
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
व्यंग्य का विश्वरूप: विदेशों में व्यंग्य लेखन का अध्ययन
देश की विभिन्न भाषाओं में व्यंग्य की उपस्थिति पर लिखते समय यह प्रश्न बार-बार मन में उभरता था कि क्या विश्व की अन्य भाषाओं में भी व्यंग्य, हिंदी की तरह पल्लवित और प्रतिष्ठित हुआ है तथा उसने वहाँ भी जनमानस में अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है। इस आलेख में इसी तथ्य की तस्दीक करते हुए विश्व की अनेक भाषाओं में व्यंग्य की भूमिका पर विचार किया गया है।
विश्व साहित्य के इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में व्यंग्य की सशक्त उपस्थिति रही है तथा उसकी भूमिका भी नैतिक प्रहरी, विद्रोह तथा मानवीय विवेक की रही है। दुनिया के सभी महाद्वीपों में व्यंग्य जनमानस में लोकप्रिय रहा है तथा उसने वैश्विक साहित्य को दिशा भी दी है। जब-जब सत्ता निरंकुश हुई, धर्म पाखंड में बदला, विज्ञान दंभ में ढला या समाज ने अपने अंतर्विरोधों से मुँह मोड़ा, तब-तब व्यंग्य ने उसे आईना दिखाने का काम किया।
अंग्रेज़ी बनाम हिंदी व्यंग्य
सबसे पहले अंग्रेज़ी में व्यंग्य की बात करते हैं। अंग्रेज़ी में व्यंग्य को सटायर कहा जाता है, जो लैटिन मूल से अंग्रेज़ी में आया है। अनेक विद्वानों का मानना है कि हिंदी व्यंग्य ने अपनी आधुनिक अवस्था तक पहुँचने की यात्रा में अंग्रेज़ी व्यंग्यकारों से प्रेरणा ली है। उनका तर्क है कि हिंदी व्यंग्य में दिखायी देने वाली वैचारिक स्पष्टता, शैलीगत विशेषताएँ और लेखकीय साहस अंग्रेज़ी सटायर की देन हैं। मेरा मानना है कि हिंदी व्यंग्य अंग्रेज़ी सटायर से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि उससे संवाद करते हुए आगे बढ़ा है। और स्पष्ट रूप में कहूँ तो हिंदी व्यंग्य की संवेदना भारतीय सामाजिक यथार्थ से उपजी है, न कि अंग्रेज़ी व्यंग्य का अनुगमन करके निर्मित हुई है।
भारतीय भाषाओं में व्यंग्य की जड़ें अंग्रेज़ी सटायर से बहुत पहले से मौजूद थीं। संस्कृत और हिंदी साहित्य में कटाक्ष, परिहास और विडंबना के सशक्त उदाहरण विद्यापति, कबीर, तुलसी और सूरदास की रचनाओं में सहज रूप से मिलते हैं। सदियों से प्रचलित लोक-कथाओं, कहावतों और भांड-परंपरा में भी तीखा हास्य विद्यमान है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी व्यंग्य की एक दीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। हाँ, आधुनिक व्यंग्य के संदर्भ में यह अवश्य कहा जा सकता है कि उसने अंग्रेज़ी सटायर से कुछ शिल्पगत औज़ार ग्रहण किये, किंतु उन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालकर अपनी भाषा, अनुभव और ज़मीन से एक विशिष्ट पहचान निर्मित की।
प्रमुख अंग्रेज़ी व्यंग्यकार
