युद्ध, मीडिया, wars, media, social media
निबंध डॉ. आकिब जावेद की कलम से....

सूचना युग में युद्ध और मीडिया की भूमिका

           हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब तीसरा विश्वयुद्ध दस्तक दे रहा है। प्रसिद्ध मीडिया चिंतक मार्शल मैक्लुहान का प्रसिद्ध कथन है– “माध्यम ही संदेश बन जाता है।” आधुनिक संचार व्यवस्था के संदर्भ में यह कथन और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज के दौर में किसी भी घटना की वास्तविकता केवल उस घटना में नहीं बल्कि इस बात में भी निहित होती है कि उसे मीडिया किस प्रकार प्रस्तुत करता है।

मानव इतिहास में युद्ध हमेशा से विनाश और पीड़ा का कारण रहा है, किंतु 21वीं सदी में युद्ध का स्वरूप पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गया है। आज युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ी जाने वाली सैन्य कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि यह सूचना, छवि और जनमत के स्तर पर भी लड़ा जाता है।

आज दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली घटना कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों की मोबाइल स्क्रीन तक पहुँच जाती है। इंटरनेट, टेलीविज़न और सोशल मीडिया ने युद्ध को एक दृश्यात्मक अनुभव में बदल दिया है। लोग युद्ध को सीधे नहीं बल्कि मीडिया के माध्यम से देखते और समझते हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को “चौथा स्तंभ” कहा जाता है क्योंकि वह शासन और जनता के बीच संवाद का माध्यम बनता है। युद्ध और संघर्ष के समय यह भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि मीडिया संतुलित और ज़िम्मेदार ढंग से कार्य करे तो वह समाज को सही जानकारी देकर शांति और समझ को बढ़ावा दे सकता है। लेकिन यदि वही मीडिया सनसनीखेज़ और मनोरंजनात्मक प्रस्तुति का सहारा ले तो वह समाज में भय, भ्रम और संवेदनहीनता को भी बढ़ा सकता है।

इसी संदर्भ में यह लेख वैश्विक और भारतीय मीडिया की भूमिका का विश्लेषण करते हुए यह समझने का प्रयास करता है कि युद्ध की मीडिया प्रस्तुति समाज पर किस प्रकार प्रभाव डालती है।

1. समय: सूचना युग और युद्ध की बदलती प्रकृति

21वीं सदी को सूचना क्रांति का युग कहा जाता है। इंटरनेट, डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के विकास ने संचार व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। अब दुनिया के किसी भी हिस्से में घटित घटना कुछ ही क्षणों में वैश्विक समाचार बन जाती है। आधुनिक युद्धों में मीडिया की भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित नहीं रह गयी है। मीडिया यह भी निर्धारित करता है कि समाज किन घटनाओं को कितना महत्व देगा और उन्हें किस दृष्टिकोण से समझेगा। मीडिया अध्ययन के क्षेत्र में इसे ‘एजेंडा सेटिंग सिद्धांत’ (Agenda Setting Theory) कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार मीडिया यह तय करता है कि समाज किन मुद्दों को महत्वपूर्ण मानेगा।

जब मीडिया किसी युद्ध या संघर्ष को लगातार प्रमुखता से प्रस्तुत करता है, तो वह विषय जनता की चर्चा और चिंता का केंद्र बन जाता है। इसी प्रकार फ्रेमिंग सिद्धांत (Framing Theory) के अनुसार मीडिया किसी घटना को जिस तरीक़े से प्रस्तुत करता है, वही दर्शकों की समझ को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए यदि किसी संघर्ष को “राष्ट्रीय सुरक्षा की लड़ाई” के रूप में प्रस्तुत किया जाये तो दर्शकों की प्रतिक्रिया अलग होगी, जबकि यदि उसे “मानवीय संकट” के रूप में दिखाया जाये तो प्रतिक्रिया भिन्न होगी।

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इस प्रकार आधुनिक युग में युद्ध केवल हथियारों और सेनाओं के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सूचना और विचारों के स्तर पर भी लड़ा जाता है।

2. भाषा: मीडिया और भय का वातावरण

मीडिया की भाषा समाज के मानस पर गहरा प्रभाव डालती है। युद्ध की परिस्थितियों में यह प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है। आज के टेलीविज़न समाचार चैनलों में अक्सर ऐसी भाषा का प्रयोग देखने को मिलता है जो अत्यधिक उत्तेजक और आक्रामक होती है। समाचार शीर्षकों में “महायुद्ध”, “तबाही”, “निर्णायक हमला”, “दुश्मन का विनाश” जैसे शब्दों का प्रयोग दर्शकों में रोमांच और भय दोनों उत्पन्न करता है।

मीडिया की इस शैली का एक प्रमुख कारण प्रतिस्पर्धा और टीआरपी की होड़ है। दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए समाचारों को अधिक नाटकीय और रोमांचक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ग्राफ़िक्स, तेज़ संगीत और आक्रामक एंकरिंग युद्ध को एक प्रकार के दृश्य तमाशे में बदल देती है।

सोशल मीडिया के प्रसार ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे मंचों के ज़रिये सूचनाएँ अत्यंत तेज़ी से फैलती हैं, लेकिन कई बार इनकी सत्यता की पुष्टि नहीं होती है। परिणामस्वरूप अफ़वाहें और ग़लत सूचनाएँ भी व्यापक रूप से फैल सकती हैं।

इस प्रकार यदि मीडिया की भाषा संयमित और ज़िम्मेदार न हो तो वह समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण उत्पन्न कर सकती है।

3. यथार्थ: युद्ध और मीडिया के उदाहरण

इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जो दर्शाते हैं कि युद्ध के समय मीडिया की भूमिका कितनी प्रभावशाली रही है।

