
ईरान की तीन मस्ट वॉच फिल्में, आप भी देखें
ऐसा नहीं है कि ईरान के सिनेमा ने पिछले कुछ दशकों से ही वैश्विक सिने समुदाय का ध्यान खींचा हो। दारीश मेहरजुई की फ़िल्म ‘द काऊ’ (1969) उसी तरह ख्यात रही, जैसे भारतीय सिनेमा में नये और कला सिनेमा की एक लहर चर्चा में थी। इन दिनों ईरान से जुड़ी कई हलचलों के बीच ईरानी सिनेमा भी रुचि का विषय है, जैसे कुछ समय से फ़लीस्तीन का सिनेमा भी विमर्शों में रहा है। यहां तीन ख़ास फिल्मों के बारे में जानिए जो ईरान के सिनेमा को गौरवान्वित करती हैं। तीसरी फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में भी उल्लेखनीय समझा जा सकता है। (आब-ओ-हवा के लिए भवेश दिलशाद की विशेष प्रस्तुति)
‘बाशु’ की दिल छूती कहानी
विश्व सिनेमा के कुछ आलोचक 1990 वाले दशक की शुरूआत से ईरानी फ़िल्मों से अभिभूत दिखते हैं और पश्चिमी सिनेमाई विद्वान अब्बास कियारोस्तमी और मोहसेन मख़मलबाफ़ जैसे निर्देशकों की सराहना शुरू करते हैं जबकि विश्व सिनेमा के सच्चे चाहने वाले जानते हैं कि बहुत पहले से ईरान बेहतरीन फ़िल्में देता रहा है। बहराम बेइज़ई की फ़िल्म ‘बाशु’ (1989) भी उन यादगार फ़िल्मों में से है, जो ईरानी ‘न्यू वेव’ से पहले की विरासतें हैं।
यह फ़िल्म शुरूआत से ही ईरान-इराक युद्ध को लक्ष्य करती है। दक्षिणी ईरान के खुज़स्तान प्रान्त में नन्हा-सा बाशु देखता है कि कैसे उसका पूरा परिवार इराकी सेना की बमबारी में मर गया। वह भाग खड़ा होता है और गुज़र रहे एक मालवाहक ट्रक में छिप जाता है। वह उत्तर-पश्चिमी ईरान के हरे-भरे इलाक़े में पहुँचकर देखता है कि उसके बंजर और रेतीले इलाक़े से यह जगह बहुत अलग है।
बाशु खुज़स्तानी अरबी भाषी है और जहां पहुंच गया है, वहां लोग फ़ारसी की गिलक बोली बोलते हैं। भाषा और बाशु की चमड़ी का रंग अलगाव की वजह बनता है, तब नाइ नाम की औरत उसे पनाह देती है। स्नेह और अपनत्व के बावजूद वह उसे रगड़-रगड़कर इसलिए नहलाती है कि शायद वह गोरा हो सके।
नाइ का शौहर दूसरी जगह है। वह अकेली है लेकिन मज़बूत और आज़ादख़याल भी। दो बच्चों के साथ रहती है, खेती-बाड़ी और दीग़र ज़िम्मेदारियाँ लेती ही है, बाशु को लेकर गाँव वालों की धमकियों से भी नहीं झुकती। कई उतार-चढ़ाव दर्शाते दृश्यों के बाद दर्शक समझते हैं कि नाइ और बाशु के बीच एक सुंदर रिश्ता बन गया है।
फ़िल्म का अन्त कुछ इस तरह है कि नाइ का शौहर लौटा है तो उसकी एक बाज़ू नहीं है। फ़िल्म कुछ शोर नहीं करती, न ही कुछ बयान देती है, (शायद उस वक़्त के सेंसर की वजह से) लेकिन सहज अनुमान लग जाता है कि वह जंग में बाज़ू गँवा आया है। नाइ के साथ ख़तों से जो वह बात करता रहा, उसमें एक और सदस्य को घर में शामिल करने के ख़िलाफ़ रहा लेकिन अन्त में वह भी बाशु को अपनाता है।