अंग्रेज़ी सटायर का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उसका उद्देश्य मानवीय दुर्बलताओं, सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक पाखंड और नैतिक पतन को उजागर करना है। अंग्रेज़ी साहित्य में व्यंग्य आज जिस ऊँचाई पर पहुँचा है, उसकी नींव रखने में जोनाथन स्विफ़्ट का योगदान अद्वितीय है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘गुलिवर्स ट्रैवल्स’ (1726) मानव समाज, राजनीति, वैज्ञानिक अहंकार और तथाकथित सभ्यता की बर्बरता पर तीखा प्रहार करती है। उनकी दूसरी रचना ‘ए मॉडेस्ट प्रपोज़ल’ इतनी तीक्ष्ण है कि वह आज भी व्यंग्य की सीमाओं का मानक मानी जाती है। उनका व्यंग्य करुणा और क्रूरता का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत करता है।
बीसवीं शताब्दी में जॉर्ज ऑरवेल अंग्रेज़ी राजनीतिक व्यंग्य के सबसे प्रभावशाली स्वर के रूप में उभरे। ‘एनिमल फ़ार्म’ में उन्होंने पशुओं के माध्यम से सोवियत क्रांति और उसके बाद स्थापित तानाशाही की निर्मम आलोचना की। अंग्रेज़ी के अन्य प्रमुख व्यंग्यकारों में ऑस्कर वाइल्ड, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, पी.जी. वुडहाउस, स्टेला गिबॉन्स, डगलस एडम्स, एवलीन वॉ, मार्क ट्वेन, जोसेफ हेलर, कर्ट वॉनेगट, जेम्स थर्बर और डोरोथी पार्कर के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ऑस्कर वाइल्ड को सौम्य व्यंग्यकार माना जाता है। उन्होंने समाज की बनावटी नैतिकता और दोहरे चरित्रों पर चुटीला व्यंग्य किया। ‘द इम्पोर्टेंस ऑफ़ बीइंग अर्नेस्ट’ में उन्होंने विक्टोरियन समाज के दिखावे और पाखंड को संवादों के माध्यम से बेनक़ाब किया। पी.जी. वुडहाउस उच्चवर्गीय जीवन की मूर्खताओं पर विनोदी व्यंग्य रचने में निष्णात थे। उनके पात्र, विशेषतः बर्टी वूस्टर और उसका चतुर सेवक जीव्स, अंग्रेज़ी हास्य साहित्य के अमर चरित्र हैं। उनकी रचनाओं में ‘राइट हो जीव्स’, ‘थैंक यू जीव्स’, ‘कैरी ऑन जीव्स’ एवं ‘द कोड ऑफ द वूस्टर्स’ प्रमुख हैं। वुडहाउस अंग्रेज़ी के ऐसे लेखक हैं, जिनके पंच वाक्य प्रमुखता से उद्धृत किये जाते हैं। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने वर्ग-व्यवस्था, युद्ध और नैतिकता पर बौद्धिक व्यंग्य लिखा। स्टेला गिबॉन्स की ‘कोल्ड कम्फ़र्ट फ़ार्म’ और एवलीन वॉ की ‘स्कूप’ अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य कृतियाँ हैं।
आयरलैंड का व्यंग्य साहित्य बौद्धिक और प्रयोगधर्मी रहा है। लॉरेंस स्टर्न आयरलैंड के सर्वाधिक चर्चित व्यंग्यकारों में गिने जाते हैं। उन्हीं की तरह स्कॉटलैंड के ई.ए. निकोल को भी हल्के, व्यंग्यात्मक और मानवीय हास्य के लिए जाना जाता है। आस्ट्रेलिया के पैरी हंफ्रीज़ का नाम भी अंग्रेज़ी के चर्चित व्यंग्यकारों में शुमार किया जाता है।
