दुष्यंत कुमार, dushyant kumar
आलोचना ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....

कब तक दुष्यंत की पीठ खुजाएगी 'हिंदी ग़ज़ल'?

             मैं जानता हूँ दुष्यंत पर कुछ भी निगेटिव लिखकर लोगों की नाराज़गी ही मोल लूँगा, लेकिन क्या करूँ आदत जो बुरी पड़ गयी है। एक बार कुमार विश्वास की किसी ग़ज़ल पर कुछ कहकर एक बड़ी आक्रामक भीड़ में फँस गया था। जब कुमार विश्वास के लिए लोग मरने-मारने पर उतारू हो सकते हैं, तो दुष्यंत के लिए तो घर पर पथराव भी कर सकते हैं। दुष्यंत हर तरह से कुमार विश्वास से बेहतर हैं। मेरे कई मित्रों ने दुष्यंत पर, लीक से हटकर लिखने से मना किया था। उनका कहना था ऐसा करने से मैं मज़ाक़ का पात्र बन जाऊँगा। कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया था कि लोग मुँह पर थूकेंगे। ख़ैर, अब जब ओखली में सर डाल ही दिया है तो यह सब सोचने की ज़रूरत नहीं है। मुझे लगता है जब तुलसी और ग़ालिब जैसे रचनाकारों पर पूरी स्वतंत्रता से लिखा जा सकता है, यहाँ तक कि ऋणात्मक भी, तो दुष्यंत पर क्यों नहीं। चलिए आगे बढ़ते हैं।

इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि दुष्यंत न होते तो हिंदी में ग़ज़ल विधा इतनी लोकप्रिय न होती। ध्यान रहे कि मैं लोकप्रिय होने की बात कह रहा हूँ समृद्ध होने की बात नहीं कह रहा। मुझे लगता है कि हिंदी ग़ज़ल पीठ खुजलाने वालों से परेशान है। सब एक-दूसरे की पीठ खुजला रहे हैं। सब एक-दूसरे को महान बता रहे हैं। हम इसे क्षद्म शिष्टता भी कह सकते हैं।

दुष्यंत के अवसान और साये में धूप के प्रकाशमान होने का 50वां वर्ष संपन्न हो रहा है। रवायत यही है कि ऐसे उल्लेखनीय अवसरों पर क़सीदे ही पढ़े जाएं लेकिन मैं बस दूसरे पक्ष पर निगाह करना चाहता हूं। दुष्यंत की ग़ज़लों की महानताएं बताने वाले लेख और टिप्पणियों की संख्या कम नहीं है। दुष्यंत ने जो कारनामे अपनी शायरी से किये हैं, मुझे हर बात से ऐतराज़ भी नहीं है। और यह भी है कि यही सब दोहराते रहने से लाभ भी क्या! तो इस टिप्पणी में हम भाषाई स्तर पर दुष्यंत की पड़ताल करेंगे और लगे हाथ कुछ और पहलुओं को भी टटोलते चलेंगे। वैसे तो मैं भाषाई पचड़े से बचता हूँ किंतु आज ज़रा इसमें पड़कर देखता हूँ। एक बहुत बड़ी भीड़ दुष्यंत को हिंदी का ग़ज़लकार मानती है। स्वयं दुष्यंत भी। ऐसे में एक निकष की आवश्यकता पड़ती है। हम अगर हिंदी शब्दावली को आधार मानकर आगे बढ़ते हैं तो दुष्यंत इस पर बिल्कुल खरे नहीं उतरते। एक ग़ज़ल देखते हैं:

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं कमीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक़ न कर
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने के लायक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं

इस ग़ज़ल में आये शब्द ज़मीन, कमाल, यक़ीन, नज़ारे, तमाशाबीन, ज़ुबान, ज़लील, बेहतरीन, अदीब, सियासी, कमीन, ख़ुदी, हलाक, क़सम, पुर्ज़ा, मशीन दुष्यंत जी को हिंदी के क्यों लग रहे हैं, मुझे नहीं पता। शायद इसलिए कि ये हिंदी के शब्दकोश में मिल जाते हैं मगर इसमें से कुछ शब्द तो हिंदी के प्रचलन में भी नहीं हैं सामान्य बोलचाल में तो ये बिल्कुल ही नहीं बोले जाते हैं। ऐसे में दुष्यंत जी को हिंदी का मानना बहुत उचित नहीं लगता। अगर उचित है तो फिर वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, निदा फ़ाज़ली बेकल उत्साही, बशीर बद्र, राहत इंदौरी और मंज़र भोपाली जैसे रचनाकारों को भी हिन्दी का ही माना जाना चाहिए। ख़ैर, लगे हाथ कुछ इज़ाफ़त वाले शब्द भी देख लेते हैं। कुछ शेर:

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज़-कम एक वह चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

मौलवी से डाँट खाकर अहले-मकतब
फिर उस आयत को दोहराने लगे हैं

अब नयी तहज़ीब के पेशे-नज़र
हम आदमी को भूनकर खाने लगे हैं

आपसे मिलकर हमें अक्सर लगा है
हुस्न में अब ज़ज्ब-ए-अमजद नहीं है

हालाते-जिस्म सूरते-जाँ और भी ख़राब
चारों तरफ ख़राब यहाँ और भी ख़राब

नज़र-नवाज़ नज़ारे बदल न जाएं कहीं
ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है

कम-अज़-कम, अहले मक़तब, पेशे-नज़र, ज़ज़्ब-ए-अमजद, हालाते-जिस्म, सूरते-जाँ, नज़र नवाज़, मस्लहत-आमेज़, जैसे अरबी फ़ारसी के इज़ाफ़त वाले शब्द, क्या किसी साज़िश के तहत किसी दूसरे व्यक्ति ने इस महान हिंदी शायर की ग़ज़लों में ठूंस दिये हैं? अगर इन शब्दों को दुष्यंत जी ने स्वयं अपनी इच्छा से अपनी ग़ज़लों में रखा है, तो हिंदी ग़ज़लकार होने का इनका दावा पूरी तरह से खोखला है।

दुष्यंत जी के एक और दावे की पड़ताल करते हैं। आपने ‘साये में धूप’ की भूमिका में लिखा है कि आपने उर्दू-दाँ दोस्तों के ऐतराज़ के बावजूद उर्दू के शब्दों को उर्दू की तरह प्रयोग में न लाकर ठीक वैसे प्रयोग किया जैसे वे हिंदी में लिखे, पढ़े या बोले जाते हैं। अपनी सफ़ाई में लिखा भी है आप ‘शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर ‘शह्र’ वाले पचड़े से बच सकते थे, किंतु आपका यह दावा भी झूठा निकला। आपने कितनी ही जगहों पर ‘शह्र’ वज़न पर ही शब्द प्रयोग किया है। यहाँ तक कि ‘सुब्ह’ का भी प्रयोग है। कुछ शेर देखते हैं:

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वे सबके सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शह्र में यह शोर सुन-सुनकर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा

ख़ामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर
कर दी है शह्र भर में मनादी तो लीजिए

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

पहले शेर में आये शब्द ‘परीशाँ’ का प्रयोग दुष्यंत जी अपने बोलचाल में करते होंगे, उनके दोस्त उर्दू-दाँ हैं, लेकिन हिंदी की आम जनता तो ‘परेशान’ शब्द का ही प्रयोग करती दिखायी देती है। इसी तरह बाद के दोनों शेरों में आया ‘शहर’ ‘शह्र’ बनकर ही ग़ज़ल में आया हैं। ‘शह्र’ का प्रयोग भी हिंदी जनता नहीं करती। अंतिम शेर में ‘सुबह’ भी ‘सुब्ह’ बनकर आया है। मुझे समझ में नहीं आता कि दुष्यंत जी बेकार के दावे क्यों कर रहे हैं। सच तो ये है कि दुष्यंत जी ने अपनी सुविधा के अनुसार शब्दों का प्रयोग किया है। जब ‘शह्र’ की ज़रूरत पड़ी है तब ‘शह्र’ का प्रयोग किया है और जब ‘शहर’ की ज़रूरत पड़ी है तब ‘शहर’। लगे हाथ ‘शहर’ वाला शेर भी देख लेते हैं:

