हम बोलेंगे सफ़र बड़ा है सोच से.. भवेश दिलशाद याद आते हैं पिता, जिनकी संगठनात्मक क्षमता, जिजी-विषा, निडरता बेमिसाल थी। मेरे हिस्से में उनके बाक़ी गुण भले बहुत सीमाओं...
गीत अब ज्ञानप्रकाश पांडेय शब्द ये गंभीरता खोने लगे हैं भाव गूँगे सिर झुकाते मात खाये-से शब्द के कंकाल में हैं मुँह छुपाये-से शोर शब्दों में प्रबल होने लगे...
याद बाक़ी शाहनाज़ इमरानी, एक यादगार कहानी प्रतिभा गोटीवाले शाहनाज़ दी से मेरी मुलाक़ात सन्ध्या दीदी के मार्फ़त हुई… इन दोनों के पास भोपाल की तहज़ीब के इतने मज़ेदार...