मार्क ट्वेन अमेरिका के अग्रणी व्यंग्यकार माने जाते हैं। कनेक्टिकट स्थित उनके घर, जो अब संग्रहालय है, को देखने का मुझे भी सौभाग्य मिला है। उन्होंने नस्लवाद, धार्मिक पाखंड और तथाकथित सभ्यता पर लोकधर्मी हास्य के माध्यम से गहरे व्यंग्य लिखे। ‘द एडवेंचर्स ऑफ़ हकलबेरी फ़िन’ और ‘द एडवेंचर्स ऑफ़ टॉम सॉयर’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। जोसेफ़ हेलर की ‘कैच-22’ युद्ध और नौकरशाही की निरर्थकता को व्यंग्यात्मक लहजे में प्रस्तुत करती है। कर्ट वॉनेगट की ‘स्लॉटरहाउस-फ़ाइव’ में युद्ध, तकनीक और मानवीय असंवेदनशीलता पर करुणाजन्य व्यंग्य है। ऐसे व्यंग्य को ब्लैक ह्यूमर के नाम से जाना जाता है। यह व्यंग्य का ऐसा स्वरूप है जो दुख और भय के बीच हँसी की जगह खोजता है। यह व्यंग्य मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सत्य की तीखी पहचान, प्रतिरोध और विवेक की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में सामने आता है। टॉम वुल्फ़ का ‘द बॉनफ़ायर ऑफ़ द वैनिटीज़’ उपभोक्तावाद, मीडिया-संस्कृति और शहरी अभिजात वर्ग की आत्ममुग्धता पर प्रहार करता है। यहाँ व्यंग्य आधुनिक महानगर की नैतिक रिक्तता और सामाजिक असमानताओं को उजागर करता है।
अन्य अमेरिकी व्यंग्यकारों में एम्ब्रोस बियर्स (द डेविल्स डिक्शनरी), जेम्स थर्बर (द सीक्रेट लाइफ़ ऑफ़ वॉल्टर मिटी), विलियम एस. बरोज़ (नैक्ड लंच), थॉमस पिंचन (द क्राइंग ऑफ लॉट 49) और डोरोथी पार्कर ने सामाजिक संबंधों, स्त्री–पुरुष मनोविज्ञान और आधुनिक शहरी जीवन पर तीक्ष्ण, संवेदनशील और प्रभावी व्यंग्य रचा है। आलोचकों का मानना है, अमेरिकी साहित्य ने आधुनिक विश्व साहित्य को साहसिक, निर्भीक और जनोन्मुख व्यंग्य लेखन की प्रेरणा दी।
व्यंग्य की फ्रेंच कॉलोनी
यूरोपीय देशों में फ्रांस में व्यंग्य की एक समृद्ध और श्रेष्ठ परंपरा रही है। फ्रांसीसी व्यंग्य दार्शनिक चेतना और वैचारिक सजगता से संपन्न रहा है। मोलिएर के नाटकों में धार्मिक पाखंड, लालच और सामाजिक आडंबर पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है। ‘तारतूफ़’ और ‘द मिसर’ उनके प्रसिद्ध नाटक हैं, जिनमें उन्होंने नैतिकता के मुखौटे ओढ़े समाज की सच्चाइयों को बेनक़ाब किया है।
एक अन्य प्रमुख फ्रांसीसी व्यंग्यकार वोल्तेयर ने अपने व्यंग्य-उपन्यास ‘कैंडिड’ में अंध आशावाद, चर्च और सत्ता की विसंगतियों की निर्मम आलोचना की। फ्रांसीसी व्यंग्य की परंपरा में जीन एफ़ेल का नाम भी उल्लेखनीय है, जिनकी कार्टून रचनाएँ समकालीन समाज और धार्मिक संस्थाओं पर तीखे, किंतु मार्मिक व्यंग्य के लिए जानी जाती हैं।

प्रमुख जर्मन व्यंग्य लेखक
जर्मनी में व्यंग्य के केंद्रीय विषय राष्ट्रवाद, सामाजिक शोषण और राजनीतिक पाखंड रहे हैं। जर्मन व्यंग्य प्रायः आंदोलनकारी और वैचारिक स्वर लिये होता है। हाइनरिख हाइने, कार्ल क्राउस और बर्टोल्ट ब्रेख्त जर्मनी के ऐसे प्रमुख लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने समूचे विश्व का ध्यान आकृष्ट किया। हाइने की कृति ‘डॉयचलैंड: ए विंटर टेल’ राष्ट्रवाद की अतिवादी प्रवृत्तियों पर तीखा प्रहार करती है, जबकि ब्रेख्त की ‘द थ्रीपेनी ओपेरा’ पूँजीवादी व्यवस्था और वर्गीय शोषण की व्यंग्यात्मक आलोचना प्रस्तुत करती है। कार्ल क्राउस का व्यंग्य और भी कठोर है। उनकी कृति ‘द लास्ट डेज़ ऑफ़ मैनकाइण्ड’ प्रथम विश्व युद्ध, पत्रकारिता की ग़ैर-ज़िम्मेदारी और युद्धकालीन नैतिक पतन पर तीखा प्रहार है। क्राउस का व्यंग्य सभ्यता की आत्मा को कठघरे में खड़ा करता है।
