
- February 28, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
विजय स्वर्णकार: लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर!
समकालीन हिंदी ग़ज़ल का आकाश जिन दैदीप्यमान नक्षत्रों से पुरनूर है, उनमें एक नाम विजय स्वर्णकार का भी है। आपकी शोहरत का फैलाव समुद्र की तरह अथाह और अंतहीन दिखायी देता है। आपके शागिर्दों की संख्या हज़ारों में है; इस लिहाज़ से भी आपकी मक़बूलियत का जादू सर चढ़कर बोलता है। क्यों न आज इन्हीं की ग़ज़लों को मर्कज़ में रखकर नुक़्ताचीनी की जाये। द्विजेन्द्र द्विज साहब ने किताब के पेशलफ़्ज़ में क्या ख़ूब लिखा है। लिखते हैं, “उनकी नयी चेतना का स्रोत एक सजग और अनुशासित शायर की जाग्रत आत्मा है, जो ग़ज़ल साहित्य में नवजागरण के संवाहक की सीरत और सूरत लिये हुए है।” जब इतना बड़ा दावा द्विजेंद्र साहब कर रहे हैं, तो क्यों न इसका जाएज़ा लिया जाये। आइए, शेर देखें-
साँचे में न ढलने का हुनर सीख रहा हूँ
कुछ और पिघलने का हुनर सीख रहा हूँ
इस हुनर के लिए विजय साहब को दाद मिलनी चाहिए; यह हुनर वाक़ई क़ाबिले-ग़ौर है। दुनिया ने अब तक यही सुना है कि तरल पदार्थ हर सांचे में ढल जाता है, किंतु यहाँ तरल होकर भी किसी आकार में न ढलने की बात कही गयी है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं। ‘पिघलने’ की इस क्रिया को यदि सरलता के अर्थ में भी ग्रहण किया जाये, तब भी सांचे में न ढलने वाला भाव ही अधिक प्रभावी होकर उभरता है। ख़ैर, एक और शेर देखें-
ऐसे उधड़ा है बदन सूखी नदी का
जैसे कोई लाश लावारिस पड़ी है
विजय भाई साहब! आप कैसे कह सकते हैं हर लावारिस लाश उधड़ी हुई ही होती है? मैं अपवाद की बात नहीं कर रहा, किंतु सामान्यतः लावारिस लाशें भी सही अवस्था में मिल जाती हैं। ख़ैर, एक और शेर देखें-
इस महल के सामने क्यों रुक गये तुम
सौ क़दम आगे वो अपनी झोपड़ी है
विजय भाई साहब! आप तो ग़ज़ल के गुरु हैं; द्विज साहब ने भी आपको लेकर कितने बड़े-बड़े दावे किये हैं। फिर आप उनकी खटिया क्यों खड़ी कर रहे हैं? आप ही बताइए, ‘सौ क़दम’ कौन-सा मुहावरा है? ‘दो क़दम’ होता तो बात मुहावरे में आ सकती थी। कहीं नया मुहावरा गढ़ना का कोई सायास प्रयास तो नहीं? एक और शेर-
बींध रक्खा था तुम्हारा चित्र जिसने
कील वह दीवार में अब भी गड़ी है
द्विज साहब के अनुसार ग़ज़ल साहित्य में नवजागरण का संवहन करता यह शेर बेमिसाल बताया गया है, पर यह आख़िर कैसी तर्कहीनता है? फ्रेम क्या कील से लटक रहा था, या कील से विंधा हुआ था? दोनों में स्पष्ट अंतर है, और यह अंतर ग़ज़ल के गुरु को अवश्य समझना चाहिए था। किसी कील से टँगे कैलेंडर को ‘बिंधा हुआ’ नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात यह कि यदि कील अब भी गड़ी हुई है, तो आपत्ति किस बात की? उस पर नया टाँग दिया जाएगा। चलिए, धनुर्धर शायर (द्विज जी के अनुसार) का एक और शेर देखें-
याद रख हम एक छाते के तले हैं
