मंटो की वह किताब, जिससे जन्मी नयी विधा
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

मंटो की वह किताब, जिससे जन्मी नयी विधा

        सआदत हसन मंटो उर्दू कथा साहित्य (अफ़सानवी अदब) के नायक हैं। प्रेमचंद के बाद जिन उर्दू कहानीकारों (अफ़साना निगारों) ने अपनी ख़ास पहचान बनायी, उनमें मंटो का नाम सबसे बड़ा है। उनकी शख़्सियत कुछ ऐसी है कि उनके बारे में जितना लिखा गया है उतना शायद किसी और के बारे में नहीं। गोया उसे किसी तौर नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। उसकी उक्तियां (मक़ूले) इस क़दर मशहूर हैं कि लोग कहावतों (ज़रब उल अमसाल) की तरह कोट करते हैं।

भारत विभाजन (तक़सीम-ए-हिंद) और इस दौरान हिंदू-मुस्लिम-सिख धर्मों (मज़ाहिब) के पैरोकारों की ऐसी-ऐसी कारस्तानियां और कारगुज़ारियाँ मंटो ने क़लम-बंद की हैं कि रौंगटे खड़े हो जाते हैं। इन्सान में कितनी हैवानियत हो सकती है, इसके बेपनाह शेड्स उसने बयान किये हैं। उसने यौन मनोविज्ञान (जिन्सी नफ़सियात) पर भी बेपनाह लिखा है और ऐसा लिखा है कि इस पर अश्लील लेखन (फ़ुहश निगारी) के मुक़द्दमे तक चले।

“स्याह हाशिये” एक पुस्तिका (किताबचे) की सूरत में है। कोई 60 पृष्ठों (सफ़हात) पर आधारित (मुश्तमिल) है मगर उसकी लेखन शैली और कौशल (अंदाज़-ए-तहरीर) ने उसे अमर (ला-फ़ानी) बना दिया है। कोई-कोई रचना (तहरीर) तो महज़ दो तीन पंक्तियों (सुतूर) तक ही सीमित (महदूद) है, मगर इतने में ही जो बात कही गयी है, वो दिल-ओ-दिमाग़ को झंझोड़ने के लिए काफ़ी है।

उर्दू अदब में दरअसल लघुकथा विधा (सिन्फ़ अफ़सांचा) की शुरूआत इस किताब से ही मानी जाती है। इस दौर में ये अफ़सांचा शब्दावली (इस्तिलाह) बनी नहीं थी क्योंकि बहुत बाद में इसको जोगिंदर पाल ने प्रचलित (राइज़) किया। उस वक़्त के आलोचक (नाक़िदीन) जिनमें मुहम्मद हसन अस्करी ने इतने संक्षिप्त गद्य के टुकड़ों (मुख़्तसर नस्र पारों) को “लतीफ़ा” तक कहा, मगर आशय साधारण चुटकुला नहीं बल्कि लतीफ़ बात अर्थात कोमल और सूक्ष्म बात से है।

मंटो की वह किताब, जिससे जन्मी नयी विधा

मुहम्मद हसन अस्करी “स्याह हाशिये” के बारे में लिखते हैं:

