
- November 25, 2025
- आब-ओ-हवा
- 6
पुस्तक चर्चा राजा अवस्थी की कलम से....
रस सिद्धांतों की परंपराओं का गहन विश्लेषण
यह उस प्रतिभाशाली आलोचक, साहित्यकार प्रोफेसर बी.एल. खरे की स्मृति का माह है, जिसे उनके समय के और बाद के भी आलोचकों, साहित्यिकारों ने याद नहीं रखा। यद्यपि दृष्टिसम्पन्न आलोचक बी.एल. खरे अपने समय में भी बुन्देली-हिन्दी कविता के श्रोताओं- पाठकों के बीच काफ़ी चर्चित और समादृत रहे हैं।
प्रोफ़ेसर बी.एल. खरे का जन्म 11 नवम्बर 1917 को सागर के निकट एक गाँव चरगंवा में हुआ था। सागर में आकर शिक्षकीय कार्य करते हुए देर शाम को ट्यूशन से लौटकर भी अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए सागर तीन बत्ती स्थित एक चाय की होटल में बैठकर पढ़ाई करते, क्योंकि यहाँ होटल में रोशनी के लिए बल्ब जला करता था। वह अनपढ़ होटल मालिक देर रात तब तक होटल खोले रखता था, जब तक ये पढ़ाई करते। प्रो. खरे स्वाध्यायी छात्र के रूप में भी सदैव मेरिट में शीर्ष पर आते रहे।
महत्वपूर्ण शोधग्रन्थ “रस सिद्धांत परम्परा” में प्रो. खरे अपने पिता के संघर्ष और उपलब्धियों को याद करते हुए आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी को भी विशेष रूप से याद करते हैं, जिनके असहयोग और मनभेद के कारण यह ग्रन्थ लम्बे समय तक और अपने समय पर सामने नहीं आ पाया। यद्यपि इस शोध में वे इनके शोध निदेशक तो नहीं थे, किन्तु विषय चयन से ही उनका दख़ल तरह-तरह की अड़चनें पैदा करने वाला रहा। यद्यपि डाॅ. शिवमंगल सिंह सुमन (तत्कालीन कुलपति-विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन) के सहयोग और मार्गदर्शन में यह शोधकार्य सम्पन्न हुआ था। उनके साथ ही डाॅ. राममूर्ति त्रिपाठी, डाॅ. रामरतन भटनागर का विशेष सहयोग रहा।
दुर्योग यह रहा कि बीमारी के कारण 20 जनवरी 1977 को प्रो. खरे का निधन हो गया और उनकी अनमोल कृति ‘रस-सिद्धांत परम्परा’ अप्रकाशित ही रह गयी। उनकी अनुपस्थिति में, किन्तु उनकी इच्छानुसार उनकी पुत्री शशि खरे ने यह कार्य हाथ में लिया और बिखरे हुए, जर्जर हो चुके पृष्ठों को टाइप कराने में इधर-उधर हो जाने के ख़तरे को भाँपते हुए दो वर्षों तक अकथ और अथक परिश्रम करके इसकी प्रकाशन योग्य पाण्डुलिपि तैयार की। अंततः 2019 में शिल्पायन प्रकाशन से यह महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। प्रो. खरे के संघर्ष की बहुत संक्षिप्त किन्तु प्रभावित करने वाली छवि पुस्तक में उनके पुत्र हरिशरण खरे, पुत्री शशि खरे के कथनों के साथ अनिल खरे (अतिरिक्त मुख्य अभियंता, छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल, रायपुर) के कथन से उभरती है।
काव्यालोचक ज़रूर पढ़ें यह पुस्तक
प्रो. खरे ने बुन्देली का पहला हास्य प्रधान खण्डकाव्य ‘मंगा’ का प्रणयन भी किया, जो ख़ासा चर्चित रहा। मंगा के अंश उनके समय मे बहुत सुने जाते थे। ‘रस-सिद्धांत परम्परा’ बी.एल. खरे की महत्वपूर्ण कृति है। इसे पढ़ते हुए रस-सिद्धांत के बारे में आचार्य भरत और उनके पूर्व से लेकर शुक्लोत्तर युग तक, यानी आधुनिक काल तक की परम्परा का व्यापक, सूक्ष्म विश्लेषणात्मक निदर्शन देखने को मिलता है। इस ग्रन्थ मे प्रो. खरे कुछ अपनी मान्यताओं की भी स्थापना करते हैं।

