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अक्सर होली और रमज़ान का माहौल साथ रहता है। हिंदुस्तान यानी एक रंग-रंगीली सरगम। हर सुर, हर रंग एक-दूसरे में घुला-मिला हुआ, रचा-बसा हुआ। यही देश की तहज़ीब है, यही संदेश और यही रंगों के त्योहार की इंद्रधनुषी धुन। प्यार, वाबस्तगी और एका के पैग़ाम सभी को मुबारक... होली को ईद-ए-गुलाबी व आब-ए-पाशी कहा गया। गंगा-जमुनी तहज़ीब में हिन्दी और उर्दू अदब की दिलदराना रवायत रही है। धरोहर लेख (फ़िरोज़ मुज़फ़्फ़र के सौजन्य से प्राप्त) उर्दू अदब के मशहूर हस्ताक्षर प्रो. मुज़फ़्फ़र हनफ़ी की कलम से आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए...

उर्दू अदब और मज़हबी रवादारी

           इस बात में अब किसी भी शक-ओ-शुब्हा की गुंजाइश नहीं रही कि उर्दू किसी ख़ास फ़िरक़े या मज़हब की ज़बान नहीं है और इसकी इब्तिदा-ओ-इर्तिक़ा (प्रारंभ और विकास) में मुख़्तलिफ़ मज़हबों के मानने वाले बराबर के शरीक रहे हैं। चुनाँचे इस क़िस्म की मुस्तक़िल तसनीफ़ात (कृतियां) मौजूद हैं, जिनसे ज़ाहिर होता है कि उर्दू की तरक़्क़ी में किस-किस मज़हब और किस-किस इलाक़े के लोगों ने हिस्सा लिया है। दूसरी जानिब उर्दू ज़बान ने भी हर दौर में वसी-अल-नज़री (व्यापक दृष्टि) और कुशादा क़ल्बी (खुले दिल) का सुबूत दिया है।

उर्दू के दामन में न सिर्फ़ मज़हब-ए-इस्लाम से मुत’अल्लिक़ किताबों का एक वाफ़र ज़ख़ीरा मौजूद है बल्कि हिंदू मज़हब और इस के तमाम इस्लाही फ़िरक़ों मसलन कबीर पंथ, देव समाज, थिओसोफिकल सोसायटी, ब्रह्म समाज, राधा स्वामी मत और आर्य समाज के मानने वालों नीज़ जैन धर्म, सिख मज़हब, ईसाइयत और बहाई अक़ीदे के पैरोकारों ने अपने मज़हब और अख़लाक़ के बारे में उर्दू में बेशुमार किताबें तसनीफ़ कीं या तर्जुमा कर के शाए कीं। उर्दू की मज़हबी रवादारी और वसी-उल-मश्रबी (उदारवाद) का अन्दाज़ा इस तरह बख़ूबी किया जा सकता है कि इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी के कैटलॉग में 713 किताबें ऐसी मौजूद हैं, जो ग़ैर मुसलमानों ने अपने मज़हब से मुतअल्लिक़ उर्दू में लिखी हैं। इसी तरह जब तक़सीम-ए-हिंद से क़ब्ल डॉक्टर मुहम्मद उज़ैर ने अपने तहक़ीक़ी मुक़ाले ‘इस्लाम के अलावा मज़हब की तरवीज में उर्दू का हिस्सा’ के लिए मवाद फ़राहम (सामग्री उपलब्ध) करना शुरू किया तो उन्हें सिर्फ़ पन्द्रह कुतुब-ख़ानों में ही कम-ओ-बेश चार सौ ग़ैर इस्लामी मज़हबी और अख़लाक़ी किताबें मिल गयीं।

बात ये है कि उर्दू ज़बान हिंदुस्तान में पैदा हुई और परवान चढ़ी है और हिंदुस्तानी मिज़ाज में मज़हबी रवादारी रची-बसी है।

चूँकि हर ज़बान का अदब अपने आस-पास बिखरी हुई ज़िन्दगी का आईनादार और मिज़ाजदाँ होता है इसलिए मज़हबी रवादारी भी उर्दू अदब का जुज़्व-ए-ला-यंफ़क (अविभाज्य अंग) बन गयी है। अमीर ख़ुसरो के हिंदवी कलाम से लेकर दक्कनी दौर के शो’रा की तख़लीक़ात तक इस मज़हबी रवादारी की झलकियाँ देखी जा सकती हैं। मीर की मसनवियाँ हों या सौदा के क़साइद, नज़ीर अकबराबादी की नज़्में हों या वाजिद अली शाह का रहस, क़दम-क़दम पर उर्दू की वसी-उल-मश्रबी के शवाहिद (सबूत) बिखरे हुए नज़र आते हैं। गीता और रामायण के नस्री और मंज़ूम तराजिम (अनुवाद) की जितनी बड़ी तादाद उर्दू में मौजूद हैं, दुनिया की किसी दूसरी ज़बान में इसकी मिसाल नहीं मिलती। ‘महाभारत’ और ‘रामचरितमानस’ से मुतअल्लिक़ ज़िम्नी दास्तानों पर मुश्तमिल मंज़ूमात की बड़ी तादाद उर्दू अदब के ज़ख़ीरे में मौजूद है और दिलचस्प बात यह है कि इन तख़लीक़ात के मुसन्निफ़ीन व मुतर्जिमीन में हिंदू और मुसलमान दोनों दोश-ब-दोश हैं। उर्दू में मेहदी नज़्मी ने ‘रामायण’ का मंज़ूम तर्जुमा पेश किया तो जाफ़र अली ख़ाँ असर ने ‘गीता’ को उर्दू नज़्म में मुंतक़िल किया।