भूल जा रिमझिम है ऊपर या झड़ी है
यहाँ भी गांडीवधारी का तीर हदफ़ (लक्ष्य) से भटकता हुआ ही दिखायी देता है। किसी ग़ज़ल-गुरु से एक ही ग़ज़ल के इतने शेरों में ऐसी चूकों की अपेक्षा नहीं की जाती। ‘रिमझिम’ और ‘झड़ी’ के बीच का भेद भी यहाँ शायर स्पष्ट नहीं कर पा रहा है। ऊपर से ‘ऊपर’ पद-बंध अलग ही जीभ निकाले खड़ा है। यदि वर्षा हो रही है, तो वह छाते के ऊपर से ही पड़ेगी… ख़ैर, शायर की टाँग खींचता हुआ एक और शेर-
अंधेरो! जब गगन में सूर्य चमकेगा तो क्या होगा
तुम्हें दर्पण दिखाने को यह दीपक बाल रखा है
विजय भाई साहब! आपने बड़ा अच्छा किया यह स्पष्ट कर दिया कि सूर्य कहाँ चमकेगा। मुझ जैसे अल्पज्ञ लोग यदि कहीं यह मान लेते कि सूरज पाताल से चमकता है, तो सचमुच भारी गड़बड़ हो जाती। दूसरे मिसरे में विजय भाई ने पहले से भी बड़ी बात कह दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि जब सूर्य चमकेगा और अंधेरे उसे देख नहीं पाएँगे, तब विजय भाई दीपक जलाएँगे, जिसकी रोशनी में सूर्य को देखा जा सकेगा! वाक़ई यह एक अनोखी और उत्तम कल्पना है।
यदि विजय भाई का आशय यह है कि अंधेरे को उसकी औक़ात दिखाने के लिए सूर्य-रूपी दीये को उन्होंने स्वयं जला रखा है, तो फिर उनकी सामर्थ्य की प्रशंसा में शब्द भी बौने पड़ सकते हैं। द्विज साहब का कहना है विजय भाई अभिव्यक्ति की प्रखरता वाले ग़ज़लकार हैं और उनकी ग़ज़लें अभिभूत करती हैं। तो चलिए कुछ और शेर देख लिये जाएं-
अजब हलचल कहां ऐसी थी पहले
नज़र अल्हड़ हुआ करती थी पहले
विजय भाई कह रहे हैं कि नज़र पहले अल्हड़ हुआ करती थी, अब वह अल्हड़ नहीं रही। शायद उम्र बढ़ जाने के कारण। किंतु मज़े की बात यह है कि हलचल अब शुरू हुई है; पहले कोई हलचल नहीं थी। इन दोनों बातों के बीच क्या रब्त है, इस पर तो विजय भाई ही प्रकाश डालें, तो बेहतर होगा। ख़ैर, एक और मज़ेदार शेर-
हमारी छेड़ बदनीयत है वरना
धरा यूं लाल कब होती थी पहले
ग़ज़ल-गुरु को पाठक पर तरस खाकर फ़ुटनोट में इतना तो अवश्य लिख देना चाहिए था कि ‘छेड़’ कितने प्रकार की होती है, और ‘धरा का लाल होना’ जैसा मुहावरा उन्होंने किस लोक की किस किताब में पढ़ा है। और एक शेर-
टटोलो नब्ज़ को और यह बताओ
तुम्हारे हाथ में किसकी घड़ी है
यह शेर तो बिल्कुल जादू-टोना प्रतीत होता है; इस पर प्रकाश तो कोई फ़ुसूँ-गर ही डाल सकता है। भला कोई साधारण व्यक्ति नब्ज़ टटोलकर कैसे बता सकता है कि रोगी के हाथ में किसकी घड़ी है! मुझे तो लगता है ISRO और NASA के वैज्ञानिकों के पास भी इस पहेली का हल हो तो बड़ी बात। विजय भाई एक अच्छे ग़ज़लकार हैं- यह बात हम सब जानते हैं, स्वयं वे भी जानते हैं; किंतु यह आवश्यक नहीं कि उनका हर शेर समान रूप से उत्कृष्ट ही हो। कहीं-कहीं ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन्होंने पानी में दूध मिलाकर काम चला लिया हो। अब इसी शेर को ही देख लें-
वो नक़्शा राह का खींचा है मैंने
