
- February 8, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
हास्य-व्यंग्य मुदित रेवातटी की कलम से....
रब्त
परसों बड़ी मेहनत से ग़ज़ल कहने की कोशिश की। जैसे ही मुक़म्मल हुई, फटाक से जाकर पड़ोस के ही सुधी साहित्यकार सह आलोचक बब्बन भाई, को सुनायी। उन्होंने बड़े इत्मीनान से सुनी और गुनी, फिर तपाक से कहा- “मियाँ! बह्र तो उम्दा निभायी है, बस कुछ-एक मिसरों में ज़रा-सी रब्त की कमी रह गयी।” लो कर लो बात, रब्त बिठाने में तो अमूमन हर आदमी मशग़ूल है, पर रब्त बैठे तब ना! क्या ग़ज़ल और क्या ज़िंदगी, रब्त की कमी तो रह ही जाती है। इन आलोचकों को कौन समझाये?
असफल साहित्यकार के सफल आलोचक और असफल आलोचक के सफल साहित्यकार होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। घर के बुज़ुर्ग अनुभवी आलोचक ही तो हैं। वे युवाओं के परफॉर्मेंस को अपने अनुभव के मीटर से मापते हैं। उनके जवानी के दिनों के उपद्रवों के क़ाफ़िये भूल जाते हैं और युवाओं से कहते हैं तुम्हारे चाल-चलन के क़ाफ़िये दुरुस्त करो। हालाँकि झूठ बोलना, अपना उल्लू सीधा करना, ज़रूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना, अपनी खिचड़ी अलग पकाना जैसी परंपरागत रदीफ़ ज्यों के त्यों रहती हैं। बुज़ुर्गों एवं युवाओं के विचारों में जो रब्त की कमी मालूम होती है, उसे जनरेशन गैप कहा जा सकता है।
धरती पर आते ही बच्चा रब्त बिठाने लगता है, अपने आस-पास जितने भी लोग हैं, सबको टकटकी लगाकर देखता है। इस असहाय अवस्था में किसी से कुछ कहे भी तो कैसे? थक-हारकर बेचारा रोकर ही अपने भावों को व्यक्त करता है। माँ उसे दूध पिला देती है तो चुप हो जाता है। कितनी ही बातें मन में आती होंगी पर किसे समझाये! और समझाये भी तो कैसे? ले-देकर बेचारा बह्र में रोता भर है, माँ इस बह्र को भरसक भाँपने की कोशिश करती है, कभी क़यास लगाती है कि कान में दर्द हो रहा होगा, सो कान में तेल गरम करके डाल देती है। कभी तेल से हाथ-पैरों की मालिश कर डालती है फिर भी रोना बंद न हुआ तो गली-मुहल्ले के किसी ओझा या बाबा से झड़वा-फुँकवा देती है। अब बच्चा बह्र में रोकर जो भाव व्यक्त कर रहा है, माँ को समझाने में सफल हुआ या नहीं, या कहें कि रब्त बैठ पाया या नहीं यह या तो बच्चा जाने, या भगवान!
महिलाएँ भी कमाल करती हैं। बधाई गीत हो या सजनई, जस हो या भजन, सबकी धुन फ़िल्मी गाने पर आधरित रखती हैं, पर उनकी जो ढोलक-मास्टरनी होती है, वह ग़ज़ब का रब्त बिठाती है। एक ही पैटर्न “ढुं-ढुं-ढुंपुक, ढुं-ढुं-ढुंपुक” बजाकर हर गीत में चार-चाँद लगा देती है और गाने वालियाँ भी अलग-अलग भावों और फ़िल्मी धुनों में रब्त बिठाने की भरसक कोशिश करती हैं।

बच्चा क्रमशः बड़ा होता है और अपने संगी-साथियों से रब्त बिठाने लगता है। कभी इच्छा न होने पर भी, सिर्फ़ साथियों को ख़ुश करने के लिए अजीबो-ग़रीब कारनामे कर डालता है जो गैंग-लीडर बताता है; मसलन बगीचे से छिपकर अमरूद तोड़ना, किसी छत पर मर्तबान से अचार चुराना, किसी के यहाँ डोरबेल बजाकर नौ-दो ग्यारह हो जाना इत्यादि।
किशोर होते ही वह कुछ-कुछ समझने लगता है। माता-पिता उसे जिन कामों को करने से मना करते हैं और उन्हीं कामों को ख़ुद करते हैं तो वह कनफ्यूजियाता है, जैसे नसीहत तो झूठ न बोलने की देते हैं, पर ख़ुद मोबाइल पर दिन-भर झूठ बोलते हैं, होते घर में हैं, लोकेशन बाज़ार की बताते हैं। उसे मोबाइल यूज़ करने के लिए मना करते हैं और ख़ुद दिन भर मोबाइल हाथ में रखे रहते हैं। माँ मोबाइल का माइक ऑन करके तरकारी बनाते हुए सहेलियों से बतियाती है, बघार जलता रहता है, दूध उफनकर बरतन से गिरता रहता है, पर किसे फ़िक्र है? पिताजी कोई फ़नी वीडियो देखते हुए दाढ़ी बनाते हैं, कट लगे तो लग जाये। बेचारा किशोर-मन कान से सुनी गयी नसीहतों और आँखों से देखे गये कारनामों के बीच रब्त नहीं बिठा पाता है।