जर्मन व्यंग्य परंपरा में गुंटर ग्रास (द टिन ड्रम के लेखक) तथा कुर्ट कुसेनबर्ग जैसे लेखकों के नाम भी प्रमुखता से लिये जाते हैं।
व्यंग्य का रूसी स्वर
रूसी भूमि राजनीतिक उथल-पुथल और अनेक क्रांतियों की प्रत्यक्षदर्शी रही है, जिसका प्रभाव वहाँ के साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखायी देता है। नैतिक पतन और सामाजिक भ्रष्टाचार, रूसी व्यंग्य की धुरी रहे हैं। रूसी व्यंग्य अपनी तीक्ष्णता और यथार्थवाद के लिए प्रसिद्ध है। निकोलाई गोगोल, मिखाइल साल्तिकोव-श्चेद्रिन, मिखाइल बुल्गाकोव, अनातोली लूनाचार्स्की तथा अर्कादी रैकिन रूस के प्रमुख व्यंग्यकार माने जाते हैं। गोगोल को व्यंग्य का स्तंभ माना जाता है। उनकी ‘डेड सोल्स’ और ‘द गवर्नमेंट इंस्पेक्टर’ नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता पर केंद्रित अद्भुत व्यंग्य रचनाएँ हैं। मिखाइल साल्तिकोव-श्चेद्रिन की ‘द गोलोव्ल्योव फ़ैमिली’ में रूसी समाज की नैतिक गिरावट को व्यंग्य का आधार बनाया गया है। अर्कादी रैकिन को एक प्रभावशाली मंचीय व्यंग्यकार और स्टैंड-अप कलाकार के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त है। मिखाइल बुल्गाकोव ने ‘द मास्टर एंड मार्गरिटा’ में फ़ंतासी के माध्यम से स्टालिन-युग के भय, दमन और वैचारिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य रचा है।
अब व्यंग्य का यूरोप टूर
ग्रीस यूरोप का ऐसा देश है जहाँ दर्शन, साहित्य और संस्कृति की अत्यंत समृद्ध परंपरा रही है। ग्रीक साहित्य में व्यंग्य की उपस्थिति पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जाती है, जब अरिस्टोफनीज़ ने अपने नाटकों ‘लिसिस्ट्राटा’, ‘द क्लाउड्स’ और ‘द फ्रॉग्स’ के माध्यम से राजनीति, युद्ध, दार्शनिक दिखावे और लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमज़ोरियों पर निर्भीक कटाक्ष किया। ‘द क्लाउड्स’ में उन्होंने सुकरात जैसे दार्शनिकों की बौद्धिकता और वैचारिक दंभ को भी प्रश्नों के घेरे में लिया। बाद के काल में होरस और जुवेनल ने इस व्यंग्य परंपरा को और अधिक सुदृढ़ तथा समृद्ध किया।
अन्य यूरोपीय देशों के व्यंग्यकारों में स्पेन के मिगेल द सर्वांतेस और फ्रांसिस्को दे क्वेवेदो, इटली के दांते अलीघिरि, उम्बेर्तो इको, जियोवानी बोक्काचियो और दारिओ फ़ो, चेक गणराज्य के जारोस्लाव हासेक तथा पुर्तगाल के गिल विसेंटे और जोसे मारिया दे एका दे केइरोस अपने सरोकारी और आलोचनात्मक लेखन के कारण विशेष स्थान रखते हैं।
