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पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....

कितनी फ़िल्मी है हमारी डिप्लोमैसी!

             विदेश नीति, कूटनीतिक संबंधों में हम इस क़दर कमज़ोर हैं कि एक फ़िल्म से तबाह हो सकते हैं?

‘घर में घुसकर मारने वाला नया भारत है यह’, आपने सुना होगा यह डंका बज रहा है। लेकिन इस नये भारत को बड़ा डर है। नहीं, घर में चीन के घुसने की बात तो संसद को भी नहीं करने दी जा रही, मैं क्या ही करूं! नये भारत को ‘ज़बरदस्त ख़तरा’ एक मासूम-सी फ़िल्म से है, इसलिए ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा नये जुमलों पर क़ुर्बान हो गयी है। और​ पिछले कुछ वक़्त में ऐसा ख़तरा कितनी ही बार हुआ है, कभी विदेशी तो कभी देशी फ़िल्मों से ही! (इस विषय को नीचे दी गयी लिंक पर पढ़ें)

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एक फेरा लगाते हैं और इस बात पर लौटते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में दो तिहाई आबादी ईसाई है। यूरोप में तीन चौथाई तक। अमेरिका में यहूदियों की आबादी बमुश्किल ढाई फ़ीसद है। और अमेरिका यहूदियों का ज़बरदस्त पैरोकार है। अब आप एक-एक करके उन फ़िल्मों को याद कर सकते हैं जिनमें यहूदियों को ‘बेचारी क़ौम’ बताया गया और ईसाइयों या अन्य को ज़ालिम। इन तमाम फ़िल्मों में बड़ा हिस्सा ​हॉलीवुडिया रहा है।

आब-ओ-हवा ने हाल ही दिलीप ख़ान की एक टिप्पणी प्रकाशित की, जो समझाती है कैसे दुनिया भर में यहूदियों के लिए हमदर्दी वाला सिनेमा बनता रहा और किस तरह हॉलीवुड की चाबी यहूदियों के हाथ में रही है। (नीचे दी गयी लिंक पर पढ़ें)

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अब यहां दो बातें हैं, ईसाइयों को विलन और यहूदियों को सतायी हुई क़ौम दिखाने के एजेंडा वाला सिनेमा ईसाई देशों में क्यूं चलता रहा? दूसरा यह कि भारत इस प्रसंग में किस तरह जुड़ रहा है?

एक जवाब तो है ही कि हॉलीवुड के बड़े स्टूडियोज़ के पीछे यहूदी रहे और अब भी एक पूरी ऐसी लॉबी है। दूसरे, ग़ौर करने की बात यह है कि पश्चिमी देशों में मुस्लिमों की आबादी यहूदियों से ज़ियादा है। इसके बावजूद सिनेमा में यहूदी, हीरो या हमदर्दी के पात्र रहे हैं और मुस्लिम देश ज़ियादातर विलन। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है ताक़त और पूंजी की गठजोड़िया हवस। यूं देखिए कि डॉलर की शक्ल में, दुनिया भर में जितनी पूंजी है, उसका छठवां हिस्सा यहूदियों की जेबों और तिजोरियों में है। और दुनिया की तीन चौथाई यहूदी आबादी इज़रायल में है।

फ़ोर्ब्स ने इसी महीने आंकड़े जारी किये, दुनिया के सबसे अमीरों में इज़रायली अरबपतियों की संख्या पिछले दो साल के भीतर डेढ़ गुना बढ़ चुकी है। वजह? अंतरराष्ट्रीय मीडिया इज़रायल को ‘युद्ध का अंततराष्ट्रीय प्रायोजक’ संज्ञा देता है। साफ़ है हथियारों की दलाली और धंधा इज़रायल की रीढ़ है।

समझा जा सकता है इज़रायल के सबसे बड़े पैरोकारों में अमेरिका और दूसरे विकसित देश क्यूं शामिल हैं। यूं भी ‘इज़रायल राष्ट्र’ बनने के पीछे एक कोलोनियल एजेंडा ही रहा। अब यहां से भारत की बात।

