
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन-2
इस लेख की पिछली कड़ी में सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक श्रेणियों में सिनेमाई व्यंग्य का जायज़ा लिया था। इस कड़ी में भारतीय फिल्मों के शैलीगत विभाजन के परिप्रेक्ष्य में, व्यंग्य के विकास को कालखंडों के आधार पर देखना विशेष रूप से रोचक और उपयोगी होगा। इससे यह समझने में आसानी होगी कि विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के साथ व्यंग्य की प्रकृति, तीव्रता और अभिव्यक्ति की शैली किस प्रकार आगे बढ़ती रही।
स्वतंत्रता-पूर्व काल: सांकेतिक और सुधारवादी व्यंग्य
स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व निर्मित फिल्मों में व्यंग्य की भूमिका मुख्यतः सामाजिक कुरीतियों जैसे जातिवाद, वर्गभेद (अमीर-गरीब का अंतर) और स्त्री-स्वतंत्रता को रेखांकित करने तक सीमित रही, किंतु इसकी प्रस्तुति अपेक्षाकृत संयत और अप्रत्यक्ष थी। उस समय का सामाजिक और औपनिवेशिक संदर्भ खुलकर आलोचना की अनुमति नहीं देता था, इसलिए फिल्मकारों ने व्यंग्य को कथा और भावनात्मक प्रसंगों के भीतर पिरोकर प्रस्तुत किया।
इस दौर की उल्लेखनीय फिल्मों में ‘अछूत कन्या’ (1936) का विशेष स्थान है, जो जाति-व्यवस्था पर एक मार्मिक और व्यंग्यात्मक चित्रण है। इसके अतिरिक्त वी. शांताराम की ‘दुनिया न माने’ (1937) बाल-विवाह और स्त्री-असमानता पर प्रश्न उठाते हुए तत्कालीन समाज की रूढ़ियों पर व्यंग्य करती हैं। वेनिस फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने वाली यह शुरुआती भारतीय फिल्मों में से एक थी।
स्वतंत्रता-पूर्व काल में व्यंग्य का स्वर अपेक्षाकृत मृदु, सांकेतिक और सुधारवादी था, जो आगे चलकर अधिक मुखर, तीखा और विविध रूपों में विकसित होता दिखाई देता है।
स्वतंत्रता के बाद (1947–1960): यथार्थवादी और प्रतीकात्मक व्यंग्य
आजादी के बाद के लगभग डेढ़ दशकों (1947 से 1960 तक) का हिंदी सिनेमा, भारतीय समाज के संक्रमणकाल का दर्पण है। इस दौर में व्यंग्य सामाजिक यथार्थ, विडंबना तथा नैतिक द्वंद्व के माध्यम से अधिक प्रकट हुआ। राष्ट्र-निर्माण, शहरीकरण, वर्ग-विभाजन और आदर्शवाद बनाम यथार्थ जैसे विषयों ने व्यंग्य को गंभीर, संवेदनात्मक और प्रतीकात्मक स्वर दिया।
इस दौर की फिल्मों में अमीर-गरीब के अंतर, शोषण और विस्थापन को व्यंग्यात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करने वाली एक प्रमुख फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ (1953, बिमल रॉय) थी। इस फिल्म में व्यंग्य विकास के उस मॉडल पर है, जिसमें प्रगति के नाम पर कमजोर वर्गों का दमन होता है। 1957 में आई बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ मशीन बनाम मनुष्य के द्वंद्व को प्रस्तुत करते हुए औद्योगिकीकरण की अंधी दौड़ पर व्यंग्य करती है। साहित्य, बाजारवाद और संवेदनहीन समाज पर व्यंग्य करने वाली फिल्मों में गुरुदत्त की ‘प्यासा’ मील के पत्थर की तरह है। 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की ‘मदर इंडिया’, ग्रामीण जीवन, नैतिकता और सामाजिक दबावों के बीच संघर्ष को दिखाते हुए आदर्श और यथार्थ के द्वंद्व को रेखांकित करती है। इसी तरह ‘दो आँखें बारह हाथ’ (1957, वी. शांताराम) जेल-व्यवस्था और दंड-प्रणाली पर प्रश्न उठाती है और व्यवस्था में सुधार को प्रेरित करती है।
