कमलकांत जी, अनघ जी.. प्यास और अंधेरे से भिड़ंत

संदर्भ: आती हुई तिथियों पर कमलकांत सक्सेना (05.10.1948-31.08.2012) और महेश अनघ (14.09.1947-04.12.2012) को याद करने के अवसर विशेष.. पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से…. कमलकांत जी, अनघ जी.....

तुम हमसे दो हाथ आगे निकले… क़तरा-क़तरा फ़हमीदा रियाज़

भवेश दिलशाद की कलम से…. तुम हमसे दो हाथ आगे निकले… क़तरा-क़तरा फ़हमीदा रियाज़             फ़हमीदा रियाज़ की याद आती है, तो ‘क़तरा-क़तरा’ उठा...

सेक्युलर, समाजवाद… शब्दों की लाश पर वबाल क्यों?

सेक्युलर, समाजवाद… शब्दों की लाश पर वबाल क्यों?               असल बात नीयत की है। जब संविधान बन रहा था, तब जवाहरलाल नेहरू और...

मुक्त सिनेमा बनाम ग़ुलाम सेंसर बोर्ड

मुक्त सिनेमा बनाम ग़ुलाम सेंसर बोर्ड              क़ैद में एक लड़की से पुलिस की सख़्त पूछताछ, शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना, पूछताछ में पुलिस के...

और ज़ुबान जीत जाती है

और ज़ुबान जीत जाती है चमत्कारों पर भरोसा न करने वाले सलमान रश्दी ने माना कि जानलेवा हमले से उनका ज़िंदा बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं रहा।...

सूचना-मुक्त होते हुए हम

सूचना-मुक्त होते हुए हम भारत-पाकिस्तान की सरहदों पर संघर्ष हुआ, फिर जंगबंदी हो गयी। जंग के हिमायती एक बहुत बड़े जनसमूह ने मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं भी पार कर...

आइए, खोजें कोई ‘हलगाम’

आइए, खोजें कोई ‘हलगाम’ हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है जन्नत कहा जाता है कश्मीर को। बनाया जाता...
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