
- November 6, 2026
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भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों दुबई प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दूर देस में लेखक-21....
खदान नहीं, फिर भी दुबई सोने का वॉक-वे कैसे?
सोना धरती से निकलता है, चीन, रूस, ऑस्ट्रेलिया और अफ़्रीका की खदानों से, शुद्ध होता है और दुनिया की आधुनिक रिफ़ाइनरियों में और आभूषण बनकर पहुँचता है बाज़ारों में। इस पूरी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है दुबई। लेकिन जिस शहर के पास अपनी कोई बड़ी सोने की खदान नहीं, वहाँ सोने का इतना विशाल कारोबार कैसे विकसित हुआ?
डेरा के गोल्ड सूक से लेकर गोल्ड डिस्ट्रिक्ट की नयी योजनाओं तक फैली यह चमक वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक बेहद दिलचस्प कहानी है।
चीन, रूस और ऑस्ट्रेलिया दुनिया के प्रमुख स्वर्ण उत्पादक देशों में हैं। खदानों से निकले सोने को शुद्ध करके सिल्लियों और आभूषण निर्माण योग्य धातु में बदला जाता है। इस प्रक्रिया में स्विट्जरलैंड की रिफ़ाइनरियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उसकी परिशोधन क्षमता और विकसित वित्तीय व्यवस्था उसे अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण व्यापार का प्रमुख केंद्र बनाती है। स्विस बैंकिंग व्यवस्था भी सोने के भंडारण और निवेश से जुड़ी है, हालाँकि बैंकिंग, परिशोधन और व्यापार अलग अलग गतिविधियाँ हैं।
आभूषण निर्माण में भारत, इटली और चीन की अलग विशिष्ट पहचान है। इटली डिज़ाइन और महीन कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है, चीन बड़े पैमाने पर ज्वैलरी उत्पादन करता है, जबकि भारत की ताक़त उसकी पारंपरिक शिल्पकला, विविध क्षेत्रीय डिज़ाइन और विशाल घरेलू बाज़ार में है।
भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि बचत, विवाह, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक विरासत का प्रतीक भी है।
दुबई ने इस वैश्विक शृंखला में अपनी ख़ास जगह बनायी है। उसने सोने की खदानों के बजाय उत्पादक देशों, रिफ़ाइनरियों, व्यापारियों और उपभोक्ता बाज़ारों को जोड़ने वाली वैश्विक बाज़ार व्यवस्था विकसित की। एशिया, यूरोप और अफ़्रीका के बीच उसकी भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क, बंदरगाह और व्यापारिक सुविधाएँ उसे स्वाभाविक लाभ देते हैं। अफ़्रीका से आया सोना यहाँ पहुँच सकता है, परिष्कृत सोने का कारोबार हो सकता है और भारत सहित एशिया के बाज़ारों तक आभूषण तथा बुलियन भेजे जा सकते हैं।

इस व्यापार को अनुकूल टैक्स व्यवस्था का भी सहारा मिलता है। संयुक्त अरब अमीरात में सामान्य मूल्यवर्धित कर पाँच प्रतिशत है, जबकि निर्धारित शुद्धता और अन्य शर्तें पूरी करने वाले निवेश श्रेणी के सोने पर शून्य दर लागू होती है। आभूषणों पर नियम अलग हो सकते हैं और पात्र पर्यटकों को निर्धारित शर्तों के अंतर्गत टैक्स वापसी भी मिल सकती है। इसलिए दुबई का आकर्षण केवल करों में नहीं, बल्कि परिवहन, वित्तीय सेवाओं, व्यापारिक सुविधा और वैश्विक बाजारों तक पहुँच के मेल में है। इनकम टैक्स नगण्य है।
संयुक्त अरब अमीरात का कीमती धातुओं का विदेशी व्यापार वर्ष 2024 में लगभग 625 अरब दिरहम तक पहुँच गया था। यह आँकड़ा बताता है कि दुबई की स्वर्ण पहचान केवल खुदरा दुकानों से नहीं बनी। थोक व्यापार, परिशोधन, निवेश, भंडारण और पुनर्निर्यात इसकी व्यापक अर्थव्यवस्था के हिस्से हैं। दुबई मल्टी कमोडिटीज़ सेंटर जैसे संस्थान इस कारोबार को सुविधाजनक बनाते हैं।
इस आर्थिक व्यवस्था का सबसे आकर्षक चेहरा दुबई में डेरा का गोल्ड सूक है। पुरानी दुबई की गलियों में सजे हार, कंगन, चूड़ियाँ और पारंपरिक आभूषण शहर के व्यापारिक इतिहास की गवाही देते हैं। यहाँ भारतीय परिवारों से लेकर खाड़ी देशों के ग्राहकों और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों तक की आवाजाही रहती है। सोना इस बाज़ार में संस्कृति, बचत और व्यापार, तीनों का प्रतीक है।
दुबई अब इस पहचान को पर्यटन के नये अनुभवों से जोड़ने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। गोल्ड डिस्ट्रिक्ट के विकास के बीच गोल्ड वॉक-वे की चर्चा इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है। इसे 24 कैरेट सोने से जुड़ी विशिष्ट परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन इसकी वास्तविक संरचना, सोने के उपयोग की मात्रा और निर्माण की तकनीकी प्रकृति के बारे में स्वतंत्र रूप से पुष्ट विवरण अभी घोषित नहीं हैं।
इसका महत्व फ़िलहाल इस विचार में है कि दुबई सोने को केवल खरीद-बिक्री की वस्तु न रखकर अपनी शहरी पहचान और पर्यटन आकर्षण से भी जोड़ना चाहता है।
इस कहानी में बड़ा उपभोक्ता भारत है। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार, भारत में वर्ष 2024 में लगभग 563 टन सोने के आभूषणों की खपत हुई, जो ऊँची क़ीमतों के बीच वर्ष 2025 में घटकर लगभग 431 टन रह गयी। फिर भी, भारत दुनिया के प्रमुख स्वर्ण आभूषण बाज़ारों में है। यही सांस्कृतिक परंपरा और व्यक्तिगत मांग दुबई के व्यापार को भी सहारा देती है। हालाँकि दुबई में सोना खरीदना हमेशा भारत से सस्ता नहीं पड़ता। अंतरराष्ट्रीय भाव, निर्माण शुल्क, कर, मुद्रा विनिमय और भारत लौटते समय लागू सीमा शुल्क नियम अंतिम लागत तय करते हैं।
सोने की चमक के पीछे नैतिक प्रश्न भी हैं… खनन से होने वाला पर्यावरणीय नुक़सान, श्रमिकों के अधिकार और संघर्ष, प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले सोने की पहचान अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गंभीर चुनौतियाँ। धातु की शुद्धता और उसके स्रोत की नैतिक शुद्धता अलग बातें हैं, दुबई जैसे बड़े व्यापारिक केंद्र के लिए ज़िम्मेदार स्रोतों और पारदर्शी आपूर्ति शृंखला को सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।
दुबई के पास सोने की बड़ी खदान नहीं, लेकिन दुनिया के सोने को अपने व्यापारिक भूगोल में स्थान देने की क्षमता है। गोल्ड सूक और गोल्ड वॉक-वे की परिकल्पना इसी सोच के दो अलग रूप हैं। दुबई की असली खदान शायद धरती के नीचे नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति, व्यापारिक संपर्कों और अवसरों को पहचानने की सरकारी दूरदृष्टि में है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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