
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
अथ श्री पद्म-पुरस्कारम् प्रपंच कथा
भारत रत्न तक के चयन पर उंगली उठती है, तब पद्म पुरस्कारों में नुक़्स निकालना बेरोज़गारों का काम कहा जा सकता है। बात साहित्य श्रेणी के पुरस्कारों की है, तो साहित्यकर्मी के नाते चुप रहना भी ठीक नहीं लगता। आप जानते हैं इस बार कुल 131 पद्म पुरस्कारों का ऐलान हुआ, इनमें से हिंदी साहित्य के हिस्से सिर्फ़ डेढ़-दो ही! वह भी पद्मश्री! तिस पर तफ़्तीश बाक़ी है कि यह भी मुनासिब कितना है।
मंगला कपूर को ‘साहित्य एवं शिक्षा’ श्रेणी में पद्मश्री से नवाज़ा गया है। वह हिम्मत और हौसले की एक जीती-जागती दास्तान रही हैं। उनकी आत्मकथा ‘सीरत’ नाम से कुछ वर्ष पहले प्रकाशित हुई, जो ज़िंदगी की जिजीविषा को स्थापित करने की सोच को बहस के केंद्र में लेकर आती है। मुमकिन है यह पुरस्कार शिक्षा के क्षेत्र में दिया गया हो क्योंकि ‘काशी की लता’ ख़िताब पा चुकी मंगला जी संगीत व अध्यापन कार्य से लंबे वक़्त से जुड़ी रही हैं।
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पद्मश्री की फ़ेहरिस्त में इसी श्रेणी में भोपाल निवासी कैलाशचंद्र पंत का नाम भी है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षरा’ और हिन्दी भवन के साथ उनका नाम तक़रीबन पर्याय की तरह जुड़ा रहा है। भोपाल में उन्हें ‘दादा’ या ‘पंत दादा’ कहने वाले साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग है। साहित्य जगत में देखने-सुनने में आता है कि एक राजनीतिक दलगत विचारधारा के साथ उनकी एक लय रही है; वह शासन प्रायोजित यात्राओं पर जा चुके हैं; कई साहित्यकारों को उपकृत करते रहे हैं… लेकिन उनके साहित्यिक अवदान को लेकर तमाम आलोचक एक-राय हों, यह देखने-सुनने में नहीं आता। ऐसी तमाम बातों के बीच कैलाशचंद्र जी को पद्मश्री मिलने से चर्चा के कई सिरे खुल जाते हैं।

उम्र और पद्म पुरस्कार
“यह पुरस्कार मेरे साढ़े पांच दशक लंबे करियर में बहुत देर से आया है”, यह कहते हुए प्रतिष्ठित गायिका एस. जानकी ने पद्मभूषण ठुकरा दिया था। उम्र को लेकर आत्मसम्मान का सवाल अभी कठघरे में आया था, जब 2025 में रामदरश मिश्र को उम्र के 101वें बरस में पद्मश्री से नवाज़ा गया। 2023 में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को नवाज़ा गया था। (वह बहस अलग है जब विश्वनाथ जी ने पद्मश्री अवसर पर ख़ुद को ‘तटस्थ’ घोषित किया था और तब (पिछले दिनों गुज़रे) आलोचक वीरेंद्र यादव ने बखिया उधेड़ दी थी।) यही विश्वनाथ जी, रामदरश जी के शिष्य बताये जाते हैं।
