अख़बारनवीसी: वे एक सौ अड़सठ साल

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राजेश बादल की कलम से....

अख़बारनवीसी: वे एक सौ अड़सठ साल

यहाँ लंबी पृष्ठभूमि इसलिए भी ज़रूरी थी क्योंकि मैं बताना चाहता था कि उन दिनों अँग्रेज़ों का डर कितना था। ऐसे में गांधी जी के लिए पत्रकारिता कितनी जोखिम भरी थी— बताने की आवश्यकता नहीं। शायद इसीलिए श्रीधर जी ने इस खंड का नाम गांधी युग दिया होगा। सन 1919 में यानी क़रीब एक सौ छह साल पहले गांधीजी गुजराती में नवजीवन शुरू करते हैं।यंग इंडिया के संपादक बनते हैं और झकझोरने वाले विचारों की नदी बहाते हैं। यंग इंडिया का संपादक बनते ही वे पहला पत्र अख़बार में उन लोगों को लिखते हैं, जो उनसे असहमत थे या उनका विरोध करते थे। दूूूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं, जिसमें वे उन्हें भारत की आज़ादी के लिए मजबूर करने वाले तर्क देते हैं। ये दोनों अख़बार क़रीब-क़रीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे।

गांधी के नैतिक साहस का एक और उदाहरण। सन 1919 में ही रॉलेट एक्ट लागू हुआ। प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति ज़रूरी बना दी गयी थी। एक्ट के तहत किसी अपील और दलील का स्थान नहीं था। गांधी जी इसके विरोध में सत्याग्रह का प्रकाशन करते हैं। इस अख़बार के प्रकाशन की अनुमति वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा, जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता। यह साहस दिखाने वाले सिर्फ़ गांधी ही हो सकते थे।

इसके बाद 1933 मेंं उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अख़बार हरिजन निकलता है। क्या आप यह जानते हैं कि हरिजन नाम संपादक के नाम पत्र लिखने वाले एक दलित पाठक ने गांधी जी को भेजा था। यह पहले अँग्रेज़ी में फिर हिंदी में निकला। उनका इस समाचारपत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ़ था- सेवा। आज विचारों की ख़ुराक़ हमें कहां मिलती है। न के बराबर। गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए। सरकार के दबाव और सेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं: एक-एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेजना पड़े तो मैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नहीं कर सकता। प्रेस की आज़ादी तो विशेषाधिकार है।

गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी। जब 1942 में उन्होंने ‘अँग्रेज़ो भारत छोड़ो’ आन्दोलन शुरू किया तो हरिजन बन्द करना पड़ा। गांधी जेल गये और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया। एक-एक प्रति जला दी गयी। दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो फिर हरिजन शुरू कर दिया। सेवाग्राम से ही उन्होंने सर्वोदय का भी प्रकाशन प्रारंंभ कर दिया। यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार माना। उनका कहना था कि सबसे बड़ा काम देश की आज़ादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता का है। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा था, “संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े, लेकिन उसे अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए।”

अंतिम खंड में और बहुत कुछ

गांधी जी को समर्पित समग्र भारतीय पत्रकारिता के इस अंतिम भाग में कन्नड़ असमिया, मलयालम, मराठी, तमिल, तेलुगु तथा अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दक्रान्ति का विवरण है। चाँद के फांसी अंक को सलामी दी गयी है। ख़ास बात यह है कि इस कालखंड में जो समाचारपत्र निकले, उनमें से अधिकांश आज भी प्रकाशित हो रहे हैं (लेकिन उनकी वर्तमान पत्रकारिता की दिशा और दशा पर मैं चुप रहना पसंद करूँगा)।

इनके अलावा डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के मराठी साप्ताहिक मूक नायक और बहिष्कृत भारत के जन्म की कहानी भी आप इस भाग में पढ़ सकते हैं। डॉक्टर आम्बेडकर को भारतवासी संविधान निर्माण में उनकी भूमिका के लिए जानते हैं। पर, वे मूलतः विलक्षण अर्थशास्त्री थे— यह लोग नहीं जानते। अर्थशास्त्र में पहली भारतीय पीएचडी डॉक्टर आम्बेडकर ने ही की थी, यह भी कम लोग ही जानते हैं।

