आँखों देखी, aankho dekhi, sanjay mishra, hindi film
21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-9) मानस की कलम से ....

दुर्लभ भारतीय फिल्म क्यों है 'आँखों देखी'?

             कबीरदास के दोहे की यह लाइन फ़िल्म “आँखों देखी” का सूत्र है। “आँखों देखी” कोई ऐसी फ़िल्म नहीं है, जिसे सिर्फ़ “अच्छी” या “बुरी” कहकर निपटा दिया जाये। यह उस ब्रैकेट में जाती ही नहीं, जहाँ फ़िल्मों को स्टार रेटिंग्स और रिव्यूज़ में क़ैद कर दिया जाता है। इस फ़िल्म को समझना भी शायद ग़लत शब्द है। इसे सिर्फ़ अनुभव किया जा सकता है। अपनी आँखों से। अपने भीतर से। “आँखों देखी” दरअसल अनुभव, सत्य और आम जीवन के बीच खड़ी एक फ़िल्म।

फ़िल्म अनुभववाद के दर्शन को मूल में रखकर आगे बढ़ती है लेकिन वो दार्शनिक दृष्टिकोण नहीं अपनाती। उसकी एक वजह यह भी है कि दार्शनिक नज़रिये से अनुभववाद बहुत पहले से नकारा जा चुका है। अनुभववाद के अनुसार इंद्रियों का ज्ञान सत्य को जानने का माध्यम है। भारतीय तथा वेस्टर्न दार्शनिक अनुभववाद को बहुत पहले ही सिरे से ख़ारिज कर चुके हैं।इसीलिए इस बहस में उलझने का कोई अर्थ निकलकर नहीं आता। यह बहस वैसे ही होती जैसे “दो समानांतर रेखाएँ कभी नहीं मिलतीं, या इन्फ़िनिटी पर जाकर मिलती हैं?”
इसीलिए निर्देशक ने अनुभववाद के मूल सिद्धांत को लेकर एक सामाजिक ताने-बाने में उसे बुन दिया।

फ़िल्म कोई स्टेटमेंट नहीं देती। बस एक सवाल उठाती है कि “क्या हो अगर हम अपना सभी ज्ञान अपने अनुभव में ही सीमित कर लें?” और इससे कई सवाल और निकलकर आएंगे, जैसे – जीवन जीने के लिए कितने ज्ञान की आवश्यकता है? यह दुनिया चाहे जितनी भी बड़ी हो, आपकी दुनिया कितनी बड़ी है? एक कुआँ? या कुछ और? हमें अगर जीवन के तमाम अनुभव नहीं हो, तो क्या हमारा जीवन व्यर्थ है? फ़िल्म “फ़ॉरेस्ट गम्प” में फ़ॉरेस्ट मुश्किल से सिर्फ़ 8-9 चीजों के बारे में जानता था लेकिन उसका जीवन किसी भी आम जीवन से कहीं विशाल था।

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इसके अलावा एक और बात पर विचार ज़रूरी है कि “आँखों देखी” सिर्फ़ आँखों द्वारा देखे गये अनुभव के बारे में बात करती है या किरदार की अंदरूनी यात्रा के बारे में?

केंद्रीय पात्र का प्रभाव

फ़िल्म की शुरूआत जैसे एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार की कहानी लगती है। पुरानी दिल्ली की गलियाँ, छोटे-छोटे कमरे, घरेलू झगड़े, रिश्तेदारों की आवाजाही, नौकरी और रोज़मर्रा की थकान।

फ़िल्म का नायक बाऊजी — जिसे संजय मिश्रा ने बड़ी सहजता से जिया है — अचानक एक घटना के बाद निर्णय लेता है कि अब वह सिर्फ़ उसी बात पर विश्वास करेगा, जिसे वह अपनी आँखों से देखेगा। घटना है उसकी बेटी का आशिक़। सभी लोग जो वहाँ मौजूद हैं, उनके हिसाब से वो आशिक़ मनचला और दिलफेंक है। लेकिन जब बाऊजी उससे ख़ुद मिलते हैं तो वो उसका उलट निकलता है। और फिर यह कहानी एक ऐसे प्रश्न में बदल जाती है, जो उनके जीवन की बुनियाद को हिला देता है- हम जिन बातों पर यक़ीन करते हैं, उनमें से कितनी हमने ख़ुद देखी हैं?

