हिना रिज़वी हैदर, hina rizvi

इंद्रधनुष-5 : हिना रिज़वी हैदर

 

हिना रिज़वी हैदर हैं तो लखनऊ की मगर शौहर जज हैं सो बिहार में मुक़ीम हैं। बचपन से ही शायरी शौक़ भी रही और खानदान का विरसा भी। आप बताती हैं नाना और मामू दोनों साहिब-ए-दीवान शायर थे, हालाँकि पैदाइश से पहले नाना और आपके शायराना सफ़र के आग़ाज से पहले मामू का इंतक़ाल हो जाना वजह रही कि वह उनसे हुनर सीख न सकीं। अलबत्ता घर में अदबी माहौल रहा। आपकी मां उर्दू अदब में पी-एच.डी. हैं, जबकि वालिद एक अरसे तक उर्दू अकादमी, लखनऊ से वाबस्ता रहे। कई सम्मानों से नवाज़ी जा चुकीं हिना रिज़वी टीवी, रेडियो और मुशायरों के अदबी मंचों से अवाम तक पहुंची हैं। “बिंत-ए-हव्वा”, “इब्न-ए-आदम” और “लखनऊ” जैसी नज़्मों से पहचान रखती हैं। आब-ओ-हवा के लिए उनकी शायरी की यह प्रस्तुति: ग़ज़ाला तबस्सुम।

हिना रिज़वी हैदर, hina rizvi

हिना रिज़वी की ग़ज़लें और नज़्में

ग़ज़ल

बेवफ़ाई से भी उसकी ये नशा उतरा नहीं
दिल ने मेरे इश्क़ को सोचा बहुत समझा नहीं

ये समझना भी कहां आसान था मेरा कि अब
उसके ख़्वाबों तक मेरे ख़्वाबों का भी रस्ता नहीं

अगले दिन सूरज सवा नेज़े पे गोया आ गया
सुब्ह का भूला हुआ घर रात भर लौटा नहीं

कुछ मुझे अपनी अना का भी तो रखना था भरम
वक़्त-ए-रुख़सत रोकना चाहा उसे रोका नहीं

ज़ीस्त के सब फैसले मेरे थे, अच्छे या बुरे
मैं ही ख़ुद अपनी हूं ज़िम्मेदार, ये दुनिया नहीं

ग़म की हिद्दत ने हिना सब कुछ उड़ाया भाप में
अब मेरी आंखों में इक सहरा है बस दरिया नहीं

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ग़ज़ल

ख़त्म कीजे ये दिखावा मेह्रबानी छोड़िए
झूठ पर सच्चाई की ये तर्जुमानी छोड़िए

अब मुहब्बत क्या, उन आंखों में मुरव्वत भी नहीं
आप भी बेजा ये सारी ख़ुशगुमानी छोड़िए

सुनने वाले अपने-अपने ग़म सुनाकर सो गये
कौन सुनता है किसी की अब कहानी, छोड़िए

खोदिए अपने कुएं ख़ुद, अपनी-अपनी प्यास में
अब मदद आनी नहीं है आसमानी, छोड़िए

देख लीजे कोई बस्ती तो नहीं है राह में
थामकर दरिया में पानी की रवानी छोड़िए

ज़िन्दगी है चार दिन की चार दिन जी लीजिए
सोचना इस ज़िन्दगी को जावेदानी छोड़िए

वो रवादारी तमद्दुन हुस्ने-इख़लाक़-ओ-ख़ुलूस
अब कहां बातें ‘हिना’ वो खानदानी, छोड़िए

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नज़्म : सती

वो जाने वाला तो जा चुका है
चिता की अग्नि में इक बदन
जिसकी अपनी शिनाख़्त थी, राख हो चुका है
लहद की मिट्टी के नीचे, मिट्टी में मिल गया है

न जाने अब उसकी रूह
किस आसमान पर हो
वहां से अब क्या ख़बर, इधर देखता भी है वो

कि इस तरफ़ जो बचे हुए हैं
वो अपनी सांसों को कैसी मुश्किल से ढो रहे हैं
जो उसकी फुरक़त में रो रहे हैं

मगर हैं मजबूर
धीरे-धीरे बग़ैर उसके,
वो सारे, जीना भी सीख लेंगे
कुछ और ख़ुशियों में ख़ुश रहेंगे

बस एक बेवा, उसी चिता की सुलगती लपटों में उम्र भर अब जला करेगी
उसी लहद पर, मनो पड़ी मिट्टियों के नीचे दबी रहेगी

वो सारी ख़ुशियां जो बाक़ी सारे मनाएंगे
दूर होंगी उससे
वो रंग सारे जो पहले शामिल थे ज़िंदगी में
वो उससे अब छीन लेगी दुनिया
कि उसको बस कुछ सफ़ेद, नीले, हरे ही रंगों में अब है जीना
सिंगार सारे, जो एक औरत का हैं तआर्रुफ़
कि जिनसे सजकर
वो मुस्कुराती थी देखकर आईने में ख़ुद को
मना हैं उस पर