“यहां इन्सान को अत्याचारी (ज़ालिम) और पीड़ित (मज़लूम) की हैसियत से पेश किया गया है और दंगों (फ़सादात) को विशेष परिस्थितियों (मख़सूस हालात) में। सामाजिक उद्देश्य  (समाजी मक़सद) का तो मंटो ने झगड़ा ही नहीं पाला। उन्होंने ये फ़ैसला तक न किया कि ज़ालिम लोग बुरे हैं या मज़लूम अच्छे हैं… एक योग्य साहित्यकार (माक़ूल अदीब) को यह शोभा (जे़ब) नहीं देता कि ऐसे होश उड़ा देने वाले वाक़ियात (घटनाओं) के मुताल्लिक़ (सम्बन्ध में) सियासी लोगों (राजनीतिज्ञों) की सतह पर उतर के फ़ैसला करने लगे। मंटो ने अपने अफ़्सानों में वही किया है, जो एक ईमानदार, सियासी अर्थों में ईमानदार नहीं बल्कि अदीब की हैसियत से ईमानदार और हक़ीक़ी अदीब को इन हालात में करना चाहिए था। उन्होंने अच्छाई और बुराई (नेक-ओ-बद) के सवाल ही को तर्क-वितर्क से बाहर (ख़ारिज अज़ बह्स) क़रार दिया है। उनका दृष्टिकोण (नुक़्ता-ए-नज़र) न सियासी है, न आर्थिक या सामाजिक (इमरानी), न सदाचारी (अख़लाक़ी) बल्कि साहित्यिक और शोधात्मक (अदबी और तहक़ीक़ी) है। मंटो ने तो सिर्फ़ ये देखने की कोशिश की है कि ज़ालिम या मज़लूम की शख़्सियत के विभिन्न आग्रहों (मुख़्तलिफ़ तक़ाज़ों) से अत्याचार (ज़ालिमाना फे़अल) का क्या सम्बन्ध (ताल्लुक़) है। ज़ुल्म करने की ख़ाहिश के इलावा ज़ालिम के अंदर और कौन-कौन-सी प्रवृत्तियां (मीलानात) सक्रिय (कारफ़रमा) हैं, इन्सानी दिमाग़ में ज़ुल्म कितनी जगह घेरता है, ज़िंदगी की दूसरी दिलचस्पियाँ बाक़ी रहती हैं या नहीं। मंटो ने न तो रहम के जज़्बात भड़काये हैं, न ग़ुस्से के, न नफ़रत के। वो तो आपको सिर्फ़ इन्सानी दिमाग़, इन्सानी किरदार और शख़्सियत पर अदबी और तहक़ीक़ी अंदाज़ से ग़ौर करने की दावत देते हैं। अगर वो कोई जज़बा पैदा करने की फ़िक्र में हैं, तो सिर्फ़ वही जज़्बा जो एक फ़नकार को जायज़ तौर पर पैदा करना चाहिए यानी जीवन से जुड़े असीम विस्मय और अचंभे (बे-पायाँ तहय्युर और इस्तेजाब)… क़ातिलों का क़त्ल किये चले जाना भयावह या आतंक पैदा करने वाली (दहश्त अंगेज़) चीज़ नहीं है, दहश्त तो इस ख़्याल से होती है कि जिन लोगों में सफ़ाई और गंदगी पहचानने का विवेक (तमीज़) बाक़ी है, वो भी क़त्ल कर सकते हैं। आख़िर अर्थपूर्णता (माअनवियत) तो तुलना और विरोधाभास (तक़ाबुल और तज़ाद) ही से पैदा होती है। ग़ैर-मामूली हालात में ग़ैर-मामूली हरकतें हमें इन्सान के मुताल्लिक़ ज़्यादा से ज़्यादा ये बता सकती हैं कि हालात इन्सान को हैवान की सतह पर ले आते हैं, लेकिन ग़ैर-मामूली करते हुए मामूली बातों की तवज्जो हमें इन्सान के मुताल्लिक़ एक ज़्यादा गहरी और ज़्यादा बुनियादी बात बताती है… वो ये कि इन्सान हर समय और एक ही समय (हर वक़त और बैक वक़्त) इन्सान भी होता है और हैवान भी, अगर इन्सान सिर्फ़ एक तरह का, सिर्फ़ अच्छा (नेक) या सिर्फ़ बुरा (बद) होता तो बड़ी ख़तरनाक चीज़ होता। इन्सान की तरफ़ से अगर कुछ उम्मीद बंधती है, तो सिर्फ़ इस वजह से कि इन्सान का कुछ ठीक नहीं। अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी हो सकता है… वो तो बड़ी व्यंग्यात्मक (तंज़िया) मुस्कुराहट के साथ इन्सानों से ये कहता है कि तुम अगर चाहो भी तो भटक के ज़्यादा दूर नहीं जा सकते। इस एतबार से मंटो को मानव स्वभाव (इन्सानी फ़ित्रत) पर कहीं ज़्यादा भरोसा नज़र आता है। मंटो को इन्सान अपनी असल शक्ल ही में क़बूल है, चाहे वो कैसी भी हो। वो देख चुका है कि इन्सान की इन्सानियत ऐसी पराक्रमी (सख़्त-जान) है कि उस की क्रूरता (बरबरीयत) भी इस इन्सानियत को ख़त्म नहीं कर सकती। मंटो को इसी इन्सानियत पर भरोसा (एतिमाद) है।”

