
- November 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
न ज़िम्मेदार है प्रेस न आज़ाद, फिर भी दिवस?
‘पत्रकारिता में जन-विश्वास को मज़बूत करना’ इस बार राष्ट्रीय प्रैस दिवस (16 नवंबर हर साल 1966 के बाद से) की थीम है। यह थीम क्या कहती है? स्वर यही है कि पत्रकारिता में जन विश्वास मज़बूत नहीं है इसलिए यह ज़रूरत पेश आ रही है। अब सवाल खड़े होते हैं कि क्यों मज़बूत नहीं है? कबसे नहीं है? ऐसा कैसे हो गया? इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही गयी पत्रकारिता, क्या अब स्तंभ रूप में शेष है भी? यह लोकतंत्र के बजाय सत्ता का एक स्तंभ बनकर तो नहीं रह गयी?
‘सबका साथ सबका विकास’ नारा 2014 में गूंजा था। पत्रकारिता का पतन होता चला गया। पत्रकारिता का विकास क्यों नहीं हुआ? क्या यह विषय राष्ट्रीय प्रैस दिवस के मौक़े पर विचारणीय नहीं होना चाहिए? 2019 में इस नारे में ‘सबका विश्वास’ शब्द-युग्म जोड़ा गया और पत्रकारिता में विश्वास का निवेश घाटे का सौदा हो गया। विचार-विमर्श से अधिक क्या इसकी जवाबदारी तय करने का समय नहीं है?
इन सवालों के जवाब सिस्टम की फ़ाइलों की तरह कभी न तो मिलने वाले हैं और न ही इन फ़ाइलों को दरयाफ़्त करना किसी का शग़ल है। ये सब सवाल परेशान करने वाले हैं ज़रूर, लेकिन प्रैस की स्वतंत्रता के सूचकांकों से हम पिछले कुछ सालों में इतनी बार चौंक चुके हैं कि अब ऐसे सवालों पर कान कौन दे। 180 देशों में 150 देशों में प्रैस की आज़ादी भारत से बेहतर है। तो अब रास्ता क्या है?
इस तरह के आंकड़ों और अध्ययनों में आम तौर से उन छोटे विकल्पों को शामिल नहीं किया जाता या फिर तवज्जो नहीं दी जाती, जो दरअसल एक उम्मीद की तरह होते हैं। कथित मुख्यधारा यानी जो बाज़ार है, जो ज़ाहिर, जिसकी टीआरपी है, उसी पर ऐसे तमाम सर्वे आधारित होते हैं। हमें वैकल्पिक पत्रकारिता का रुख़ करना होगा।
हम जान चुके हैं कि कथित मुख्यधारा के मीडिया का एजेंडा सूचनाएं छुपाना, मैनिपुलेट करना, सूचनाओं के नाम पर नफ़रत, भ्रम और बकवास फैलाना आदि हो चुका है। तो हमें इससे मोहभंग की दिशा की ओर प्रयासों को बढ़ाना होगा। मुझे लगता है स्वतंत्र पत्रकारिता के जो विकल्प खुल रहे हैं, रचनात्मक पत्रकारिता के जो रास्ते बनाये जा रहे हैं, कथित मुख्यधारा से अलग, आर्थिक रूप से कम सक्षम ऐसे छोटे संस्थानों या व्यक्ति आधारित प्रकल्पों को हमें खुलकर अपनाना होगा। इन्हें आर्थिक रूप से संबल देने के साथ ही, सामाजिक और वैचारिक साथ भी देना होगा। सांस्थानिक पत्रकारिता के ढर्रे बदलने की उम्मीद सहरा में दरिया खोजने की तरह है। ठीक इसी तरह राजनीति में भी मुझे लगता है कि दलगत राजनीति से मोहभंग उपाय हो सकता है। यही मोहभंग किसी आंदोलन की नींव हो सकता है और राजनीति को वास्तविक अर्थ में नेतृत्व मिल सकता है।
प्रैस कोई व्यवसाय नहीं था। जैसे राजनीति कोई व्यवसाय नहीं था। बेहतर समाज और बेहतर सेवा के लिए ये रास्ते थे, कुछ रचनात्मक कर्म को अंजाम देने के। इन दोनों भावनाओं का जिस तरह पतन हुआ है, ऐतिहासिक केस स्टडी का विषय है।

