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अपनी संक्षिप्त फ़लीस्तीन यात्रा के दौरान विनीत तिवारी ने आयदा टूमा सुलेमान के साथ जेरूसलम में बातचीत की, यात्रा से लौटकर उसे लिपिबद्ध किया है। लेखक द्वारा उपलब्ध करवाया गया यह लेख इज़रायल के उस पक्ष को प्रस्तुत करता है, जो भारत में कम जाना, समझा गया...

इज़रायल बनाम हमास: नाइंसाफ़ी से लड़तीं आइदा से चर्चा

            महान जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेष्ट की एक कविता है–
जनरल, तुम्हारा टैंक एक मज़बूत वाहन है,
लेकिन उसमें एक कमी है– उसे एक इंसान चलाता है
जनरल, मनुष्य बड़े काम का जीव है
लेकिन उसमें एक कमी है– वह सोच सकता है

अब कृत्रिम मेधा (एआई) के ज़माने में यह कविता कितनी दूर तक प्रासंगिक रहेगी, इसकी भविष्यवाणी मुश्किल है लेकिन जेरूसलम में आइदा टूमा सुलेमान को देखकर, सुनकर और उनसे बातें करके यह कविता काफ़ी याद आयी। इकसठ वर्षीय आइदा टूमा सुलेमान इज़रायल की संसद (जिसे ‘नेसेट’ कहा जाता है) की सदस्य हैं। वे इज़रायल की नागरिक हैं, अरब ईसाई मूल की हैं लेकिन वे स्वयं को घोषित तौर पर नास्तिक कहती हैं। वे इज़रायल की कम्युनिस्ट पार्टी ‘हदश’ की सदस्य हैं, नारीवादी हैं, कम्युनिस्ट पार्टी के अरबी भाषा के अख़बार अल-इत्तिहाद की संपादक हैं और वे इज़रायल की पहली और एकमात्र महिला संपादक हैं। वे ‘इज़रायल के अरब नागरिकों के लिए बनी उच्च-स्तरीय समिति’ की पहली महिला सदस्य हैं। वे इज़रायली नागरिकों के हक़-अधिकारों के लिए तो लड़ती ही हैं लेकिन फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों के लिए भी लड़ती हैं। उनसे मिलकर मुझे अपने देश के ऐसे तमाम ऐक्टिविस्ट साथी याद आये जो ग़ैर-मुसलमान या ग़ैर-ईसाई या ग़ैर-दलित या ग़ैर-आदिवासी होते हुए भी इंसानी इंसाफ़ के लिए लड़ते हैं और अपने-अपने समुदायों में भला-बुरा सुनते हैं। उनकी एक प्रसिद्धि इस बात की भी है कि उन्होंने इज़रायल में महिलाओं की शादी की क़ानूनी उम्र 17 से बढ़वाकर 18 करने वाला क़ानून नेसेट में बनवाया।

मैंने उनसे जो बात की, ज़ाहिर है वह इज़रायल के बारे में ही थी लेकिन बार-बार मुझे अपने देश, अपने भारत की याद आती रही। कहने के लिए इज़रायल भी लोकतंत्र है और भारत भी। यह भी सच है कि हिटलर भी लोकतंत्र के रथ पर सवार होकर ही फ़ासीवादी तानाशाही तक पहुँचा था, लेकिन फ़र्क़ यह है कि पूँजीवादी शासक वर्ग लोकतंत्र की आड़ लेकर जनविरोधी काम करता है और उसे लोकतंत्र की वैधता दिलवा देता है, जबकि वामपंथ उसी लोकतंत्र को सही मायनों में जनता की भलाई और उत्थान के लिए क़ायम करना चाहता है।