कहाँ तो तय था चराग़ां हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ आपने ‘शहर’ को (lS) के वज़्न में लिया है। ख़ैर, अब ज़रा दूसरी तरफ़ चलते हैं। आपने लिखा है कि आपने अपने दुःखों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए ग़ज़ल कही है। ज़रा आपका दुःख भी देख लेते हैं:

अफ़वाह है या सच है यह कोई नहीं बोला
मैंने भी सुना है अब जाएगा तेरा डोला

दुष्यंत कुमार, dushyant kumar

दुष्यंत जी के इस शेर को पढ़कर ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा के वे सड़क छाप मजनूं तुरंत याद आ जाते हैं, जो नयी-नयी जवानी की दहलीज़ चूम रहे होते हैं। जहाँ तक कहन की बात है इतना हल्का और कमज़ोर है कि इनको ग़ज़लकार कहने में भी शर्म आ जाये। ग़ज़ल जैसी सिन्फ़ को इतने कुरूप तरीक़े से कहना वाक़ई एक अपराध माना जाना चाहिए। दुःख तो इस बात का है कि इनके यहाँ ऐसे शेरों की भी भरमार है। दुनिया इन्हें ग़ज़ल का न जाने क्या-क्या मानती है। एक और शेर देखते हैं:

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतंभरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा

एक और शेर देखें:

हमने भी पहली बार चखी तो बुरी लगी
कड़वी तुम्हें लगेगी मगर एक जाम और

इस शेर पर गंभीर प्रतीक भी आरोपित किया जा सकते हैं मगर इसके पहले के दोनों शेरों को पढ़ने के बाद मुझे नहीं लगता कि किसी गंभीर प्रतीक की गुंजाइश बची है। इस शेर का मतलब चाहे जो हो किंतु इसे पढ़कर मुझे हिंदी सिनेमा के वे नुक्कड़ वाले छिछोरे ही याद आते हैं, जो आती-जाती लड़कियों पर फब्तियाँ कसते हैं। कवि सम्मेलनी गीतों का प्रभाव साफ़ नज़र आ रहा है। अगर दुष्यंत साहब ने अपना ध्यान दूसरी ओर न ले जाकर इश्क़ पर संजीदा गुफ्तगू की होती तो यह हल्कापन न आता। ख़ैर आपने अकविता और मुक्त कविता को छंद के ख़िलाफ़ साज़िश माना है तो क्यों न आपकी ग़ज़लों से ही छंदों की जांच शुरू की जाये। चलिए एक शेर देखते हैं:

घुटने पे रख के हाथ खड़े थे नमाज़ में
आ-जा रहे थे लोग ज़ेह्न में तमाम और

इस शेर की रुक़्न है:
मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन
S S I S I S I I S S I S I S

इस लिहाज़ से देखने पर दुष्यंत साहब का पहला मिसरा तो दुरुस्त लगता है किंतु दूसरा मिसरा ज़ेह्न तक पहुँचते-पहुँचते मुँह के बल गिर पड़ता है। दूसरा शेर देखते हैं:

एक खंडहर के हृदय से एक जंगली फूल-सी
आदमी की पीर गूंगी ही सही गाती तो है

इस शेर की रुक़्न है:
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन
S I S S S I S S S I S S S I S

इस लिहाज़ से देखें तो पहला मिसरा ही गच्चा खाता दिखायी दे रहा है। ‘जंगली’ शब्द ने बीच में आकर सब गुड़ गोबर कर दिया है। एक और शेर देखें:

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहें
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

इस शेर की रुक़्न है:
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन
S I S S S I S S S I S S S I S

