
- May 27, 2026
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पीयूष बबेले की कलम से....
जब नेहरू बोले, लेखक का दर्जा प्रधानमंत्री से बड़ा
नेहरू जी स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता होने के साथ ही एक आला दर्जे के लेखक थे। उनकी किताबें विश्व इतिहास की एक झलक, आत्मकथा और डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया का लेखक होने के साथ ही उन्होंने बहुत सी प्रतिष्ठित किताबों की भूमिका भी लिखी है। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद नेहरू साहित्य और संस्कृति के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे, लेकिन शुरू के दो-तीन साल पूरी तरह ग़रीबी, राहत और पुनर्वास पर फ़ोकस होने के कारण साहित्य संस्कृति के लिए वे दो-तीन साल ठहरे रहे। लेकिन जब शुरू हुए तो इतिहास रच दिया।
नेहरू के पत्राचार में इसकी झलक मिलती है। कला और संस्कृति से जुड़ा एक बढ़िया क़िस्सा देखिए। दिल्ली के श्रीराम सेंटर का नाम तो काफ़ी मशहूर है। कला और संस्कृति की दुनिया में इसकी अपनी धाक है। इस सेंटर का नाम लाला श्रीराम के नाम पर रखा गया है। लाला श्रीराम देश के बड़े उद्योगपित और मशहूर डीसीएम समूह के मालिक थे।
तो इन्हीं लाला श्रीराम ने 10 जनवरी 1949 को नेहरू जी को पत्र लिखा कि भारत से रजवाड़ों के ख़त्म होने के बाद से भारतीय कलाकार और लेखक तबाह होने की कगार पर पहुंच गये हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इन कलाओं को सरकारी संरक्षण दिया जाये। इसके अलावा एक वैधानिक बोर्ड बनाया जाये, जिसमें विशेषज्ञ, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग और कुछ प्रशासक शामिल हों। उन्होंने इस काम के लिए 50 लाख रुपये की मांग की।
नेहरु जी ने 17 जनवरी 1949 को जवाब लिखा, ‘मैं इस बात में आप से पूरी तरह सहमत हूं कि भारतीय संस्कृति और कलाओं के संरक्षण और विकास को प्रोत्साहन देने के लिए हमें कुछ करना चाहिए। मैं समझता हूं ऐसा करना राज्य की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए, बल्कि इन मामलों से निपटने के लिए एक विशेष विभाग होना चाहिए। फ़्रांस में इस काम के लिए मिनिस्ट्री ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स है। लेकिन फ़िलहाल हम इस स्थिति में नहीं हैं कि बड़ी रक़म की दरकार वाली ऐसी किसी योजना को चला सकें या उसमें शामिल हो सकें। मैं समझता हूं कि इस बारे में भविष्य में कुछ किया जाएगा। आपको नये साल की बहुत-बहुत मुबारकबाद।’

नेहरू पैसा किफ़ायत से ख़र्च कर रहे थे। कला-संस्कृति को अपनी बारी के लिए कुछ देर इंतज़ार करना था। 31 मई 1952 को संगीत नाटक अकादमी की स्थापना की गयी। 5 अगस्त 1954 को दिल्ली में ललित कला अकादमी की स्थापना हुई। इससे ठीक पहले 12 मार्च 1954 को साहित्य अकादमी का उद्घाटन हुआ। ये अकादमियां नेहरू और तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जुगलबंदी का परिणाम थीं।
साहित्य अकादमी शुरू होने के अगले ही दिन नेहरू ने जो किया वह ऐतिहासिक है। नेहरू ने साहित्य अकादमी के नवनियुक्त सचिव कृष्ण कृपलानी को महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के बारे में पत्र लिखा। नेहरू और निराला दोनों इलाहाबादी थे। नेहरू ने लिखा कि वैसे तो निराला बहुत बड़े कवि हैं और जब कभी रौ में आते हैं तो अब भी बहुत अच्छी कविता लिखते हैं। लेकिन वे फक्कड़ स्वभाव के हैं। उनके पास पैसा रुकता नहीं। उनकी किताबें वैसे तो ख़ूब बिकती हैं और पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं, लेकिन उन्होंने जिस तरह से रॉयलटी बेच दी है, उसमें सिर्फ़ प्रकाशकों को फ़ायदा होता है। निराला के हिस्से महीने में मुश्किल से 20-25 रुपये आते हैं।
नेहरू ने कृपलानी को सुझाव दिया कि अकादमी निराला को हर महीने 100 रुपये की मदद भेजा करे। साथ ही नेहरू ने ताक़ीद की कि यह पैसा सीधे निराला को न भेजा जाये क्योंकि वह क़लंदर तो न जाने किसे पैसा दे बैठेंगे इसलिए बेहतर होगा पैसा हर महीने कवियत्री महादेवी वर्मा को भेजा जाये। सचिव ने कहा कि प्रस्ताव तो बहुत अच्छा है, लेकिन शिक्षा मंत्री की म़ंजूरी ज़रूरी है। 16 मार्च को शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद़ की मंज़ूरी भी आ गयी।