जैसे किसी बड़े आदमी, अफ़सर या राजा तक पहुंचने के लिए उसके ख़ास क़रीबी के साथ आपको समीकरण बनाना पड़ता है, ठीक वैसे ही इज़रायल से दोस्ती किये बग़ैर अमेरिका के साथ दोस्ताना रिश्ता क़ायम कर पाना टेढ़ी खीर ही है।

भारत के फ़िलीस्तीन और इज़रायल संबंधों का एक इतिहास रहा है (जिसे गूगल/एआई चुटकी बजाते कुछ हद तक समझा देता है)। दरअस्ल पिछले कुछ वक़्त में भारत की पक्षधरता बदली है। तटस्थ रहने के स्टैंड बदले हैं। रूस के साथी रहे भारत का चेहरा इस वक़्त अमेरिका के समर्थक का हो चला है। फ़लीस्तीन का हाथ थामे रहा भारत अब खुले तौर पर इज़रायल के साथ सालसा कर रहा है। वजह? वही दौलत और ताक़त की हवस।

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इज़रायल जितने ​हथियार दुनिया भर में बेचता है, उसके 42% तक का ख़रीदार भारत हो चुका है। आम जीवन में देखें तो जिस दुकानदार के आप सबसे बड़े ग्राहक हैं, वह आपके साथ संबंध निभाने की कोशिश करेगा, आपकी सेवा करेगा, आपको मान देगा लेकिन यहां हमारी विदेश नीति उलट हो जाती है। और क्यूं ये संबंध इस क़दर कमज़ोर हैं कि एक फ़िल्म से तबाह हो सकते हैं?

सबसे बड़ा ख़रीदार होने के बावजूद इज़रायल के सामने यह नया भारत अजीब तरह से नमन मुद्रा में क्यूं है? शांति का पक्ष लेने की बात हो तो पीछे हट जाता है, ग़लत को ग़लत कहने का मौक़ा आये तो चुप रहता है या दांत निपोरता है और इस तरह ‘विश्वगुरु’ व ‘आत्मनिर्भरता’ का दावा करता यह भारत अपनी भद्द ख़ुद पिटवाता नज़र आता है। एक फ़िल्म भर से डर जाता है!

इस बरस ऑस्कर पुरस्कार के लिए एक फ़िल्म नामांकनों में चर्चा में रही, ‘द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब’। यह फ़िल्म फ़लीस्तीन की एक मासूम बच्ची ‘हिंद रजब’, उसके परिवार और उसे बचाने गये दलों के वहशियाना क़त्ल की दास्तान है जिसमें इज़रायली फ़ौजें अमानवीय दिखायी गयी हैं। जैसे अंदेशे थे, इसे ऑस्कर नहीं मिला। ज़ाहिर है ऐसे सिनेमा को यहूदी लॉबी आख़िर कितना सर चढ़ाती।

बावजूद इसके, इस फ़िल्म को रोका नहीं गया। फ़लीस्तीन की यह फ़िल्म ऑस्कर पुरस्कारों की दौड़ में काफ़ी आगे तक गयी, अमेरिका व यूरोप के कई देशों (इज़रायल समर्थक) में सामान्य तौर से रिलीज़ हुई, फ़िल्म समारोहों में दिखायी गयी। एक समारोह में तो फ़िल्म को 20 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन मिला।

अगर बेख़बर हैं तो हैरान हो जाइए इस ख़बर से कि पहले इस फ़िल्म को रोका था, लेकिन इसे इज़रायल में भी रिलीज़ किया जा चुका। और भारत में? सेंसर बोर्ड ने दलील दी, इस फ़िल्म को रिलीज़ करने से इज़रायल के साथ भारत की ‘डिप्लोमैटिक बैलेंसिंग’ पर असर पड़ सकता है।