1960 में प्रदर्शित दो फिल्में अपने कथ्य एवं अंतर्निहित व्यंग्य से नए प्रश्न खड़े करती हैं। पहली फिल्म ‘कानून’ (1960, बी.आर. चोपड़ा), न्याय-व्यवस्था की सीमाओं और मृत्युदंड की वैधता पर बौद्धिक स्तर पर प्रश्न उठाती है। फिल्म में तर्कप्रधान, दार्शनिक व्यंग्य निहित है। यह हिंदी सिनेमा की उन दुर्लभ फिल्मों में है जिसमें कोई गीत नहीं है। दूसरी फिल्म ‘उसने कहा था’ (1960, मोनी भट्टाचार्य) मूलतः प्रेम और त्याग की कथा होते हुए भी औपनिवेशिक विडंबना को उजागर करती है। एक भारतीय सैनिक अंग्रेज़ी सेना के लिए विदेशी भूमि पर ऐसे शत्रु से लड़ता है जिससे उसका कोई व्यक्तिगत वैर नहीं। यह स्थिति औपनिवेशिक शोषण और मानसिक दासता पर एक गहरा व्यंग्य करती है।
इस कालखंड में राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत सिनेमा भारतीय समाज के अंतर्विरोधों, आकांक्षाओं और विडंबनाओं का सशक्त प्रतिनिधि बनकर उभरता है। उनकी फिल्मों में व्यंग्य प्रत्यक्ष प्रहार के बजाय विडंबनाओं, प्रतीकों और चरित्रों के माध्यम से सामने आता है, जो दर्शक को भीतर तक प्रभावित करता है। इस दृष्टि से राज कपूर का सिनेमा हिंदी फिल्मों में सामाजिक व्यंग्य की एक सशक्त और आधारभूत परंपरा का निर्माण करता है। 1951 में आई ‘आवारा’, अपराध और न्याय-व्यवस्था की विडंबनाओं पर केंद्रित है। फिल्म यह प्रश्न उठाती है कि अपराध व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्ति है या सामाजिक परिस्थितियों का परिणाम। उनकी अगली फिल्म ‘श्री 420’ (1955) शहरी जीवन, भ्रष्टाचार, उपभोक्तावाद और नैतिक पतन पर व्यंग्य प्रस्तुत करती है। महानगरीय समाज में ईमानदारी बनाम छल-कपट का द्वंद्व इसका केंद्रीय विषय है। ‘जागते रहो’ (1956) शहरी मध्यवर्ग के पाखंड और नैतिक दोहरेपन पर व्यंग्य करती है। इसी प्रकार 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में कानून और नैतिकता के द्वंद्व पर सूक्ष्म व्यंग्य देखने को मिलता है। यह फिल्म डकैत समस्या और सामाजिक पुनर्वास के प्रश्न को भी उठाती है।
1961–1980: व्यंग्य का विस्तार और राजनीतिक चेतना
1961 से 1980 का कालखंड हिंदी सिनेमा में व्यंग्य के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समय सामाजिक-राजनीतिक संक्रमण, शहरीकरण, बढ़ते भ्रष्टाचार, आपातकाल और मध्यमवर्गीय चेतना के उभार का था। परिणामतः इस दौर में व्यंग्य अधिक मुखर, विविध और बहुस्तरीय रूप में सामने आता है। हल्के-फुल्के हास्य से लेकर तीखे राजनीतिक कटाक्ष तक की एक सशक्त और बहुआयामी परंपरा इस कालखंड ने स्थापित की। गोदान (1963, त्रिलोक जेटली) जो मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित है, जमींदारी प्रथा, सामाजिक शोषण और पाखंड पर मार्मिक व्यंग्य प्रस्तुत करती है।