समाज उसको बता रहा है कि उसको अब मुस्कुरा के जीने का हक़ नहीं है
जो ज़ख्म दिल पर लगे हुए हैं
अब उनको सीने का हक़ नहीं है
वो एक सती है, सती रहेगी
जो उम्र भर अब चिता पे अपनी जला करेगी

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ग़ज़ल

आंखों ने ये कैसा दरिया खींच लिया
जिसने मेरे दिल तक रस्ता खींच लिया

फूंक आये हैं गुलशन में शादाबी हम
अपने अंदर हमने सहरा खींच लिया

सारी वहशत, ज़हमत, आफ़त ख़त्म हुई
ख़ामोशी से रूह ने कांटा खींच लिया

डूब मरेंगे हम उसको कब था मालूम
उसने बस हाथों से तिनका खींच लिया

ग़म का सूरज ख़्वाब जलाने निकला था
अश्कों ने पलकों का परदा खींच लिया

अब तो उसका हिज्र भी दिलकश लगता है
इश्क़ ने हमको कितना गहरा खींच लिया

झूठे ख़्वाब दिखाकर ख़ूब तहफ़्फ़ुज़ के
हर पिंजरे ने एक परिंदा खींच लिया

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ग़ज़ल

इक दर्द है दुनियादारी भी
लम्हा-लम्हा दुश्वारी भी

जीना जिसको सब कहते हैं
नेमत भी है, लाचारी भी

ये इश्क़ का जज़्बा क्या कहिए
सरशारी भी, बीमारी भी

दिल दे भी जवाब-ए-उल्फ़त क्या
है राज़ी भी, इनकारी भी

हम भी कब अपनी सुनते हैं
सुनता है कौन हमारी भी

इक रोज़ ज़माना जीतेंगे
आएगी हमारी बारी भी

ग़ज़लों की ‘हिना’ इस दुनिया में
जज़्बात भी हैं, फ़नकारी भी

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नज़्म: मुहब्बत

सुनो! इक काम करते हैं
मुहब्बत आम करते हैं
ये दुनिया नफ़रतों से भर रही है
सदाक़त लम्हा-लम्हा मर रही है

इसे एहसास की नम और हयात-अफ़ज़ा हवाओं से जिलाना है
रगों में दोस्ती, अपनाइयत का ख़ून भरना है
हमें नफ़रत की बढ़ती, तेज़ होती, ऊंची लपटों से
हमारी आपसी बेलौस क़ुर्बत को बचाना है
नहीं तो ये तपिश, इक रोज़ सब कुछ राख कर देगी
दिलों में आग भर देगी

ये नफ़रत
झूठ है, धोखा है, बस मौक़ापरस्ती है
ये दोज़ख़ है, बला है, सिर्फ़ शैतानों में बसती है

मुहब्बत मीठे पानी की नदी है
ये इंसानों की ख़ातिर ही बनी है
यही सच है, वफ़ा है, बस यही उन्वान-ए-हस्ती है
ये जन्नत है, दुआ है, और इंसानों में बसती है
‘हिना’ बस हमको इस इंसानियत को ही बचाना है
हमें इन नफ़रतों के बढ़ते शोलों को मुहब्बत से बुझाना है

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ग़ज़ल

नहीं ‘हिना’ तेरे अंदर कोई हुनर ही नहीं
दिलों में झांकने वाली तेरी नज़र ही नहीं

दुआ को हाथ उठाते हुए भी था मालूम
गुनाहगार हूं अल्फ़ाज़ में असर ही नहीं

वो चाहता है कि हम फ़िक्र से करें परवाज़
सो रब ने हमको सब आज़ा दिये हैं पर ही नहीं

जला के ख़ुद को जो रातों में नूर भरता रहा
उसी चराग़ की क़िस्मत में इक सहर ही नहीं

सुना है आख़िरी लम्हों में ज़िंदगी सबको
बहुत हसीन भी लगती है, मुख़्तसर ही नहीं

वो जिसकी फ़िक्र में हल्कान हम रहे बरसों
‘हिना’ उसी की हमें अब कोई ख़बर ही नहीं

2 comments on “इंद्रधनुष-5 : हिना रिज़वी हैदर

  1. What to say!
    What a collection!
    ,,
    Specially the nazm Sati and,,, the ghazal Aankhon ne yeh kaisa dariya khinch liya,,,,

  2. अब तो उसका हिज्र भी दिलकश लगता है- बहुत ख़ूब! हिना रिज़वी साहिबा। सुकून मिला आपकी ग़ज़लें, नज़्म पढ़कर। बहुत मुबारक आपको

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