आयदा ने कहा कि यह सच है कि थोड़े-बहुत अधिकार हम लोगों को इज़रायल का नागरिक होने के नाते हासिल हैं। हम इज़रायली अरब नागरिकों का एक समूह हैं, जो इस ज़मीन के मूल निवासी (इंडीजीनस) हैं, इसलिए हम अपनी एक राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं, अपने मुद्दे राजनीति में उठा सकते हैं, चुनाव लड़ सकते हैं, इज़रायल की सरकार जो भी ग़लत क़दम उठाती है, उसके खिलाफ़ थोड़ी-बहुत आवाज़ उठाने की गुंजाइश भी हमारे पास है। अब आप इन बातों में से ‘है’ की जगह ‘था’ कर दीजिए। क्योंकि ये सारी बातें गुज़रे ज़माने की बातें हो गयी हैं। यह सच है कि इज़रायल में लोकतंत्र जैसा भी था, मध्य पूर्व के देशों में यह एकमात्र तथाकथित लोकतंत्र था और उस नाते कुछ अधिकार हमें हासिल थे, लेकिन पिछले दो वर्षों में यह अधिकार पूरी तरह छीने जा चुके हैं। पिछले दो साल में एक बिल्कुल ही नये क़िस्म की स्थिति बनायी जा रही है और यह रोज़-रोज़ अपने नये-नये आकार लेती जा रही है।

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने नेसेट में 7 अक्टूबर 2023 के हमास के हमले की निंदा नहीं की और इज़रायली फ़ौज के अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी तो उन्हें दो महीने के लिए संसद से निलंबित कर दिया गया था और उनकी दो सप्ताह की तनख़्वाह काटने का दंड भी लगाया गया था। आयदा ने उलटे इज़रायली फ़ौज और शासकों पर इल्ज़ाम लगाये थे कि उन्होंने ग़ाज़ा में अस्पतालों पर बम गिराये, जिससे 48 सर्जन में से केवल सात जीवित बचे। विस्थापित और निहत्थे लोगों पर इज़रायल की फ़ौज के इस हमले की उन्होंने निंदा की थी और अपने बयान पर माफ़ी माँगने से या उससे पीछे हटने से इनकार कर दिया था। इज़रायली संसद की समिति (एथिक्स कमिटी) ने आयदा पर कार्रवाई करने की अनुशंसा करते हुए कहा था कि “हमास के हमले की निंदा न करना उन इज़रायली नागरिकों के साथ विश्वासघात है जिनके टैक्स के पैसे से आप लोगों को जनप्रतिनिधि होने की तनख़्वाहें मिलती हैं…अपने देश की फ़ौज पर फ़लस्तीनीयों के अत्याचार के आरोप लगाने से इज़रायल के दुश्मनों की मदद होती है।”

आयदा का आरोप था कि इज़रायल के फ़ौजियों ने ग़ाज़ा के नागरिकों के युद्धक्षेत्र से निकालने के लिए बनाये गये मानवीय गलियारे से अपनी जान बचाकर भाग रहे गाज़ा के लोगों पर गोलियाँ बरसायीं। वे किस मुँह से अपने आपको दुनिया की सबसे नैतिक फ़ौज कहते हैं और दावा करते हैं कि वे निरपराधों और अस्पतालों पर हमला नहीं करते? 

उन्होंने कहा कि बहुत-से लोग यह भी सोचते हैं कि 7 अक्टूबर 2023 के पहले तक सब ठीक था और जो कुछ भी हालात ख़राब होने शुरू हुए, वह 7 अक्टूबर 2023, मतलब हमास के हमले के बाद शुरू हुए। इसका मतलब बहुत सारे लोग यह भी निकालते हैं कि अगर हमास ऐसा न करता तो इज़रायल सरकार ऐसी सख़्ती बरतने पर मजबूर नहीं होती। ऐसा सोचने वालों में अनेक भले लोग भी शामिल हैं, जो राजनीतिक रूप से पढ़े-लिखे हैं और अनेक दफ़ा फ़लस्तीन के समर्थक भी हैं। लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि यह दृष्टिकोण दोषपूर्ण है, अधूरा है। फ़लस्तीन पर इज़रायल के ज़ुल्मों का इतिहास 7 अक्टूबर 2023 से पुराना है।  