इस तरह यहाँ भी पहला मिसरा तो ठीक ठहरता है, किंतु दूसरा मिसरा चक्कर खाकर गिरता दिखायी दे रहा है। थोड़ा और आगे बढ़ते हैं:

तू परेशान है तू परेशान न हो
इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली

इस शेर की रुक़्न भी लड़खड़ाती-सी दिख रही है। रुक़्न है:
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फेलुन
S I S S I I S S I I S S S S

इस तरह देखने पर पहला मिसरा बे-बह्र लग रहा है। अब ज़रा रदीफ़ की ग़लतियों की तरफ चलते हैं। कुछ शेर:
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पाँव घुटने तक सना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है

इन दोनों शेरों के अंत में ‘है’ आने की वजह से तकाबुले-रदीफ़ का दोष आ गया है।

पिछले सफ़र की न पूछो, टूटा हुआ एक रथ है
जो रुक गया था कहीं पर, फिर साथ चलने लगा है

ये दोनों पंक्तियां अगर शेर हैं तो यहाँ भी ‘है’ की वजह से तकाबुले-रदीफ़ दोष है। इन दोषों को बड़ी आसानी से हटाया जा सकता था, लेकिन रचनाकार में इन दोषों से बचने की कोई दिलचस्पी दिखायी नहीं दे रही। उर्दू-दाँ दोस्त जो ‘शहर’ को ‘शह्र’ करवाने की पैरवी कर रहे थे, वे भी शायद गच्चा खा गये। कहीं ऐसा तो नहीं कि दुष्यंत साहब को रदीफ़ की इन ग़लतियों का इल्म ही न हो। ऐसे तो तमाम दावों की हवा ही निकल जाएगी!

इस क़दर टूटे हुए चेहरे नहीं हैं
जिस तरह टूटे हुए ये आईने हैं

यहाँ भी रदीफ़ आपस में मूड़-फुड़ौवल कर रहे हैं अब ज़रा क़ाफ़िये के दोषों के उदाहरण देखें:

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे-बहस ये मुद्दआ

इस शेर में आगे के काफ़िये साँवला, कुआँ, धुआँ, और खिड़कियाँ हैं। ये किसी भी तरह से फ़िट नहीं बैठते। यहाँ एक बात और कहना चाहूंगा कि ‘मुद्दआ’ भी हिंदी में अपने इस रूप में प्रचलित नहीं है जैसा कि शायर ने अपनी भूमिका में दावा किया है। इस ग़ज़ल के क़ाफ़िये दो ग़ज़लों के एक साथ गड्डम-गड्ड होने का भ्रम भी पैदा कर रहे हैं। ख़ैर…

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतंभरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा

इस शेर में काफ़िया ‘ऋतंभरा’ और ‘भरा’ हैं मगर बाद के एक शेर में ‘सिरा’ काफ़िया होने की वजह से शेर ख़ारिज हो जाता है। ऐसे में सारे बड़े-बड़े दावे बेमानी लगने लगते हैं। उदाहरण कम नहीं हैं:

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

इस ग़ज़ल में कुछ काफ़िये तो सही हैं मगर बाद के पतवारें तलवारें और दीवारें जैसे शब्द काफ़िये की मिट्टी पलीद कर देते हैं।

अब इस छोटी सी टिप्पणी में और क्या-क्या लिखूँ। इन खोखले दावों और दोषों के अतिरिक्त भी न जाने कितने दोष हमें ‘साये में धूप’ की 52 ग़ज़लों में मिल जाएंगे। जो ग़लतियाँ और दावे पाठकों को अधिक आहत करते हैं उन्हें मैंने यहाँ दिखा दिया है। इसके अतिरिक्त तनावफ़ुर दोष, अतिरिक्त पद दोष, शब्द क्रम दोष, शुतुरगुर्बा दोष, मुज़क्कर-मुअन्नस दोष के अनगिनत उदाहरण देखे जा सकते हैं। क़ाफ़िया, रदीफ़, बहर आदि ये सब ग़ज़ल की प्राथमिक शर्तें हैं और हमने देखा कि दुष्यंत की ग़ज़लें इन आधारभूत बातों पर ही कितनी ठहर पा रही हैं। सच तो ये है कि दुष्यंत उस समय दौड़ में अकेले ही दौड़ रहे थे इस वजह से इन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हो गया। कुछ पत्रिकाओं ने भी इन्हें आश्चर्यजनक रूप से आगे बढ़ाया। सच कहूँ तो कमलेश्वर जी ने तथा धर्मवीर भारती जी ने अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से इनका एडवरटीज़मेंट किया, इस तरह भी दुष्यंत, दुष्यंत बन सके।

