
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
याद बाक़ी स्वप्निल श्रीवास्तव की कलम से....
अपनी रचना में पूरे मौजूद विनोद कुमार शुक्ल
जब भी विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं पढ़ता हूं, उनसे पहली मुलाक़ात याद आती है। बहुत-से कवियों से मेरी कई मुलाक़ातें हुई हैं लेकिन विनोद जी से हुई मुलाक़ात भिन्न है। यह भी अनुभव हुआ कि किसी कवि की कविताएं और उसके मुख से कविता सुनना अलग-अलग अनुभव है। जब किसी कवि से उसकी कविताएं सुनी जाती हैं, तो उसमें उसकी मुद्रा और भाव भी शामिल होते हैं। कविता पढ़ना भी एक कला है। बंगाल में यह परम्परा है कि अगर कोई कवि ठीक से अपनी कविताएं नहीं पढ़ पाता तो उसे वाचक की सुविधा मिलती है। हम भले ही सही ढंग से कविताएं न उच्चारित कर पाएं लेकिन उसके भाव हम तक पहुंच जाते हैं।
यह उन दिनों की बात है जब विनोद जी मुक्तिबोध फ़ेलोशिप के अंतर्गत अपना प्रथम उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ लिख़ रहे थे। साथ ही वे अपना संग्रह ‘वह आदमी नया गर्म कोट पहिन कर चला गया विचार की तरह’ भी। इस संग्रह की कथा भी अलग है, बहरहाल मूल कथा पर लौटें।
उनकी ये दोनों किताबें सम्भावना प्रकाशन से प्रकाशित हुई थीं। विनोद जी का हापुड़ आना-जाना था. हापुड़ में मेरी नौकरी लगी थी। उन दिनों हापुड़ केवल अनाज की मंडी के रूप में नहीं ख्यात था बल्कि वहां कथाकार सुदर्शन नारंग, अशोक अग्रवाल, नफ़ीस अफ़रीदी, प्रभात मित्तल, अवधेश, अमितेश्वर जैसे साहित्यकार भी थे। उन्हीं दिनों मैंने विनोद कुमार शुक्ल की लम्बी कविता पढ़ी थी और उसका बार-बार पाठ करता था। यह कविता छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के बारे में थी। उसके विवरण मार्मिक थे। विनोद जी किताब के प्रकाशन के सिलसिले में हापुड़ आये थे। मैंने अपने आवास पर चलने का आग्रह किया और वे सहर्ष राज़ी हो गये।
चाय-नाश्ते के बाद मैंने उनसे ‘रायपुर संभाग’ कविता सुनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि उन्हें यह कविता याद नहीं है। मैंने कहा यह कविता मेरे पास है। वे कविता पढ़ने लगे, थोड़ी देर बाद उनकी आवाज़ बदलने लगी। उनका गला रुंधने लगा। मैंने उनका हाथ थामकर कहा… बस करिए विनोद जी। मैंने नाहक आपकी कोई नब्ज़ छू दी है। लेकिन उन्होंने मुझे पूरी कविता सुनायी। बोले, यह कविता इसके बिना नहीं पढ़ सकता।
यह थी एक कवि का किसी कविता के प्रति इन्वाल्वमेंट। जो लोग यह शिकायत करते हैं कि उनकी कविता में छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज अनुपस्थित है, उन्हें यह कविता ज़रूर पढ़नी चाहिए। ऐसी अनेक कविताएं उनके यहां मिलेंगी।

विनोद कुमार शुक्ल ने लम्बी कविताएं लिखी हैं लेकिन उनका काव्यात्मक संगठन उनकी छोटी कविताओं में दिखायी देता है। उनकी कविताएं निम्न मध्यवर्गीय समाज के सुख-दुख का मार्मिक वृतांत प्रस्तुत करती हैं। उनकी एक कविता का यह अंश देखें: मैं दो दिन की ज़िंदगी/ जी सकता हूं/एक दिन तुम्हारे पास रहूंगा/दूसरे दिन तुम मेरे साथ रहना।
इस कविता को पढ़ते हुए बहादुर शाह ज़फ़र की यह पंक्ति याद करिए.. उम्र-ए-दराज़ मांग के लाये थे चार दिन/दो आरज़ू में कट गये दो इंतज़ार में।
विनोद जी की कविता में उनका पास-पड़ोस उपस्थित है। जब उनके पास-पड़ोस में कोई आता है तो वे लिखते हैं… जो रिक्शे में लदे-फदे / बस अड्डे की तरफ़ से आते दिखे थे /मेरे पड़ोस में आये /तब मैं सोच रहा था /किसके घर जाएंगे / और वे मेरे पड़ोस में आये / मुझे अच्छा लगा।
उनकी कविताओं को पढ़ते हुए उनका अवलोकन याद आता है। हमारे समाज के अनेक विवरण उनकी कविताओं में मौजूद हैं। उनकी कविताओं में दैनिक जीवन के अनेक विवरण मिल सकते हैं।
उन्हें पढ़ते हुए हम अपने आप को उनकी कविताओं में पाते हैं और चकित हो जाते हैं कि इसमें हमारी ध्वनि सुनायी दे रही है। कवि अपनी कविताओं में अपने आपको भी व्यक्त करता है। बी.बी.सी. ने उनका इंटरव्यू लेते हुए पूछा था कि संतू (नौकर की कमीज़) रघुवर (दीवार में एक खिड़की रहती है) उनके भीतर कितने मौजूद हैं? उत्तर देते हुए उन्होंने कहा ‘मेरा ख्याल है कि पूरे हैं। रचनाकार अपनी रचना में पूरा होता है जो नहीं होता वह भी होता है।’
विनोद कुमार शुक्ल को साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसे सम्मान मिले थे। ज्ञानपीठ के बाद वे आलोचना के शिकार हुए थे। तीस लाख की रॉयल्टी मिलने के बाद लोग उन पर हमलावर होने लगे थे। तथाकथित क्रांतिकारी आलोचकों ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया था। यह सब उनके जीवन के अप्रिय प्रसंग थे। यह आलोचना की नयी रीति है जिसका उन्हें सामना करना पड़ा था। इस तरह के आक्रमण रेणु पर हुए थे लेकिन वे लोकप्रिय लेखक बने रहे।
इन सबके बावजूद विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के ज़रूरी कवि और लेखक हैं। वह अपने कथ्य और शैली के लिये याद किये जाते रहेंगे। उन्होंने उपन्यास और कविता की भाषा को बदलने का काम किया है।

स्वप्निल श्रीवास्तव
उ.प्र. सरकार के अधिकारी के रूप में सेवा के समानांतर साहित्य कर्म। आधा दर्जन से अधिक कविता संग्रह, लगभग इतने ही उपन्यास/कथा संग्रह प्रकाशित। आधा दर्जन से अधिक भाषाओं में आपकी कविताओं के अनुवाद हो चुके हैं। अलावा इनके संस्मरण, वृत्तांत की पुस्तकें भी आपके नाम। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, फ़िराक़ सम्मान, केदार सम्मान, शमशेर सम्मान व अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान से विभूषित।
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बहुत अहम,सारभूत बात कही आपने ‘ रचनाकार अपनी रचना में पूरा होता है। जो नहीं होता है,वह भी होता है ।’
भावप्रवण स्मरण के संग विनोद कुमार शुक्ल जी के रचना-वैभव पर विश्लेषणात्मक टिप्पणियांँ सराहनीय हैं।