियता के पीछे सिर्फ़ उसकी अलौकिक शक्तियाँ नहीं हैं। उसके पीछे हमारी अपनी बेबसी है। यह ख़याल, कि हमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं—किसी रोज़ कोई सुपरहीरो आएगा और सब कुछ वैसा कर देगा जैसा हम चाहते हैं—एक तरह के निकम्मेपन से भरा हुआ, लेकिन बेहद रोमांचक ख़याल है। इसमें उम्मीद है, बदला है, तमाशा है और मसाला भी। और कामयाब फ़िल्म के लिए इससे बेहतर नुस्ख़ा और क्या हो सकता है? बशर्ते कि तकनीक उस कल्पना को पर्दे पर उतारने लायक़ हो।

सुपरहीरो: हॉलीवुड और हम

यही कारण है हॉलीवुड ने सुपरहीरो को केवल एक जॉनर नहीं रहने दिया, बल्कि उसकी पूरी दुनिया बना दी। ‘बैटमैन’, ‘सुपरमैन’, ‘स्पाइडरमैन’, ‘एंटमैन’ और ऐसी न जाने कितनी फ्रेंचाइज़ी दुनिया भर में दर्शकों को आकर्षित करती हैं। वहाँ सुपरहीरो आधुनिक मिथक का हिस्सा बन चुका है।

भारत में स्थिति थोड़ी अलग रही है। हमारे सुपरहीरो लंबे समय तक कॉमिक्स के पन्नों से बाहर नहीं निकल पाये। सुपर कमांडो ध्रुव, नागराज जैसे किरदार लोकप्रिय तो रहे, लेकिन बड़े पर्दे तक उनकी यात्रा नहीं पहुँच सकी। इसकी दो बड़ी वजहें समझ में आती हैं।

पहली—सुपरहीरो सिनेमा महँगा है। उड़ना, अदृश्य होना, इमारतों से छलांग लगाना, बिजली पैदा करना या किसी शहर को बचाना केवल अभिनय से संभव नहीं है। इसके लिए बड़े पैमाने पर विज़ुअल इफ़ेक्ट्स, एक्शन डिज़ाइन और तकनीकी दक्षता चाहिए, जिसकी लागत बड़ी होती है।

दूसरी वजह कहीं अधिक दिलचस्प है—भारत में सुपरहीरो की जगह पहले से ही हमारे देवताओं और पौराणिक नायकों ने घेर रखी है।

हमारी कल्पना में भगवान वह शक्ति है जो अंततः सब ठीक कर देगी। किसी सरकारी दफ़्तर में घूस लेने वाला आदमी अगर अपने कर्मों की सज़ा नहीं पा रहा, तो हमारे पास उसका एक जवाब है—कर्म का हिसाब होगा। ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं। बस परेशानी यह है कि यह सज़ा कब मिलेगी, इसकी कोई समयसीमा नहीं है।

और हम जीते-जी उस भ्रष्ट आदमी को सज़ा पाते हुए देखना चाहते हैं।

यहीं सुपरहीरो की ज़रूरत पैदा होती है।

ईश्वर के न्याय में समय लग सकता है, लेकिन हमारा सुपरहीरो तुरंत न्याय करता है। वह अपराधी को पकड़ता है, उसे पीटता है और कुछ ही घंटों में वह काम कर देता है, जिसका इंतज़ार शायद वर्षों से किया जा रहा था।

हमारे सुपरहीरो

‘मिस्टर इंडिया’ इसी भारतीय इच्छा का शुरूआती लोकप्रिय उदाहरण है। एक साधारण आदमी को ऐसी शक्ति मिलती है, जो उसे असाधारण बना देती है और वह अपनी शक्ति का इस्तेमाल बुराई के ख़िलाफ़ करता है। इस फ़िल्म से पहले और बाद में भी कुछ दोयम दर्जे ​की सुपरहीरो फ़िल्में बनती रहीं, लेकिन उन्हें उल्लेखनीय सिनेमा नहीं माना जा सकता।

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फिर भारत में ‘कृष’, ‘रा.वन’, ‘अ फ़्लाइंग जट’ और हाल में ‘हनु-मैन’ जैसी फ़िल्में आयीं। लेकिन भारतीय सुपरहीरो सिनेमा की असली दिलचस्पी उन फ़िल्मों में दिखायी देती है, जिन्होंने इस फ़ॉर्मूले को सिर्फ़ दोहराया नहीं, बल्कि उसे अपने सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में समझने की कोशिश की।