स्वयं मंज़िल उठी और चल पड़ी है
इस तथाकथित शेर में कथ्य तो लगभग नदारद है, पर शोर बहुत है। पहली नज़र में ऐसा प्रतीत होता है मानो विजय भाई ने कालिया नाग को ही नाथ दिया हो; किंतु जैसे-जैसे पाठक इसमें प्रवेश करता है, वैसे-वैसे इसके छिछलेपन की बोरियत से बोझिल होता चला जाता है। सबसे पहले तो यही कहना पड़ेगा कि हिंदी के शेरों वाला बड़बोलापन यहाँ साफ़ नज़र आता है। दूसरी बात यह कि विजय भाई ने एक असमंजस-भरी स्थिति खड़ी कर दी है। स्पष्ट ही नहीं हो पाता कि मंज़िल आख़िर किस ओर बढ़ चली है? और दूर खिसक गयी है या पास आ गयी है। अब एक शेर देखिए और देखिए कि इस तरह की बात को कहने की सलाहीयत क्या होती है और किसी और शायर ने किस ख़ूबसूरती से कथ्य को साधा है-
उठ के मंज़िल ही अगर आए तो शायद कुछ हो
शौक़े-मंज़िल तो मेरा आबला-पा हो बैठा
इस शेर को पढ़ने के बाद यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि हिंदी के तमाम तथाकथित ग़ज़ल-गुरु चाहे जितने भी दावे कर लें, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि शब्दों को बरतने का शऊर उनमें आज भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है। मेरा मानना है उनकी कल्पनाएँ संभवतः सुंदर होती हों, किंतु काग़ज़ पर उतरते-उतरते विकृत हो जाती हैं। इसका एक कारण अभ्यास का अभाव है और दूसरा, शीघ्रातिशीघ्र गुरु बनने की ललक। अभ्यास के अभाव में उनकी कल्पनाएँ शिल्प के बोझ तले दबकर दम तोड़ देती हैं। ख़ैर, एक और शेर देखते हैं-
हुनर पे शम्स के हैरत में अक़्ल वाले हैं
लगी है आग कहां और कहां उजाले हैं
विजय भाई से मैं सबसे पहले यह पूछना चाहता हूँ इसमें हैरत की ऐसी कौन-सी बात है? यह गुण तो ढिबरी, लालटेन और मोमबत्ती में भी होता है। थॉमस अल्वा एडिसन के आविष्कार के बाद से बल्ब और ट्यूबलाइट में भी यही गुण है- एक जगह ‘आग’ है और दूर तक उजाला फैल जाता है।
दूसरी बात यह कि सूरज की आग उसका हुनर नहीं, बल्कि उसका नैसर्गिक गुण है। अब ग़ज़ल गुरु के एक और शेर पर रोशनी डालते हैं:
किरण-किरण के सहारे उतर रही है धूप
यह किसने भोर के सूरज पर डोरे डाले हैं
चलिए, मान लें कि किरणों के सहारे ज़मीन पर धूप उतर रही है; मगर दूसरे मिसरे में ‘भोर के सूरज’ लिखने की क्या आवश्यकता थी? यह तो सूर्योदय से सूर्यास्त तक के सूर्य का सामान्य गुण है। ऐसा नहीं है कि यह विशेषता केवल भोर के सूरज में ही हो। डोरे–फोरे डालने की बात तो आप विजय भाई से ही पूछिएगा। मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि यहाँ मानवीकरण अलंकार रचने की एक असफल कोशिश भर दिखायी देती है। एक और शेर-
सवाल यह है कि हँसकर पिये कोई कैसे
ग़ज़ब का ज़ह्र तो सबके ही पास है लोगो
मैं विजय भाई से सिर्फ़ एक ही प्रश्न करूँगा, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाये। मैं केवल इतना पूछना चाहता हूँ कि यदि ‘ग़ज़ब का ज़हर’ सबके पास नहीं होता, तो क्या सभी लोग हँसकर ज़हर पी लेते?
