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पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

सुबह और सांझ के माथे पर ग़मों की गठरी

            अलसुबह अरमानों को अपनी कांख में दबाकर कितने ही जिस्म सदियों से ज़िन्दगी की राह से यूं ही गुज़र रहे हैं। न जाने कितनी सड़कें नाप रहे हैं। न जाने कितना बोझ उठा रहे हैं। न जाने कितनी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। हालांकि जो इनकी चाह है वह पूरी नहीं हुई। जो इच्छा ले कर सुबह निकले वो शाम तक पूरी नहीं हुई लेकिन ये कभी अपने पथ से विचलित नहीं हुए। कभी अपने ईमान का सौदा नहीं किया। कभी अपने अरमानों को कम नहीं होने दिया। कभी अपने हौसले मद्धम नहीं पड़ने दिये। हर सुबह अपने शहर के किसी चौक या चौराहे पर ये जिस्म अपनी पिछली रात की तकलीफ़ों को भुलाकर फिर से ताज़गी के साथ खड़े मिलेंगे।

ऐसे तमाम लोगों के साथ भी शाइरी सफ़र करती है। अहमद नदीम क़ासमी कहते भी हैं-

सुब्ह होते ही निकल आते हैं बाज़ार में लोग
गठरियाँ सर पे उठाये हुए ईमानों की

इन लोगों में कौन शामिल नहीं है। अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करने की चाह में दिन-रात एक करते हुए सभी इन्सान इस गठरी को अपने सर पर उठाये घूम रहे हैं। हर दिन एक उम्मीद जागती है और रात तक पहुंचकर निराशा में तब्दील हो जाती है। मगर हौसला देखिए कि अगली सुबह यह निराशा न जाने कहां चली जाती है और फिर से एक उम्मीद साथ चहलक़दमी करने लगती है। मोहसिन भोपाली तभी तो कहते हैं-

सूरज चढ़ा तो फिर भी वही लोग ज़द में थे
शब भर जो इंतिज़ार-ए-सहर देखते रहे

न जाने कितनी ही रातों को देखे गये ख़्वाब एक झटके में ख़त्म हो जाते हैं। सुबह होती ज़रूर है मगर वह रात का ही शेडो होती है। कहने को सुबह ज़रूर होती है लेकिन हक़ीक़त में सुबह नहीं होती। नाकामयाबी के मंसूबे पूरे नहीं होते। इब्न-ए-इंशा यूं ही तो नहीं कहते हैं-

रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती

लेकिन इतना तो तय है कि सूरज आता इन जिस्मों के लिए ही है जो उसकी आस में घने अन्धकार से मुक़ाबला करते हैं। जिनको देख सूरज को ख़ुशी होती है। जिनके चेहरे की चमक और आत्मविश्वास से नज़रें मिलाने को सूरज भी बेताब रहता है। हुमैरा रहमान के मिसरे इसी बात की ताईद करते हैं-

रौशन-दान से धूप का टुकड़ा आकर मेरे पास गिरा
और फिर सूरज ने कोशिश की मुझसे आँख मिलाने की

तकलीफ़ इस बात की है कि इन आंखों की रोशनी को किसी की नज़र लग गयी है। कोई इनकी सुबह को ख़त्म करने की कोशिश कर रहा है। कोई इनसे इनकी सुबह छीनने की कोशिश कर रहा है। इनकी ज़िन्दगी से सुकून के पल छीने जा रहे हैं। ख़्वाहिशों के जंगल में इनके ख़्वाब दफ़्न किये जा रहे हैं। शंकर शैलेन्द्र कहते हैं-

मेरी सुबह छिन गई हैं
दिन जाने कब शुरू हो जाता है
रातें जाने कब ख़त्म हो जाती हैं,
एक साँझ अवश्य है, जो रोते हुए आती है,
सिसकते हुए जाती है

सुबह को शाम में तब्दील करते लोगों के मंसूबों को शाइरी बेनक़ाब करती है। वह हर समय उसकी आंखों में हौसला जगाती है। शाइरी सहर के उजियारे को शाम के अंधेरे में धकेलने वालों पर उंगली उठाती है। शकील बदायूंनी भी इसी तकलीफ़ देती सांझ तक पहुंचती सहर की चिन्ता करते हैं-

नयी सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे

ज़िन्दगी में एक सुबह बची रहेगी तो चेहरे की चमक बची रहेगी। ख़्वाब बचे रहेंगे। कोशिशें बची रहेंगी। इस सुबह के साथ हम भी बचे रहें। शाइरी के साथ हम भी ये दुआ करें।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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