सबसे दिलचस्प उदाहरण है ‘भावेश जोशी सुपरहीरो’।

2018 में आयी यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। लेकिन उसकी असफलता के भीतर ही उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी छिपी है। क्योंकि ‘भावेश जोशी’ असल में उस सुपरहीरो की कहानी नहीं है, जो हमारी लड़ाई लड़ता है। यह उस आम आदमी की कहानी है, जो ख़ुद लड़ने की कोशिश करता है।

भावेश जोशी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ना चाहता है। वह व्यवस्था बदलना चाहता है। वह बार-बार कोशिश करता है, असफल होता है, चोट खाता है और फिर भी वापस आता है। वह कोई सर्वशक्तिमान सुपरहीरो नहीं है। वह जुझारू आदमी है।

और शायद यही कारण है कि वह पारंपरिक सुपरहीरो फ़िल्म के साँचे में आसानी से फ़िट नहीं बैठता। इसी संदर्भ में दक्षिण भारतीय फ़िल्मकार शंकर की कुछ फ़िल्मों को भी याद रखा जा सकता है।

दरअसल, हम सुपरहीरो इसलिए देखना चाहते हैं क्योंकि हम चाहते हैं हमारी लड़ाई कोई और लड़े और जीते। लेकिन ‘भावेश जोशी’ हमें हमारी ही लड़ाई वापस थमा देती है। वह कहती है—हीरो तुम्हें ख़ुद बनना पड़ेगा।

यही विचार ‘रंग दे बसंती’ में भी एक अलग रूप में दिखायी दिया था। वहाँ फ़िल्म देखने के बाद दर्शक के भीतर केवल भावुकता नहीं, बल्कि कुछ करने की इच्छा पैदा होती थी। ‘भावेश जोशी’ भी इसी तरह दर्शक को जगाना चाहती है, लेकिन वह उस प्रभाव को उतनी ताक़त से पैदा नहीं कर पाती। यही उसकी सीमा भी है और महत्व भी।

कुछ और तस्वीरें

इसके बिल्कुल विपरीत 2021 की मलयालम फ़िल्म ‘मिन्नल मुरली’ है। यह एक ऐसे सुपरहीरो की कहानी है, जो असाधारण शक्तियों के बावजूद असाधारण आदमी नहीं बनता।

जैसन एक साधारण दर्ज़ी है। बिजली गिरने के बाद उसे सुपरपावर मिलती है और वह सुपरहीरो बन जाता है। लेकिन उसकी पहली चिंता दुनिया को बचाना नहीं है। वह पहले अपनी शक्तियों को समझता है। वह यह जानने की कोशिश करता है कि वह क्या कर सकता है। यानी सुपरपावर मिलने के बाद भी उसकी मानसिकता एक आम आदमी की ही रहती है।

और यही उसे दिलचस्प बनाता है।

कल्पना कीजिए कि किसी कपड़े धोने वाले को सुपरपावर मिल जाये। वह शायद दुनिया बचाने से पहले यह सोचेगा कि अब वह एक दिन में कितने कपड़े धो सकता है। ‘मिन्नल मुरली’ इसी मानवीय हास्य और कल्पना से अपना सुपरहीरो बनाती है।

जैसन के कंधे पर पूरी दुनिया को बचाने का अमेरिकी बोझ नहीं है। उसकी ज़रूरतें स्थानीय हैं। उसकी लड़ाइयाँ छोटी लग सकती हैं, लेकिन उसके लिए वे उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

एक तरह से जैसन हमारी अभिव्यक्ति का विस्तार है। आम जीवन में हम ऐसी कितनी ही परिस्थितियों में ख़ुद को पाते हैं, जहाँ हम चाह कर भी वो नहीं कर पाते जो करना चाहते हैं। जैसे एक पुलिस स्टेशन में एक दुष्ट और करप्ट पुलिस वाले को सबक़ सिखाना!! लेकिन मुरली वो कर सकता है। इसलिए वो आम आदमी का सुपरहीरो है।

मिथक और नये अर्थ

इस कड़ी में पिछले दिनों आयी फ़िल्म ‘लोका’ ने भारतीय सुपरहीरो की संभावनाओं को एक और महत्वपूर्ण दिशा दी है। यह फ़िल्म इस सवाल को सामने रखती है कि अगर हमें अपने सुपरहीरो गढ़ने हैं, तो क्या हर बार हमें अमेरिका की तरफ़ देखने की ज़रूरत है?

