
गूंज बाक़ी… हिंदी कविता और गीत के प्रसिद्ध हस्ताक्षर गोपालदास नीरज की एक भूली-बिसरी रचना। यह रचना ‘सुमित्रा’ पत्रिका के सितम्बर 1952 अंक में ‘मिट्टीवाला’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, जिसे आज भी युद्धों के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। आब-ओ-हवा की यह प्रस्तुति विवेक मेहता के सौजन्य से।
नीरज की दुर्लभ कविता – मिट्टी की कुर्बानी

“घर-घर पर आवाज़ लगाते मिट्टी ले लो मोल,
गाँव गाँव इस धुन्ध-धूप में भूखे-प्यासे डोल,
चिकनी, खुदरी, गोली, सूखी, काली, पीली, श्याम,
लाद गधों पर तरह-तरह की मिट्टी यह बेनाम,
खोज रहे तुम किस सौदागर को ओ मिट्टीवाले !
कौन यहाँ जो इस अनमोल वस्तु का मोल चुका ले !”
अरे कहा क्या- बस दो पैसे एक गधे का दाम,
कुछ कम भी हो सकता है यदि ले लूं माल तमाम,
यह कैसा व्यापार, अरे यह कैसा है उपहास !
दो पैसों में बेच रहे तुम मिट्टी का इतिहास !
यह कैसी मजबूरी भाई यह कैसी लाचारी !
मिट्टी की सम्पत्ति बिक रही कुछ पैसों में सारी !
आस-पास ही देख रहा हूँ मिट्टी का व्यापार,
चुटकी-भर मिट्टी की कीमत जहाँ करोड़ हजार,
और सोचता हूँ आगे तो होता हूँ हैरान,
बिका हुआ है कुछ मिट्टी के ही हाथों इन्सान,
यह एटम, ये टैंक-गनें, ये गैस-मशीनें, यान,
कुछ मिट्टी के लिए कर रहे मिट्टी का बलिदान,
और बांटने को मिट्टी से बस मिट्टी का प्यार,
खड़ी बीच में है मिट्टी के लोहू की दीवार,
यह चाँदी की चहल-पहल यह मय-मीना का शोर,
यह पेरिस की रात, कोरिया की यह काली भोर,
यह चितवन की चकाचौंध, यह चुम्बन के बाजार,
ताम्रकाल वह, लौहकाल यह, सोने का संसार,
ये भिखमंगे, ये नंगे, ये तुन्द महाजन-सेठ,
यह अमरीका, यह रशिया, यह डालर रोटी-पेट,
मन्दिर, मस्जिद, गिरजेघर ये भक्त और भगवान,
बस कुछ मिट्टी लिये लगाये सब अपनी दूकान
कलाकार, पैगम्बर, नीतिक, बुद्ध, सिकन्दर सारे,
सभी ज़िन्दगी में मुट्ठी-भर मिट्टी से बस हारे।
और उसी मिट्टी को तुम यों लुटा रहे बेमोल,
चीख उठेगी कब्र किसी की अरे सँभलकर बोल।
अरे सँभलकर बोल, अभी सोयी है थककर लाश
झरे फूल के पास खड़ा है बुलबुल का उच्छ्वास
कसा है वह कुंभकार, यह कैसा क्रूर विचार,
दर-दर मारी फिरे गधों पर मिट्टी यह सुकुमार !
यह अचरज की बात नहीं, यह कोई बात अजानी,
“मिट्टी को अच्छी लगती मिट्टी की कुर्बानी।”
