swapnil tiwari, स्वप्निल तिवारी
'आबो-हवा' का सीधा मतलब जलवायु है और शायरी में यह बाहर और भीतर की कैफ़ियत के हवाले से दर्ज होता रहा है। कहीं-कहीं तो यह प्रतीक भी बन जाता है। 'आबो-हवा' लफ़्ज़ सदियों से शायरी में मौजूद है और अब भी बासी नहीं हुआ है। समकालीन शायरों ने इसे अपने अंदाज़ से बरता है। ऐसे ही कुछ अशआर आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए...
संकलन : देवदत्त संगेप...

हिन्दी-उर्दू शायरी में 'आबो-हवा'

तुम्हारे शहर की आबो-हवा अच्छी नहीं लगती
कोई भी शय मुहब्बत के सिवा अच्छी नहीं लगती
उदयप्रताप सिंह

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अच्छी से अच्छी आबो-हवा के बग़ैर भी
ज़िंदा हैं कितने लोग दवा के बग़ैर भी
मुनव्वर राना

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ज़माने की आबो-हवा देखता है
फ़लक से तमाशा ख़ुदा देखता है
कुँवर कुसुमेश

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देख ली आबो-हवा मैंने बदलकर जानेमन
दाग़ साँसों से नहीं जाते तिरे परफ़्यूम के
स्वप्निल तिवारी

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शह्र की आबो-हवा में घुल गयी हैं नफ़रतें
ऐ मेहरबां! अब हमें ले चल हमारे गांव में
डॉ. आफ़ताब आलम

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ज़मीं की आबो-हवा में न सांस ले पाये
ख़ला की सैर को अहले-ज़मीं चले गये हैं
आलम खुरशीद

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नीम बरगद और पीपल की तमन्ना में कभी
शह्र को तज गाँव की आबो-हवा ढूंढ़ेंगे लोग
अनु राज

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आबो-हवा वफ़ाओं की क्या लाएगी बहार
दीमक जड़े-यक़ीन ही बरबाद कर गयी
अविनाश भटकर

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यहाँ आ गया गाँव को छोड़कर क्यूँ
वहीं की मैं आबो-हवा चाहता हूँ
अखिलेश वर्मा

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ख़ुशी तुमको मिले तो फूंक दो हस्ती मेरी
मगर मासूमियत आबो-हवा ले जाएगी
अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया

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हवाएं हाथ पकड़े हैं, घटाएं घर बुलाती हैं
हुई है किस तरह आबो-हवा शैतान होली में
बी.आर. विप्लवी

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पहले सी रंगत न वो आबो-हवा
ये तेरे शहर को अब के क्या हुआ
दर्द गढ़वाली देहरादून

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रंग फ़ैशन का जुदा है आज के माहौल में
खो गयी शर्मो-हया है आज के माहौल में
घुट रहीं सांसें सभी की इस क़दर अलूदगी है
ज़ह्र सी आबो-हवा है आज के माहौल में
ग़ज़ाला तबस्सुम

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आयी न रास ख़ुल्द की आबो-हवा मुझे
फिर भेज दे ज़मीन पे मेरे खुदा मुझे
हसन काज़मी

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घर नहीं अब घर लगे आबो-हवा कुछ और है
बन चुकीं कितनी दरारें ग़म ही माना रह गया
हरी शंकर चौरसिया ‘शिवम’

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गाँव के बरगद में जो इक घोंसला महफ़ूज़ है
कह रहा है गाँव की आबो-हवा महफ़ूज़ है
के.पी. अनमोल

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किस किससे कहें आबो-हवा कोई नहीं है
इस ख़ाक के होंटों पे सदा कोई नहीं है
डॉ. कौशल सोनी फ़रहत

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दम घुटा जाये है इस नाज़ो-अदा से अब तो
इश्क़ अब एक खुली आबो-हवा माँगे है
कुलदीप सलील

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नफ़रतों के बीज से उगने लगें ऐसे शजर
तो ज़हर आबो-हवा में यूं मिला रह जाएगा
डॉ. कादम्बिनी सिंह