यहीं से फ़िल्म अपने सबसे ख़ूबसूरत और सबसे असहज क्षेत्र में प्रवेश करती है।

बाऊजी का यह सफ़र सिर्फ़ उनका व्यक्तिगत विद्रोह नहीं रह जाता। वह उन तमाम लोगों का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं, जो जीवन भर दूसरों की बनायी हुई धारणाओं में जीते रहते हैं। समाज में कितने ही लोग, कितनी ही चीज़ें ऐसी हैं जिनके बारे में हमने बिना मिले, बिना देखे, बिना समझे राय बना रखी है।

हमारे सामाजिक रिश्तों की जड़ें अक्सर दर्शन या सत्य में नहीं, बल्कि सुविधा और आदत में होती हैं।

फ़िल्म का विचार-संसार

रजत कपूर ने अपने सिनेमा की एक अलग भाषा बनायी है। वह बड़े-बड़े उत्तर नहीं देते। वह छोटे-छोटे सवाल पूछते हैं। इतने साधारण सवाल कि वही सबसे ख़तरनाक लगने लगते हैं। उनका सिनेमा दर्शकों को चकित करता है क्योंकि वह जीवन की सबसे सामान्य चीज़ों के भीतर छिपी असामान्यता को सामने लाता है। “आँखों देखी” दरअसल सवाल उठाने की फ़िल्म है। यह जवाब देने की कोशिश नहीं करती।

फ़िल्म का शीर्षक ही कबीर की उस अमर पंक्ति से आता है—

“तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखन देखी
मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यौ उरझाई रे”

कबीर उस ज्ञान के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं जो सिर्फ़ पुस्तकों, परंपराओं और वाद-विवाद से पैदा हुआ है। वे अनुभव की बात करते हैं। प्रत्यक्ष की बात करते हैं। वह सत्य जो भीतर से जाना गया हो।

यही बात बाद में ओशो ने भी अपने प्रवचनों में दोहराई— “मैं कहता आँखन देखी” सिर्फ़ एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरी जीवन-दृष्टि है। उधार के ज्ञान के बजाय स्वानुभव की ओर लौटना।

बाऊजी भी शायद यही कर रहे हैं। वह दुनिया को पहली बार अपनी आँखों से देखना चाहते हैं।

फ़िल्म का विचार प्लेटो की “Allegory of the Cave” की याद दिलाता है। प्लेटो की गुफ़ा में क़ैदी दीवार पर पड़ती परछाइयों को ही सत्य मान लेते हैं। लेकिन जब उनमें से एक बाहर जाकर वास्तविक दुनिया देखता है और लौटकर दूसरों को सच बताता है, तो उसका मज़ाक़ उड़ाया जाता है। बाऊजी भी उसी क़ैद से मुक्त हुए हैं।

जब वह अपने अनुभवों के आधार पर जीवन जीना शुरू करते हैं, समाज उन्हें सनकी समझने लगता है। क्योंकि समाज को सत्य से ज़्यादा सुविधा प्रिय है। हम भ्रम के साथ ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन फ़िल्म का मूल बिंदु यह नहीं कि हमें बाऊजी की हर बात मान लेनी चाहिए। बल्कि यह कि हर व्यक्ति को अपना सत्य ख़ुद खोजना होगा।

फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह है, जब मोहल्ले वाले बाऊजी की हर बात को आँख बंद करके मानने लगते हैं। तब बाऊजी उन्हें घर से निकाल देते हैं। वह कहते हैं—
“मैं ख़ुद अपने सत्य की तलाश में हूँ। तुम मेरे रास्ते पर क्यों चल रहे हो?”

फ़िल्म कैसे बनती है अनुभव?

फ़िल्म में जुए का मोटिफ़ बार-बार आता है। जैसे जीवन को बाऊजी ने नये तौर से लिया है, उसी प्रकार जुए को भी वो संभावनाओं का खेल कहते हैं। और जीवन भी कुछ वैसा ही है। हम हर दिन बिना पूरी जानकारी के निर्णय लेते हैं। प्रेम करते हैं, नौकरी चुनते हैं, रिश्ते निभाते हैं, सपने देखते हैं। कोई भी सत्य पूर्ण नहीं होता। हर निर्णय एक दांव है।बाऊजी इस दांव को पहली बार सचेत होकर खेलते हैं।

फ़िल्म के बारे में बात करें तो फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती उसकी सादगी है। रफ़ी महमूद की सिनेमैटोग्राफ़ी पुरानी दिल्ली की गलियों को किसी स्मृति की तरह क़ैद करती है। कैमरा कभी प्रदर्शन नहीं करता, जीवन को बहते हुए देखता है। पुरानी दीवारें, संकरी गलियाँ, भीड़, छतें, कमरे — सब कुछ इतना स्वाभाविक लगता है कि हम अपने आपको जैसे बाऊजी की मंडली में बैठा महसूस करते हैं। ऐसे कई फ्रेम हैं, जिनमें एक साथ 9 से 10 किरदार हैं। और जगह भी सीमित है। ऐसे में कैमरा का काम काफ़ी मुश्किल होता है लेकिन रफ़ी महमूद ने इस कमी को ही ख़ूबी में तब्दील कर दिया।