ज्ञानप्रकाश पांडेय, gyan prakash pandey

ज्ञानप्रकाश पांडेय

1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।

10 comments on “कब तक दुष्यंत की पीठ खुजाएगी ‘हिंदी ग़ज़ल’?

  1. बहुत तफ्तीश के बाद लिखा गया आलेख। ऐसे आलेख लिखने के लिए साहस की जरूरत होती है।मुबारकबाद

  2. आप तार्किक रूप से बिलकुल सही हैं, पर आप को मानना पड़ेगा कि उनकी ग़ज़ल की भाषा आम बोल चाल की, राजनीतिक सामाजिक मुहावरों से भरी और सीधे संवाद करने वाली है , ग़ज़ल को विशुद्ध उर्दू ग़ज़ल के व्याकरण , नज़ाकत और इश्क़िया शब्दावली के दायरे से बाहर निकालकर व्यापक बनाने वाली। शायद इसलिए ही वे लोकप्रिय होते गए ।

  3. कब तक दुष्यंत की ग़ज़लों की पीठ खुजलाएगी हिंदी ग़ज़ल ? एक प्रतिक्रिया।
    समालोचना यदि निहित स्वार्थ से प्रेरित न हो तो किसी भी विधा की जड़ता को तोड़ती है। दुष्यंत ने भूमिका में ही कहा है कि उन्होंने उर्दू शब्दों का प्रयोग जान बूझकर किया है। उनकी मजबूरी को और ग़ज़ल की तासीर को समझने की ज़रूरत है। ग़ज़ल एक अंदाज़-ए-बयाँ है। जब ग़ालिब ने फ़ारसी से उर्दू में ग़ज़ल लिखना शुरू किया था तब उन्होंने भी फारसी के शब्दों को उर्दू में वैसे ही प्रयोग किया था जैसे हिंदी कविताओं में संस्कृत के शब्दों का प्रयोग होता था। अब यदि ग़ज़ल में शेरियत को बनाये रखने के किए उर्दू के शब्दों का प्रयोग दुष्यंत करते हैं तो क्या बेज़ा बात हो गई। इस तरह के प्रयोग हिंदी ग़ज़ल में शुरू से ही होने की परंपरा रही है।
    ग़ज़ल अरबी और फारसी से होती हुई उर्दू से पहले हिन्दी में आई और अमीर खुसरो ने फारसी, हिन्दी और लोक भाषाओं के मिले-जुले प्रयोग से ग़ज़ल को एक नया रूप प्रदान किया। अमीर खुसरो के बाद कबीर दास, प्यारे लाल शोकी और गिरिधरदास से होती हुई ग़ज़ल आधुनिक काव्य तक पहुँची। हिन्दी में भक्ति काल साहित्य के कवियों द्वारा गीत, चैपाई, दोहा और पदों जैसे छन्दों को अपनाये जाने के कारण ग़ज़ल जैसे काव्य रूप पर उनका ध्यान नहीं गया। रीति कालीन कवियों ने दोहा, सवैया, धनाक्षरी आदि छन्दों में रचनाएँ की। हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल के अध्येताओं ने मीराबाई के कुछ पदों एवं केशवदास की रामचन्द्रिका में ग़ज़ल के छन्दशास्त्र की लय लक्षित की है, किन्तु ग़ज़ल का व्यवस्थित लेखन भारतेन्दु युग में ही मिलता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, रुद्र प्रताप नरायण मिश्र, बद्री नारायण चौधरी, प्रेमघन आदि ने इस युग में अच्छी गजलें लिखी हैं। भारतेन्दु जी का एक शेर है।