मुझे समझ में नहीं आता कि हिंदी के ग़ज़ल गुरु केवल छंद को साध लेने भर को ही संपूर्ण ग़ज़ल क्यों मान लेते हैं! ऐसा प्रतीत होता है मानो बाक़ी सब तत्व ग़ैर-ज़रूरी हों। विजय भाई मेरे बड़े भाई जैसे हैं। मैं उनके डिक्शन की बुराई नहीं करना चाहता, मगर क्या करूँ! उन्हें पढ़ते ही पेट में एक अजीब-सी ऐंठन होने लगती है। देखिए-
उजाला बांट दे और आग दायरे में रखे
उसूल ख़ास ये सूरज के पास है लोगो
मैं यहाँ यह नहीं कहूँगा कि विजय भाई ने बहुत भद्दे ढंग से शब्दों का प्रयोग किया है, हालाँकि उन्होंने यहाँ भद्द अवश्य की है। इस शेर के पहले मिसरे में सूरज के जिस उसूल का ढोल विजय भाई पीट रहे हैं, वह गुण तो मोमबत्ती में भी है। चलो, मान लिया कि मोमबत्ती में यह गुण न हो; लालटेन में तो अवश्य है। सारी आग शीशे के भीतर रहती है और रोशनी दूर तक फैलती रहती है। दरअसल ‘हुनर पे शम्स के’ वाले शेर को ही उन्होंने प्रकारान्तर से कहा है और दूसरी बार भी वही चूक! विजय भाई के वक़ार में यहाँ भी थोड़ी-सी अफ़सुर्दगी आ गयी है। अब एक और अटपटा-सा शेर देखें-
बूढ़े ने गांव इसलिए छोड़ा नहीं कभी
चौपाल छोड़कर कहीं पीपल नहीं गया
दोनों मिसरे अलग-अलग कथन (स्टेटमेंट) कहकर शांत हो गये हैं। इन दोनों मिसरों के बीच कम से कम एक योजक तो होना ही चाहिए था। तोड़-मरोड़कर संभव है आप इसका अर्थ निकालने में सफल हो जाएँ, लेकिन क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इस वाक्य-विन्यास पर ग़ज़ल गुरु को फिर से विचार करना चाहिए?
अब कुछ और शेर देखते हैं, जिन्हें द्विजेन्द्र साहब के अनुसार व्यंजनाओं की अप्रतिम झिलमिल कहा गया है, जिन पर विस्मित और अभिभूत हुआ जा सकता है। यह अलग बात है कि ये शेर मेरे पल्ले नहीं पड़े। इसी कारण मैं केवल इन्हें दर्ज कर रहा हूँ। व्यंजनाओं की वह तथाकथित अप्रतिम झिलमिल आप स्वयं देख लें-
यह जो परचम है उसकी बाम्बी पर
है मेरी आस्तीन का टुकड़ा
सांप के घर में है ममेंटो-सा
किस सपेरे की बीन का टुकड़ा
कभी-कभी मैं विजय भाई के शेरों को पढ़कर सचमुच आश्चर्य में पड़ जाता हूँ। बार-बार उनकी भैंस पानी में चली जाती है। यह अलग बात है वे उसे हाँकते हुए कहीं दिखायी नहीं देते; उलटे, अनेर छोड़ देते हैं। यह भी देखिए-
पांव में वह फटी बिवाई दे
पीर सबकी मुझे सुनाई दे
इस शेर का छद्म जनवाद पहली नज़र में आपको आकर्षित करता है, लेकिन जैसे-जैसे आप इसमें उतरते हैं, भ्रम दूर होता चला जाता है। सबसे पहले तो मैं विजय भाई से यही कहना चाहूँगा कि बिवाई होंठों या गालों पर नहीं होती।
दूसरी बात कि यदि विजय भाई यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि बिवाई ‘फटी’ और ‘बंद’, दो तरह की होती है, तो यह बात भी जमती नहीं। तीसरी बात कि केवल फटी बिवाई से ही दूसरे का दर्द दिखायी देगा, यह धारणा भी मन को नागवार गुज़रती है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ बड़े-बड़े राजाओं ने दीन-दुखियों की सहायता के लिए संन्यास तक ग्रहण कर लिया।
