shahrikaran ki samasya ke vishay par shayri blog by ashish dashottar
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

शहर की कीमत बढ़ी तो इंसान की घटी

    अभी वक़्त ने एक नये फ़ाइनेंशियल ईयर में क़दम रखा। इसमें यह तब्दीली नज़र आयी कि अब हर शहर में प्रॉपर्टी के रेट कई गुना बढ़ चुके हैं। असातज़ा कहते हैं जब किसी शहर की क़ीमत बढ़ती है तो वहां रहने वालों की क़ीमत उतनी ही घटती है। हक़ीक़त में आजकल इंसान का क़द जिस रफ़्तार से घट रहा है, शहर के जलवे उसी गति से बढ़ रहे हैं। शहर अपनी हदों को तोड़कर आगे बढ़ते ही जा रहे हैं।‌ सीमेट-कांक्रीट के जंगलों ने हरे-भरे जंगलों को ख़त्म कर दिया है। जैसे-जैसे हरियाली बाहर से ख़त्म हुई है, इंसान के भीतर की हरियाली भी ख़त्म हो गयी। वह रूखा हो गया है। उसके विचारों में और व्यवहार में भी यह रूखापन दिखायी दे रहा है। ज़िन्दगी को ख़्वाहिशों ने मैकेनिकल बना दिया है। मनुष्य मशीन में तब्दील हो रहा है और हमारा घर किसी अजायबघर में। इसीलिए कहना पड़ता है:

क़द्र होती ही नहीं रिश्तों की यारो आजकल
ख़्वाहिशों ने ज़िन्दगी को कर दिया मैकेनिकल

ऐसे में रिश्ते-नातों की बात करना तो बेमानी लगता है। एक ही घर में जब लोगों के बीच ‘मिस कॉल’ से बातें होने लगे, तब क्या उम्मीद करें कि कोई अपने पड़ोसी को पहचाने या मुहल्ले के हर घर के हर शख़्स की जानकारी रखे। ये चिंताएं हमारे बिगड़ते समाज की हैं और शाइरी भी इससे अछूती नहीं है। डॉ. बशीर बद्र कहते हैं:

इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं

आज का इंसान इतना ख़बरदार हो गया है कि उसे किसी की भी ख़बर नहीं। वह अपने अलावा हर किसी से बेख़बर है। न किसी से बात करता है, न मिलता-जुलता है और कहने को यह कि सारी दुनिया के बारे में उसे पता है। इस पूरी दुनिया को क़ैद करने के चक्कर में वह अपने क़रीब को भूल गया है, उसे भूलता जा रहा है। इसी दर्द को हफ़ीज़ जालंधरी ने यूं कहा:

हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके
तुमने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके

ये तब्दीलियां हर दौर में होती रही हैं मगर गुज़िश्ता दो दशकों में जो तब्दीलियां हुई हैं, उसने रिश्तों को हाशिये पर ला खड़ा किया है। संयुक्त परिवार ख़त्म हो गये हैं और न्यूक्लियर परिवार की शक्ल समाज ने अख़्तियार कर ली है। जिन घरों में कभी ताले नहीं लगते थे, वहां अब दिन भर ताले दिखायी देते हैं। ये तब्दीलियां ज़िन्दगी के बदलते मायनों की तरफ़ इशारा करती हैं। हम कुछ पाने की चाह में बहुत कुछ ऐसा छोड़कर जा रहे हैं, जो हमारे साथ होना चाहिए। छत की मुंडेर पर अब कोई परिंदा नहीं बैठता। किसी मुर्ग़े की बांग से अब दिन की शुरूआत नहीं होती। कोई कोयल अब आम पर बैठकर गीत नहीं गाती, क्योंकि हमने अपने बीच से मिठास के इन पेड़ों को ही ग़ायब कर दिया है। क़मर सिद्दीक़ी फ़तेहपुरी के अंदाज़ में कहें तो:

जाने कैसा हादिसा गुज़रा है अपने शहर पर
आसमाँ में दूर तक कोई परिंदा भी नहीं

यह बढ़ते शहरों की हक़ीक़त है। जहां तन्हाइयां दूर तक फैल चुकी हैं। जज़्बात ख़त्म हो रहे हैं। संवेदनशीलता मर चुकी है। किसी के सुख-दुख में एक होने की इच्छाएं अब नहीं उठतीं। किसी के ग़म में शामिल होने का मन अब नहीं करता। पत्थर के शहर में आकर फूलों-सा इंसान भी पत्थर की शक्ल अख़्तियार कर चुका है। शायद इसीलिए कैलाश माहिर ने कहा है:

तुम भी इस शहर में बन जाओगे पत्थर जैसे
हँसने वाला यहाँ कोई है न रोने वाला

शहर में आदमी इतना मसरूफ़ हो चुका है कि हर तरफ़ तनहाइयां नज़र आती हैं। हर कोई अपने आप तक सीमित हो गया है। हर किसी के अपने दायरे बन चुके हैं। हर किसी की नज़रें तंग हो चुकी हैं। हर किसी का दिल छोटा हो चुका है। ऐसे छोटे शहर में बड़ा दिल लेकर अगर कोई इंसान आना चाहे तो उसे जावेद नासिर का यह शेर सावधान करता है:

दोस्तो तुम से गुज़ारिश है यहाँ मत आओ
इस बड़े शहर में तनहाई भी मर जाती है

तनहाई का मरना इंसान का मरना है। तन्हाई का मरना इंसानियत का मरना है। शहरों में बढ़ती भीड़ वहां की तरक़्क़ी को ज़रूर बता रहै हैं मगर हक़ीक़त में वहां रहने वाला इंसान तनहाइयों से भी महरूम होता जा रहा है। तरक़्क़ी के क़रीब आकर भी अपनी ज़िन्दगी से बहुत दूर होता जा रहा है।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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