तीन दिन के भीतर प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री ने एक कवि को दी जाने वाली विनम्र सहायता शुरू करा ली। कोई लाल फीता बीच में नहीं आया। यह गांधी के जवाहर का लोकतंत्र था जिसमें संवेदना थी, सम्मान था, तेज़ी थी और सबसे बढ़कर इंसानियत थी।
ऐसा नहीं कि नेहरू को सिर्फ़ निराला से ही प्यार था। उर्दू के महान शायर फ़िराक गोरखपुरी के लिए नेहरू बड़े भाई की तरह थे। नेहरू उन्हें रघुपति कहकर ही पुकारते थे। हिंदी के मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन से उनका निजी रिश्ता था। ऑल इंडिया रेडियो में उन्हें सम्मानित पद पर नियुक्त करने का पत्र नेहरू ने अपने हाथ से लिखा था। यही नहीं, अपनी मृत्यु से पहले महात्मा गांधी ने जो आख़िरी ख़त पंडित नेहरू को लिखा था, उसकी भाषा जब नेहरू नहीं पकड़ पा रहे थे, तो इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करने का आग्रह उन्होंने बच्चन जी से किया था।
इसी पत्र में बापू ने नेहरू को हिंद का जवाहर कहा था। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध किताब संस्कृति के चार अध्याय की भूमिका ख़ुद नेहरू ने लिखी। और हिंदी कविता को उसके पांव पर खड़ा करने वाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त नेहरू जी के क़रीबी थे। दोनों राष्ट्रकवियों को नेहरू ने राज्यसभा में सम्मानित जगह दी।
कवि और लेखकों की परेशानियों को वह ख़ूब समझते थे, क्योंकि ख़ुद भी लेखक थे। 25 जनवरी 1949 को लेखक नेहरू ने देश के वित्त मंत्री जॉन मथाई को पत्र लिखा: ‘मैं प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक लेखक की हैसियत से आपको यह ख़त लिख रहा हूं। इस पत्र के साथ मैं ‘लंदन टाइम्स’ की एक कतरन भी भेज रहा हूं, जिसमें जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का एक पत्र छपा है।’
18 जनवरी 1949 के ‘लंदन टाइम्स’ में बर्नार्ड शॉ ने संपादक के नाम पत्र में लिखा था: उनके जैसे पेशेवर लेखकों, नाटककारों और कंपोज़र्स को एक क़िस्म के जुए के धंधे में अपना जीवन काटना पड़ता है। एक मशहूर लेखक होने के बावजूद उनके कुछ नाटकों से तो उन पर पैसे की बरसात हो गयी, लेकिन बाक़ी नाटकों से उन्हें कुछ नहीं मिलता। बेहतर यह होगा कि लेखकों पर जो टैक्स लगाये जाएं, वह उनकी सालाना आमदनी के बजाय, तीन साल की औसत आमदनी पर आधारित हों। बर्नार्ड शॉ की इस बात को नेहरू भारतीय संदर्भ में देखना चाह रहे थे।
नेहरू पत्र में आगे लिखते हैं, ‘भारत में लेखकों की हालत इंग्लैंड से कहीं गयी-बीती है। मुझे लगता है कि उन्हें सहानुभूति और बढ़ावे की दरकार है। यह काम ठीक-ठीक कैसे किया जाये, यह आपके मंत्रालय को सोचना है। जिस तरह के एवरेज की बात इंग्लैंड में हो रही है, हो सकता है वह कुछ काम की हो। अपने निजी तजुर्बे से मैं आपको बता सकता हूं कि एक साल मुझे अपनी रॉयल्टी से 50 हज़ार रुपये तक मिल गये थे और उसके बाद कई साल तक मुझे रॉयल्टी से तक़रीबन कुछ भी नहीं मिला। जो 50 हज़ार रुपये मिले थे, वह तक़रीबन पूरे के पूरे टैक्स में चले गये, ख़ासकर तब जब सरकार के सदस्य के रूप में मुझे अतिरिक्त आमदनी होती है। हालांकि मेरे मामले का कोई मतलब नहीं है, फ़िलहाल मैं भारत के औसत लेखकों की समस्या आपके सामने रख रहा हूं.’
(नेहरू की पुण्यतिथि के अवसर पर ‘नेहरू: मिथक और सत्य’ पुस्तक का यह अंश लेखक द्वारा विशेष रूप से प्राप्त।)

पीयूष बबेले
पत्रकार के रूप में समाचार पत्र पत्रिकाओं में सेवाओं के बाद पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के मीडिया सलाहकार के रूप में सेवाएं। कला व साहित्य प्रेमी और 'नेहरू: मिथक और सत्य' जैसी किताबों के लेखक के रूप में भी चर्चित। संपर्क: 919871187260
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