शायद नहीं।

भारत की अपनी मिथकीय और लोक परंपराएँ हैं। हमारे पास देवता हैं, लोकनायक हैं, लोककथाएँ हैं, आदिवासी मिथक हैं और सदियों पुरानी ऐसी कल्पनाएँ हैं, जिनमें असाधारण शक्तियों वाले चरित्र पहले से मौजूद हैं। ‘लोका’ इसी सांस्कृतिक स्मृति की तरफ़ लौटने की कोशिश करती है। ख़ासकर महिला सुपरहीरो को भारतीय लोक और पौराणिक संदर्भों से जोड़ना इस जॉनर के लिए एक नयी संभावना खोलता है।

शायद भारतीय सुपरहीरो सिनेमा का भविष्य यहीं है।

क्योंकि जिस समाज ने रामायण, महाभारत और जय संतोषी माँ जैसी धार्मिक और पौराणिक कथाओं को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया हो, वहाँ केवल अमेरिकी सुपरहीरो की नक़ल हमेशा उतनी प्रभावी नहीं हो सकती। हमारे लिए ईश्वर की कल्पना स्वयं इतनी शक्तिशाली है कि कोई भी सुपरहीरो उसके सामने छोटा पड़ सकता है।

लेकिन सिनेमा की ख़ूबी यही है कि वह मिथकों को नये अर्थ दे सकता है।

सीमाओं का विस्तार

इसी संदर्भ में ‘सुपरमैन आफ़ मालेगांव’ को देखना भी दिलचस्प है। यहाँ सुपरहीरो के पास न कोई सुपरपावर है, न कोई हाई-टेक सूट और न ही दुनिया बचाने का कोई मिशन। मालेगाँव के आम लोग सिनेमा बनाते हैं और उसी सिनेमा में अपने लिए एक ऐसी दुनिया गढ़ते हैं, जहाँ वे अपनी सीमाओं से बाहर निकल सकते हैं। उनकी फ़िल्मों में सुपरहीरो होना असल में कोई असाधारण शक्ति हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर कल्पना की ताक़त हासिल करना है।

जहाँ मिन्नल मुरली एक आम आदमी को सुपरपावर देकर उसे असाधारण बनाती है और भावेश जोशी आम आदमी को बिना किसी सुपरपावर के लड़ते हुए दिखाती है, वहीं मालेगांव का सुपरमैन एक तीसरी संभावना का ज़िक्र है—सुपरहीरो पर्दे पर नहीं, पर्दा बनाने वाले आम लोगों के भीतर पैदा होता है। सीमित साधनों, स्थानीय कलाकारों और देसी जुगाड़ से फ़िल्म बनाना भी उनके लिए एक तरह की सुपरपावर है। वे हॉलीवुड की नक़ल भर नहीं करते; वे अपने आसपास की दुनिया को लेकर अपनी सिनेमाई कल्पना रचते हैं।

इस अर्थ में मालेगाँव का सुपरहीरो किसी एक किरदार का नाम नहीं, बल्कि उस सामूहिक विश्वास का नाम है कि… अगर हमारे पास संसाधन नहीं हैं, तब भी हम अपनी कहानी ख़ुद बना सकते हैं। शायद यही सिनेमा की सबसे बड़ी सुपरपावर है—हक़ीक़त को बदल न पाना, लेकिन उसे देखने का तरीक़ा बदल देना।

सुपरहीरो अंततः हमारी उस इच्छा का सिनेमाई रूप है, जिसमें हम चाहते हैं कि कोई हमसे अधिक ताक़तवर आये और हमारी दुनिया ठीक कर दे। ‘कृष’ हमें वह सपना दिखाता है। मिन्नल मुरली उस सपने में आम आदमी को शामिल करता है। भावेश जोशी हमें याद दिलाता है कि शायद हमें ख़ुद लड़ना पड़ेगा। और लोका सवाल पूछती है कि अगर हमें सुपरहीरो चाहिए ही, तो वह हमारे अपने मिथकों, हमारी अपनी मिट्टी और हमारी अपनी सांस्कृतिक स्मृति से क्यों नहीं आ सकता?

शायद यही भारतीय सुपरहीरो की असली खोज है—दूसरे देशों के सुपरहीरो की नक़ल करना नहीं, बल्कि यह तलाशना कि हमारे समाज को किस तरह का नायक चाहिए।

क्योंकि अंततः सुपरहीरो केवल वह नहीं है जिसके पास सुपरपावर हैं। सुपरहीरो वह हो सकता है, जो उस समय खड़ा हो जाये, जब बाक़ी सबने उम्मीद छोड़ दी हो।

और शायद न्यूटन की दुनिया में सबसे बड़ा सुपरहीरो वही होगा, जो बिना किसी सुपरपावर के अपना काम ईमानदारी से करता रहे।

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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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