    हिला देंगे अभी ऐ संगे दिल तेरे कलेजे को,
    हमारी आतिशेबारी से पत्थर भी पिघलते हैं।

    द्विवेदी युगीन कवियों में श्रीधर पाठक, मैथिलीशरण गुप्त, केशव प्रसाद मिश्र, मन्नन द्विवेदी, सत्य नारायण, कवि रत्न बदरीनाथ भट्ट, ठाकुर गोपाल शरण सिंह, राय देवी प्रसाद पूर्ण, राम नरेश त्रिपाठी, लाला भगवानदीन इत्यादि ने गजलें लिखीं। इन कवियों ने उर्दू लयाधारों और हिन्दी छन्दों को भी अपनाया। यहाँ ग़ज़ल की अन्तर्वस्तु मुख्य रूप से भक्ति और देशप्रेम है।

    राम नरेश त्रिपाठी का एक उदाहरण देखें
    मैं हूँढता तुझे था जब कुंज और वन में,
    तू खोजता मुझे था तब दीन के वतन में।

    छायावाद के कवियों में मुख्य रूप से जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी ने ग़ज़लें लिखी। प्रसाद के कविता-संग्रहों एवं नाटकों में उनकी गजलें संकलित हैं। उनकी ग़ज़लों में ग़ज़ल के नियमों का बखूबी निर्वाह हुआ है।

    छायावादी कवियों में निराला ऐसे महत्वपूर्ण रचनाकार हैं जिन्होंने सामाजिक विद्रपताओं, असमानताओं और शोषण को विषय बनाकर अनेक खूबसूरत गजलें लिखी जो उपसंहार ‘बेला’ में संकलित है। बेला के आवेदन में उन्होंने लिखा है कि सबसे बढ़कर नई बात यह है कि अलग-अलग बहरों की गजलें भी हैं जिनमें फारसी के छन्दशास्त्र का निर्वाह किया गया है। निराला की गजलों की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी जनपक्षधरता राजनीतिक समझ और व्यंग्य की तीखी मार-

    भेद खुल-खुल जाय वो सूरत हमारे दिल में है,
    देश को मिल जाय जो पूँजी तुम्हारी मिल में है।

    प्रेमचंद की कहानियों में और बाद की कहानियों में भी अनेकों उर्दू शब्द मिलते हैं। क्या वे सभी कहानियाँ कटघरे में खड़ी की जानी चाहिए। हिंदी तभी सशक्त होगी जब दूसरी भाषा के शब्दों को भी शामिल करेगी। ये दोनों भारत की देशज भाषाएं हैं। इनमें आवाज़ाही आरम्भ सेठी रही है।
    हिंदी और उर्दू ग़ज़ल में एक बड़ा अंतर यह है कि उर्दू ग़ज़ल आज भी इश्क़ और मुश्क कि बात करती दिखती है। हिंदी ग़ज़ल इश्क़-मुहब्बत के पायदान से उतर कर आम आदमी के दर्द, मुसीबतों और मुश्किलों के साथ मुहब्बत की भी बातें करती दिखती है। हिंदी ग़ज़ल साधारण तौर पर रदीफ़ और क़ाफ़िया का पालन तो करती गई लेकिन शायर बह्र के मामले में कभी तो बह्र बिठाते हैं कई बार बह्र से समझौता करके शेर में जान डालने की कोशिश करते हैं। ग़ज़ल में बह्र का मसला शेर की गेयता से भी जुड़ा है। उर्दू ग़ज़ल कोठों और दरबारों में गाये जाने के कारण उनका बह्र में होना ज़रूरी था। हिंदी ग़ज़ल मुख्यतः कही या पढ़ी अधिक जा रही है इसलिए गेयता की पाबंद नहीं रही। बह्र में ग़ज़ल कहने की मजबूरी पर ग़ालिब का एक शेर इस तरह है-