चौथी बात कि इस शेर में एक अजीब-सा चित्र उभरता है, मानो बिवाई, बिवाई न होकर कोई झरोखा हो, जिसमें मुँडी घुसाकर हम दूसरे का दुःख देख लेंगे। अब एक और शेर देखते हैं, जो न सिर्फ़ हिंदी ग़ज़ल के मुँह पर कालिख पोतता हुआ प्रतीत होता है, बल्कि इंसानियत को भी तार-तार करता है। ऐसा लगता है मानो विजय भाई कोई तानाशाह हों, लोग उनके सामने गिड़गिड़ाएँ और वे उन पर रहम करें। यहाँ ‘रहम’ की जगह यदि ‘मदद’ शब्द होता, तो बात इतनी नहीं अखरती-
रह्म करने का दिल करे लेकिन
तू परेशान तो दिखायी दे
किसी के परेशान होने पर विजय भाई मदद नहीं करते, बल्कि उस पर रहम करते हैं। विजय भाई में यह नृशंसता क्या किसी बड़े अधिकारी होने की वजह से है? कारण चाहे जो भी रहा हो, यह निस्संदेह दुःखद है। आइए, उसी ग़ज़ल के कुछ और शेर देखें, जो विजय भाई की स्थापित कीर्ति से मैच नहीं करते-
चाहता है कोई अगर उड़ना
तो ज़रूरी है उसका डर उड़ना
नयी रदीफ़ की लालच में कविश्रेष्ठ ने यह शेर लिख तो दिया मगर यह ‘उड़ना’ स्वाभाविक ‘उड़ना’ का अर्थ न देकर एक मुहावरे को रीप्रेज़ेण्ट कर रहा है। यह शब्द कभी-कभी उच्छृंखलता के अर्थ में आता है, तो कभी अहंकार के अर्थ में। आप लोगों ने भी प्रायः लोगों को यह कहते सुना होगा, “बहुत उड़ो मत”। और अगर इसमें कोई वक्रोक्ति नहीं, सिर्फ़ अभिधा से काम लिया गया है, तो भी बचकानापन ही है। ख़ैर-
यह तो आदत नहीं परिन्दों की
दिन में आराम रात भर उड़ना
पहले तो यही कि इसमें शेर है कहाँ? शायर दोनों मिसरों को जोड़कर बस एक वाक्य ही बना पाया है। दूसरी बात यह कि विजय साहब को आख़िर कौन यह बात मनवाना चाह रहा है कि परिन्दों की आदत ही ऐसी होती है, वे रात भर उड़ते हैं और दिन भर आराम करते हैं। यह संप्रेषणीयता तो शायद द्विज साहब को ही समझ में आ सकती है। शेर की हैसियत से ये दोनों मिसरे मुझे बिल्कुल वाहियात प्रतीत होते हैं। अब कुछ और वाहियात-से शेर-
कब तक जियें ऐसे भला
जिस्म इस तरफ़ दम उस तरफ़
इस शेर के ‘इस’ और ‘उस’ आपको बच्चन की याद दिला सकते हैं।
इस पार प्रिये तुम हो मधु है
उस पार न जाने क्या होगा
बच्चन की ये दोनों पंक्तियां नितांत वैयक्तिक होने के बावजूद एक सौंदर्य समेटे हुए हैं। सब लोग इसे अपनी ज़िंदगी, प्रेम और प्रेयसी से जोड़ सकते हैं, मगर ऊपर के शेर में ‘लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर’ के अलावा कुछ नहीं है।
ज़िंदगी से न यूं करो बर्ताव
जन्म जैसे हुआ हो धोखे से
इन शेरों को पढ़ने के बाद मुझे ऐसा लगने लगा है द्विज साहब की ग़ज़लों की भी पड़ताल ज़रूरी है। आख़िर उन्होंने इन शेरों की इतनी प्रशंसा कैसे कर दी? उनका ज़ायक़ा ख़राब क्यों नहीं हुआ?