इस सिरे से यह कहने की गुंजाइश भी है, यदि रामदरश जी को इसलिए पद्मश्री से नवाज़ा गया कि वह शतायु हो गये तो भोपाल निवासी कवि यतींद्रनाथ राही 2026 में जीवन के सौवें वर्ष में हैं, मैथिली लेखक गोविंद झा ने भी क़रीब 102 वर्ष की आयु पायी, तो ऐसे हस्ताक्षरों पर नज़र क्यों नहीं? रामदरश जी की साहित्य साधना पर उंगली उठाना फ़िलहाल मेरा मक़सद नहीं, कहना है सिर्फ़ यह कि उनके साहित्य, उनके साहित्यिक अवदान को अन्य शतायु साहित्यकारों के बरअक्स किस तरह समझा जा सकता है? पद्म पुरस्कार समिति ने यदि उम्र को ही नमन किया तो राही जी, गोविंद जी जैसे महानुभावों को भी करे।
दांव पर हिंदी वालों की साख
अब दूसरी दलील, उस्ताद इमरत ख़ान के शब्द याद कीजिए, “हमारे बाद के फ़नकारों को पद्मभूषण दिया जाता रहा और हमें पद्मश्री”! इस जायज़ सवाल पर उस्ताद विलायत ख़ान के भाई ने पुरस्कार ठुकराया था। ऐसे क़िस्से और भी हैं। ग़ौरतलब यह है, रामदरश जी के पास न तो जानकी जी जैसी कोई दलील थी और न ख़ान साहब जैसी। उम्र के 90 वर्ष पूरे कर रहे कैलाशचंद्र जी के पास भी ख़ान साहब या फिर जानकी जी जैसी कोई दलील है, अब तक ऐसी ख़बर नहीं है। ख़बर उल्टे यह है कि कैलाशचंद्र जी को नवाज़े जाने के बाद भोपाल और मध्य प्रदेश के और भी ऐसे साहित्यकार लार टपकाती नज़रों से पद्म पुरस्कार को तक रहे हैं, जो उम्र के नौवें या दसवें दशक में हैं और जिनके संबंध संघ या सत्ता में घनिष्ठ बताये जाते हैं।
लेखक/पत्रकार अरविंद कुमार के लेख का यह वाक्य मुलाहिज़ा कीजै: “पिछले 10 सालों में पद्म पुरस्कारों की सूची में हिंदी के लेखकों को पद्मभूषण न देकर एक पद्मश्री झुनझुने की तरह थमा दिया जाता है…” वाक़ई यह झनझना देने वाली बात है। हिन्दी की दुनिया सशक्त हस्ताक्षरों से कितनी महरूम हो गयी है! फिर जब अरविंद लिखते हैं क्या संघ परिवार से तअल्लुक रखने वाला भी ऐसा कोई हिंदी लेखक नहीं है, जिसे पद्मभूषण योग्य समझा जा सके! तब औचक ख़याल आता है, ग़नीमत है भाई पद्मभूषण नहीं दिया जा रहा! अरविंद आगे कमलेश दत्त त्रिपाठी, राधावल्लभ त्रिपाठी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विनोद कुमार शुक्ल, प्रयाग शुक्ल, मृदुला गर्ग, ममता कालिया जैसे लेखकों के नाम लेते हुए पूछते हैं, इन्हें पद्म पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए? वाक़ई इस लिस्ट में हम और आप न जाने कितने और नाम जोड़ सकते हैं। बावजूद इनके, पद्म सूचियों में जो नाम आते हैं, यह मानना मुश्किल हो जाता है कि इन पुरस्कारों के पीछे कोई निष्पक्षता, निश्छलता है।
साहित्य और सत्ता: जुगलबंदी माने?