वियतनाम युद्ध

1960 और 1970 के दशक में हुए वियतनाम युद्ध को मीडिया इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने युद्ध की भयावह तस्वीरें और वीडियो प्रसारित किये। इन दृश्यों ने अमेरिकी समाज को गहराई से प्रभावित किया और वहाँ व्यापक युद्ध विरोधी आंदोलन शुरू हो गये। यह उदाहरण दर्शाता है मीडिया जनमत को प्रभावित करने की बड़ी शक्ति रखता है।

खाड़ी युद्ध और इराक युद्ध

1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान पहली बार दुनिया ने टेलीविज़न पर युद्ध की लाइव कवरेज देखी। अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनलों ने युद्ध की घटनाओं को लगातार प्रसारित किया। 2003 में इराक युद्ध के समय भी मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। हालांकि बाद में कई विश्लेषकों ने यह आलोचना की कि कुछ मीडिया संस्थानों ने सरकारों के दावों को बिना पर्याप्त जांच के प्रसारित किया।

रूस–यूक्रेन युद्ध

2022 में शुरू हुआ रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध आधुनिक समय का सबसे चर्चित सैन्य संघर्ष बन चुका है। इस युद्ध की मीडिया कवरेज अत्यंत व्यापक रही है। ड्रोन हमलों, मिसाइल हमलों और सैन्य गतिविधियों के वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार साझा किये जाते हैं।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की निरंतर दृश्यात्मक प्रस्तुति युद्ध की वास्तविक त्रासदी को कई बार एक तमाशे में बदल देती है।

इज़राइल–गाज़ा संघर्ष

मध्य–पूर्व में इज़राइल और गाज़ा के बीच चल रहा संघर्ष भी मीडिया की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इस संघर्ष के कारण भारी मानवीय संकट उत्पन्न हुआ है। विभिन्न देशों के मीडिया संस्थान इस संघर्ष को अलग-अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं, जिससे दर्शकों के लिए वास्तविक स्थिति को समझना कई बार कठिन हो जाता है।

सूडान का गृहयुद्ध

अफ्रीकी देश सूडान में चल रहा गृहयुद्ध भी एक गंभीर मानवीय संकट है। लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और भोजन तथा चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी हो गयी है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस संघर्ष को अपेक्षाकृत कम स्थान मिलता है। यह स्थिति दर्शाती है मीडिया कई बार उन संघर्षों को अधिक महत्व देता है, जो वैश्विक राजनीति या आर्थिक हितों से अधिक जुड़े होते हैं।

भारतीय मीडिया का दृष्टिकोण

भारत में मीडिया राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा संघर्षों को प्रमुखता से प्रस्तुत करता है। सैनिकों की वीरता और बलिदान की कहानियाँ समाज में देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना को मज़बूत करती हैं।

हालाँकि कई बार भारतीय मीडिया पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि वह युद्ध संबंधी ख़बरों को अत्यधिक आक्रामक और सनसनीखेज़ तरीक़े से प्रस्तुत करता है। टेलीविज़न चैनलों की बहसों में युद्ध को एक प्रकार के प्रतियोगी कार्यक्रम की तरह दिखाया जाता है। इसके विपरीत सोशल मीडिया के माध्यम से कई स्वतंत्र पत्रकार और विश्लेषक वैकल्पिक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे जनचर्चा का दायरा व्यापक हुआ है।

4. सार: ज़िम्मेदार मीडिया की आवश्यकता

समग्र रूप से देखा जाये तो युद्ध के समय मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील होती है। मीडिया समाज को युद्ध की वास्तविकता से अवगत कराने और मानवीय पीड़ा को उजागर करने का महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है।

लेकिन यदि मीडिया सनसनीखेज़ प्रस्तुति और मनोरंजनात्मक शैली को प्राथमिकता दे तो इससे समाज में भय, तनाव और संवेदनहीनता बढ़ सकती है। इसलिए आवश्यक है मीडिया अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी को समझे और युद्ध जैसी गंभीर घटनाओं को संतुलित, तथ्यपरक और मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करे। युद्ध की ख़बरों में केवल हथियारों और सैन्य रणनीतियों को नहीं बल्कि पीड़ितों की स्थिति, विस्थापन और शांति के प्रयासों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

अंततः कहा जा सकता है मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का दर्पण भी है। यदि मीडिया अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी का पालन करे तो वह युद्ध की विभीषिका के बीच भी मानवता, सहानुभूति और शांति के मूल्यों को सुदृढ़ कर सकता है।

––संदर्भ––
1.Dennis McQuail – Mass Communication Theory
2.Noam Chomsky – Manufacturing Consent
3.Pippa Norris – Media and Global Politics
4.Rajdeep Sardesai – Newsman
5.विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समाचार रिपोर्ट

आकिब जावेद, aaqib javed

डॉ. आकिब जावेद

बांदा, उत्तर प्रदेश में शिक्षक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार हेतु सतत प्रयासरत आकिब शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जुड़े रहे हैं। शिक्षा के साथ ही साहित्य में आपकी उपस्थिति निरंतर है। ग़ज़ल, कविता, कथा तथा बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन एवं संग्रह। देश-विदेश की प्रतिष्ठित साहित्यिक वेबसाइटों एवं मंचों के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन। साहित्यिक संस्था 'आवाज़-ए-सुख़न-ए-अदब' के संस्थापक और ब्लॉगर। शिक्षा एवं साहित्य दोनों क्षेत्रों में अनेक सम्मान भी प्राप्त। अपने साहित्य को समाज के प्रति सजग दृष्टिकोण, मानवीय संवेदनाओं और जनसरोकारों की प्रतिबद्धता प्रमुख मानते हैं। संपर्क: 9506824464।

1 comment on “युद्ध और मीडिया की भूमिका

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