शेर पर आते हैं। जिन लोगों ने योजना बनाकर जन्म लिया हो, वे अपनी ज़िंदगी के साथ अच्छा बर्ताव ज़रूर करें; और जिनका जन्म धोखे से हुआ है, वे ग़ज़ल गुरु से मिलें। ज़रूरत पड़े तो हकीम रहमानी से भी मिल सकते हैं।
हिंदी में ग़ज़ल ने लंबे संघर्ष के बाद कुछ मुक़ाम बनाया है। इसकी रक्षा के लिए ज़रूरी है ग़ज़ल को ग़ज़ल गुरुओं के आतंक से बचाया जाये। अब आप स्वयं यह शेर देखें-
पत्थर में रब को देखने के वास्ते जनाब
आंखें बड़ी-बड़ी न करें दिल बड़ा करें
नीचे के मिसरे में दोनों मुहावरों पर बात करते हैं। ‘आँखें बड़ी-बड़ी करना’ मुहावरे का अर्थ आश्चर्यचकित होना होता है; कभी-कभी इसका अर्थ ग़ुस्सा होना भी लिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आँखें बड़ी-बड़ी कर रहा है, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि उसे किसी असाधारण दृश्य, यहाँ तक कि ईश्वर-दर्शन का आश्चर्य हो रहा है। यदि दर्शन हो ही गये हैं, तो फिर उसे आँखें बड़ी-बड़ी करने से मना क्यों किया जा रहा है, यह बात समझ से परे है।
दूसरी बात कि ‘दिल बड़ा करना’ मुहावरे का अर्थ उदार होना होता है। इस शेर में ‘उदारता’ की बजाय ‘श्रद्धा’ के अर्थ वाले शब्द की आवश्यकता थी। मुझे लगता है ‘उदार होना’ वाला अर्थ इस शेर में ‘श्रद्धा’ के भाव की भरपाई नहीं कर पा रहा है। Reverence और Generous, ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग अर्थ वाले शब्द हैं।
ऐसे वाहियात शेरों की एक तवील फ़ेहरिस्त है। कहाँ तक मैं उनका तज़किरा करता फिरूँ। कुछ शेर यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ, आप स्वयं जाँच लें-
तीर खाने की ख़ुशी जाती रही
जब से बारूदी बुरादा चल गया
है कौन ख़तावार यह तय कौन करेगा
अमरूद के पेड़ों पे अगर आम न आये
मेरी हसरत है मन में मन रखना
भूल जाओ मेरा बदन रखना
उजाला सूर्य का है चांदनी में
कहां है ताप वह पूनम से पूछो
सलाखें हैं मगर पल्ले खुले हैं
शरारत खिड़कियों की देखिए तो
टिकी है फ़र्श पर यह छत को भेद कर लेकिन
रूआब उजाले का पूरा किरण की छड़ में है
ज़रूरी है मुसाफ़िर पंख भी, परवाज़ भी अब
न केवल मंज़िले, हर रहगुज़र उड़ने लगी है
कहां दरिया कहां कश्ती के दीवाने बच्चे अब
नयी पीढ़ी की दिलचस्पी रिवर और बोट में है
कुछ ऐसे शेर देखते हैं जिन्हें विजय साहब बहुत बड़ा शेर मानते हैं और बार-बार सुनाया करते हैं-
तकाज़ा करने लगीं जब लगान की किस्तें
तो भर के चल दिये ख़ुद्दार जान की किस्तें
ये दुनिया के पहले ख़ुद्दार हैं, जो लगान चुकाने से बचने के लिए ख़ुदकुशी का रास्ता अख़्तियार करते हैं। यदि पलायन ही ख़ुद्दारी है, तो ईश्वर करे दुनिया में दूसरा कोई ख़ुद्दार पैदा न हो।
यहाँ विजय भाई की उस्तादी का ढोल फूटता हुआ नज़र आता है। विजय भाई को जब भी पढ़ता हूँ, तो प्रायः हर क़दम पर कोई-न-कोई शेर लांघी मारने को तैयार दिखाई देता है।
मर के भी हमें शायद यह ख़बर नहीं होती
यह हयात किसने दी किसने मार डाला है