स्पेनी व्यंग्य मूलतः मानवीय और दार्शनिक प्रकृति का रहा है। वह जीवन की विडंबनाओं को करुणा और विवेक के साथ देखता है। मिगेल द सर्वांतेस की कालजयी कृति ‘डॉन किहोते’ में आदर्शवाद और यथार्थ के टकराव पर अत्यंत प्रभावी व्यंग्य मिलता है। कथ्य और शिल्प, दोनों स्तरों पर यह रचना आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। क्वेवेदो की ‘ला विदा देल बुस्कोन’ सामाजिक बुराइयों, अवसरवाद और नैतिक पतन पर हास्य और विडंबना के माध्यम से तीखा प्रहार करती है।
इतालवी व्यंग्य प्रतीकात्मकता और नैतिक चेतना से गहराई से जुड़ा रहा है। दांते अलीघिरि को इतालवी साहित्य में व्यंग्य का सबसे बड़ा प्रतिनिधि माना जाता है। उनकी महाकाव्यात्मक कृति ‘द डिवाइन कॉमेडी’ में मध्ययुगीन यूरोप की राजनीति, चर्च की सत्ता और सामाजिक पाखंड पर गहन प्रतीकात्मक व्यंग्य किया गया है। नरक और स्वर्ग की यात्राओं के माध्यम से दांते ने अपने समय के पोपों, राजनेताओं और नैतिक पतन का निर्भीक मूल्यांकन किया है। उम्बेर्तो इको ने व्यंग्य को बौद्धिक और दार्शनिक स्तर पर आगे बढ़ाया। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘द नेम ऑफ़ द रोज़’ मध्ययुगीन मठ की पृष्ठभूमि में ज्ञान, धर्म और सत्ता के जटिल अंतर्संबंधों की आलोचनात्मक पड़ताल करता है। बोक्काचियो का ‘डेकामेरॉन’ प्लेग काल के सामाजिक और धार्मिक पाखंड पर हास्यपूर्ण, किंतु तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करता है। दारिओ फ़ो ने रंगमंच के माध्यम से सत्ता, चर्च और पूँजीवादी व्यवस्था पर लोकधर्मी और आक्रामक व्यंग्य रचा।
चेक साहित्य में जारोस्लाव हासेक की कृति ‘द गुड सोल्जर श्वेक’ युद्ध, सैन्यवाद और नौकरशाही की निरर्थकता पर करुणा से भरा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। हासेक का व्यंग्य मानवीय पीड़ा और सत्ता की मूर्खता को एक साथ उजागर करता है।
पुर्तगाली साहित्य में व्यंग्य का विकास सामाजिक नैतिकता, धार्मिक संस्थाओं और औपनिवेशिक मानसिकता की आलोचना के रूप में हुआ। सोलहवीं शताब्दी के गिल विसेंटे को पुर्तगाली व्यंग्य का प्रवर्तक माना जाता है। उनके नाटकों में चर्च के पाखंड, सामाजिक वर्गभेद और नैतिक पतन पर तीखा, किंतु लोकधर्मी व्यंग्य मिलता है। आधुनिक काल में जोसे मारिया दे एका दे केइरोस पुर्तगाली व्यंग्य के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनके उपन्यास ‘द क्राइम ऑफ़ फ़ादर अमरो’ और ‘द मायस’ कैथोलिक चर्च, मध्यवर्गीय नैतिकता और सामाजिक दोहरेपन पर सशक्त और यथार्थवादी व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं। उनका व्यंग्य अतिशयोक्ति से दूर रहकर समाज की वास्तविक कमज़ोरियों को उजागर करता है।