इस दौर में समानांतर सिनेमा ने व्यंग्य को अधिक गंभीर और राजनीतिक आयाम दिया। ऐसी फिल्मों में मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ (1969), श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ (1974) और ‘निशांत’ (1975) को रखा जा सकता है। ‘भुवन शोम’ एक कठोर नौकरशाह के मानवीय परिवर्तन की कथा है जिसमें व्यंग्य नौकरशाही की जड़ता और सत्ता के अहंकार के रूप में उभरता है। ‘अंकुर’ में सामंतवाद, जाति और पितृसत्ता के दोहरे मापदंडों पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है जबकि ‘निशांत’, ग्रामीण सत्ता-संरचना और शोषण पर प्रहार करती फिल्म के रूप में सामने आती है।
इन दो दशकों में राजनीतिक व्यंग्य और व्यवस्था की आलोचना करने वाली फिल्मों में ‘आंधी’ (1975, गुलजार) तथा ‘किस्सा कुर्सी का’ (1977, अमृत नाहटा) का नाम हर चर्चा में प्रमुखता से लिया जाता है वहीं ‘गाइड’ (1965, विजय आनंद) एवं ‘तीसरी कसम’ (1966, बासु भट्टाचार्य) जैसी फिल्में आस्था, आध्यात्मिकता, सामाजिक पाखंड और नैतिक दोहरेपन पर व्यंग्य करती हैं। शतरंज के खिलाड़ी (1977, सत्यजीत रे) में नवाबी शासकों की निष्क्रियता और अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद पर सूक्ष्म व्यंग्य है। जब देश हाथ से निकल रहा हो और शासक शतरंज खेलने में मग्न हो, यह विडंबना फिल्म का केंद्रीय भाव है। हलके-फुल्के हास्य एवं सुरुचिपूर्ण व्यंग्य वाली फिल्मों में ‘गोलमाल’ (1979, ऋषिकेश मुखर्जी) तथा ‘चुपके चुपके’ (1975, ऋषिकेश मुखर्जी) इस दौर की पहचान हैं। ‘गोलमाल’ नौकरी पाने के लिए झूठी पहचान बनाने वाले युवक की कहानी है वहीं ‘चुपके चुपके’ यह संदेश देने में सफल रही कि जीवन में बहुत अधिक गंभीर होने की बजाय कभी कभी खुद पर हँसना भी जरूरी है। इनके साथ ‘चलती का नाम गाड़ी’ (1958) तथा ‘पड़ोसन’ (1968) जैसी फिल्मों को विशुद्ध हास्य फिल्मों के रूप में शामिल कर सकते हैं। दोनों ही फिल्मों में स्तरीय कॉमेडी देखने को मिलती है।
1981–2000: डार्क सटायर और मनोरंजन का मिश्रण
1981 से 2000 का कालखंड हिंदी सिनेमा में व्यंग्य के रूपांतरण और पुनर्संयोजन का दौर माना जाता है। 1970-80 के दशक के ‘किस्सा कुर्सी का’ सरीखे तीखे राजनीतिक व्यंग्य और समानांतर सिनेमा की यथार्थवादी परंपरा के बाद, इस अवधि में व्यंग्य ने एक ओर खुद को मनोरंजनप्रधान ढाँचे में ढाला, तो दूसरी ओर कुछ चुनिंदा फिल्मों में वह अत्यंत धारदार सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी के रूप में भी उभरा। यह समय आर्थिक-सामाजिक बदलावों, मध्यमवर्ग के विस्तार, टेलीविजन के प्रसार और 1991 के उदारीकरण का था, जिनका प्रभाव व्यंग्य की विषयवस्तु और शैली, दोनों पर पड़ा।

‘जाने भी दो यारो’ (1983, कुंदन शाह) हिंदी सिनेमा की सबसे सशक्त सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य फिल्मों में गिनी जाती है। यह फिल्म भ्रष्टाचार, मीडिया, नौकरशाही और राजनीति के गठजोड़ पर तीखा प्रहार करती है, तथा अपने व्यंग्यात्मक शिल्प, फार्स और एब्सर्डिटी के कारण आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। ‘मिर्च मसाला’ (1987, केतन मेहता) मूलतः स्त्री-प्रतिरोध की कथा है, किंतु इसके भीतर सामंती सत्ता, पुरुष वर्चस्व, लैंगिक असमानता और ग्रामीण लाचारी पर गहरा व्यंग्य निहित है। 1981 में सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानी ʽसद्गतिʾ पर उसी नाम से फिल्म बनाई थी। यह फिल्म भारतीय जाति-व्यवस्था पर गहरा प्रहार करती है।