साढ़े नौ बरस तक बनारसीदास चतुर्वेदी ने विशाल भारत का निर्भीक संपादन किया और उसके बाद मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ आ गये। वहाँ कुण्डेश्वर से मधुकर का प्रकाशन किया।सन्दर्भ के तौर पर बता दूँ कि चतुर्वेदी जी पहले इंदौर के डेली कॉलेज में प्राध्यापक थे। इस कॉलेज में अधिकतर रियासतों के राजकुमार पढ़ने आया करते थे। टीकमगढ़ रियासत के राजकुमार भी चार साल तक बनारसीदास चतुर्वेदी के छात्र रहे थे। जब वे राजा बने तो उन्होंने चतुर्वेदी जी को न्यौता भेजा कि वे टीकमगढ़ आकर रहें और पत्रिका का प्रकाशन करें। मधुकर पत्रिका चतुर्वेदी जी ने ही निकाली थी। दिलचस्प कहानी यह है कि राजा साहब बुंदेलखंडी व्यंजनों के बड़े शौक़ीन थे और बहुत अच्छे रसोइये भी थे। उन्होंने बुंदेली व्यंजनों पर एक किताब लिखी और अपने प्रधानमंत्री को दिल्ली भेजा कि वे इस किताब को किसी प्रेस से प्रकाशित कराएँ। उन दिनों दिल्ली में गिने-चुने प्रकाशक ही होते थे। जब प्रधानमंत्री दिल्ली गये तो उन प्रकाशकों ने बड़ा मज़ाक़ उड़ाया। प्रधानमंत्री से राजा साहब ने यह क़िस्सा सुना तो बहुत क्रोधित हो गये और सीधे लन्दन या जर्मनी से नयी प्रिंटिंग प्रेस ख़रीदकर टीकमगढ़ में लगायी। इस प्रेस में बुंदेली व्यंजनों की वह किताब छपी। बाद में इस मशीन के लिए कोई पूर्णकालिक काम नहीं बचा तो उन्होंने बनारसीदास दास चतुर्वेदी से प्रार्थना की कि वे राजा मधुकर शाह के नाम से मधुकर नमक पत्रिका निकालें। चतुर्वेदी जी ने यह आग्रह स्वीकार कर लिया। बताने की आवश्यकता नहीं कि मधुकर में अपनी रचना छपवाने के लिए चोटी के लेखक लालायित रहते थे।

इससे 106 साल पहले केसरी के मराठी और हिंदी में प्रकाशन के बाद बुंदेलखंड केसरी निकला। यह आज के उत्तरप्रदेश में शामिल बुंदेलखंड के राठ क़स्बे के निकट घने जंगलों में एक गुप्त मंदिर से निकलता था। अँग्रेज़ों की पिट्ठू पुलिस प्रकाशन स्थल का पता नहीं लगा सकी, दो-चार दिन बाद वह स्थान बदल दिया जाता था और साइकिलोस्टाइल मशीन रातो-रात और घने जंगल में ले जायी जाती थी। कभी बैलगाड़ी पर, कभी साइकल पर तो कभी पोटली बनाकर सर पर रखकर। इसे पढ़ते हुए मुझे 1942 के अँग्रेज़ो! भारत छोड़ो आंदोलन की याद आ रही है। इस आंदोलन में जब महात्मा गांधी समेत सारे बड़े नेताओं की गिरफ़्तारी हो गयी तो ऊषा मेहता ने गोरों को चकमा देते हुए ख़ुफ़िया तौर पर कांग्रेस रेडियो प्रारंभ किया था। इस मायने में ऊषा हिन्दुस्तान की पहली ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं। यह कांग्रेस रेडियो गोरी पुलिस और उसके गुप्तचरों को चकमा देते हुए काम करता था। बंबई (तब इसका नाम मुंबई नहीं था) के अलग-अलग इलाक़ों में हर रात इस रेडियो के ट्रांसमीटर का पुर्ज़ा-पुर्ज़ा खोला जाता था और रातो-रात दूसरे स्थान पर ले जाया जाता था। जब तक पुलिस किसी इलाक़े में सिग्नल पकड़ती, तब तक ट्रांसमीटर किसी अन्य क्षेत्र में स्थापित कर दिया जाता। महीनों तक यह प्रसारण पत्रकारिता चलती रही। संसार के किसी अन्य मुल्क में ऐसा नमूना देखने को नहीं मिलता।