ज़फ़र अली ख़ाँ ने ‘एक ऋषि के दाग़-ए-जिगर की कहानी राजा दशरथ की ज़बानी’ पेश की तो शाद आरफ़ी ने ‘होली’, ‘दीवाली’ और ‘दशहरा अश्नान’ जैसी ला-ज़वाल नज़्में तख़्लीक़ कीं। नज़ीर अकबराबादी ने तो ख़ैर से तमाम हिंदू त्यौहारों और देवताओं पर नज़्में लिखी हैं। अल्लामा इक़बाल जैसे फ़लसफ़ा तराज़ शायर ने रामचंद्र जी पर ‘इमाम-ए-हिंद’ के उनवान से तबा आज़माई की है। फ़रमाते हैं-
है राम के वजूद पे हिन्दुस्तानाँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं इसको इमाम-ए-हिंद

नज़्म गवैयों की तरह उर्दू के ग़ज़ल गवैयों ने भी अज़-इब्तिदा ता-हाल वसी-उल-मश्रबी और मज़हबी रवादारी का सबक़ दिया है। मसलन मीर तक़ी मीर ने कहा है:

मीर के दीन-ओ-मज़हब को क्या पूछो हो लोगो! उनने तो
क़श्क़ा खींचा, दैर में बैठा, कबका तर्क इस्लाम किया

मिर्ज़ा ग़ालिब का क़ौल है :

वफ़ादारी बशर्त-ए-उस्तुवारी असल ईमाँ है
मरे बुत-ख़ाने में तो काबे में गाड़ो बरहमन को

असग़र गोंडवी फ़रमाते हैं-

ऐ शेख़ वो बसीत हक़ीक़त है कुफ़्र की
कुछ क़ैद-ओ-बंद ने जिसे ईमाँ बना दिया

हसरत मोहानी के बक़ौल :

मथुरा से अहल-ए-दिल को वो आती है बू-ए-उन्स
दुनिया-ए-जाँ में शोर है जिसके दवाम का

और मुज़फ्फ़र हनफ़ी का ख़याल है :
रौशनी का सबब है तारीक़ी
सरहदें साफ़ कुफ़्र-ओ-दीं में नहीं

मौजूदा दौर में नयी ग़ज़ल कहने वाले अक्सर शो’रा अपने अशआर में हिंदू माइथोलॉजी से इस्तिफ़ादा करते हैं और देवी-देवताओं से मुतअल्लिक़ तलमीहात (संकेतों/प्रतीकों) को ख़ूबसूरती के साथ बरतकर ग़ज़ल में नये ज़ायक़े की आमेज़िश करते हैं। मसलन जाँ निसार अख़्तर का शेर है :

टूटी-टूटी सी हर एक आस लगे
ज़िन्दगी राम का बनबास लगे

और मुनव्वर राना ने कहा है :

ग़म से लछमन की तरह भाई का रिश्ता है मिरा
मुझ को जंगल में अकेला नहीं रहने देता

अहद-ए-हाज़िर की नयी नज़्म भी भरपूर मज़हबी रवादारी का मुज़ाहिरा करती नज़र आती है, जिस का अंदाज़ा काविश बद्री की ‘कावीम’, हुरमत-उल-इकराम की ‘अमावस का जादू’, मुज़फ्फ़र हनफ़ी की ‘लछमन रेखा’, मज़हर इमाम की ‘सरस्वती’, फ़रहत कैफ़ी की ‘मुरली मनोहर’ अमीक़ हनफ़ी की ‘मत्स गंधा’ जैसी नज़्मों के महज़ उन्वानात (शीर्षकों) से किया जा सकता है।

उर्दू नस्र में भी इस मज़हबी रवादारी के मुरक़्क़े कम नहीं हैं। इंशा अल्लाह ख़ाँ इंशा की ‘रानी केतकी की कहानी’ हो या रजब अली बेग सरवर का ‘फ़साना-ए-अजाइब’, क़ुर्रतुल ऐन हैदर का नॉवेल ‘आग का दरिया’ हो या सलाहउददीन परवेज़ की ‘नम्रता’ या सुरेन्द्र प्रकाश का अफ़साना ‘बजूका’ हर जगह कुशादा क़ल्बी, वसी-उल-मश्रबी और मज़हबी रवादारी का जज़्बा कार-फ़रमा देखा जा सकता है।