इस दौर में समानांतर सिनेमा ने व्यंग्य को अधिक वैचारिक, यथार्थवादी और तीक्ष्ण बनाया। गोविंद निहलानी की ‘अर्ध सत्य’ (1983) तथा श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ (1983) इसके सशक्त उदाहरण हैं। ‘अर्ध सत्य’ में पुलिस-व्यवस्था, सत्ता-संरचना और व्यक्तिगत नैतिकता के द्वंद्व के माध्यम से व्यवस्था की विडंबनाओं पर व्यंग्य उभरता है, जबकि ‘मंडी’ वेश्यावृत्ति के परिवेश के जरिए समाज, नैतिकता और राजनीति के पाखंड पर करारा प्रहार करती है।
1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद व्यंग्य का केंद्र बदलकर उभरते मध्यमवर्ग, उपभोक्तावादी संस्कृति और बदलते पारिवारिक मूल्यों की ओर स्थानांतरित हो गया। इस प्रवृत्ति की फिल्मों में ‘हम हैं राही प्यार के’ (1993) और ‘अंदाज़ अपना अपना’ (1994) उल्लेखनीय हैं। यद्यपि ये फिल्में हास्यप्रधान हैं, फिर भी इनमें लालच, पहचान-संकट और सफलता की विडंबनाओं पर अर्थपूर्ण व्यंग्य उपस्थित है।
‘राजा हिंदुस्तानी’ (1996) में वर्गभेद और सामाजिक प्रतिष्ठा के आडंबर पर अप्रत्यक्ष व्यंग्य देखने को मिलता है, जबकि ‘मैं आज़ाद हूँ’ (1989, टीनू आनंद) मीडिया और राजनीति के गठजोड़ पर गहरा और मार्मिक कटाक्ष प्रस्तुत करती है। इसी क्रम में राजनीति और अपराध के बढ़ते गठजोड़ पर तीखा प्रहार करने वाली फिल्म के रूप में ‘शूल’ (1999, ई. निवास) को भी रख सकते हैं। ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ (1998, पामेला रूक्स) में विभाजन की त्रासदी, राजनीतिक निर्णयों की अमानवीयता और आम आदमी की विवशता बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रित हुई है।
2000 के बाद: समकालीन और बहुआयामी व्यंग्य
2000 के बाद यानी की इक्कीसवीं सदी के हिंदी सिनेमा में व्यंग्य अधिक विविध और प्रखर होकर सामने आता है। इस काल में व्यंग्य ने एक नए तेवर, नई भाषा और नए विषयों के साथ पुनर्संयोजन किया है। वैश्वीकरण, उदारीकरण के प्रभाव, मीडिया विस्फोट, डिजिटल तकनीक, उपभोक्तावाद और बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों ने व्यंग्य की विषयवस्तु और शैली, दोनों को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
राजनीति, लोकतंत्र और व्यवस्था पर ‘नायक’ (2001, एस. शंकर) में तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है। एक दिन का मुख्यमंत्री जैसी कल्पना व्यवस्था की विडंबनाओं को उजागर करती है। ‘लगान’ (2001, आशुतोष गोवारिकर) में क्रिकेट मैच को औपनिवेशिक प्रतिरोध के रूपक के रूप में प्रस्तुत कर, सत्ता के दंभ, कर-व्यवस्था और शासकीय अहंकार पर प्रतीकात्मक व्यंग्य प्रस्तुत किया गया है। सरकारी योजनाओं, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर ‘वेल डन अब्बा’ (2009, श्याम बेनेगल) गंभीर कटाक्ष करती है। ‘पीपली लाइव’ (2010, अनुषा रिज़वी) में किसान आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे को मीडिया-तमाशे और राजनीतिक अवसरवाद से जोड़ते हुए तीखा व्यंग्य किया गया है। धर्म, आस्था और पाखंड पर ‘ओएमजी: ओह माय गॉड!’ (2012, उमेश शुक्ला) एवं ‘पीके’ (2014, राजकुमार हिरानी) में प्रभावशाली व्यंग्य रचा गया है। ‘ओएमजी 2’ (2023, अमित राय) यौन-शिक्षा, सामाजिक संकोच और धार्मिक दृष्टिकोणों पर व्यंग्य में अपनी बात रखती एक अच्छी फिल्म है। ‘मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.’ (2003, राजकुमार हिरानी) और ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ (2006, राजकुमार हिरानी) में चिकित्सा-व्यवस्था, शिक्षा और गांधीवाद की पुनर्व्याख्या के माध्यम से समाज पर व्यंग्य किया गया है। इसी तरह ‘थ्री इडियट्स’ (2009, राजकुमार हिरानी) शिक्षा-प्रणाली, अंकों की दौड़ और करियर-प्रेशर पर व्यंग्यात्मक प्रहार करती है। ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ (2017, श्री नारायण सिंह) स्वच्छता, सामाजिक मानसिकता और ग्रामीण संरचना पर व्यंग्यात्मक दृष्टि से एक अनछुई समस्या पर दृष्टि डालती है।
विभाजन की पृष्ठभूमि में स्त्री की अस्मिता, मानवीयता के क्षरण और सामाजिक क्रूरता पर ‘पिंजर’ (2003, चंद्रप्रकाश द्विवेदी) में गहरी व्यंग्यात्मक टिप्पणी अंतर्निहित है। ‘गंगाजल’ (2003, प्रकाश झा) पुलिस-प्रशासन और राजनीति के क्रूर गठजोड़ को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करती है। फिल्म में व्यवस्था की हिंसक प्रवृत्तियों पर तीखा कटाक्ष है। ‘राजनीति’ (2010, प्रकाश झा) का केंद्रीय विषय परिवारवाद, सत्ता-लोलुपता, नैतिक पतन और राजनीतिक ड्रामा है, जिसमें सत्ता-संघर्ष की विडंबनाएँ व्यंग्यात्मक रूप में उभरती हैं। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ (2011, राजकुमार गुप्ता) अपने शीर्षक से ही व्यंग्य का आभास देती है। फिल्म में मीडिया ट्रायल और जनमत की भूमिका पर अप्रत्यक्ष व्यंग्य है। वैश्विक मंदी, अपराध और अर्थव्यवस्था पर ‘फँस गए रे ओबामा’ (2010, सुभाष कपूर) तथा मीडिया, निगरानी संस्कृति और निजी जीवन के बाजारीकरण पर ‘लव, सेक्स और धोखा’ (2010, दिबाकर बनर्जी) में धारदार व्यंग्य है। ग्रामीण-शहरी द्वंद्व, राजनीति, अशिक्षा और सामाजिक रूढ़ियों पर व्यंग्य के रूप में ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ (2008, श्याम बेनेगल) तथा वैश्वीकरण, धर्म और बनारस की बदलती सांस्कृतिक पहचान पर ‘मोहल्ला अस्सी’ (2018, डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी) महत्वपूर्ण फिल्में हैं। ‘दिल्ली बेली’ (2011, अभिनय देव) में शहरी मध्यमवर्गीय जीवन, भाषा, नैतिकता और भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य है।
समकालीन यथार्थ और छोटी-छोटी घटनाओं पर भी इस दौर में मनोरंजक सिनेमा रचा गया है। ऐसी ही एक फिल्म है ‘कठल’ (2023, यशोवर्धन मिश्रा)। एक साधारण-सी घटना, पेड़ से कटहल चोरी हो जाने को आधार बनाकर रची गई यह फिल्म प्रशासनिक तंत्र, पुलिस व्यवस्था और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर तीखा व्यंग्य करती है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘न्यूटन’ (2017, अमित मसूरकर) में चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से लोकतंत्र की जमीनी हकीकत, आदर्शवाद और व्यवस्था के टकराव पर व्यंग्य किया गया है वहीं ‘बधाई दो’ (2022, हर्षवर्धन कुलकर्णी) लैंगिक पहचान, सामाजिक दबाव और सामान्य जीवन की परिभाषाओं पर व्यंग्य करती है। टेलीफोन कॉल सेंटर की पृष्ठभूमि में इच्छाओं, अकेलेपन और सामाजिक दिखावे पर व्यंग्य को ‘ड्रीम गर्ल’ (2019, राज शांडिल्य) भलीभाँति मुखर स्वर देती है तथा ‘लूडो’ (2020, अनुराग बासु) में किस्मत, अपराध और मानवीय लालच की उलझनों के जरिए जीवन की विडंबनाओं को, व्यंग्यात्मक दृष्टि से दिखाया गया है। ‘लापता लेडीज़’ (2024, किरण राव) में पितृसत्ता, लैंगिक असमानता और ग्रामीण सामाजिक संरचना पर हल्का किंतु प्रभावी व्यंग्य है।
