
- May 20, 2026
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
नेपोटिज़्म बनाम नैसर्गिक प्रतिभा
जब कोई वरिष्ठ संपादक या साहित्यकार यह कहता है कि सच्चे लेखक को किसी प्रपंच की ज़रूरत नहीं होती और उसकी रचना ख़ुद अपना रास्ता बना लेती है, तो सुनने में यह बात बेहद गौरवमयी और आदर्श काव्यात्मक बात लगती है।
वहीं जब दूसरा पक्ष पलटकर पूछता है कि क्या बिना किसी गॉडफ़ादर के आज के दौर में मुख्यधारा का लेखक बनना मुमकिन भी है? तो इस कड़वे यथार्थ को सुनकर पीड़ा भी होती है।
दरअसल, आज के साहित्यिक परिदृश्य में जिसे हम ‘गॉडफ़ादर संस्कृति’ कहते हैं, वह कुछ और नहीं बल्कि साहित्य का ‘नेपोटिज़्म’ या भाई-भतीजावाद ही है, जिसने इस विमर्श को जटिल और संवेदनशील बना दिया है।
यदि हम इस सिक्के के उस पहलू को देखें जो नेपोटिज़्म, ख़ेमेबाज़ी और गॉडफ़ादर की ज़रूरत पर बल देता है, तो आज के बाज़ारवादी दौर की नग्न सच्चाई सामने आती है। आज साहित्य केवल स्वांतः सुखाय अर्थात एकांत की साधना नहीं रहा, बल्कि वह एक व्यावसायिक नेटवर्क बन चुका है।
हिंदी हो या अंग्रेज़ी, साहित्यिक दुनिया में भी वंशवाद, गुटबाज़ी और ख़ास क़बीलों का कब्ज़ा साफ़ दिखायी देता है।
ख़ासकर सम्मान और सरकारी पुरस्कार, अकादमी से मान्यता, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में किताबें और रचनाएं शामिल करना आदि कार्यों में तटस्थता, पारदर्शिता की कमी स्पष्ट दिखती है।
जब तक किसी स्थापित आलोचक, रसूख़दार लेखक या बड़े प्रकाशक का वरदहस्त किसी नये लिखने वाले पर नहीं होता, तब तक उसे मुख्यधारा के मंचों, पत्रिकाओं और पुरस्कारों की दौड़ में शामिल होने का मौक़ा ही नहीं मिलता।
नेपोटिज़्म के इसी चक्रव्यूह के कारण कई बार गुणी और मर्मस्पर्शी लेखक भी हाशिये पर ढकेल दिये जाते हैं, जबकि किसी रसूख़दार के चहेते या उनके उत्तराधिकारी मामूली लेखन के बावजूद रातो-रात मुख्यधारा के शीर्ष पर चमकने लगते हैं। इस नज़रिये से देखें तो लगता है बिना किसी गॉडफ़ादर के इस साहित्यिक सिंडिकेट में प्रवेश पाना लगभग असंभव है।
इसके विपरीत, सिक्के का दूसरा पहलू कला की उस शाश्वत और नैसर्गिक शक्ति की वकालत करता है, जो किसी भी तरह के प्रपंच या नेपोटिज़्म की मोहताज नहीं होती। इतिहास गवाह है कि कबीर, मीरा, रसखान या आधुनिक दौर में निराला ने किसी साहित्यिक ख़ेमे या पीआर एजेंसी के सहारे अपनी पहचान नहीं बनायी थी।
शायद यह तब के समय की पवित्रता थी, पर तब भी राज दरबार के कवि होते ही थे। नेपोटिज़्म या गॉडफ़ादर संस्कृति किसी लेखक को एक बेहतरीन ‘लॉन्च-पैड’ तो दे सकती है, उसे वीआईपी गैलरी में तात्कालिक प्रवेश भी दिला सकती है, लेकिन पाठकों के दिलों में स्थायी जगह दिलाने का हुनर केवल नैसर्गिक प्रतिभा के पास ही होता है। यदि रचना में गहराई और युगीन सत्य को झकझोरने का माद्दा नहीं है, तो दुनिया का बड़े से बड़ा गॉडफ़ादर भी उस लेखक को सिर्फ ‘चर्चित’ रख सकता है, स्थायी, ‘कालजयी’ या जन ‘आदरणीय’ नहीं बना सकता।
जैसे ही नेपोटिज़्म का वह सुरक्षा कवच हटता है, कमज़ोर और खोखली रचनाएं वक़्त के थपेड़ों से ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।
इस प्रकार, समकालीन नेपोटिज़्म के इस कोलाहल से दूर अगर हम साहित्य के शाश्वत सत्य को तलाशें, तो रास्ता बहुत साफ़ नज़र आता है। गॉडफ़ादर होना मुख्यधारा की चकाचौंध में आने का एक आसान शॉर्टकट या सुविधा तो हो सकता है, लेकिन यह साहित्य की दुनिया का आख़िरी नियम नहीं है। वक़्त गवाह है कि जो लेखक केवल प्रपंच और भाई-भतीजावाद के दम पर मंचों पर काबिज़ होते हैं, वे अक्सर अपने जीवनकाल के साथ ही इतिहास के पन्नों से विस्मृत हो जाते हैं।
इसके उलट, जो नैसर्गिक प्रतिभाएं बिना किसी गॉडफ़ादर के, पूरी ईमानदारी से अपने समय के सच को शब्दों में पिरोती हैं, वे भले ही शुरूआती दौर में उपेक्षित रहें, लेकिन वे हार नहीं मानतीं। अंततः बात इसी एक शाश्वत सत्य पर आकर टिकती है कि यदि लेखक की कलम में वास्तविक ताक़त है, यदि उसकी स्याही में जनमानस की धड़कनें शामिल हैं, तो दुनिया का कोई भी नेपोटिज़्म या साहित्यिक सिंडिकेट उसे रोक नहीं सकता। देर-सबेर समाज में उसकी स्वीकार्यता और प्रतिष्ठा होकर ही रहती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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