गांधी युग की पत्रकारिता वाले इस खंड में कथा सम्राट प्रेमचंद की ख्याति कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में थी। लेकिन एक मासिक पत्रिका हंस के संपादक प्रेमचंद का नया रूप 1930 में देशवासियों ने देखा। उनके पत्रकारिता वाले तेवरों से आज भी यह राष्ट्र अनभिज्ञ है। प्रेमचंद ने इसमें ओजस्वी संपादकीय, समसामयिक विषयों पर गंभीर और तीखी टिप्पणियाँ लिखीं। प्रवेशांक में उन्होंने लिखा:

स्वाधीनता केवल मन की एक वृति है। इस वृति का जागना ही स्वाधीन हो जाना है। अभी तक हमारे दिलों में यह विचार ही नहीं आया। हमारी चेतना इतनी मंद, मद्धम और मुर्दा हो गयी थी कि उसमें ऐसी महान महत्वकांक्षा का जन्म ही नहीं हो सकता था। लेकिन भारत के कर्णधार महात्मा गांधी ने हमें सोते से जगा दिया। अब इस संग्राम में हम एक दिन जीतेंगे। वह दिन जल्द आएगा या देर से, यह हमारे साहस, पराक्रम और अक़्ल पर निर्भर करेगा। हमारा धर्म है कि उस दिन को शीघ्र लाने के लिए तपस्या करते रहें। यही इस हंस का मक़सद है।

प्रेमचंद ने इन्द्रनाथ मदान को 7 सितंबर 1934 को एक साक्षात्कार दिया था। हंस की बात चली, तो मुझे वह साक्षात्कार याद आ रहा है। इसमें प्रेमचंद कहते हैं:

“मैं मूलतः पत्रकार नहीं था। देशकाल की परिस्थितियों ने आज़ादी के लिए मुझे पत्रकार बना दिया। जो मैंने साहित्य में धन कमाया था, वह सब पत्रकारिता में गँवा दिया। लेकिन मैं प्रसन्न हूँ।

प्रेमचंद कोई ऐसा दावा नहीं करते कि वे हिंदुस्तान के सबसे प्रखर संपादक हैं। लेकिन 1935 में महात्मा गांधी ने स्वयं उनको मिलने के लिए वर्धा आमंत्रित किया। हालाँकि वे 1920 में एक सभा में उनका भाषण सुन चुके थे। इसका असर यह हुआ कि नौकरी छोड़ दी और फिर प्रेमाश्रम लिखा। जब 1928 में महात्मा जी इलाहाबाद आये (उन दिनों अधिकृत तौर पर प्रयागराज नाम नहीं था) प्रेमचंद जी दो दिन पहले से इलाहाबाद जाकर डट गये, मगर मुलाक़ात नहीं हो पायी। गांधी जी का मिनट-दर-मिनट कार्यक्रम पहले से तय था। वे तनिक निराश तो हुए, लेकिन तय किया कि अब पत्रकारिता करेंगे। इसके बाद गोरी हुकूमत पर उनके हमले बढ़ गये। हंस की नींव यहीं पड़ गयी। महात्मा गांधी ने प्रेमचंद जैसे इंसान को पत्रकार बना दिया, तो विजयदत्त श्रीधर जी के लिखे इस ग्रन्थ का नाम गांधी युग देना उचित ही है। प्रेमचंद ने लिखा:

महात्मा गांधी देशभक्त हैं। उन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर दिया है। हमारी भलाई के लिए दिन रात हिन्दुस्तान भर में दौड़ रहे हैं। ऐसे महान पुरुष विरले ही होते हैं।

गांधी जी से पहली बार मिलने के बाद उन्होंने लिखा:

जितना महात्मा जी को समझता था, उससे कहीं ज़्यादा मिले। उनसे मिलने के बाद कोई ऐसा नहीं है, जो उनका हुए बिना लौट आये। वे सबके हैं और उनसे मिलने के बाद सब उनके हो जाते हैं। उनके सामने कितना ही बड़ा झूठा जाये, उनके सामने तो सच ही बोलना पड़ेगा। मैं तो उनका चेला ही हो गया। वैसे तो महात्माजी का चेला गोरखपुर में ही हो गया था। तभी तो नौकरी एकदम छोड़ी थी… गांधी इस युग का सबसे बड़ा पंडित है। उसका दिल दोनों के लिए बराबर है। वह आदमीयत पहले देखता है। जब आदमी आदमी न रहा तो मज़हब क्या है और किसका है?