लैटिन अमेरिकी देशों में व्यंग्य का प्रमुख स्वर तानाशाही, सत्ता की विसंगतियों और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध से जुड़ा रहा है। कोलंबियाई साहित्य में व्यंग्य प्रायः जादुई यथार्थवाद के साथ अंतर्गुंफित दिखायी देता है। गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ में सत्ता, धर्म, इतिहास और सामाजिक जड़ता पर अप्रत्यक्ष किंतु गहन व्यंग्य मिलता है। कल्पना और यथार्थ का यह अद्भुत मिश्रण सत्ता की निरर्थकता, हिंसा की निरंतरता और इतिहास की पुनरावृत्ति को उजागर करता है। इसी परंपरा में पेरू के लेखक मारियो वर्गास योसा के उपन्यास ‘कन्वर्सेशन इन द कैथेड्रल’ एवं ‘द फीस्ट ऑफ द गोट’ राजनीति, तानाशाही और सामाजिक भ्रष्टाचार पर तीक्ष्ण व्यंग्यात्मक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। उनका व्यंग्य सत्ता के भीतर व्याप्त नैतिक खोखलेपन और नागरिक जीवन की विडंबनाओं को बेनकाब करता है।
मेक्सिकन व्यंग्य साहित्य सत्ता, चर्च और सामाजिक असमानता पर केंद्रित रहा है, जबकि अर्जेंटीना में व्यंग्य अधिक बौद्धिक और दार्शनिक स्वर ग्रहण करता है। कार्लोस फुएंतेस (द डेथ ऑफ अर्टेमिओ क्रूज) और ऑक्टेवियो पाज (द लबीरैंथस ऑफ सोलिट्यूड) मैक्सिकन व्यंग्य की धुरी माने जाते हैं। अर्जेन्टीनियन व्यंग्यकार जॉर्ज लुईस बोर्खेस की रचनाओं में सत्ता, ज्ञान और यथार्थ की अवधारणाओं पर बौद्धिक व्यंग्य और विडंबना देखी जा सकती है। उनकी रचनाओं में ‘फिक्सिओनेस’ तथा ‘लबीरैंथस’ प्रमुख हैं।
क्यूबा में व्यंग्य राजनीतिक और क्रांतिकारी चेतना से गहराई से जुड़ा रहा है, जहाँ वह सत्ता और वैचारिक जड़ता पर तीखा प्रहार करता है। चिली में व्यंग्य सामाजिक अन्याय और राजनीतिक दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम बना, जबकि ब्राज़ीलियाई व्यंग्य सामाजिक वर्ग-विभाजन और उपनिवेशवादी मानसिकता की आलोचना पर केंद्रित रहा। यहाँ हास्य के भीतर गहरी सामाजिक समीक्षा अंतर्निहित रहती है। इन देशों के व्यंग्यकारों में जोसे डोनोसो (चिली, ‘द ऑब्सेन बर्ड ऑफ नाईट’ के लेखक) तथा मशादो दे असिस (ब्राजील, द पोस्टहुमस मेमोयर ऑफ ब्रास सुबास के लेखक) के नाम प्रमुख हैं।
एशियाई देशों में व्यंग्य साहित्य
एशियाई देशों में जापानी व्यंग्य का स्वर पश्चिमी व्यंग्य से भिन्न, अधिक सूक्ष्म, प्रतीकात्मक और सौंदर्य-बोध से जुड़ा हुआ दिखायी देता है। जापानी व्यंग्य प्रायः प्रत्यक्ष कटाक्ष की बजाय संकेत, विडंबना और मौन के माध्यम से प्रभाव उत्पन्न करता है। प्राचीन जापानी साहित्य में क्योगेन नामक हास्य-नाट्य परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। ये लघु नाटक सामंती व्यवस्था, पुजारियों, मालिक-नौकर संबंधों और मानवीय मूर्खताओं पर लोकधर्मी और चुटीले व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं।
आधुनिक जापानी साहित्य में नात्सुमे सोसेकी को उनकी व्यंग्यात्मक दृष्टि के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। उनका उपन्यास ‘आई एम ए कैट’ (1905) जापानी मध्यवर्ग, पश्चिमीकरण और बौद्धिक दिखावे पर अद्भुत व्यंग्य है। एक बिल्ली की दृष्टि से समाज को देखने की युक्ति जापानी व्यंग्य की मौलिकता और कलात्मकता को रेखांकित करती है।
