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पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....

क्रांति थी पहली कथा-फ़िल्म.. उसी की कहानी

              नमस्कार दोस्तो, हम फिर हाज़िर हैं पिछली कहानी को आगे ले जाने के सिलसिले में। जबसे विश्व पटल पर सिनेमा की पहल हुई, तबसे लेकर आज तक सिनेमा ने हर दशक में नये आयाम गढ़े हैं, जिन्होंने दर्शकों को एक नयी अनुभूति प्रदान की। लेकिन विश्व सिनेमा आज अपने जिस दौर में है, वहां तक इसके पहुंचने की कहानी बहुत अनोखी है जिसमें साहस, जूनून और कठिन परिश्रम की ढेरों मिसालें हैं, जो हर पल हमें अचंभित करती हैं। और सच कहूं तो मुझे कभी-कभी बहुत ताज्जुब होता है कि आज तक किसी ने विश्व सिनेमा को परदे पर समेटने की कोशिश क्यों नहीं की?

जानती हूँ, मेरी इस बात को सुनते ही आपके दिमाग़ में बहुत-सी फ़िल्मों के नाम आएंगे जैसे कि Hugo (2011), The Lumiere Brothers’ First Films (1895-1897), Cinema Paradiso (1988) इत्यादि। नहीं, मैं यह नहीं कह रही कि आज तक विश्व सिनेमा के इतिहास पर कोई फ़िल्म नहीं बनी बल्कि मैं तो यह कहना चाह रही हूँ कि कोई ऐसी फ़िल्म या सीरीज़ विश्व सिनेमा पर क्यों नहीं है, जो परत-दर-परत इस कला को समेटे और जिसे आने वाली पीढ़ियां ख़ासकर हमारे GenZ और Alpha भी देखकर इससे अपनी जानकारी बढ़ा सकें। क्योंकि विश्व सिनेमा के इतिहास पर आज तक बनी ज़्यादातर फ़िल्में सिर्फ़ एक विशेष काल या किरदार पर आधारित रही हैं जबकि कितना अच्छा हो अगर विश्व सिनेमा के इतिहास को एक सीरीज़ की तरह पिरोया जाये… सब कुछ एक साथ एक जगह।

ख़ैर यह हमारे कॉलम का विषय नहीं है तो चलिए बिना देर जहाँ से पहली कड़ी में बात छोड़ी थी, वहां से शुरू करते हैं।

1900 से 1910 का दशक विश्व सिनेमा के इतिहास में एक नवजात शिशु की शुरूआती अवस्था जैसा था, जो रोज़ एक नयी दिशा तय कर रहा हो। धीरे-धीरे सिनेमा अपनी भाषा गढ़ रहा था और हर दिन, महीने और साल में सिनेमा की भाषा न केवल साफ़ और रोमांचक हो रही थी बल्कि इसकी गूँज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सुनायी दे रही थी। इतना ही नहीं, यूरोप के बाद इस दिशा में क्रांतिकारी पहल अतीत और वर्तमान के सबसे ताक़तवर देश अमेरिका की तरफ़ से हुई। 1903 में अमेरिका में एक ऐसी फ़िल्म बनी, जिसने सिनेमा को चमत्कार से आगे बढ़ाकर कथात्मक कला में बदल दिया। यह फ़िल्म थी एडविन एस. पोर्टर की The Great Train Robbery।

पहली क्रांति: संपादन कला

एडविन पहले फ़िल्मकार थे, जिनका प्यार कला नहीं बल्कि मशीनों से था। अमेरिका के पेनसिल्वेनिया राज्य में एक साधारण परिवार में पैदा हुए एडविन घर को मदद करने के लिए टेलीग्राफ़ ऑपरेटर, इलेक्ट्रिशियन और मैकेनिक के रूप में काम किया करते थे और अक्सर अलग-अलग जगहों पर अपने काम के सिलसिले में जाया करते थे। यह वही दौर था, जब अमेरिका में चलती तस्वीरों यानी की सिनेमा का जादू फैल रहा था। वह शुरूआत में एक प्रोजेक्शनिस्ट के रूप में काम किया करते थे। लेकिन अपने मशीनी प्यार के चलते वे सिर्फ़ फ़िल्में चलाते नहीं ही नहीं थे बल्कि मशीन खोलते, सुधारते और उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश भी करते थे। कहा जाता है वे सिनेमा को पहले एक मशीन की तरह समझते थे।