40 करोड़ लोग भारत में समाचारों के उपभोक्ता नहीं हैं, यह दावा वनिता कोहली के जिस लेख में है, उसका सार संदेश है “ज़्यादातर संगठन और लोग सिर्फ़ एक ऐसे समाचार तंत्र में सूचना और दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए काम करते हैं, जो एक ही समूह में सिमट चुका है। वे एक ऐसे प्रतिध्वनि-कक्ष से बोल रहे हैं, जो भारत की सिर्फ़ 17 प्रतिशत आबादी को ही ख़ुश कर रहा है। भारत जैसे विविधरंगी देश में, जितनी ज़्यादा आवाज़ें हों – वाम, दक्षिण, मध्यमार्गी या और भी – उतना ही बेहतर है। ये आज़ाद आवाज़ें लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पर ज़ोर देती हैं।”
मेरे कई दोस्त परिवार के भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, घर की ईएमआई और खोखली दुनियादारी जैसे कारणों से सिर्फ़ नौकरी कर रहे हैं, मीडिया संस्थानों में। ये संस्थान किनके हाथ में हैं, जानते सब हैं। सब मजबूर हैं और अपनी नौकरी बचाने के लिए मन मारकर घंटों खट रहे हैं। ‘तनाव’ ऐसे संस्थानों में ‘न्यू नॉर्मल’ है। ‘मन का काम’ कपोल-कल्पना के संसार की बात है। हर दूसरे मीडिया संस्थान के लोगो की पंचलाइन में ‘सच’, ‘साहस’ जैसे शब्द हैं ज़रूर लेकिन ‘आदर्श’ या ‘नैतिकता’ जैसे शब्द इस सिस्टम की डिक्शनरी से ख़ारिज हैं, पंचलाइन के पीछे एक नपुंसक फ़ौज है। ऐसी बड़ी फ़ौज को ‘पत्रकार’ कहना कोई समझदारी नहीं है।
प्रैस दिवस पर विचारने की थीम होना तो यह चाहिए कि प्रैस की वांछित आज़ादी कैसे सुरक्षित की जाये। या यह कि प्रैस पर शासन की निगरानी व नियंत्रण का उन्मूलन कैसे हो या फिर प्रैस फिर से लोकतंत्र के एक स्तंभ वाली गरिमा कैसे हासिल करे… तो जन-विश्वास बाद की बात है, पहले तो पत्रकारिता शब्द पर ही माथा पीटने की नौबत है। पहले इसी की शिनाख़्त होना ज़रूरी है कि यह ‘पत्रकारिता’ नाम की चिड़िया कहां गुम है? कैसे लुप्त हो रही है और इसके अस्तित्व को कैसे बचाया जाये? कहते हैं किसी मुसाफ़िर के सफ़र को समझना हो तो उसके पैरों या जूतों के तलवे देखना चाहिए, कहते हैं किसी मुल्क की तरक़्क़ी को भांपना हो तो वहां की सड़कें देखो… इसी तर्ज़ पर अगर किसी लोकतंत्र की मज़बूती समझना हो तो देखो वहां प्रैस कितनी आज़ाद और ज़िम्मेदार है, उससे तंत्र और लोक में कितना फ़र्क पड़ता है।
प्रैस की आज़ादी मुल्क के अवाम की बोलने की आज़ादी है। समाज को भाषा देना साहित्य का कर्तव्य है और प्रैस का कर्तव्य है कि समाज की भाषा को सुरक्षा, सम्मान और मंच दे। प्रैस से मोहभंग होना या प्रैस का अप्रासंगिक हो जाना किसी समाज के लिए शोक की सूचना है। इस शोक में ढोल पीटने वाले समाज को क्या कहा जाये!
“ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है…”
बरसों पहले, दशकों पहले राजेंद्र माथुर जी ने स्वतंत्र और समर्थ समाचार तंत्र के बारे में एक लेख में लिखा था, “एक सक्षम और शासन-निरपेक्ष समाचार तंत्र क्योंकि भारतीय प्रजातंत्र की महती ज़रूरत है और चूंकि निजी उद्यम से वह खड़ा नहीं हो सकता। अत: सरकार को ऐसे माध्यमों को परोक्ष सहायता देनी चाहिए, जिनसे प्रैस की स्वाधीनता पर कोई आंच न आये।” 1982 में माथुर जी यह लिख रहे थे और 2025 में हमें बोलना पड़ रहा है कि शासन ने सहायता तो दी लेकिन पूरी वसूली की। यह पूरा तंत्र शासन-निरपेक्ष न रहकर शासन की कठपुतली मात्र बनाकर छोड़ दिया गया। हम बोलेंगे कि सिस्टम ने पत्रकारिता का साथ भरपूर लिया, पर पत्रकारिता का विकास नहीं किया और नतीजा है कि पत्रकारिता में सबका विश्वास संकट में है।
(कार्टून कोलंबो टेलिग्राफ़ से साभार)

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

प्रिय भवेश,
ज़रूरी मुद्दे हमेशा पढ़ रहे हैं आपके कॉलम में. इस बार प्रेस की आज़ादी के लिए आपने ना सिर्फ कुछ चुनौतियाँ बताईं, साथ ही कुछ जवाब भी सुझाये.
समाज की भाषा की सुरक्षा relevant thought लगा.
लिखते रहें
आकांक्षा
मुझे आपके ब्लॉग्स और चिंतन बहुत पसंद आते हैं सर,,,
बहुत बढ़िया नज़रिया है इस आलेख में भी!
ज़िम्मेदारियाँ अगर ज़िम्मेदारी से निभाई जाए तो विश्वास बना रहता है,,बढ़ता है।
मैं एक लाइन हमेशा कहा करती हूँ,,”भावनाएँ सूर्य भगवान की rays की तरह हैं, इन्हें किसी भी तौर छुपाया नहीं जा सकता।