March 12, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी युद्ध के नये मोर्चे और डिजिटल घेराबंदी विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. युद्ध के नये मोर्चे और डिजिटल घेराबंदी आज के समय में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और... और पढ़े
February 26, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी साहित्य के ठेकेदारों के नाम एक चिट्ठी हिंदी लेखक मनोज रूपड़ा के साथ एक कुलपति के आपत्तिजनक बर्ताव के बाद साहित्य जगत में प्रतिवाद का क्या हाल रहा? प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रियाओं का आलम क्या रहा? इस... और पढ़े
February 8, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी साठोत्तरी साहित्य: विद्रोही चेतना, विमर्श और द्वंद्व नोट्स विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. साठोत्तरी साहित्य: विद्रोही चेतना, विमर्श और द्वंद्व साठोत्तरी साहित्य भारतीय रचनाकाल का वह कालखंड है, जो... और पढ़े
February 3, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी कहानी के बदलते स्वरूप विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. कहानी के बदलते स्वरूप आज ए.आई. मॉडल, डिजिटल प्रभाव, ऑनलाइन पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया आदि कहानी लेखन और प्रसार... और पढ़े
January 15, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी ज्ञानरंजन का जाना ‘मान’ सहज व रोचक अंदाज़ में उस परिदृश्य को सामने लाती है, जो इस शती के पूर्वार्द्ध तक के समाज की तस्वीर रहा है। अंत में कहानी के पारंपरिक... और पढ़े
January 10, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी ज्ञानरंजन – उम्र भर सफ़र स्मरण निशांत कौशिक की कलम से…. ज्ञानरंजन – उम्र भर सफ़र ज्ञानरंजन (21 नवंबर 1936-7 जनवरी 2025) का 90 वर्ष की आयु में जबलपुर... और पढ़े
December 19, 2025 आब-ओ-हवा Uncategorized, टिप्पणी हंसी ही बचाव और सवाल ही उम्मीद साहित्य अकादमी सम्मान की रुकी घोषणा पर कटाक्ष विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. हंसी ही बचाव और सवाल ही उम्मीद सचिव का... और पढ़े
December 12, 2025 आब-ओ-हवा टिप्पणी क्यों बार-बार देखी जाये सत्यकाम? ‘याद आते रहेंगे धर्मेंद्र’ सिनेमा नोट्स ब्रज श्रीवास्तव की कलम से…. क्यों बार-बार देखी जाये सत्यकाम? सत्यकाम (1969), धर्मेंद्र इस फ़िल्म में सिर्फ़... और पढ़े
December 6, 2025 आब-ओ-हवा टिप्पणी अयोध्या का सफ़र 1990 से अब तक विवेक रंजन श्रीवास्तव (इन दिनों न्यूयॉर्क में) की कलम से…. अयोध्या का सफ़र 1990 से अब तक समय के प्रवाह में अयोध्या एक... और पढ़े
November 24, 2025 आब-ओ-हवा टिप्पणी तो क्या साहित्य सदा राजसत्ता का मुखापेक्षी रहेगा! विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. तो क्या साहित्य सदा राजसत्ता का मुखापेक्षी रहेगा! आदर्श स्थिति यही है कि साहित्य को राजनीति से... और पढ़े