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लगातार एक प्रोजेक्शनिस्ट की तरह काम करते हुए और उसकी पूरी प्रक्रिया को बार-बार दोहराते हुए एडविन ने महसूस किया अगर अलग-अलग दृश्यों को जोड़कर एक क्रमबद्ध कथा बनायी जाये, तो सिनेमा कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकता है। Edison Manufacturing Company में काम करते-करते, वो फ़िल्म कैमरे और प्रोजेक्टर के साथ घंटों बिताते और समझने की कोशिश करते कि ये दृश्यों को कैसे बदल देता है। बस यही जिज्ञासा उनके फ़िल्मकार बनने की वजह बनी।

यही वो समय था जब सिर्फ़ सिनेमा ही नहीं बल्कि एडविन के जीवन ने भी करवट बदली और एडविन पोर्टर ने The Great Train Robbery फ़िल्म का निर्माण किया। एडीसन स्टूडियो में काम करते हुए एडविन ने सैकड़ों छोटी फिल्मों के निर्माण में हिस्सा लिया। वे लगातार नये तरीक़े आज़माते थे: डबल एक्सपोज़र, स्टॉप-मोशन और सबसे महत्वपूर्ण- संपादन के ज़रिये कहानी गढ़ना।

एडविन धीरे-धीरे सिनेमा की भाषा और दर्शकों के मन को समझने लगे। अब उनकी रुचि उपन्यासों, कहानी की किताबों और रंगमंच में भी बढ़ने लगी और उनको समझ आ गया कि दर्शक सिर्फ़ चमत्कार या मनोरंजन ही नहीं चाहते हैं बल्कि वो कहानी चाहते हैं। यही सोच उन्हें उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म The Great Train Robbery तक ले गयी। ये उनके जीवन का सबसे सुखद और चरम क्षण था। एडविन ने इसमें अलग-अलग स्थानों पर फ़िल्माये गये दृश्यों को जोड़कर एक कहानी बनायी। फिर घंटों संपादन (editing) टेबल पर बैठकर शॉट्स के क्रम के साथ प्रयोग किये।

एडविन के साथ काम करने वालों के अनुसार, वे अक्सर फ़िल्म की पट्टियों को फ़र्श पर फैलाकर बैठ जाते और सोचते कि किस क्रम में जोड़ने से सबसे अधिक प्रभाव पैदा होगा। आने वाले समय में प्रोफ़ेशनल एडिटिंग का यही स्वरूप हुआ करता था।

The Great Train Robbery लगभग 12 मिनट लंबी फ़िल्म थी – उस दौर के हिसाब से काफ़ी बड़ी। इसमें कुल 14 अलग-अलग शॉट थे, जो मिलकर एक पूरी कहानी रचते थे: डाकुओं द्वारा ट्रेन लूटना, यात्रियों को क़ाबू में करना और अंततः पीछा करके अपराधियों को पकड़ा जाना। पहली बार दर्शकों ने सिनेमा में एक सुसंगत एक्शन कथा देखी, जिसमें घटनाएँ, कारण और परिणाम के क्रम में आगे बढ़ती थीं। इतिहासकारों की मानें तो इसके बाद ही एडविन को cross-cutting editing और multi-shot storytelling जैसी तकनीक का जनक माना जाता है।

आज यह तकनीक बहुत सामान्य लगती है, लेकिन उस समय यह एक क्रांतिकारी आविष्कार था। इसने सिनेमा को समय और स्थान के साथ खेलने और बदलने की शक्ति दी।

फ़िल्म का एक और यादगार मज़ेदार सीन उसका अंतिम शॉट था- जब एक डाकू सीधे कैमरे की ओर बंदूक तानकर गोली चलाता है। यह दृश्य कहानी से अलग, लगभग एक स्वतंत्र क्षण की तरह था। कहा जाता है कि कई दर्शक इस दृश्य से चौंक गये थे; कुछ ने तो डर के मारे सिर झुका लिया। यह क्षण सिनेमा की शक्ति का प्रतीक बन गया था- स्क्रीन और दर्शक के बीच की दूरी अचानक टूट गयी थी।

चढ़ाव के बाद उतार

The Great Train Robbery ने केवल तकनीकी प्रयोग नहीं किये; उसने अमेरिकी लोककथाओं और वाइल्ड वेस्ट की छवि को भी लोकप्रिय बनाया। यह शुरूआती वेस्टर्न फ़िल्मों में से एक थी, जिसने आगे चलकर हॉलीवुड की एक पूरी सिनेमैटिक शैली को जन्म दिया। इसकी सफलता ने फ़िल्म निर्माताओं और फ़िल्मकारों को यह विश्वास दिलाया कि दर्शक लंबी, जटिल कहानियां देखने के लिए तैयार हैं। इस फ़िल्म के बाद सिनेमा तेज़ी से बदलने लगा।

