
- February 8, 2026
- आब-ओ-हवा
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नोट्स विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
साठोत्तरी साहित्य: विद्रोही चेतना, विमर्श और द्वंद्व
साठोत्तरी साहित्य भारतीय रचनाकाल का वह कालखंड है, जो नेहरूवादी ‘रोमांचक समाजवाद’ के अवसान के मोहभंग की कठोर ज़मीन पर खड़ा हुआ। 1960 के बाद की रचनाधर्मिता केवल शब्दों का विन्यास नहीं थी, बल्कि यह सत्ता, समाज और स्वयं के विरुद्ध एक युद्ध की घोषणा थी।
प्रगतिशील, वामपंथी और जनवादी चेतना: वैचारिक अंतर्संबंध
साठोत्तरी साहित्य को समझने के लिए इसके वैचारिक स्तंभों का विश्लेषण अनिवार्य है। प्रगतिशील आंदोलन (Progressive Movement), जिसका सूत्रपात 1936 में हुआ था, मूलतः सामंतवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक व्यापक सांस्कृतिक मोर्चा था। मुंशी प्रेमचंद को इसका प्रतिनिधि रचनाकार कहा जा सकता है। किंतु साठोत्तरी काल तक आते-आते यह आंदोलन ‘संस्थागत’ होने लगा था। इसी के समानांतर वामपंथी चेतना ने साहित्य को वर्ग-संघर्ष के मार्क्सवादी सिद्धांतों से जोड़ा। 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद जब मोहभंग चरम पर था, तब जनवादी आंदोलन (Democratic/Janwadi Movement) का उदय हुआ। प्रगतिवाद जहाँ मध्यमवर्गीय बौद्धिक सहानुभूति पर टिका था, वहीं जनवादी आंदोलन ने साहित्य को सीधे ‘जन-संघर्ष’ और ‘आम आदमी’ की राजनीति से जोड़ दिया। यह आंदोलन अधिक आक्रामक था और ‘अकविता’ व ‘अकहानी’ में प्रवृत्तियों के विरुद्ध एक वैकल्पिक यथार्थवाद पेश कर रहा था। मुक्तिबोध और धूमिल जैसे रचनाकारों ने इसी जनवादी चेतना को अपनी कलम की गिरफ़्त में लेकर व्यवस्था की नग्नता को उजागर किया।
दलित, स्त्री एवं आदिवासी विमर्श: अस्मिता की नयी पहचान
साठोत्तरी साहित्य ने पहली बार हाशिये के समाज की पीड़ा को उसकी अपनी भाषा में अभिव्यक्ति दी। दलित विमर्श के अंतर्गत ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे रचनाकारों ने स्थापित सौंदर्यशास्त्र को चुनौती देते हुए ‘स्वयं के अनुभवों’ को केंद्र में रखा।
वहीं, स्त्री विमर्श में कृष्णा सोबती और मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं ने स्त्री को ‘विषय’ से ‘कर्ता’ के रूप में रूपांतरित किया, जहाँ देह की स्वायत्तता और मानसिक स्वतंत्रता के प्रश्न मुखर हुए।
आदिवासी विमर्श ने महाश्वेता देवी और रमणिका गुप्ता आदि के माध्यम से जल-जंगल-जमीन के संघर्ष को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया, जो पूँजीवाद और सत्ता के गठजोड़ के विरुद्ध एक ठोस प्रतिरोध बनकर उभरा।
आपातकाल: सत्ता का दमन और लेखकीय प्रतिरोध
इस कालखंड का सबसे कठिन समय 1975 का आपातकाल था, जिसने साहित्यकारों की नैतिकता की अग्नि-परीक्षा ली। जहाँ एक बड़ा वर्ग ‘ठकुरसुहाती’ और ‘सुविधाजनक मौन’ ओढ़कर सत्ता के छद्म तर्कों का समर्थन कर रहा था, वहीं फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जैसे लेखकों ने जोखिम उठाया। रेणु द्वारा ‘पद्मश्री’ लौटाना और नागार्जुन की जेल यात्रा इस बात का प्रमाण थी कि सच्चा साहित्यकार सत्ता के पुरस्कारों से अधिक जनता के प्रति जवाबदेह होता है। यह कालखंड साहित्य में ‘प्रतिबद्धता’ बनाम ‘अवसरवादिता’ के बीच की स्पष्ट विभाजक रेखा बन गया।
अवसरवादिता और व्यक्तिवाद का संकट
सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि इसी दौरान ‘अस्तित्ववाद’ के नाम पर आत्म-केंद्रित कुंठाओं को भी परोसा गया। अज्ञेय द्वारा प्रवर्तित व्यक्तिवाद ने कई लेखकों को समाज से काटकर अपनी ही मानसिक ग्रंथियों में उलझा दिया। सत्ता के संरक्षण में पुरस्कारों की दौड़ और ख़ेमेबंदी ने समालोचना को ‘सराहना का व्यापार’ बना दिया, जिससे मानवतावाद पर कहीं-कहीं व्यक्तिवाद हावी हुआ और साहित्य की धार कुंद हुई।
साठोत्तरी साहित्य से आज तक की यात्रा
‘पक्षधरता’ और ‘अवसरवादिता’ के बीच का एक निरंतर संघर्ष है। यदि मानवतावाद आज भी जीवित है, तो उन निर्भीक रचनाकारों के कारण जिन्होंने जोखिम उठाकर व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार किया। साहित्यकार का धर्म तटस्थता नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता के पक्ष में खड़े होना है, और साठोत्तरी साहित्य इसी नैतिक दायित्व का एक ऐतिहासिक प्रतिलेख है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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बहुत बढ़िया विश्लेषण,,,