हंस के अप्रैल 1930 अंक में ‘आज़ादी की लड़ाई’ लेख में उन्होंने लिखा:

आज़ादी की लड़ाई शुरू हो गयी। महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल को डांडी यात्रा करके ग़ुलामी की बंदी पर पहला हथौड़ा चलाया। सारे देश में उसकी झंकार गूँज उठी। पहले तो किसी की समझ में न आया कि महात्माजी क्या करने जा रहे हैं। उनका मज़ाक़ भी बनाया गया। गवर्नर ने अपने ख़ुशामदी टट्टुओं से कहा कि यह दुःख भरा प्रहसन है। पर, उन्हें क्या मालूम था कि यह प्रहसन दो महीने में ही आज़ादी का प्रचंड प्रवाह सिद्ध होगा। उसे संगठित नौकरशाही रोक नहीं पाएगी… फ़िल्मों पर रोक लगायी जा रही है, ख़बरों पर सेंसर है। अँग्रेज़ों की दानवता का नाच हम देख रहे हैं। कायरता, कमीनेपन और निर्दयता में इस जाति से बाज़ी ले जाना मुश्किल है। फिर भी हमारा जो अनुमान था, उससे ज़्यादा ही हो रहा है। न कोई क़ानून है, न क़ायदा न नीति न शर्म। इन्ही अन्यायों से तो हमारी विजय तय है। हम तो महात्मा जी की सूझ”बूझ के क़ायल हैं। उन्होंने जो भी बात की, ख़ुदा क़सम लाजवाब की। न जाने कहाँ से नमक का टैक्स खोज निकाला कि उसने देखते ही देखते देश भर में आग लगा दी।

श्रीधरजी का यह ग्रन्थ हमें किरती की याद भी दिलाता है। अमृतसर से गुरुमुखी और उर्दू में यह ऐतिहासिक पत्र क्रांतिदूत की तरह सरदार अर्जुनसिंह निकालते थे। हैरानी होती है कि यह मासिक साठ पन्नों का था। किरती की पत्रकारिता के बारे में शानदार समाचार पत्र महारथी ने लिखा था:

यह पत्र क्रांतिकारी है। हमें दुःख है कि साहित्य-साहित्य चिल्लाने वाले किसी हिंदीसेवी को आज तक ऐसा पत्र निकालने का साहस नहीं हुआ। पत्र का एक-एक शब्द क्रांति का जयघोष कर रहा है। ग़ुलामी में जकड़ा भारत बहुत संभव है, साहित्य के धोखे में अपने आपको भी खो बैठे। उफ़..धन्य है वीरों का साहस…यह समाचार-पत्र है या पीड़ितों की मर्म वेदनाओं का धधकता हुआ अग्निकुंड… इसको कहते हैं कलेजा और इसको कहते हैं आग।

बता दूँ कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए कॉलेज छोड़ने वाले सरदार भगतसिंह भी किरती के लेखकों में से एक थे। इसमें वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। काकोरी केस के सेनानियों को सलामी देते हुए जनवरी 1928 में भगतसिंह ने लिखा:

हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गये हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं। तड़प रहे हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएँ।

दरअसल समग्र भारतीय पत्रकारिता नाम का यह विराट ग्रन्थ रचकर विजयदत्त श्रीधर जी ने आने वाली नस्लों पर ऐसा उपकार किया है, जिसका क़र्ज़ शायद कभी नहीं उतर सकता।गागर में सागर भरने वाली कहावत चरितार्थ करती श्रीधरजी की यह क़लम आने वाले दिनों में हमें ऐसी ही अनमोल विरासतें सौंपती रहेंगी।

राजेश बादल, rajesh badal

राजेश बादल

राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक के रूप में ख्यातिप्राप्त। चार दशक से अधिक समय से रेडियो, टीवी, प्रिंट व डिजिटल पत्रकारिता में चर्चित हस्ताक्षर। सौ से अधिक वृत्तचित्रों के निर्माण, टीवी पत्रकारिता में व्यवस्थित बायोपिक एवं पत्रकारिता की अनेक पुस्तकों के लिए प्रशंसित। पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित।

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