उन्होंने कहा, “बाहर के लोगों को तो यह पता नहीं है, या फिर लोग भूल जाते हैं कि 7 अक्टूबर के पहले इज़रायल में क्या हो रहा था। जनवरी 2023 से अक्टूबर में हमास के हमले तक इज़रायल में नेतन्याहू सरकार के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे थे, क्योंकि सरकार ने न्यायिक सुधारों के नाम पर जो नये क़ानून प्रस्तावित किये थे, उनसे इज़रायल की जनता और मेहनतकश तबक़ा बिल्कुल नाख़ुश था। सरकार द्वारा प्रस्तावित उन सुधारों की आड़ में सरकार अपने अधिकार बेतहाशा बढ़ाना और न्यायपालिका के अधिकार कम करना चाहती थी। दरअसल सरकार का इरादा इज़रायल के सुप्रीम कोर्ट पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लेना था। सरकार के इन तथाकथित सुधारों की मंशा यह थी कि वे अपने एकतरफ़ा क़ानूनों को पारित करवाकर सवालों से परे हो जाये और उसे इसमें क़ानूनी मोहर भी हासिल हो जाये। इन प्रस्तावों का हम सभी विपक्षी दलों ने तो विरोध किया ही लेकिन साथ ही इज़रायल की जनता ने भी ज़बर्दस्त विरोध किया था।

इज़रायल की जनता सड़कों पर प्रदर्शन कर रही थी और वह दमनकारी, तानाशाह, दक्षिणपंथी और फ़ासीवादी सरकार के ख़िलाफ़ थी। इसके पहले 2021 में नेतन्याहू की पार्टी हार चुकी थी और वे प्रधानमंत्री पद से अपदस्थ हो चुके थे। जब 2022 की नवंबर में वे वापस सत्ता में आये तो उन्होंने अपनी तानाशाही लादने की कोशिश की जिसका इज़रायल में तगड़ा विरोध हुआ। वे इन क़ानूनी सुधारों की आड़ में फ़लस्तीनी ज़मीनों पर कब्ज़ा करने की कार्रवाई तेज़ करना चाहते थे और हम लोग इसके विरोध में थे। जनता भी शांति चाहती थी और ऐसा लग रहा था कि उनकी सरकार फिर से गिर जाएगी। सितंबर 2023 में हुए सर्वेक्षणों के मुताबिक़ उनकी पार्टी के सदस्य नेसेट में घटने वाले थे। बस, इसी वक़्त 2023 में 7 अक्टूबर हुआ और युद्ध और आपातकाल की स्थिति बताकर सारे प्रदर्शन रोक दिये गये। विपक्षी दलों और हमारी पार्टी के लोगों को घरों में ही नज़रबंद कर दिया गया। उसके बाद से इज़रायली सरकार ने फ़लस्तीनियों को विलेन बनाकर पेश कर दिया और “फ़लस्तीनियों के मुक़ाबले यहूदियों को बेहतर और ताक़तवर” बताने के गुमान से भर दिया। इसलिए गाज़ा में इज़रायली सरकार नरसंहार कर सकी क्योंकि इज़रायल की आबादी में वे फ़लस्तीनीयों के प्रति नफ़रत, ग़ुस्सा, और डर बिठा चुके थे। इज़रायल की सरकार ने 7 अक्टूबर की घटना को एक अवसर की तरह भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।”

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उनकी यह बात सुनकर मुझे 2002 में गोधरा कांड की याद आयी, जिसके ठीक पहले तत्कालीन भाजपा सरकार गुजरात में लोकप्रियता खो रही थी और पंचायत चुनाव में उनकी हार दर्ज हुई थी। फिर गोधरा कांड ने राज्य के अधिकांश हिन्दू वोटरों को “मुस्लिम भय” के सामने एकजुट कर दिया। मुझे कारगिल युद्ध की याद आयी, जिसके ठीक पहले जयललिता की समर्थन वापसी से सरकार गिरने वाली थी, लेकिन कारगिल युद्ध के ऐलान ने लोगों को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एकजुट करके सरकार को स्थिर कर दिया। मुझे पुलवामा की याद आयी, जिसने भी भारत में राजनीतिक समीकरणों को सत्ता के लिए अनुकूल बना दिया था।

इज़रायल की सरकार को अपनी गिरती लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम हो रहे समर्थन को ठीक करने के लिए कुछ तो करना ही था। वह 7 अक्टूबर को नहीं करती तो 6 को या 8 को करती या 20 या 25 को करती। अक्टूबर में नहीं करती तो कभी और करती। कैलंडर के 365 दिनों में से किसी भी दिन करती लेकिन वह करती ज़रूर। अभी उसने हमास के हमले का बहाना लेकर किया। अगर हमास का हमला न होता तो भी वह करती, किसी और बहाने की आड़ में करती।