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हमारे बीच की लंगड़ा रही है आबो-हवा
सहारा ढूँढ़ता फिरता है अब सहारों को
मेहदी अब्बास रिज़वी

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सहूलियात तो हासिल हों शहर की लेकिन
ये चाहते हैं कि आबो-हवा हो जंगल की
महेश जानिब

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वक़्त की दरकार है अब खिड़कियों को खोल तू
अम्न की आबो-हवा से दुश्मनी की ज़िद न कर
नवीन मणि त्रिपाठी

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निज़ामत है उनकी हुक़ूमत है उनकी
वतन की बदल दें वो आबो-हवा तक
नज़र द्विवेदी

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निकलकर देखना आबो-हवा भी
क़फ़स को आशियाँ मत मान लेना
पुष्पेन्द्र ‘पुष्प’

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कर आबो-हवा मुबारक आमाल मुबारक कर दे
मेरे मौला! इस दफ़ा मेरा साल मुबारक कर दे
डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़

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नफ़रतों का लिखा बदलना है
हम को आबो हवा बदलना है
रज़िक अंसारी

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फिर, जब आबो-हवा रास आने लगी
शहर में ज़िन्दगी गुनगुनाने लगी
राजिंदर सिंह दिलदार देहलवी

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छोड़ के सब कुछ ये सोचा है ढूंढ़ें कोई शहर नया
तेरे शहर की आबो-हवा तो सबकी जान निकाले है
मलिक आर.के. पंकज

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बदल रही है यूँ आबो-हवा ज़माने की
शबाब आ गया उस पर शबाब से पहले
शुचि ‘भवि’

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एक सी आबो-हवा एक गुलाबी मौसम
आपका घर भी मेरे घर की तरह लगता है
शिव नारायण शिव

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अपनी आंँखों में नये ख़्वाब सजाये पंछी
दश्त से शहर की जानिब चले आये पंछी
धीरे-धीरे से ये असरार खुलेंगे तुम पे
ये फ़ज़ा, आबो-हवा सब हैं पराये पंछी
संगीत राइकवार

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आग, मिट्टी, साथ में आबो-हवा, नभ
जिस्म को बस ये ख़ज़ाना चाहिए था
सीमा अग्रवाल

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मुसलसल बढ़ रहीं बेचैनियाँ हैं
नई आबो-हवा है और मैं हूँ
सौमेन्दु वर्धन मालवीय

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आज आबो-हवा बदल पायी
राख की आग मत उभारो तुम
शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

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दिल में ख़्वाहिश है कि वो आबो-हवा आ जाये
उजड़े गुलशन में बहारों की फ़ज़ा आ जाये
शायर शिवशरण बन्धु

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मयस्सर आबो-हवा है तो दम पे क़ुदरत के
फिर उसके वास्ते हममें ये बेहिसी क्यूँ है
स्व. शेषधर तिवारी

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बड़ी रफ़्तार से आबो-हवा बदली ज़माने की
जहां रिश्ते बचाने का ठिकाना ही नहीं कोई
सुरिंदर कुमार

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सोचिए किनके इशारों पर प्रभाती गा रही है
ये हवा जो सामने से सर उठाकर आ रही है
मैं इसी आबो-हवा का रुख़ बदलना चाहता हूँ
रोज़ जिसमें सभ्यता की नथ उतारी जा रही है
तेज नारायण शर्मा

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थी यही आबो-हवा सबसे भली
अब यही है दर्द-ए-सर होते हुए
उबैद हारिस

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ज़माना हो गया है तल्ख़ लेकिन
मुहब्बत है अभी आबो-हवा में
तन्हा आनन्द

देवदत्त संगेप, devdutta sangep

देवदत्त संगेप

बैंक अधिकारी के रूप में भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त। शायरी के प्रति ख़ास लगाव। उर्दू, हिन्दी और मराठी ग़ज़लों में गहरी दिलचस्पी। मिज़ाह शायरी करने के भी शौक़ीन और चुनिंदा शेरों और ग़ज़लों के संकलनकर्ता के रूप में पहचान।

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