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पुस्तक चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

चर्चा में दो किताबें

           “अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ़ लता…” ड्रॉइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफ़ॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गयी, माध्यम बदल गये, पीढ़ियाँ बदल गयीं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मरकर भी अमर हो जाती हैं।

अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, पहले लता जी की आवाज़ से फ़िल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।

लता पर प्रामाणिक और शोधपरक किताब

ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ़ लता मंगेशकर’, राजू भारतन लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफ़ी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ़ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तकें जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेज़ी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखायी देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।

इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आयी है, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर’। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।

लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट् जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।

लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।

लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम, गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र, सम्मान और पुरस्कार… अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।

डॉ. इन्द्रजीत के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नयी आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है। लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों-सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।

पुस्तक की सबसे बड़ी ख़ूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।

पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गयी है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।

कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण

डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किये गये अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।

संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।

इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है। उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है: “लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिये बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।

न भूतो, न भविष्यति

आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नयी प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति।

यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नयी लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी। मशहूर शायर जावेद अख़्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”

डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीक़े और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।

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संपादन कला के हर पहलू का विश्लेषण

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज़ एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।

संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरूआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुज़रना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है।

संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है। संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।

मेरा मानना है शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97) शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

संपादन प्रक्रिया से जुड़े अनेक पहलुओं पर कई अध्यायों में विस्तृत चर्चा है। समाचारों के साथ चित्र चयन पर जो अध्याय है, उसे पढ़ते हुए मुझे स्मरण हुआ मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार’ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था… लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे, पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।

आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया। जब तक एक ख़बर पर भरोसा करो, उसका खंडन आ जाता है। ख़बरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फ़ैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टिकोण से यह किताब अध्ययन, मनन और सीखने, पढ़ते, गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।

मेरी समझ में असंपादित न्यूज़ की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गयी थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है। यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।

प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तारपूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है। पत्रकारिता जगत से जुड़े हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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