इसका मतलब यह नहीं है कि इज़रायल के ज़्यादातर लोग इज़रायल की सरकार के समर्थक या वैसे ही फ़लस्तीन विरोधी या दक्षिणपंथी नस्लवादी सोच के हो गये हैं लेकिन यह बात सच है कि बाक़ी लोग अपनी भावनाएँ प्रकट करने से डर रहे हैं क्योंकि राष्ट्रवाद के उभार में विरोधी स्वर का गला घोंटना सत्ता के लिए बहुत आसान होता है, चाहे वह स्वर कितना भी विवेकपूर्ण और समझदार क्यों न हो, क्योंकि जनता उस वक़्त एक नासमझ भीड़ बन चुकी होती है।

उन्होंने कहा, “गाज़ा और वेस्ट बैंक में अपने ही फ़लस्तीनी लोगों पर हो रहे ज़ुल्मों के दर्द से हम भरे हुए हैं लेकिन उसके अलावा इज़रायल के अंदर रह रहे हम फ़लस्तीनी लोग अलग तरह की चुनौतियाँ झेल रहे हैं। पहले जब भी गाज़ा या वेस्ट बैंक में इज़रायली सरकार कोई दमनात्मक कार्रवाई करती थी तो हम फ़लस्तीनी लोग जो इज़रायल में रह रहे हैं, सड़कों पर निकलकर तुरंत उसके ख़िलाफ़ विरोध दर्ज करते थे। अब आपातकाल की घोषणा के तहत हम ऐसा नहीं कर सकते। हमें तुरंत गिरफ़्तार कर लिया जाता है। अब हम लोग कहीं प्रदर्शन नहीं कर सकते। हमने एक हॉल के भीतर मीटिंग करने की कोशिश की तो उस हॉल के मालिक को सरकार का सन्देश आ गया कि तुम्हारा यह हॉल छः महीनों के लिए बंद कर दिया जाएगा और उसके अलावा और क्या-क्या होगा, वह अलग है।

हमारे सामने दूसरी बड़ी चुनौती है कि हम अपने शहरों और गाँवों में ही खलनायक बना दिये जा रहे हैं। सात अक्टूबर के बाद नेतन्याहू ने राष्ट्र के नाम जो पहला संदेश दिया था, उसमें उसने इज़रायली नागरिकों को कहा था कि हमें चार मोर्चों पर युद्ध लड़ना है। एक गाज़ा में, दूसरा वेस्ट बैंक में, तीसरा लेबनान में और चौथा मोर्चा है उन लोगों का, जो इज़रायल के भीतर रहते हुए भी उसकी आवाज़ का विरोध करते हैं और इंसाफ़ की आवाज़ उठाते हैं। ज़ाहिर है कि इज़रायली सरकार हमें अपना दुश्मन मानती है और जनता के सामने भी हमें देशद्रोहियों की तरह पेश करती है ताकि उनके जनविरोधी कारनामों पर हम जो आवाज़ उठाते हैं, उन पर जनता ही ध्यान देना बंद कर दे।”

मुझे ब्रेष्ट की एक और कविता की पंक्तियां याद आ रही थी जिसका इस्तेमाल गौहर रज़ा ने अपनी फ़िल्म “ज़ुल्मतों के दौर में” किया है–
मैं तुम्हारे वक़्तों की
और तुम्हारे मुल्क की नहीं
अपने वक़्त और
अपने वतन की बात कर रहा हूँ

और ये पंक्तियाँ कि–
इंसान सोच सकता है
और सोच सकता है तो वह हालात बदल भी सकता है…

विनीत तिवारी, vineet tiwari

विनीत तिवारी

भारत-फ़लस्तीन एकजुटता नेटवर्क के कार्यकर्ता। प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव। ख़ुद को साहित्यकार नहीं मानते पर बताते हैं वैचारिक और संगठन से जुड़े मुद्दों पर लेखन के साथ ही कविताई में भी दिलचस्पी। संपर्क: 98931 92740।

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