स्वाधीनता और भारत विभाजन की पुस्तक (किताब-ए-आज़ादी ओ तकसीम-ए-हिन्द) के हाशिये पर लिखी ये काली दृश्य-पटकथाएं (स्याह मंज़र-नामे), मंटो ने जैसे हत्या के शिकार (मक़्तूल) के ख़ून में क़लम डुबो-डुबो कर लिख दिये हैं। ये इतने कष्टदायक (तकलीफ़-दह) हैं कि पाठक (क़ारी) पढ़कर दिल पर भारी बोझ महसूस करता है। तमाम ‘अफ़साने और अफ़सांचे, जिनमें से अधिकतर (बेशतर) केवल चंद पंक्तियों या आधे पृष्ठ तक सीमित हैं, भारत विभाजन (तकसीम-ए-हिंद) की पृष्ठभूमि (पस-मंज़र) में रचे (तख़लीक़) गये हैं और मानव स्वभाव (फ़ितरत-ए-इन्सान) के विरोधाभासों (तज़ादात को), मानव प्रजाति (बनी-आदम) की हास्यास्पद (मज़हकाख़ेज़) मासूम आपराधिक (मुजरिमाना) बेवक़ूफ़ियों को और परंपरा और धर्मों (रवायात-ओ-मज़ाहिब) की अंधाधुंध अनुकरण और पैरवी (तक़लीद) की ख़राबियों के पर्दे हटाते चले जाते हैं।

मंटो की दुनिया भर में प्रसिद्ध (मशहूर-ए-ज़माना) निर्दयी क़लम रूपी तलवार (बे-रहमाना शमशीर-ए-क़लम) को अगर कर्मभूमि (मैदान-ए-अमल) में देखने का कोई इच्छुक (मुतमन्नी) हो तो ये किताब पढ़े।

वैसे मंटो को पढ़ पाना मुश्किल इसलिए नहीं है कि वो मुश्किल बात या मुश्किल भाषा प्रयोग करता है, बल्कि ऐसी-ऐसी बातें लिखता है जो रगों में पिघले सीसे की तरह सरायत कर (समा) जाता है और कहानी के मंज़रनामे को सोचकर रौंगटे खड़े हो जाते हैं। वो अकेला (वाहिद) ऐसा लिखारी था, जो कुछ भी लिखने से नहीं घबराता था। जिसे दूसरा कोई लिखते हुए झिझके, घबराये, शर्माये या फिर लेखन कला (फ़न तहरीर) की तौहीन समझे।

“स्याह हाशिये” ऐसी संक्षिप्त पुस्तक (मुख़्तसर किताब) है, जिस पर हज़ारों पृष्ठों का विस्तार (सफ़हात की तवालत) न्योछावर (क़ुर्बान) है। उसे पूरे होश-ओ-हवास के साथ पढ़ने की कोशिश में वो वो अनुभव होते हैं, जिनसे पाठक मुद्दतों प्रभावित (मुतास्सिर) रहता है। कम  शब्दों (अलफ़ाज़) में कही गयी अक्सर कहानियां लोगों को अधूरी लग सकती हैं और शम्स उर रहमान फ़ारूक़ी जैसे प्रसिद्ध आलोचक को लग सकता है कि मंटो बड़ी उजलत से काम लेता है। मगर जहां वो अपनी बात रोक देता है वहां से बहुत-सी भावनाओं (एहसासात) के धारे बह निकलते हैं। वो अपनी रचनाओं का अक्सर, स्पष्ट अंत (वाज़िह इख़तताम) नहीं करता बल्कि पाठक की समझ पर छोड़ देता है। इसलिए मंटो सबके लिए नहीं है। इसका पाठक कोई मामूली शख़्स नहीं हो सकता, उसके पास वैचारिक और भावनात्मक परिपक्व दृष्टि (फ़िक्री और जज़बाती बालिग़नज़री) ज़रूरी है। अपने पहले कहानी संग्रह (अफ़सानवी मजमूआ) “आतिश पारे” में वो ख़ुद लिखता है:

“ये अफ़साने दबी हुई चिनगारियां हैं, उनको शोलों में तब्दील करना पढ़ने वालों का काम है।”

मंटो की हर रचना (निगारिश) में व्यंग्य का नशतर है और यही व्यंग्य उसकी विशिष्टता और श्रेष्ठता (तुर्रा-ए-इमतियाज़) है, जो बहुत बारीक मगर बहुत गहराई तक ज़ख़्म पैदा करता है। इस किताब का समर्पण संदेश (इंतिसाब) देखिए:

उस आदमी के नाम – जिसने अपनी ख़ूँरेज़ियों (रक्तपात) का ज़िक्र करते हुए कहा : “जब मैंने एक बुढ़िया को मारा तो मुझे ऐसा लगा मुझसे क़त्ल हो गया है!”

“साअत-ए-शीरीं” को उर्दू अदब और ज़बान का पहला अफ़सांचा माना जाता है। ग़ौर फ़रमाइए:

“साअत-ए-शीरीं”

इत्तिला मौसूल (सूचना प्राप्त) हुई है कि महात्मा गांधी की मौत पर इज़हार-ए-मुसर्रत (हर्ष व्यक्त करने) के लिए अमृतसर, गवालियर और बंबई में कई जगह लोगों में शीरीनी (मिठाई) बाँटी गयी।

कुछ और अफ़सांचे भी देखें-

दावत अमल

आग लगी तो सारा मुहल्ला जल गया। सिर्फ़ एक दुकान बच गयी, जिसकी पेशानी पर ये बोर्ड आवेज़ां (लटका) था — “यहां इमारतसाज़ी (भवन निर्माण) का जुमला (सारा) सामान मिलता है।

…..

हलाल और झटका

“मैंने उस की शहरग (गर्दन की मुख्य नस/जुगलर वेन) पर छुरी रखी। हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।

“ये तुमने क्या किया?”

“क्यों?”

“इसको हलाल क्यों किया?”

“मज़ा आता है इस तरह”

“मज़ा आता है के बच्चे, तुझे झटका करना चाहिए था.. इस तरह”

और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया।

…..

कसर-ए-नफ़सी (विनम्रता)

चलती गाड़ी रोक ली गयी। जो दूसरे मज़हब के थे, उनको निकाल-निकालकर तलवारों, गोलियों से हलाक़ कर दिया गया। इससे फ़ारिग़ होकर गाड़ी के बाक़ी मुसाफ़िरों की हलवे, दूध और फलों से तवाज़ो (सत्कार) करने वालों के मुंतज़िम (प्रबंधक) ने मुसाफ़िरों को मुख़ातिब करके कहा :

“भाईयो और बहनो, हमें गाड़ी की आमद (आगमन) की इत्तिला (सूचना) बहुत देर में मिली। यही वजह है कि हम जिस तरह चाहते थे उस तरह आपकी ख़िदमत (सेवा) न कर सके।”

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सॉरी

छुरी पेट चाक (फाड़ती) करती हुई नाफ़ (नाभि) के नीचे तक चली गयी। इज़ारबंद (नाड़ा) कट गया। छुरी मारने वाले के मुँह से दफ़’अतन (सहसा) कलिमा तास्सुफ़ (पश्चाताप के शब्द) निकला:

“च च च च मिस्टेक्स हो गया!”