इस दौर की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति स्मॉल-टाउन सिनेमा है, जहाँ व्यंग्य अधिक स्वाभाविक और जीवनानुभव से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। इस तरह की फिल्मों में ‘बरेली की बर्फी’ (2017, अश्विनी तिवारी) और ‘शुभ मंगल सावधान’ (2017, आर.एस. प्रसन्ना) को रखा जा सकता है। पहली फिल्म जहाँ छोटे शहर की सामाजिक संरचना, साहित्यिक महत्वाकांक्षा, लेखक-प्रकाशक संबंध और पहचान के संकट पर हल्का व्यंग्य करती है वहीं दूसरी फिल्म में यौनिकता, सामाजिक झिझक तथा पुरुषत्व की परिभाषा पर साहसिक और विनोदी टिप्पणी देखने को मिलती है। ‘अंधाधुन’ (2018, श्रीराम राघवन) डार्क कॉमेडी के माध्यम से नैतिक पतन, लालच और अपराध की सामान्यीकृत मानसिकता पर व्यंग्य करती है।
इक्कीसवीं सदी का हिंदी सिनेमा व्यंग्य को एक अत्यंत लचीले और बहुआयामी रूप में प्रस्तुत करता है। जहाँ पहले व्यंग्य बड़े राजनीतिक या सामाजिक विमर्शों तक सीमित दिखाई देता था, वहीं अब कठल, न्यूटन जैसी फिल्में यह सिद्ध करती हैं कि रोज़मर्रा की साधारण घटनाएँ भी गहरे व्यंग्य का आधार बन सकती हैं। इस दौर की फिल्मों में व्यंग्य स्थानीय, मानवीय और जीवन-सन्निकट भी बन गया है, जो दर्शक को हँसाते हुए उसकी सामाजिक चेतना को भी झकझोरता है। इस कालखंड ने सिद्ध किया है की व्यंग्य यदि विचारोत्तेजक भी हो, तो भी व्यापक दर्शक-वर्ग तक प्रभावी ढंग से पहुँच सकता है।
फिल्मी गीतों में व्यंग्य: तंज़, प्रतीक और विडंबना का प्रयोग
हिंदी फिल्मों में गीत, मनोरंजन के साथ ही, व्यंग्य, सामाजिक आलोचना और वैचारिक हस्तक्षेप के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित हुए हैं। भारतीय सिनेमा की परंपरा में गीतों ने यह संभव किया कि जटिल सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक विडंबनाएँ और मानवीय अंतर्विरोध सरल, स्मरणीय और लोकप्रिय रूप में व्यापक दर्शक-वर्ग तक पहुँच सकें। फिल्म-अध्येता आशीष राजाध्यक्ष ने अपनी पुस्तक ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन सिनेमा’ में भी इस तथ्य की ओर संकेत किया है कि हिंदी फिल्मों के गीत “नैरेटिव के भीतर वैचारिक टिप्पणी” का कार्य करते हैं। ऐसे गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे प्रत्यक्ष कथन के बजाय तंज, रूपक, उलटबाँसी और प्रतीकात्मकता के माध्यम से व्यंग्य रचते हैं। कई बार गीत, फिल्म के कथानक से आगे बढ़कर अपने समय की सामाजिक मानसिकता को भी प्रतिबिंबित करते हैं। उदाहरणस्वरूप इन गीतों को देखिए –
- “मेरा जूता है जापानी” (श्री 420): मोटे तौर पर यह राष्ट्रवादी उल्लास का गीत है, किंतु भीतर से यह उस दौर के विरोधाभासों, विदेशी वस्तुओं के आकर्षण और स्वदेशी भावना पर व्यंग्य करता है।