युद्ध की तबाही, नस्ली-भाषाई भेदभाव का माहौल और इन सबके बीच मेहनतकश समाज में इंसानी रिश्तों की गर्माहट… यूं इस फ़िल्म को कई जगह सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ ईरानी फ़िल्मों में गिना जाता रहा।
‘अदम’ का रहस्यपूर्ण कथानक
2004 से अब्दुलरज़ा कहनी ने अपने वतन ईरान में तक़रीबन आठ फ़िल्में बनायीं लेकिन बाद की कुछ फ़िल्मों को सेंसर के चलते पाबंदियां झेलना पड़ीं। तबसे कहनी ने अपना वतन छोड़ा पर सिनेमा नहीं। अन्य देशों में रहकर सिनेमाई दृष्टि से वह लगातार काम कर रहे हैं। अब वह महसूस करते हैं कि किसी ख़ास सीमा वाले किसी स्थान विशेष के नहीं, बल्कि वह एक बंजारा फ़ितरत के कलाकार हैं। कहनी निर्देशित फ़िल्म ‘अदम’ 2007 में आयी थी और भारत में MAMI फ़िल्मोत्सव, मुंबई में प्रदर्शित भी हुई थी।
इस फ़िल्म की कहानी ईरान के किसी गांव ऐशाबाद की फ़िज़ा में शुरू होती है और दर्शक को पता चलता है कि इस गांव में क़रीब 20 सालों से कोई मौत नहीं हुई है। एक पूरी पीढ़ी मौत और उसके बाद के रीति-रिवाज़ों, मौत के प्रभाव आदि से वंचित है। यहां एक ख़ास बात यह भी है चूंकि पानी बहुत कम है इसलिए खेती वग़ैरह सब तबाह हो चुकी है तो लोग ज़ियादातर वक़्त गाने-बजाने में बिताते हैं। तमाम विडंबनाओं के बावजूद एक ख़ुशी हर तरफ़ है। और इन आनंद के पीछे है एक शख़्स ‘अदम’।
यह एक रहस्यमयी व्यक्ति अदम सालों पहले इस गांव में आया था और यहीं रह गया। तबसे मौत नहीं हुई और गांव वाले मानते हैं कि उसी की आध्यात्मिक शक्तियों के कारण गांव में शांति और ख़ुशहाली है। फ़िल्म तब मोड़ लेती है जब एक अनजानी-सी, रहस्यमयी लड़की अचानक उस गांव में पहुंचती है।
यह लड़की धीरे-धीरे उस गांव के बारे में जानती है और फिर अदम से मिलने की इच्छा जताती है। कई कोशिशों के बाद मिल पाती है। इस मुलाक़ात के बाद ऐसा कुछ होता है कि गांव वाले हैरान हो जाते हैं। मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है तो कुछ ही देर में लोग इस लड़की को ‘मौत का फ़रिश्ता’ मान लेते हैं और फिर…
दरअसल यह फ़िल्म आध्यात्मिक स्तर पर दर्शाती है कि जीवन की तरह मौत भी एक सच्चाई है और इसे टाला नहीं जा सकता। दूसरे स्तर पर यह फ़िल्म बग़ैर किसी बयान के अंतर्लय में यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि सियासी नाकामियों के चलते, अभावग्रस्त समाज ख़ुश रहने के बहाने किस तरह खोज लेता है। इस फ़िल्म को फ़िल्म आलोचना में जादुई यथार्थवाद का एक चित्र समझा जाता रहा है।
ग़ज़ब की फ़िल्म ‘द डे आइ बिकेम अ वूमन’