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उलाहना

“देखो यार तुमने ब्लैक मार्केट के दाम भी लिये और ऐसा रद्दी पैट्रोल दिया कि एक दुकान भी न जली।”

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आराम की ज़रूरत

“मरा नहीं देखो अभी जान बाक़ी है”

“रहने दो यार.. मैं थक गया हूँ”

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हिन्दी वाले भी लघुकथा के क्षेत्र में मंटो को बहुत इज़्ज़त देते हैं। और उनके अफ़सानों और अफ़सांचों पर सेमिनार आयोजित करते हैं। इस तरह मंटो दोनों भाषाओं में लोकप्रिय हैं।

मंटो : एक नज़र में

11 मई 1912 को लुधियाना के क़स्बा सम्बराला के एक कश्मीरी घराने में पैदा हुए। उनके वालिद का नाम मौलवी ग़ुलाम हुसैन था जो पेशे से जज थे। मंटो शुरू से ही शरारती और तालीम की तरफ़ से बेपर्वा थे। मैट्रिक में दो बार फ़ेल हुए और वो भी उर्दू में फ़ेल हो जाते थे। अलीगढ़ भी भेजा गया, लेकिन वहां से ये कहकर निकाल दिया गया कि उन्हें दिक़ (टी बी) की बीमारी है। इस ज़माने में यह बीमारी लाइलाज मानी जाती थी।

सआदत हसन मंटो उर्दू के विशिष्ट और यथार्थ लिखने वाले कहानीकार (मुनफ़रद और हक़ीक़त निगार अफ़साना निगार) हैं, जिनके प्रसिद्ध कहानी संकलनों (मशहूर अफ़सानवी मजमूओं) में “आतिश पारे” (1936), मंटो के अफ़साने (1940), धुआँ (1941), काली शलवार (1941), चुग़द (1948), ठंडा गोश्त (1950) और सरकण्डों के पीछे (1955) वग़ैरा शामिल हैं। उनकी तहरीर समाजी हक़ीक़त निगारी और तकसीम-ए-हिंद की दुखद घटनाओं का चित्रण (अलमियों की अक्कासी) करती है।

और भी उनके अफ़सानों के मजमुए हैं जैसे लज़्ज़त-ए-संग (1948), स्याह हाशिये (1948) में प्रकाशित हुए। तकसीम-ए-हिंद के फ़सादात पर बहुत मुख़्तसर लेकिन गहरे अफ़सांचे और अफ़साने हैं। शिकारी औरतें संकलन 1955 मैं प्रकाशित हुआ। बादशाहत का ख़ातमा 1950, नमरूद की ख़ुदाई 1950, ख़ाली बोतलें ख़ाली डिब्बे 1950, यज़ीद 1951 भी उनके शाहकार संकलन हैं। मंटो के नाम के हवाले से चंद अफ़साने बेहद मशहूर हैं, जैसे “ठंडा गोश्त”, “खोल दो”, “टोबा टेक सिंह” वग़ैरा।

मंटो पर पाकिस्तान में 2015 और भारत में 2018 में “मंटो” नाम से फ़िल्में भी बन चुकी हैं। यह भी जानने लायक़ है कि फ़िल्मी दुनिया के लिए भी उन्होंने डायलॉग और कहानियां लिखी थीं। लेकिन वहां से बद-दिल होने के बाद चुपके से पाकिस्तान चले गये। पाकिस्तान में ही “ठंडा गोश्त” कहानी पर फ़ह्हाशी (अश्लीलता) का मुक़द्दमा चला और तीन सौ रुपये जुर्माना भी लगा, लेकिन अदबी हलक़ों (साहित्यिक मंडलियों) में कोई एहतिजाज (विरोध या प्रतिवाद) नहीं हुआ। धीरे-धीरे वो सबसे बेज़ार होते गये और शराब में डूबते गये। अख़बार वाले 20 रुपया देकर सामने बिठाकर कहानियां लिखवाते। शराब की लत बढ़ती गयी। सेहत बिगड़ती गयी और 18 जनवरी 1955 में 43 साल की उम्र में इंतिक़ाल हो गया।

किसी के आटोग्राफ़ बुक में अपने कुतबे (क़ब्रिस्तान की पत्थर की तख़्ती) के बारे में लिखा:

“786… यहां सआदत हसन मंटो दफ़न है। इसके सीने में अफ़साना निगारी के सारे इसरार-ओ-रमूज़ (रहस्य) दफ़न हैं। वो अब भी मनों मिट्टी के नीचे सोच रहा है कि वो बड़ा अफ़साना निगार है या ख़ुदा!”
-सआदत हसन मंटो
18 अगस्त 1954

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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