अन्य फ़िल्मकारों ने एडविन की तकनीकों को अपनाकर विकसित किया। संपादन (editing) अब केवल दृश्यों को जोड़ने का साधन नहीं रहा; वह कहानी कहने का नया उपकरण बन गया था। कैमरा एंगल, शॉट की लंबाई और दृश्य संरचना पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। धीरे-धीरे एक ऐसी “फ़िल्म भाषा” आकार लेने लगी, जिसके व्याकरण में कट, क्लोज़-अप और समानांतर क्रिया जैसे तत्व शामिल थे। इतना ही नहीं The Great Train Robbery इस खोज का निर्णायक मोड़ थी। इसने साबित किया कि फ़िल्म केवल वास्तविकता का रिकॉर्ड मात्र ही नहीं, बल्कि एक रचित कथा हो सकती है- ऐसी कथा जो संपादन और दृश्य संरचना के माध्यम से भावनाएँ जगाती है।

इसी क्षण से सिनेमा ने कहानी कहने की अपनी अनूठी भाषा बोलनी शुरू की और आगे आने वाले दशकों में वही भाषा विश्व सिनेमा की आधारशिला बनी। यही नहीं, एडविन वो पहले फ़िल्मकार थे जिन्होंने साहित्य को सिनेमा में शामिल करने के भी प्रयोग किये, जो काफ़ी हद तक सफल भी रहा क्योंकि दर्शकों को पढ़ी हुई कहानी को जीवंत रूप में देखने का आनंद मिला।

अपने जीवन-काल में एडविन पोर्टर ने करीब 250-300 फ़िल्मों का निर्माण किया, जिसमें Life of an American Fireman (1902), The Great Train Robbery (1903), Uncle Tom’s Cabin (1903), The Ex-Convict (1904), The Kleptomaniac (1905), Dream of a Rarebit Fiend (1906), Rescued from an Eagle’s Nest (1908), The Count of Monte Cristo (1913) इत्यादि विशेष रूप से प्रचलित हैं और दुनियाभर के फ़िल्म स्कूलों में इनमें से कई का ज़िक्र आज भी विश्व सिनेमा के इतिहास में क्रांतिकारी बदलाव के रूप में किया जाता है।

एक समय पर एडविन जब पूरी तरह से फ़िल्म निर्माण में उतर चुके थे, तब उन्होंने एडिसन कंपनी को अलविदा कहा और अपनी ख़ुद की फ़िल्म निर्माण कंपनी शुरू की, जिसका नाम Rex Motion Picture Company रखा। लेकिन बदलते समय और फ़िल्म निर्माण में लगातार हो रहे नये प्रयोगों के चलते अब एडविन का नाम भी फीका पड़ने लगा था।

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उनकी बनायी फ़िल्में अब दर्शकों को ख़ास पसंद नहीं आती थीं क्योंकि विश्व सिनेमा में नये-नये खिलाड़ी दाख़िल हो चुके थे जिनका स्टाइल दर्शकों के दिल पर अपना जादू चलाने लगा था। लिहाज़ा एडविन की कंपनी धीरे-धीरे घाटे में जाने लगी और उन पर कर्ज़ का बोझ बढ़ता चला गया और फिर एक दिन उन्हें कंपनी बंद करनी पड़ी। एडविन अब बूढ़े हो चले थे और कर्ज़े में डूब गये थे। दूसरी तरफ़ उनकी फ़िल्मों का प्रभाव भी कम हो चुका था। इन सब चीज़ों ने एडविन को तोड़ दिया था। आज उनके मूल स्टूडियो भवन का अस्तित्व व्यावसायिक रूप में नहीं है; वे इतिहास का हिस्सा बन चुका है। उनकी विरासत पारिवारिक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि फ़िल्म इतिहास की बौद्धिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ी।

वक़्त खा गया रत्न कैसे-कैसे!

