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नियमित ब्लॉग विवेक मेहता की प्रस्तुति...

रंग बिरंगी: नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-11

             हिंदी-उर्दू के साथ ही भारतीय साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को प्रस्तुत करने की इस शृंखला में पाठकों की रायशुमारी और भागीदारी की अपेक्षा है। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए और अगर आपके पास भी ऐसे क़िस्से/प्रसंगों की यादें हैं, तो हमारे साथ साझा कीजिए अपना ख़ज़ाना …

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कन्नड़ में हंसना!

बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार श्री शिवराम कारंत के बचपन की यह घटना उनकी मातृभाषा के प्रति गहरे स्वाभिमान की झलक देती है। बाल्यावस्था में ही उन्हें अपनी मातृभाषा कन्नड़ पर इतना गर्व था कि उसके सम्मान के लिए वे दंड सहने से भी पीछे नहीं हटते थे।

उनके विद्यालय के प्रिंसिपल का कड़ा आदेश था, कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होने के कारण विद्यार्थी आपस में केवल अंग्रेज़ी में ही बातचीत करेंगे। इस नियम को तोड़ने के अपराध में कारंत को कई बार दंडित किया जा चुका था, लेकिन दंड भी उनके मातृभाषा-प्रेम को डिगा नहीं सका। वे अपने सिद्धांत पर अडिग रहे।

एक दिन कक्षा चल रही थी। उसी समय प्रिंसिपल महोदय कक्षा में आये और उन्होंने मज़ाक़ में कोई बात कह दी। पूरी कक्षा ठहाकों से गूंज उठी। बच्चे अपनी हंसी रोक नहीं पा रहे थे।

तभी कारंत अचानक अपनी जगह से उठ खड़े हुए और बड़ी सहजता से बोले— “आप सब कन्नड़ में क्यों हंस रहे हैं? अंग्रेज़ी में हंसिए!”

कक्षा में क्षण भर के लिए सन्नाटा छा गया। कारंत के इन थोड़े-से शब्दों में जितना व्यंग्य था, उससे कहीं अधिक गहरा अर्थ छिपा था। उन्होंने बिना किसी बहस या तर्क के यह सवाल सामने रख दिया था कि जब हंसी पर भी भाषा का पहरा हो, तो उस नियम की विडंबना क्या है!

प्रिंसिपल महोदय कारंत की बात का मर्म समझ गये। बालक की इस चतुराई में उन्हें उसकी मातृभाषा के प्रति दृढ़ स्वाभिमान भी दिखायी दिया और अपने आदेश की विसंगति भी।

उस दिन के बाद प्रिंसिपल ने कारंत को विद्यालय के अहाते में कन्नड़ में बातचीत करने के लिए कभी नहीं टोका। बालक कारंत की वह छोटी-सी बात मानो मातृभाषा के सम्मान की एक बड़ी घोषणा बन गयी।

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नाइट-शिफ़्ट

कॉफ़ी हाउस में यशपाल जी तथा अन्य स्थानीय लेखकों के साथ प्रबोध मजुमदार की पत्नी वाणी भी बैठी थीं। मेज़ पर कुछ मक्खियां भिनभिना रही थीं। उन्हें भगाने के व्यर्थ-प्रयास से भिन्नाकर वाणी ने यशपाल जी से कहा, “बाबा, पता नहीं रात को भी ये मक्खियां कहां से आ मरती हैं?”

यशपाल जी ने गंभीर स्वर में कहा, “ये नाइट शिफ़्ट वाली जो हैं।”

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कहान की चौहानी

एक गोष्ठी में मनहर चौहान ने अपनी कहानी पढ़ी- ‘युद्धज’। चर्चा के दौरान उस कहानी पर अश्लीलता का आरोप लगा। कहानी पर बोलने की अंतिम बारी थी गोष्ठी के अध्यक्ष विष्णु प्रभाकर की। वे ठहरे सहज स्वभाव के, सीधे-सादे भले मानस!

अश्लील कहानी का विवेचन करते हुए शुरू में ही उनकी ज़बान लड़खड़ा गयी। उनका पहला वाक्य था- “अभी आप लोगों ने मनहर कहान की चौहानी सुनी…”, और फिर तो ऐसा ठहाका बरपा हुआ कि..!

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मज़दूरों की तलाश

प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के अंतिम दिन आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कवि-गोष्ठी में अनामन्त्रित कवियों की भरमार थी। सौ कवियों की सूची में से रात दो बज जाने के बाद भी जब आधे कवि रचना पढ़ने से वंचित ही रह गये, तो गोष्ठी के संयोजक शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के पास जाकर वंचित कवियों के लीडर ने धमकी दी:

“हमें कविता-पाठ का अवसर नहीं दिया गया तो हम पंडाल उखाड़ देंगे।”

“ज़रूर उखाड़ देने की कृपा करें। सम्मेलन का आज अंतिम दिन है और आयोजक पंडाल उखाड़ने के लिए मज़दूरों की तलाश में ही हैं”- सुमन जी ने शांत चित्त होकर उत्तर दिया।

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चोटी के…

दिल्ली में यशपाल के सम्मान में एक आयोजन हुआ। विद्यानिवास मिश्र भाषण देने के लिए उठे तो उनकी लम्बी, सुडौल चोटी भी लहरा उठी।

जनता में से एक आवाज़ आयी, “भई, ये कौन हैं?”

दूसरी आवाज़ सुनायी दी, “चोटी के साहित्यकार।”

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ, 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

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