ईरानी फ़िल्मकार मर्जिएह मेश्किनी की बहुचर्चित फ़िल्म THE DAY I BECAME A WOMAN (जिस दिन मैं बड़ी हो गयी) तीन अलग-अलग उम्र की तीन औरतों की कहानी है, जो पितृसत्ता, समाज की बंदिशों के ख़िलाफ़ एक कलात्मक प्रस्तुतिकरण नज़र आती है। फ़िल्म तीन अलग-अलग कहानियों का कोलाज इस तरह बनाती है कि रूपक, अन्योक्ति और अतियथार्थवाद (surrealism) जैसे उपकरणों से यह एक लय में दिखती है।
पहली कहानी है हावा नामक बच्ची की। उसकी मां और दादी उसे एहसास दिलाती हैं कि वह चूंकि नौ साल की हो गयी है तो अब औरत है और उसे अब ज़िम्मेदार होना होगा। यानी अब वह लड़कों के साथ खेल नहीं सकती और घर से बच्चों की तरह बाहर नहीं जा सकती… अब उसे चादोर (ईरानी लिबास जिससे चेहरे के अलावा शरीर का शेष ऊपरी हिस्सा ढंका जाता है) पहनना लाज़िम है। इन औरतों ने हावा को औरत की तरह ज़िम्मेदारियां उठाना शुरू करने के लिए दोपहर तक का वक़्त दिया है। दोपहर तक हावा अपने सबसे अच्छे दोस्त हसन के साथ किस तरह वक़्त बिताती है! यह देखना इस फ़िल्म को देखने की बड़ी वजह है।
दूसरी कहानी आहू की है, एक जवान औरत की मर्दों की दुनिया के विरोध की पर्वा न करते हुए साइकिल रेस में हिस्सा लेती है। वह रेस में सबसे आगे निकलती है तो उसके परिवार को ही गवारा नहीं होता। पहले उसका पति और फिर तमाम परिजन घोड़े से उसका पीछा करते हैं। उसे रोकना, वापसी के लिए मजबूर करना, तलाक़ की धमकी… लेकिन आहू की बग़ावत बुलंद!
तीसरी कहानी में एक बुज़ुर्ग निसंतान महिला हूरा है। अपनी जवानी में एक आदमी से फ़रेब की शिकार रही हूरा के पास अचानक बहुत धन आता है तो उसके भीतर की दबी हुई इच्छाएं जागती हैं। अभाव में जो कुछ वह कभी ख़रीद न सकी, मन मारती रही, सारा साज़ो-सामान ख़रीद लेना चाहती है। फिर भी उसे यही लगता है कि कुछ न कुछ तो छूट गया है। अन्त में वह इस सारे सामान को बच्चों की मदद से जहाज़ से समुद्र पार ले जाने की कोशिश करती है।
फ़िल्म में हालाँकि तीन स्वतंत्र कहानियाँ हैं, परन्तु तीनों को एक के बाद एक देखते हुए एक लय और कुल असर अपेक्षा से कहीं अधिक पड़ता है। पहली कहानी की अंतर्लय में 9 साल की बच्ची हावा की नैसर्गिक इच्छा का दम माँ व दादी द्वारा पितृसत्ता की काली चादोर से घोंटा जाना है, तो दूसरी कहानी में आहू का पति की धमकी पर बेझिझक तलाक़ के लिए राज़ी हो जाना, एक दक़ियानूसी समाज को अंगूठा दिखाना है। आख़िरी कहानी में एक स्त्री का अधूरी इ़च्छाओं की छटपटाहट के साथ जीना और उन इच्छाओं के अधूरेपन के साथ ही छूट जाना फ़िल्म को किसी सुखांत या दुखांंत नहीं बल्कि एक विचार बनाकर छोड़ देता है।
(जानकारियां विभिन्न स्रोतों से और ये सभी फ़िल्में विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों पर उपलब्ध हैं)

वाह! ऐसा content लगातार पढ़ने को मिले तो और मज़ा आए!
अच्छा लिखा।
ईरानी पटकथा में वहां के सामाजिक जीवन की विडम्बनाओं को उजागर किया गया है।