जैसे-तैसे जवानी आती है। ज्योतिषी वर और वधू के गुणों का मिलान करके घरवालों को बताता है कि दोनों में रब्त बैठेगा या नहीं। मामला जम जाये तो तगड़ी दक्षिणा देकर, रब्त न हो, तब भी ज्योतिषी से रब्त बिठवाया जा सकता है; और मामला न जमे तो भी दोनों में से किसी एक को मांगलिक बताकर रब्त की कमी ठहरायी जा सकती है। विवाह होते ही बीवी पति को अपनी ज़िंदगी की ग़ज़ल के लिए प्लॉट के रूप में पाती है, उधर माँ को लगता है कि इसने आते ही मेरे प्लॉट को हथिया लिया। दोनों में प्रायः खींच-तान चलती रहती है। बेचारा युवक घर में सास-बहू के बीच में रब्त बिठाने की नाकाम कोशिश करता है और दफ़्तर में अपने बॉस से रब्त बिठाने की जुगाड़ जमाता है, पर रब्त बैठे तब ना। उधर, बेचारी बीवी मायके और ससुराल में रब्त बिठाने की कोशिश में तमाम उम्र खपा देती है।
बुढ़ापा बिना बुलाये मेहमान-सा आ धमकता है। आदमी या तो अपने बच्चों और नाती-पोतों पर आश्रित हो जाता है या रब्त नहीं बैठा पाने के कारण वृद्धाश्रम की शोभा बढ़ाता है। वो जिसने कभी नाक पर मक्खी तक नहीं बैठने दी, अब उसका दबदबा ख़त्म हो जाता है। हर छोटे से छोटा निर्णय जिसकी सम्मति के बिना नहीं लिया जाता था, अब बड़े-बड़े निर्णय बच्चे स्वयं ले लेते हैं, इस बात पर दिल का एक टुकड़ा हर्ष प्रकट करता है और दूसरा अफ़सोस। अब उसे समझ में आने लगता है कि “जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिए,” इसलिए ज़िंदगी के बचे-खुचे दिन परिवार वालों से रब्त बिठाकर काटने में ही सार है।
कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी होते हैं, जिनके जीवन और सृजन में उनके जीवित रहते लोगों को रब्त की भारी कमी प्रतीत हुई। समय बीतने के साथ आलोचकों की अक़्ल ठिकाने आयी और पछतावे के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा, क्योंकि जाने वाला तब तक जा चुका था। बुद्ध हो या कबीर, निराला हो या ओशो, जब तक जीवित रहे, लोगों ने रब्त की कमी बताकर नाक में दम कर रखने में कोई कोर कसर बाक़ी नहीं रखी। जब वे हमारे बीच से चले गये तो वर्षों बाद समझ में आया कि उनने तो जो कहा, सच ही कहा, हमीं ने समझने में भूल की, गोया रब्त न पकड़ पाये।
बुद्ध को क्या कम आलोचना झेलनी पड़ी? पर आज उनके वे उपदेश, जिनमें कभी रब्त की कमी बतायी गयी होगी, आज अत्यंत प्रासंगिक हैं। जिन कबीर और निराला की आलोचना उस समय के लोग पानी पी-पीकर करते थे उन्हीं पर आज अनगिनत लोग पी.एच.डी. कर रहे हैं। ओशो को उनके समय के लोग पसंद नहीं करते थे, उनके वचनों में रब्त की कमी बताकर मज़ाक़ उड़ाते थे, आज वे ही वचन ज़िंदगी से निराश हो चुके अनगिनत लोगों को वेदना की महानिशा से आनंदलोक तक लाने में मील के पत्थर साबित हो रहे हैं।
इने-गिने क़ाफ़िये हैं और घिसे-पिटे रदीफ़। जो व्यक्ति मौलिकता लाएगा, इनकी जगह पर नवीन जीवन-मूल्यों के क़ाफ़िये और प्राणिमात्र के कल्याण को रदीफ़ के रूप में रखेगा, वही बेधड़क ज़िंदगी की मुरस्सा ग़ज़ल कह पाएगा। रब्त की कमी बताने वालों की कमी न कभी थी, न है, न रहेगी।
(चित्र परिचय: नॉर्मन रॉकवेल की चर्चित पेंटिंग ‘द प्रॉब्लम वी आल लिव विद’, सोशल मीडिया पर डैनियल ओलिवियर की पोस्ट से)

मुदित रेवातटी
मूल नाम कौशल किशोर पुरी। माध्यमिक शिक्षक के रूप में सेवारत और ओशो से प्रभावित होने के कारण कोई सपना नहीं बस स्वांतः सुखाय सृजन। गीत, ग़ज़ल, नवगीत, व्यंग्य में विशेष रुचि। संपर्क: 90091 51723
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बहुत बहुत उत्तम व्यंग्य है , मुद्रित हो गया मन ।
हल्के-हल्के हँसी मजाक , महिला संगीत की ढोलक का फिल्मी धुन के भजन से मेल बिठाना,से आरंभ कर गंभीर तथ्यों पर आ गये ; कबीर ,निराला के साथ जो हुआ ।
हल्के-फुल्के मज़ाक से गंभीर बातों पर व्यंग्य मिलाकर अच्छी रब्त बिठाई है।
क्या ख़ूब व्यंग्य हुआ।
जनरेशन गैप ,,का रब्त,,,