इस नुक़्ते पर भी हमारी तवज्जोह होनी चाहिए कि उर्दू ज़बान-ओ-अदब में मज़हबी रवादारी का ये अमल यकतरफ़ा हरगिज़ नहीं है। अगर इक़बाल ‘हमारा वतन’ नज़्म में गुरुनानक और गौतम बुद्ध की तक़दीस के सना-ख़्वाँ हैं तो तिलोकचंद महरूम ‘हज़रत अली रज़ि.’ की ज़िंदगी का एक वाक़िआ नज़्म करते हैं। सफ़दर आह ने ‘राम चरित्र मानस’ का तर्जुमा किया तो कन्हैया लाल शाद ने ‘रिसाला इल्म तसव्वुफ़’ क़लमबंद फ़रमाया। जाफ़र अली खाँ असर लखनवी ने ‘गीता’ का उर्दू तर्जुमा मंज़ूम किया तो बशेश्वर प्रशाद मुनव्वर लखनवी ने कलाम-ए-पाक की आयत के तर्जुमे किये। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने बक़ा-ए-दवाम के दरबार में रामचंद्र जी को अज़ीम तरीन मसनद पर बैठाया तो हर गोपाल तुफ़्ता, किशन प्रशाद शाद, प्यारे लाल रौनक़, द्वारका प्रशाद उफ़ुक़ और महाराज बहादुर बर्क़ वग़ैरा शुहदा-ए-कर्बला की शान में सलाम लिखे और मरसिये कहे। अगर हसन निज़ामी ने ‘क़लमी चेहरे’ में कृष्ण जी को शामिल किया तो मालिक राम ने ‘औरत और इस्लाम’ जैसा तहक़ीक़ी मुक़ाला रक़म किया। पैग़म्बर-ए-इस्लाम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में नाते कहने वाले ला’तादाद ग़ैर मुस्लिम शो’रा गुज़रे हैं, जिनमें लक्ष्मी नारायण शफ़ीक़, दुर्गा सहाय सरवर जहान आबादी, राजेन्द्र बहादुर मौज, सुखदेव प्रशाद बिस्मिल, लाल चंद फ़लक, दत्तात्रिया कैफ़ी आनंद नारायण मुल्ला, नरेश कुमार शाद, लभु राम जोश मलसियानी, अमर चंद क़ैस, धर्मपाल गुप्ता वफ़ा, हरीचंद अख़्तर, रघुपति सहाय फ़िराक़, महेंद्र सिंह बेदी सहर, जगन्नाथ आज़ाद वग़ैरा क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। ग़ैर मुस्लिम शो’रा के चंद नातिआ अशआर बतौर-ए-मिसाल पेश-ए-ख़िदमत हैं।

मुंशी रूपचन्द्र क़मतराज़ फ़रमाते हैं :

आया जो नाम-ए-पास-मुहम्मद ज़बान पर
सल्ले अला का शोर उठा आसमान पर

गौरी प्रशाद हमदम अकबराबादी को फ़ख़्र है :

क्यों न हो फ़ख़्र, ये तौक़ीर है क्या कम हमदम
बख़्श दी नात की जागीर नबी ने मुझको

रौशन लाल नईम लिखते हैं :

ऐ शेख़ तुझी को रहे फ़िरदौस मुबारक
काफ़ी है मुझे गोशा-ए-गुलज़ार-ए-मदीना

बाल मुकंद अर्श मलसियानी ने नात में क्या ख़ूबसूरत मतला’ कहा है :

हामिल-ए-जलवा अज़ल, पैकर-ए-नूर-ए-ज़ात तू
शान-ए-पयंबरी से है सरवर-ए-काइनात तू

पंडित हरीचंद अख़्तर फ़रमाते हैं :

आदमिय्यत का ग़र्ज़ सामाँ मुहय्या कर दिया
इक अरब ने आदमी का बोल-बाला कर दिया

कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर ने कहा है :

सिमटकर दो जहाँ की वुसअतें आईं तख़य्युल में
तसव्वुर सरवर-ए-लोलाक का मालूम होता है

और जगन्नाथ आज़ाद महबूब-ए-किब्रिया की ख़िदमत में अपना नज़राना-ए-अक़ीदत पेश करते हुए लिखते हैं :

सलाम इस ज़ात-ए-अक़दस पर, सलाम इस फ़ख़्र-ए-दौराँ पर
हज़ारों जिसके एहसानात हैं दुनिया-ए-इम्काँ पर

पेशकर्दा हक़ाइक़ (प्रस्तुत तथ्यों) की मौजूदगी में कोई भी उर्दू की मज़हबी रवादारी पर शक नहीं कर सकता।

muzaffar hanfi, मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

1 अप्रैल 1936 को खंडवा में जन्म। उर्दू में एम.ए. और पी.एच.डी. के बाद वन विभाग, एनसीईआरटी जैसे संस्थानों में सेवा के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उर्दू विभाग में पदस्थ हुए। कलकत्ता विश्वविद्यालय में इक़बाल चेयर के प्राध्यापक रहे व उर्दू विभाग के प्रमुख। सौ से ज़्यादा किताबों के लेखक, प्रसिद्ध शायर और इस उर्दू साहित्यकार ने 10 अक्टूबर 2020 को संसार से विदा ली।

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