पहले मिसरे को पढ़कर प्रतीत होता है मानो मरने के बाद सबको यह ख़बर हो जाती हो कि अमुक व्यक्ति को किसने मारा है। विजय भाई के बारे में द्विज साहब का कहना है कि विजय साहब पाठकों को आत्मावलोकन और आत्ममंथन के लिए निरंतर प्रेरित करते हैं। द्विज साहब हमारे अग्रज शायर हैं; मैं उनकी बात काटना नहीं चाहता। किंतु क्या पाठकों को ऐसा नहीं लग रहा विजय भाई को स्वयं भी आत्मावलोकन और आत्ममंथन की ज़रूरत है? साथ ही, द्विज साहब को भी अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए।
मुझे लगता है किसी भी पुस्तक की समीक्षा या भूमिका लिखने से पहले इतना तो अवश्य सोचना चाहिए कि समीक्षक द्वारा दी गयी संज्ञाएँ, संबंधित व्यक्ति वास्तव में डिज़र्व करता है या नहीं।
हिंदी ग़ज़ल अपने इब्तिदाई दौर से ही कुछ हद तक लाउड रही है। यह लाउडनेस कहीं-न-कहीं उसे आत्ममुग्धता की ओर ले जाती है। विजय भाई भी इससे अछूते नहीं रह पाते। इस प्रवृत्ति को हम अगले कुछ लेखों में समझते-बूझते चलेंगे। इधर, विजय भाई ने काफ़ी प्रयोग किये हैं। इनमें कुछ ऊटपटांग अवश्य हुए हैं, मगर कुछ अच्छे शेर भी सामने आये हैं। ज़रा उन्हें भी देख लेते हैं-
बताये कौन उन्हें इस तरह नहीं होता
कि राज़ राज़ रहे राज़दाँ बदल जाये
ख़ार को ख़ार कह न सकता था
फूल को फूल कह के छूटा मैं
अब अंत में लाशों पे खड़ा सोच रहा है
क्यों जंग वह ख़ुद से न लड़ा सोच रहा है
धड़कनों के सिवा वह देता क्या
मौत की ज़िद थी मुंह-दिखाई दे
विजय भाई की ग़ज़लों से आद्योपांत गुज़रने के बाद यह कहा जा सकता है उनमें अच्छे शेर कहने की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखायी देती है। रचनाओं में प्रयोगधर्मिता है, जोखिम उठाने का साहस है और प्रभाव छोड़ने वाले शेर भी कहीं-कहीं हैं। यह उनके रचनात्मक मन की सक्रियता और संभावनाओं का संकेत है।
किन्तु, इन्हीं प्रयासों के साथ-साथ स्पष्ट होता है कि शिल्प के स्तर पर उनकी ग़ज़लें अपेक्षित संतुलन नहीं साध पातीं। भाव, कथ्य और भाषा के बीच जो स्वाभाविक सामंजस्य ग़ज़ल की आत्मा होता है, वह कई स्थानों पर खंडित होता दिखायी देता है।
परिणामस्वरूप, जहाँ कुछ-एक शेर पाठक को ठहरकर सोचने के लिए विवश करते हैं, वहीं अनेक स्थानों पर वही पाठक असंतोष और असहजता का अनुभव करता है।
इस लेख का उद्देश्य विजय भाई की रचनात्मक क्षमता को नकारना नहीं, बल्कि यह इंगित करना है कि केवल छंद और संरचना को साध लेना ही ग़ज़ल की पूर्णता नहीं है। ग़ज़ल एक नाज़ुक और सधी हुई विधा है, जिसमें शिल्प, अर्थ, व्यंजना और संवेदना.. सभी का संतुलित होना अनिवार्य है। विजय भाई की ग़ज़लों में अच्छे शेरों की उपस्थिति आश्वस्त करती है उनमें संभावना मौजूद है; आवश्यकता केवल आत्मावलोकन, शिल्पगत सजगता से काम लेने और अनावश्यक आत्ममुग्धता से बचने की है।
अंततः यह निर्णय ग़ज़ल के गंभीर पाठकों और जानकारों पर ही छोड़ा जाना उचित होगा कि विजय भाई अपने प्रयासों में कितने सफल हुए हैं, कितने विफल। मेरी दृष्टि में उनकी ग़ज़लें संभावनाओं और कमियों, दोनों के साथ उपस्थित हैं। शिल्पगत त्रुटियों पर विस्तार से चर्चा का अवसर भविष्य में लिया जा सकता है; फ़िलहाल इतना कहना पर्याप्त है यदि वह अपनी सामर्थ्य के अनुरूप अनुशासन और आत्मसंयम को साध लें, तो उनकी ग़ज़लें कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकती हैं।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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