ख़बरों में एक फ़िल्म वितरक के हवाले से कहा गया, “मैंने उनसे (सेंसर बोर्ड) कहा भी कि भारत-इज़रायल ​के रिश्ते इतने कमज़ोर तो नहीं हैं ही कि एक फ़िल्म इन्हें ख़त्म कर दे, ऐसा मानना तो सरासर बेवकूफ़ी है! लेकिन फ़िल्म को आख़िरकार रोक ही दिया गया”।

इधर, आठ विपक्षी सांसदों ने सूचना व प्रसारण मंत्रालय से इस रोक पर जवाब चाहा है। सांसदों के पत्र में सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम-1952, के प्रावधानों के हवाले से इस सेंसरशिप की वैधानिकता को चुनौती दी गयी है और संस्थागत विश्वसनीयता, रचनात्मक स्वतंत्रता की रक्षा, नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता जैसे सवाल उठाये गये हैं।

‘द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब’ का ट्रेलर यूट्यूब पर है। ए​क फ़िल्म जो आपके संवेदनों को झिंझोड़ सकती है, आपको शायद थोड़ा इंसान बना सकती है, उस फ़िल्म को आप बेवकूफ़ाना दलीलों से रोकते हैं। दूसरी तरफ़ न जाने ऐसी कितनी फ़िल्मों को सर चढ़ाते हैं, जो आपके ही कूटनीतिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय अस्मिता के इतिहास को कलंकित करती हैं। ताज़ा सुर्ख़ी है, ‘धुरंधर’। इस तरह की फ़िल्में ‘घर में घुसकर मारने’ नहीं बल्कि ‘घर को आग लग गयी घर के चिराग़ से’ कहावत चरितार्थ करती हैं। यहां एक बोधकथा याद कीजिए:

“राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक दफ़ा इस मुद्दे पर बात छिड़ गयी कि किसका डंक अधिक चुभता है?

राजा ने सभी सभासदों से पूछा। किसी ने कहा- मधुमक्खी, किसी ने ततैया तो कोई बिच्छू, गोहरा के डंक की बात करने लगा। चुप बैठे वररुचि और कालिदास से राजा ने कहा, ‘भई, आप दोनों चुप क्यों हैं? अपना अभिमत दीजिए इस विषय पर’…

वररुचि ने सधी हुई वाणी में कहा- ‘राजन, इन सबसे गहराई से काटता है निंदक। जले-कटे वचनों के डंक इन सबसे तीक्ष्ण होते हैं।’

सबने वररुचि का लोहा माना। अब कालिदास से राजा ने पूछा तब वह बोले- राजन, सच है कि निंदक की जली-कटी वाणी बड़ी तीखी होती है पर मेरे मत में तो सबसे गहरा दंश होता है चापलूस का। इस दंश के दर्द का पता नहीं चलता किन्तु वह आपको जब धोखा दे देता है या चिकनी-चुपड़ी बातों के नशे की लत लगा देता है, तो जीवन भर अहित करने वाला उसका दंश सालता है। यह पीड़ा चिरस्थायी भी है। चाटुकारिता के नशे में आपको अपने बारे में मुग़ालते हो जाते हैं और यह नशा जीवनपर्यंत पीछा नहीं छोड़ता। चापलूस की छाया से भी दूर रहना ही श्रेयस्कर है।”

‘धुरंधर’ जिस लहर का नया नाम है, उस तरह का सिनेमा मौक़ापरस्त, मुनाफ़ाख़ोर और चापलूस दर्जे का ही सिनेमा है.. सियासत को जब होश आएगा तब वह पछताएगी कि उसने वक़्त रहते ऐसी चापलूसी पर लगाम क्यूं न कसी! ‘आत्मनिर्भर’ जो होते हैं, वो बंदूक़ दूसरे के कंधे पर रखकर नहीं चलाते और क्रेडिट कार्ड पर अय्याशी करने वाले के मुंह से ‘विकसित’ होने का दावा खोखला ही लगता है।

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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