- “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है” (प्यासा ): भौतिक सफलता और मानवीय शून्यता के द्वंद्व पर दार्शनिक-व्यंग्य प्रस्तुत करता है।
- “तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा” (धूल का फूल ): धार्मिक पहचान की राजनीति पर मानवीय दृष्टि से किया गया व्यंग्य। यह गीत उस सामाजिक विडंबना को रेखांकित करता है जहाँ जन्म के आधार पर मनुष्य की पहचान निर्धारित की जाती है।
- “सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी” (अनाड़ी): ईमानदारी बनाम चालाकी के द्वंद्व के माध्यम से सामाजिक नैतिकता के क्षरण पर व्यंग्य।
- “महँगाई डायन खाय जात है” (पीपली लाइव ): आम आदमी की आर्थिक पीड़ा को लोक-शैली में व्यक्त करते हुए यह गीत महँगाई और नीतिगत विफलताओं पर तीखा कटाक्ष करता है।
- “साला मैं तो साहब बन गया” (सगीना): सत्ता, पद और औपनिवेशिक मानसिकता से जुड़े अहंकार पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी।
- “आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ” (पहचान): गीत मानवीयता के क्षरण की पृष्ठभूमि में एक व्यंग्यात्मक प्रतिप्रश्न की तरह उभरता है जैसे कहना चाह रहा हो कि ऐसी साधारण-सी बात को कहने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
इन कुछ उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि हिंदी फिल्मों के गीतों में व्यंग्य की धार कितनी गहरी, प्रभावशाली और स्थायी है। इन गीतों में व्यंग्य अनेक स्तरों पर अभिव्यक्त होता है, कहीं राष्ट्रवाद और उपभोक्तावाद के द्वंद्व के रूप में, तो कहीं जाति, धर्म और नैतिकता से जुड़े प्रश्नों के रूप में। साथ ही महँगाई, वर्ग-संघर्ष, जीवन के अर्थ और मानवीय संवेदनाओं जैसे विषय भी इनके माध्यम से उभरते हैं। ये गीत सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और दार्शनिक विषमताओं का सूक्ष्म संकेत देते हुए दर्शक-श्रोता को विचार के लिए प्रेरित करते हैं।
साहित्य और सिनेमा: व्यंग्य-साहित्य की सीमित सिनेमाई उपस्थिति:
भारत में सिनेमा की शुरुआत के संदर्भ में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित पहली पूर्ण लंबाई की मूक फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) भारतीय पौराणिक आख्यान पर आधारित थी, लेकिन इसके कथानक का स्त्रोत भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाटक ‘हरिश्चंद्र’ को माना जाता है। इस कथा में प्रत्यक्ष व्यंग्य नहीं है, लेकिन भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिंदी व्यंग्य-परंपरा के प्रमुख आधार-स्तंभ माने जाते हैं, इसलिए इस तथ्य का विशेष महत्त्व है। सिनेमा और व्यंग्य-साहित्यकार का प्रारंभिक संबंध को एक उत्साहवर्द्धक घटना के रूप में देखा जा सकता है।
बाद में जब हिंदी सिनेमा में फीचर फिल्मों की परंपरा विकसित हुई, तब साहित्यिक कृतियों पर अनेक महत्वपूर्ण फिल्में बनीं, किंतु विशुद्ध व्यंग्य-कृतियों पर अपेक्षाकृत कम काम हुआ। यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति है, क्योंकि हिंदी व्यंग्य-साहित्य, विशेषतः उपन्यास और निबंध का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। उदाहरण के लिए, श्रीलाल शुक्ल का प्रसिद्ध व्यंग्य-उपन्यास ‘राग दरबारी’ हिंदी साहित्य की कालजयी कृति माना जाता है, किंतु इस पर अब तक कोई मुख्यधारा की फीचर फिल्म नहीं बनी, हालाँकि 1980 के दशक में दूरदर्शन के लिए धारावाहिक रूपांतरण अवश्य हुआ था।