लगभग 250 संदर्भ ग्रन्थों के साथ लिखे गये इस ग्रन्थ के 14 अध्यायों को पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड में वर्गीकृत किया गया है। पूर्व खण्ड के अध्याय – रस शब्द, अर्थ, रस-सिद्धांत की महत्ता, अध्याय 2- रस के सैद्धांतिक विकास का विहंगावलोकन, स्रोत, अध्याय 3- संस्कृत काल में रस विवेचन, अध्याय 4- विभिन्न सम्प्रदाय और रस, अध्याय 5- मध्ययुगीन भक्तिवाद और रस परम्परा, अध्याय 6- हिन्दी में रस विवेचन-रीतिकाल, भारतेन्दु काल, अध्याय 7- महर्षि अरविन्द और भावी कविता, अध्याय 8- आचार्य रामचंद्र शुक्ल शीर्षक से सम्मिलित हैं। उत्तर खंड के अंतर्गत अध्याय 9- शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा का विकास, अध्याय 10- स्वच्छंदतावादी कला चिन्तन और रस, अध्याय 11- प्रगतिवादी आलोचना, अध्याय 12- प्रयोगवाद और नयी कविता, अध्याय 13- रस-सिद्धांत और पाश्चात्यवाद, अध्याय 14- रस की सीमा, व्याप्ति और संभावनाएँ। जैसा कि ऊपर कह चुके हैं इस ग्रन्थ में भरत से लेकर आधुनिक काल के आचार्यों, आलोचकों की रस सम्बन्धी मान्यताओं पर एक गहरी पड़ताल की गयी है।
384 पृष्ठों के इस उल्लेखनीय ग्रन्थ का अध्ययन काव्य और उसकी परम्परा का अनुशीलन करने वाले कवियों, अध्येताओं, प्राध्यापकों को अवश्य करना चाहिए। मुझे लगता है इस विषय पर उनके बाद किसी ने काम नहीं किया। उनके पहले भी डाॅ. नगेन्द्र के बाद कम ही लोगों ने काम किया है। यदि यह ग्रन्थ अपने समय पर सामने आया होता, तो इसका प्रभाव समूची हिन्दी काव्यालोचना पर दिखायी पड़ता। किन्तु ज्ञान और साहित्य तथा शोध आदि कभी व्यर्थ और निष्प्रभावी नहीं होते। यह भी नहीं होगा। इसका अध्ययन करने की इच्छा रखने वाले इसे शिल्पायन बुक्स, नवीन शाहदरा दिल्ली से मँगा सकते हैं।
अंत में, प्रो. खरे की पुत्री शशि खरे के लिए साधुवाद शब्द बहुत छोटा होगा। उन्होंने इस पुस्तक को प्रकाशित करवाने में अपना अमूल्य श्रम और समय देकर न सिर्फ़ अपने यशःकाय पिता के प्रति कृतज्ञता दिखायी है, बल्कि सम्पूर्ण हिन्दी कविता और काव्यालोचना जगत को अपना कृतज्ञ बना लिया है। इस काम में उनके अग्रज, प्रो. खरे जी के सुपुत्र हरिशरण खरे का समर्पण भी कम उल्लेखनीय नहीं है। सादर साधुवाद दोनों को।

राजा अवस्थी
सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।
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मेरे नानाजी. उनके व्यक्तित्व की ऊर्जा, आजतक हम सब को प्रकाशित करती है
पुस्तक का पूर्ण परिचय है इस लेख में विस्तृत विवरण के साथ –यह भी बहुत परिश्रम से किया गया काम है और धैर्य से भी ।
आपकी गंभीर पठनीयता बहुत सराहनीय है और प्रेरक भी।
मुझे तो बहुत अच्छा लगा हार्दिक आभार आप दोनों ( संपादक) का।
बहुत बहुत धन्यवाद।
“रस सिद्धांत परंपरा” लेखक के बहुत संघर्षों के बाद उनके जीवन काल में पूर्ण हुई, किंतु प्रकाशित न हो सकी, पुस्तक की प्रशंसा करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है और बहुत कठिन कार्य है,और शब्दों में लिखना असंभव है, प्रोफेसर बी एल खरे साहब की पुत्री साधुवाद की पात्र हैं जिन्होंने इस पुस्तक को सबके सामने लाने में बहुत-बहुत कठिन और असंभव कार्य करके बता दिया.
ऐसा अब लगता है,मेहनत और लगन से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं जाता।रस सिद्धांत परंपरा में लेखक की 15,सालों की मेहनत अब उनके जीवित न रहने के बाद भी पुस्तक रूप में
ऐसा अब लगता है,मेहनत और लगन से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं जाता।रस सिद्धांत परंपरा में लेखक की 15,सालों की मेहनत अब उनके जीवित न रहने के बाद भी पुस्तक रूप में, आकार ले सकी।ये उनके परिवार की सच्ची श्रद्धांजलि
लेखन के साथ साथ प्रो खरे साहब अपनी आगे की पीढी के लिए भी प्रेरणास्रोत रहे, इसी के चलते उनके बेटे और बेटी श्रीमती शशि खरे जी उनकी लिखी हुई इस रचना को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर पाये
खरे भाई बहन और विशेष कर प्रो खरे साहब की पुत्री श्रीमती शशि खरे जी इसके लिये बधाई की पात्र हैं
साभार