ग़ज़ल अब 1अनजान इक जहां में उतारा गया हमेंपहना के सुर्ख़ जोड़ा सँवारा गया हमें आंखों को मूंदकर उन्हीं राहों पर चल दियेजिन रास्तों से जैसे गुज़ारा गया हमें...
ग़ज़ल तब रह-रवी है न रहनुमाई है आज दौर-ए-शिकस्ता-पाई है अक़्ल ले आयी ज़िंदगी को कहाँ इश्क़-ए-नादाँ तिरी दुहाई है है उफ़ुक़-दर-उफ़ुक़ रह-ए-हस्ती हर रसाई में ना-रसाई है हो...