चीनी साहित्य में कन्फ्यूशियस और ताओ दर्शन की परंपराओं में भी अप्रत्यक्ष व्यंग्य और विडंबना के संकेत मिलते हैं। प्राचीन चीनी कथाओं और लोककथाओं में शासकों, अधिकारियों और विद्वानों की मूर्खताओं पर प्रतीकात्मक व्यंग्य किया गया है। आधुनिक चीनी व्यंग्य के सबसे प्रमुख लेखक लू शुन माने जाते हैं। उनकी रचनाएँ ‘द ट्रू स्टोरी ऑफ आह क्यू’ (1921) और ‘डायरी ऑफ़ ए मैडमैन’ (1918) चीनी समाज की नैतिक जड़ता, परंपरागत सोच और सत्ता-संरचना पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं।
अरबी साहित्य में व्यंग्य कविता और गद्य, दोनों रूपों में विकसित हुआ है। 9वी शताब्दी में अल-जाहिज़ ने कंजूसी, सामाजिक स्वार्थ और मानवीय कमज़ोरियों को आधार बनाकर ‘किताब अल-बुक़ला’ एवं ‘किताब अल-हयवान’ जैसी कालजयी रचनाएँ लिखीं। इसी तरह परलोक की कल्पना के माध्यम से धर्म, नैतिकता और सामाजिक पाखंड पर अल-मआरी ने ‘रिसालत अल-ग़ुफ़रान’ जैसा ग्रन्थ लिखा। अहमद राग़िब व नग़ीब महफ़ूज़ (मिस्र) तथा मुहम्मद अल-मघूत (सीरिया) ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
इसी प्रकार फ़ारसी साहित्य में भी व्यंग्य और उपहास की एक सशक्त परंपरा मिलती है। उबैद-ए-जाकानी जैसे कवियों ने धार्मिक पाखंड, सत्ता और सामाजिक नैतिकता पर निर्भीक व्यंग्य रचा। इरज मिर्ज़ा, सादेग हेदायत, रूमी और सादी शिराज़ी की रचनाओं में नैतिक और दार्शनिक व्यंग्य के सूक्ष्म स्वर दिखायी देते हैं। आधुनिक ईरानी साहित्य में इब्राहिम नबावी को अग्रणी व्यंग्यकारों में गिना जाता है।
अफ्रीकी भाषाओं में लोककथाओं, गीतों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से उपनिवेशवाद और शोषण पर व्यंग्य मिलता है। आधुनिक अफ्रीकी साहित्य में यह व्यंग्य सत्ता, नस्लभेद और उत्तर-औपनिवेशिक संकटों के विरुद्ध तीखे प्रतिरोध के रूप में उभरता है। इस परंपरा के लेखकों में नाइजीरिया के चिनुआ अचेबे (‘द ट्रायल्स ऑफ ब्रदर जेरो’ व ‘ए प्ले ऑफ जाइंट्स’), केन्या के नगूगी वा थ्योंगो (विज़ार्ड ऑफ द क्रो) तथा घाना के अमा अता ऐडू (अवर सिस्टर किलिजोय) के नाम आदर के साथ लिये जाते हैं।
समेकित रूप से विश्व साहित्य की विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में व्यंग्य की उपस्थिति सिद्ध करती है कि वह किसी एक देश, काल या भाषा की साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि मानवीय विवेक की सार्वकालिक अभिव्यक्ति है। जब भी समाज में सत्ता निरंकुश हुई, विचार जड़ हुए, धर्म पाखंड में बदला या नैतिक मूल्य क्षीण पड़े, व्यंग्य ने प्रश्न उठाने, असुविधा पैदा करने और आत्मावलोकन के लिए विवश करने का कार्य किया।
संदर्भ
1. हिंदीपॉड
2. इपिटोम जर्नल्स
3. कैम्ब्रिज जर्नल्स
4. एक्सोटिक इंडिया आर्ट
5. स्टडी स्मार्टर
6. विकिपीडिया
7. अन्य संदर्भित वेबसाइट्स

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
