विवेक रंजन श्रीवास्तव विदेशों की यात्राओं पर हैं। इस दौरान वह नियमित रूप से शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव...
गूंज बाक़ी… दुनिया के हालात के मद्देनज़र कैसे कोई कविता प्रासंगिक हो जाती है! गोपालदास नीरज की एक कविता जैसे फिर ज़िंदा हो गयी है। दशकों पहले कविता पढ़ते...
अमेरिका-इज़राइल के तीखे विरोध की अपील मध्य-पूर्व एशिया में हालात तनावपूर्ण हैं और ख़बरों की मानें तो ईरान में जश्न और मातम का मिला जुला माहौल है। ईरान के...
हिंदुस्तान यानी एक रंग-रंगीली सरगम। हर सुर, हर रंग एक-दूसरे में घुला-मिला हुआ, रचा-बसा हुआ। यही इंद्रधनुषी धुन देश की तहज़ीब है। प्यार, वाबस्तगी और एका के पैग़ाम सभी...
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से…. हिंदी नाटक में व्यंग्य-चेतना का विकास : इतिहास और वर्तमान हिंदी साहित्य के प्रारंभिक वर्षों में व्यंग्य-नाटक व्यापक रूप से लिखे...