युद्ध के नये मोर्चे और डिजिटल घेराबंदी

विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. युद्ध के नये मोर्चे और डिजिटल घेराबंदी             आज के समय में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और...

साहित्य के ठेकेदारों के नाम एक चिट्ठी

हिंदी लेखक मनोज रूपड़ा के साथ एक कुलपति के आपत्तिजनक बर्ताव के बाद साहित्य जगत में प्रतिवाद का क्या हाल रहा? प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रियाओं का आलम क्या रहा? इस...

साठोत्तरी साहित्य: विद्रोही चेतना, विमर्श और द्वंद्व

नोट्स विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. साठोत्तरी साहित्य: विद्रोही चेतना, विमर्श और द्वंद्व             साठोत्तरी साहित्य भारतीय रचनाकाल का वह कालखंड है, जो...

कहानी के बदलते स्वरूप

विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. कहानी के बदलते स्वरूप           आज ए.आई. मॉडल, डिजिटल प्रभाव, ऑनलाइन पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया आदि कहानी लेखन और प्रसार...

ज्ञानरंजन का जाना

‘मान’ सहज व रोचक अंदाज़ में उस परिदृश्य को सामने लाती है, जो इस शती के पूर्वार्द्ध तक के समाज की तस्वीर रहा है। अंत में कहानी के पारंपरिक...

हंसी ही बचाव और सवाल ही उम्मीद

साहित्य अकादमी सम्मान की रुकी घोषणा पर कटाक्ष विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. हंसी ही बचाव और सवाल ही उम्मीद             सचिव का...

क्यों बार-बार देखी जाये सत्यकाम?

‘याद आते रहेंगे धर्मेंद्र’ सिनेमा नोट्स ब्रज श्रीवास्तव की कलम से…. क्यों बार-बार देखी जाये सत्यकाम?             सत्यकाम (1969), धर्मेंद्र इस फ़िल्म में सिर्फ़...

तो क्या साहित्य सदा राजसत्ता का मुखापेक्षी रहेगा!

विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. तो क्या साहित्य सदा राजसत्ता का मुखापेक्षी रहेगा!             आदर्श स्थिति यही है कि साहित्य को राजनीति से...
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