एडविन एस. पोर्टर की कहानी सिनेमा के शुरूआती युग की एक कड़वी सच्चाई भी है: उन्होंने सैकड़ों फ़िल्में बनायीं, लेकिन समय उनमें से बड़ी संख्या को निगल लिया। शुरूआती फ़िल्मों को नाइट्रेट फ़िल्म स्टॉक पर शूट किया जाता था- बेहद ज्वलनशील और नष्ट हो जाने वाला माध्यम। स्टूडियो उस समय फ़िल्मों को “स्थायी कला” नहीं, बल्कि अस्थायी मनोरंजन मानते थे। लिहाज़ा उनको सहेजने का न तो कोई तरीक़ा था और न ही कोशिश, जिसका नतीजा यह हुआ कि एडविन की अधिकांश फ़िल्मों को संरक्षित करने की कोई व्यवस्थित कोशिश नहीं हुई।

इतिहासकारों के अनुमान के अनुसार, एडविन की लगभग 250-300 फ़िल्मों में से आज करीब 90 से 120 फ़िल्में ही किसी न किसी रूप में उपलब्ध हैं, कुछ पूरी, कुछ अधूरी, और कुछ के केवल अवशेष। उनकी सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म The Great Train Robbery अच्छी स्थिति में संरक्षित है और विश्व भर के फ़िल्म आर्काइव में दिखायी जाती है। कई अन्य फ़िल्में अमेरिकी अभिलेखागार, ख़ासकर Library of Congress में सुरक्षित हैं, जहाँ शुरूआती सिनेमा को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर बहाली परियोजनाएँ चलती रही हैं।

इतिहासकार मानते हैं एडविन सिनेमा की नयी औद्योगिक गति के साथ ख़ुद को ढाल नहीं पाये। वे आविष्कारक थे, रणनीतिक व्यवसायी नहीं। कुछ सहयोगियों और निर्माताओं ने उन्हें काम दिलाने की कोशिश की, लेकिन 1910 के दशक के मध्य तक नई पीढ़ी के निर्देशक और प्रोड्यूसर अधिक संगठित, व्यावसायिक और आक्रामक थे। एडविन धीरे-धीरे हाशिये पर चले गये। 1941 में न्यूयॉर्क में उनका निधन हुआ।

उनकी मृत्यु बड़ी ख़बर नहीं थी- न कोई बड़ा सार्वजनिक समारोह, न उद्योग का शोर। यह शुरूआती सिनेमा के कई अग्रदूतों की साझा नियति थी: उन्होंने नींव रखी, पर इमारत किसी और ने खड़ी की और धीरे-धीरे नींव रखने वाले हमेशा के लिए गुमनामी में खो गये। बहुत अजीब बात है ऐसा सिर्फ़ एडविन के साथ ही नहीं हुआ, बल्कि दुनिया भर के कई नामी फ़िल्मकारों और निर्माताओं का भी यही अंजाम हुआ, जिनमें Georges Méliès, Edwin S. Porter, Oscar Micheaux, F. W. Murnau, भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के, Guru Dutt, Ritwik Ghatak आदि कितने ही नाम हैं, जो सिनेमा उद्योग के संस्थागत ढाँचे से कभी आगे निकल ही नहीं पाये।

जिन्होंने ज़िंदगी और जवानी के क़ीमती साल इस कला पर समर्पित कर दिये। जिनके नाम और प्रयोगों की वजह से आज सिनेमा जगत करोड़ों अरबों का एक दुनिया का शक्तिशाली उद्योग बन गया है, लेकिन इसकी नींव रखने वालों को सिक्कों की खनक के आगे भुला दिया गया। जब इन महान लोगों का अंत हुआ तो बमुश्किल ही कोई उनके साथ खड़ा पाया गया। सही मायनों में सिनेमा की तुलना ‘माया’ से की गयी है- माया यानी छल- इसलिए आज का सिनेमाई दौर बहुत क्षणिक बनकर रह गया है, उसके अंदर की गहराई खो रही है।

तो साथियों, ये था विश्व सिनेमा के इतिहास को फिर से आप सबके साथ साझा करने का हमारा दूसरा अध्याय। आपके विचारों के ज़रिये हम जानना चाहते हैं आपको ये कैसा लग रहा है। तो इसके लिए हमें अपनी राय ज़रूर भेजें और इतना ही नहीं यदि आपके पास भी विश्व सिनेमा से जुड़ा कोई दस्तावेज़ या जानकारी है तो हमारे साथ बांटें क्योंकि वो कहते हैं ना कि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और हो सकता है जो हमसे छूट गया हो, शायद आपके माध्यम से वो भी बाक़ी पाठकों तक पहुंच जाये। चलिए अगले अध्याय के साथ मिलते हैं…

चारु शर्मा, charu sharma

चारु शर्मा

फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680

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