जिन साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्में बनी हैं, उनमें उल्लेखनीय नाम हैं – प्रेमचंद (गोदान, सद्गति एवं शतरंज के खिलाड़ी), चंद्रधर शर्मा गुलेरी (उसने कहा था), अमृता प्रीतम (पिंजर), काशीनाथ सिंह (मोहल्ला अस्सी), कमलेश्वर (आंधी) आदि। हालाँकि इन कृतियों में सामाजिक यथार्थ, विडंबना और आलोचनात्मक दृष्टि मौजूद है, फिर भी इनमें से अधिकांश को शुद्ध “व्यंग्य-प्रधान” फिल्में नहीं कहा जा सकता। इनमें व्यंग्य केवल एक अंतर्धारा के रूप में उपस्थित है। इसके विपरीत जिन व्यंग्यकारों ने फिल्मों में पटकथा अथवा संवाद लेखन का काम किया उनमें से अधिकाँश फ़िल्में व्यंग्य की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। ऐसे नामों में जो नाम एकदम से स्मृति में आते हैं उनमें शरद जोशी और केपी सक्सेना प्रमुख हैं। शरद जोशी ने क्षितिज (1974), गोधूलि (1977), उत्सव (1984), उड़ान (1989), चोरनी (1982), साँच को आँच नहीं (1979) और दिल है कि मानता नहीं (1991) जैसी फिल्मों के संवाद लिखे। उनकी लेखन-शैली में व्यंग्य, चुटीलापन और सामाजिक अवलोकन की तीक्ष्णता स्पष्ट दिखाई तो देती है, लेकिन इनमें से कोइ भी फ़िल्म पूर्णतया व्यंग्य फ़िल्म नहीं है। इसी प्रकार केपी सक्सेना ने ‘लगान’ (2001), ‘स्वदेश’ (2004), ‘हलचल’ (2004) और ‘जोधा अकबर’ (2008) जैसी फिल्मों में संवाद और पटकथा लेखन में योगदान दिया।
हिंदी सिनेमा और व्यंग्य-साहित्य के संबंधों का अवलोकन यह स्पष्ट करता है कि जहाँ साहित्य में व्यंग्य एक स्वतंत्र और सशक्त विधा के रूप में विकसित हुआ, वहीं सिनेमा में वह प्रायः प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि कथानक, चरित्रों, संवादों और स्थितियों के भीतर अंतर्निहित रूप में व्यक्त हुआ।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सिनेमा एक व्यापक जनमाध्यम होने के कारण अक्सर प्रत्यक्ष और तीखे व्यंग्य के बजाय संतुलित, मनोरंजन-प्रधान और बहुस्तरीय प्रस्तुति को प्राथमिकता देता है। इसी कारण राग दरबारी जैसी विशुद्ध व्यंग्य-कृतियों का फिल्मांकन अपेक्षाकृत कम हुआ, जबकि सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना से जुड़ी कृतियाँ अधिक बार रूपांतरित की गईं।
इस प्रकार, हिंदी सिनेमा में व्यंग्य की उपस्थिति भले ही सीमित या अप्रत्यक्ष प्रतीत हो, किंतु उसकी अंतर्धारा निरंतर सक्रिय रही है, जो समय-समय पर विभिन्न रूपों में उभरकर समाज की विसंगतियों को उजागर करती रही है
— — —
संदर्भ
Encyclopaedia of Indian Cinema by Ashish Rajadhyaksha & Paul Willemen
Bollywood: The Indian Cinema Story by Nasreen Munni Kabir
अपनी माटी.कॉम
हिंदी सारंग.कॉम
सिनेमा और साहित्य – ले. हरीश कुमार
साहित्य, सिनेमा और समाज (आलेख, जनसत्ता) ले. साकेत सहाय
हिन्दी साहित्य का फिल्मों से जुड़ा नही गहरा नाता! (आलेख, जनसत्ता) ले. श्रीशचंद्र मिश्र

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