    ब-क़द्र-ए-शौक़ नहीं ज़र्फ़-ए-तंगना-ए-ग़ज़ल,
    कुछ और चाहिए वुसअत मिरे बयाँ के लिए।

    दुष्यंत की ग़ज़लों की बहर पर मिथिलेश वामनकर ने एक पूरी किताब लिखी है। ज्ञान प्रकाश उसे देख लेते तो उन्हें इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। कहीं ऐसा तो नहीं है ज्ञान प्रकाश पांडे ख़ुद की ज़मीन खोजने के प्रयास में दुष्यंत के खेत खोदने लगे हैं। हम बिल्कुल नाराज़ नहीं हैं बल्कि आलोचना के स्तर पर हँस रहे हैं।

    सुरेश पटवा

    1. बहुत सारगर्भित एवं विवेक सम्मत बातें।
      सराहनीय

  4. आलोचना किसी की भी हो सकती है,होनी भी चाहिए। दुष्यन्त कुमार की यहाॅं जो आलोचना की गई है उसका आधार उर्दू अरबी-फारसी से होकर आया हुआ छंदशास्त्र है जिसकी हिन्दी ग़ज़लों के सन्दर्भ में अब कोई उपयोगिता नहीं है। हिन्दी के सक्षम कवि हिन्दी वर्णवृत्तों में बहुत अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं।
    प्रश्न यह है कि किसी कवि की सामर्थ्य का पता उसके कथ्य से ही अधिक चलता है।छंद के रचनात्मक निर्वाह में तो गोस्वामीजी ने भी छूट ली है। वैदिक छंदोमीमांसा में तो एकाध अक्षरों की घटत बढ़त को स्वीकार किया गया है यदि कथ्य की रक्षा हो रही हो तो।
    *इसलिए आपके इस लेख में मुझे कुंठा के स्वर अधिक लीग रहे हैंं*
    बेहतर हो कि दुष्यन्त कुमार से बेहतर रच कर दिखाएं।

  5. नित्यानंद श्रीवास्तव जी और सुरेंद्र पटवा जी ने की प्रतिक्रिया के बाद कुछ कहना बाकी नहीं रहा। ज्ञान जी की आलोचना एक मुर्दा आलोचना की तरह यहाँ आई है। चार शेरों को देखकर छंद के दोष गिना रहे हैं। मात्राएँ गिन रहे हैं। उनके सेट बना रहे हैं। हुजूर आप तो तुलसी, सूर,कबीर सभी को ख़ारिज़ कर देंगे। उनके यहाँ भी ऐसी गलतियांँ मिलती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि दुष्यंत कह क्या रहे थे। उनकी प्राथमिकता में कथ्य और उसके कहने का फार्म दोनों थे लेकिन प्राथमिकता कथ्य को दी गई है। फार्म को प्राथमिकता देने की ज़िद के कारण ही उर्दू ग़ज़ल अपने पारम्परिक कर्म-क्षेत्र से बहुत धीरे-धीरे निकल पा रही है या कोशिश में है। इसलिए दुष्यंत को इस तरह देखते हुए हम दरअसल कविता देख ही नहीं रहे होते।

  6. बहुत सारगर्भित एवं विवेक सम्मत बातें।
    सुरेश पटवा जी नित्यानंद जी एवं राजा अवस्थी जी

    आपके तर्क़ पूर्ण विचार सराहनीय हैं।

    1. सादर धन्यवाद आपको। दरअसल कविता में प्रथम दृष्टया कविता ही देखने चाहिए। रूप तो द्वितीयक वस्तु है। यह ठीक इस तरह है कि हम किसी हिमाचल में रहने वाले व्यक्ति के गठन को देखकर चीनी कह दें। यह प्रवृत्ति और यह दृष्टि बहुत ख़तरनाक है। इससे उबरना बहुत जरूरी है कविता के लिए भी और मनुष्यता के लिए भी।

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