एक ज़ाविया यूं, बांग्ला थिएटर के पुरोधा कहे जाने वाले शिशिर कुमार भादुड़ी का पद्मभूषण अस्वीकार करने का तर्क था, “राज्य प्रायोजित पुरस्कार चाटुकारिता भर करने वालों का एक गुट बनाने में मदद करते हैं।” ऐसी ही एक वैचारिक मज़बूती कृष्णा सोबती ने भी पद्मभूषण ठुकराते हुए दी थी कि एक लेखक के रूप में उनका काम स्थापित व्यवस्था से दूरी बनाये रखना है। ये दलीलें या ऐसी मानसिकता अब विचार के दायरे में ही नहीं है! चाटुकारिता ने अपनी एक भाषा ईजाद कर ली है तो सत्ता ने उसे संरक्षण देने के नाम पर झुनझुना थमाने की कलाबाज़ी।
बादल सरकार भी याद आते हैं जिन्होंने कभी पद्मश्री तो कभी पद्मभूषण से हाथ जोड़ लिये थे। हिंदी इसीलिए नयी होती जा रही है क्योंकि शायद ऐसे तेवर अब पुराने पड़ते जा रहे हैं। शिशिर, कृष्णा, बादल… ऐसी मिसालें रचने वाले लेखक अब अजायबघर में कहीं हों। ‘चेहरे की किताब’ पर ‘सेल्फ़ियों’ के ज़माने में अब इतना आत्मसम्मान साहित्यकारों की उस दुनिया में बिरला हो चला है, जहां एक पूरी भीड़ सत्ता और तंत्र के सामने हाथ जोड़कर ‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ रटते मिलती है।

बोलने में फिर झिझक क्या, कि सत्तापीठों और सत्तानमाज़ियों के बीच की जुगलबंदी का खेल भर है, ये सब पुरस्कार-वुरस्कार, सम्मान-वम्मान। पद्म पुरस्कारों का साहित्यिक तमाशा देखने के बाद यह खेल और समझना हो तो 2026 के पद्म पुरस्कारों की लिस्ट एक बार फिर देखिए। कुल पांच में से तीन पद्मविभूषण केवल केरल के खाते में हैं, तिस पर दो पद्मभूषण भी। तमिलनाडु के हिस्से में भी दो पद्मभूषण। (याद आया इस बरस इन दोनों राज्यों में चुनाव है!) जैसे आचार संहिता की मीआद में चुनावी मंचों से खुल्लम-खुल्ला ऐलान किया जाता है ना, आपके खाते में पांच हज़ार आएंगे, दस हज़ार आएंगे और वोटिंग से ऐन पहले आ भी जाते हैं… कहने वाले उसे भी वोट चोरी नहीं, मास्टरस्ट्रोक ही कहा करते हैं!
ख़ैर साहब, बात को साहित्य के हवाले से ही मुल्तवी करते हैं। रांगेय राघव, मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई, मोहन राकेश, राही मासूम रज़ा, रघुवीर सहाय, हरिहरनिवास द्विवेदी, बाबा नागार्जुन जैसे कितने ही नाम हैं, जिन्हें किसी पद्म पुरस्कार से नहीं नवाज़ा गया। निराला का नाम इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहले है। और यह लिस्ट हमेशा सनद है, सच्चे साहित्यसेवियों का हौसला है कि साहित्य की प्रतिष्ठा किसी इनाम (ख़ासकर राज्य प्रायोजित) की मोहताज नहीं।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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सही सही और बेलाग बात।पद्म पुरस्कारों का छद्म बरस दर बरस प्रगाढ़ होता जा रहा है। इस प्रचलित परिपाटी पर उंगली उठाने के लिए साधुवाद।
बेबाक बयान
सही ही है कि “साहित्य और सत्ता: जुगलबंदी ही है”
समाज व्यवस्था राजनीति और सत्ता के उस लेन -देन वाले चेहरे को उजागर किया है जिसे संभवत शिष्टाचार के परदे में रखा जाता है।
खरी-खरी कहकर सीधे तौर पर बौद्धिक शुचिता और ढलकती नैतिकता, कर्तव्य -धर्म के संघर्ष को रेखांकित किया है।
इसी प्रकार लोकतंत्र के इस चौथे मुरझाए स्तंभ को पानी देते रहिए।
आपकी संपादकीय अच्छी , ज्ञानवर्धक लगी।
हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं जी
अभी का आलेखों का आकार ठीक लगा , २ मिनट रीड वाला होने से सटीक, सारगर्भित रहता है, पठनीय हो जाता है , समय की मारामारी के समय में ..
सटीक एवं सार्थक रचना