कॉस्ट्यूम, बैकग्राउंड, फ्रेमिंग — सब कुछ इतना अनआर्केस्ट्रेटेड है कि दर्शक भूल जाता है कि वह “एक फ़िल्म” देख रहा है।

फ़िल्म के लेखन की बात करें तो सबसे अद्भुत बातों में से एक है, वह लड़का जो लगातार बड़बड़ाता रहता है। उसे ठीक उसी समय लाया जाता है जब बाऊजी बोलना बंद करने का निर्णय लेते हैं। और जैसे ही बाऊजी उसकी बात सुनने लगते हैं, उसकी बड़बड़ाहट रुक जाती है। मानो वह सिर्फ़ इसलिए बोल रहा था कि कोई उसे सच में सुने। यह दृश्य प्रतीकात्मक स्तर पर बहुत गहरा है। बाऊजी ने बाहर बोलना बंद किया ताकि भीतर की आवाज़ सुन सकें। और वह लड़का शायद उसी भीतर के शोर का प्रतिनिधित्व है, जिसे हम जीवन भर अनसुना करते रहते हैं।

रजत कपूर से जब इस बारे में प्रश्न किया गया तो उन्होंने कहा, “जब बाऊजी बोलना बंद करते हैं तो एक किरदार हमें चाहिए था, जो कंट्रास्ट पैदा करे। इसके अलावा बाऊजी के स्पर्श से वो ठीक होता है, जो बाऊजी के किरदार में एक आयाम जोड़ने का काम करता है।”

“भगवान को मारना मतलब उम्मीद को मारना”

फ़िल्म के भीतर एक और गहरी परत है— भय और आशा की। यदि भगवान एक सांत्वना है, तो उसे ख़त्म करना भय को भी समाप्त कर देता है। क्योंकि आशा और डर अक्सर एक-दूसरे के सहारे जीवित रहते हैं।

बाऊजी धीरे-धीरे उन सभी संरचनाओं को तोड़ते हैं जिन पर सामान्य जीवन टिका हुआ है—धर्म, सामाजिक प्रतिष्ठा, मान्यताएँ, भाषा, यहाँ तक कि बोलना भी। वो मंदिर के प्रसाद को अपने अनुभव से सिर्फ़ मीठा पाते है। वो विद्रोह नहीं करते कि प्रसाद सिर्फ़ मिठाई है। वो सिर्फ़ अपना अनुभव अपने जीवन को जीने के लिए प्रयोग में लेते हैं।

फ़िल्म में एक क्षण आता है, जब बाऊजी अपनी सहकर्मी से कहते हैं— “तुम बहुत सुंदर हो।” यह सिर्फ़ एक प्रशंसा नहीं है। यह उनके भीतर के परिवर्तन का संकेत है। जब व्यक्ति बेकार की नैतिकताओं से मुक्त होने लगता है, तब वह दुनिया को नये सिरे से देखने लगता है। उसमें निष्कपटता लौटने लगती है। कोई ईगो नहीं होता।

“आँखों देखी” भारतीय सिनेमा की उन दुर्लभ फ़िल्मों में है, जो आपको बदल देती है। धीरे-धीरे। बिना शोर किये। यह फ़िल्म किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। न यह बताती है कि बाऊजी सही हैं, न यह कि वे ग़लत हैं। शायद जीवन भी ऐसा ही है। स्पष्ट उत्तरों से ज़्यादा ईमानदार प्रश्नों का नाम। और शायद इसलिए फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी हमारे भीतर चलती रहती है। बाऊजी एक निरंतर चलते रहते रोज़मर्रा के सर्कल से बाहर आते हैं। एक दर्शक के तौर पर हमारा अनुभव क्या कहता है? हम भी बाऊजी के साथ बाहर आएं या सर्कल में ही चलते रहें। सबका अपना अनुभव। सबका अपना निर्णय!

अंततः “आँखों देखी” सिर्फ़ यही कहती है— “सब कुछ यहीं है।
अपनी आँखों से देखो।”

और यह ट्रिविया भी…

फ़िल्म प्रोडूसर ने मिथ्या टॉकीज़ के यूट्यूब चैनल पर तमाम डिलीटेड सीन्स अपलोड किये हैं।फ़िल्म निर्माण में इच्छुक उसे देख सकते हैं और उससे कयास लगा सकते हैं कि एडिटिंग के दौरान कौन-से सीन क्यों निकाले गये होंगे।

मानस, विवेक त्रिपाठी, vivek tripathi, maanas

मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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