
- May 28, 2026
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डॉ. नौमान की कलम से....
दुनिया भर के चहेते शायर थे बशीर बद्र..
‘आमद’, ‘इकाई’, ‘इमेज’ शेरी संकलनों के ख़ालिक (रचनाकार) अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त, पद्मश्री से नवाज़े गये उर्दू शायर एवं साहित्यकार डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से बीमार थे। अपनी याददाश्त तक़रीबन खो चुके थे। भोपाल में 28 मई को इत्तेफ़ाक़ से ईद के मौक़े पर आपने आख़िरी सांस ली और शायरी की दुनिया के साथ ही अपने चाहने वालों को ग़मगीन कर गये।

डॉ. बशीर बद्र ने 90 बरस से अधिक उम्र पायी, हालांकि पिछले कुछ सालों में उनकी सेहत ने उनका साथ नहीं दिया इसलिए अदबी महफ़िलों और पब्लिक इवेंट्स में वह दिखायी नहीं देते थे।
उनकी तालीम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुई। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल पर तहक़ीक़ी मक़ाला (शोध प्रबंध) लिखकर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की थी।
उनका ताल्लुक मेरठ से रहा और 80 की दहाई के दौरान वह भोपाल चले आये थे। भोपाल में बसने से पहले ही वह मुशायरों के कामयाब शायर के तौर पर मशहूर हो चुके थे।
बाद में, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री वाले दौर में बीजेपी भी जॉइन कर ली थी। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के चेयरमैन पद पर रहते हुए, अतंरराष्ट्रीय मुशायरों में शिरकत करते हुए उन्होंने साहित्य की सेवा की और अपनी शायरी की जो दौलत लुटायी, उसे भुलाया नहीं जा सकता।
बशीर बद्र का अदबी सफ़र तवील मुद्दत तक जारी रहा। वह मुन्फ़रिद लबो—लहजे के शायर होने की वजह से अपनी एक अलग पहचान रखते थे। उनकी शायरी का डिक्शन आम शायरों से मुख़्तलिफ़ और मख़सूस था। वह शायर ही नहीं बल्कि बड़े मुशायरों के कामयाब नाज़िम यानी संचालक/सूत्रधार भी माने गये।
बशीर बद्र ने अपने मुन्फ़रिद कलाम से उर्दू शायरी में शोहरत और मक़बूलियत हासिल की ही, साथ ही साथ हिंदी के शेरी और अदबी हलक़ों में भी इस शायरी को मक़बूल बनाया। उर्दू और हिंदी के कई कवियों या शायरों के कलाम पर इस्लाह दी। नयी पीढ़ी को जिस तरह उन्होंने हौसला दिया, वह भी भुलाया नहीं जा सकेगा।
पद्मश्री बशीर बद्र का इंतक़ाल (निधन) हिंदी और उर्दू अदब का एक ऐसा नुक़सान है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके कुछ मशहूर अशआर यहां पढ़ लेते हैं :
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
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सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
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दुश्मनी का सफ़र इक क़दम दो क़दम
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएँगे
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
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दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
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ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
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बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
***
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
***
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
***
यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे
***
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
***
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
***
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
***
तुम मुझे छोड़ के जाओगे तो मर जाऊँगा
यूँ करो जाने से पहले मुझे पागल कर दो
***
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
***
तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा
***
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझको मिरा महबूब समझते होंगे
***
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
***
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है
***
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिजक गई
***
उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है
***
मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता
***
हज़ारों शेर मेरे सो गये काग़ज़ की क़ब्रों में
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता
***
ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे

मो. नौमान ख़ान
उर्दू साहित्य की सात किताबों के लेखक, 6 किताबों के संपादक और दर्जनों पाठ्यपुस्तकों के संकलक/संपादक रह चुके हैं डॉ. नौमान। सवा सौ ज़्यादा शोधपत्र प्रकाशित हैं। आधा दर्जन साहित्यिक किताबें प्रकाशनाधीन हैं। दर्जनों सेमिनार में बतौर एक्सपर्ट वक्ता शामिल होने के साथ ही आपको आधा दर्जन से ज़्यादा महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। 2 जुलाई 1952 को जन्मे डॉ. नौमान एनसीईआरटी में प्रोफ़ेसर रहे हैं और बतौर पत्रकार और महत्वपूर्ण अकादमिक संस्थानों में सेवाएं दे चुके हैं।
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