सुनीता पाठक, sunita pathak
बहुत लंबे समय से पुत्री होना, पुत्री के माता-पिता होना कष्टदायक और पुत्र की तुलना में नीचे दर्जे का हो गया था। नौबत अपमानित जीवन के साथ हिंसा और हत्याओं तक आ गयी थी। अब लगभग यही स्थिति एक बड़े वर्ग में लड़कों के साथ दिख रही है। स्वस्थ पारिवारिक वातावरण कब बनेगा? जब एक पक्ष दूसरे पक्ष का, समय, पैसा, सुविधाएंँ, सोच-विचार रिश्ते सब कुछ निचोड़कर उसे केवल एटीएम समझे.. तब क्या पहली बार में ही इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए? यह कहानी इस पर क्या रुख़ अपना रही है, जानने के लिए कहानी का पाठन अच्छा लगेगा। -शशि खरे (संपादक: कथा प्रस्तुति)

पुरुष सशक्तिकरण | सुनीता पाठक लिखित कहानी

            “अनिकेत सुनो, किराये के मकान में रहते-रहते अब तो तंग आ गये हैं.. कितनी सारी परेशानियां रहती हैं किराये के मकान में… आंगन में चिड़ियों का बसेरा है, तो कहीं उनके फैलाये हुए तिनकों की गंदगी है, छिपकली, चूहों के आने-जाने के लिए न जाने कितने रास्ते बने हैं… ऐसा करते हैं ना कि शहर से बाहर इन्वेस्टमेंट पॉइंट से हमने जो प्लॉट लिया था, अब उस पर अपना घर प्लान कर ही लेते हैं, आज शाम को किसी आर्किटेक्ट के पास चलते हैं।”

“लेकिन छवि, वह तो शहर से अभी बहुत दूर है… मुझे तो लगता है हमें किसी सोसाइटी में फ्लैट बुक करना चाहिए सोशल लाइफ़ भी मिलेगी और सुरक्षा भी।”

“नहीं-नहीं अनिकेत, मुझे तो मल्टी अपार्टमेंट की लाइफ़ बिल्कुल पसंद नहीं… सारा वक़्त आस-पास की दीवारों की धम-धम परेशान कर देती है और ऐसा लगता है जैसे कबूतर के दड़बे में इंसान रह रहे हों।”

“अब यह तो तुम्हारी सोच है! वरना मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में रहने की संस्कृति अब तो ख़ूब फल-फूल रही है..। अच्छा चलो छोड़ो…आज अगर प्लानर के पास चलना है तो उससे पहले हम दोनों को आपस में अपनी रिक्वायरमेंट्स पर भी तो बात कर लेनी चाहिए। आख़िर वो भी तो हमारी ज़रूरत और इच्छाओं के अनुसार ही नक़्शा प्लान करेगा ना?”

“हाँ आर्किटेक्ट से पहले मैं अपने पापा मम्मी से राय ज़रूर लूंगी…बहुत अनुभवी हैं वो…आख़िरकार मुझे भी, मेरे भविष्य को भी कितने अच्छे से प्लान किया है।”

“अपना तो 2000 स्क्वायर फ़ीट का प्लॉट है …मकान क्या बंगला बनाएंगे वहां हम तो।” उसकी राय को दरकिनार कर पापा, मम्मी की राय के लिए बेताब छवि की अवहेलना को नज़रअंदाज़ कर अनिकेत ने उत्साह से कहा।

“बंगला…? बंगला भला क्यों..? उसे कौन मेंटेन करेगा और क्यों मेंटेन करेगा..? सारा दिन तो हमारा ऑफ़िस में निकलता है उस बंगले को सजाने-संवारने और उसमें घूमने का वक़्त कहाँ है हमारे पास! तुमने भी क्या ख़ूब सोची?”

“और फ्लैट को तुम पहले ही मना कर ही चुकी हो।”

“हाँ सबसे अलग हटकर जो काम करना है। फ्लेट में तो दुनिया रह रही है ना.. ज़मीन और आकाश के बीच में लटके हुए-से लगते हैं फ्लैट में रहने वाले लोग।”

“तो उस 2000 स्क्वायर फ़ीट के प्लॉट पर क्या चाहती हैं आप रानी साहिबा…? तो एक महल बनवा दूँ आपके लिए…? रुपहले पर्दों और झिलमिलाती चिलमन से उसमें जहाँ-जहाँ चाहे वहाँ सेपरेशन कर लेना।” अनिकेत ने माहौल को क्लेश से बचाने के लिए कहा था।

“आप मेरा मज़ाक़ बनाने बैठे हैं या मकान?”

“मैं मकान नहीं घर बनाना चाहता हूं, जिसमें एक हवादार रसोई हो…”

“रसोई…! क्या ट्रेडिशनल बातें करते हैं आप अनिकेत? जैसे-जैसे मेरे प्रमोशन होते जाएंगे…आपको लगता है कि मैं रसोई में जा पाऊँगी? हमें खाने के लिए नहीं जीना है…जीने के लिए खाना है। आजकल तो ऑनलाइन ऑर्डर करने पर सब कुछ हाज़िर है और फिर वह जगह शहर से दूर भी है ऑफ़िस से रोज़ इतने दूर जाने के बाद क्या मैं खाना बनाने की स्थिति में रह पाऊँगी? अभी… रसोई नहीं बस एक किचिनेट प्लेटफ़ार्म काफ़ी है जिस पर सुबह-शाम की चाय, कॉफ़ी और कुछ हल्का-फुल्का नाश्ता ज़रूरत पड़ने पर बनाया जा सके। नये प्रोजेक्ट और दिन पर दिन बढ़ते टारगेट में रसोई जैसी टाइम स्पेंडिंग जगह की तो गुंजाइश ही नहीं है।” छवि ने अपनी बात कह दी थी।

“अच्छा चलो, तुम्हारी रसोई में जाने की आदत तो शुरू से नहीं है और तुम्हारे पास वक़्त भी नहीं है…हाँ, पूजाघर तो वास्तु के अनुसार होना ही चाहिए ना वरना…”

“वरना क्या? आस्था अपनी जगह है और कर्म अपनी जगह.. सोचो ज़रा, क्या हम घंटों बैठकर पूजा स्तुति कर पाएंगे? भगवान को घर में स्थान देने के बाद उनकी अवहेलना भी तो ठीक नहीं! ईश्वर तो हर मनमंदिर में निवास करते हैं, पूजाघर को हम तो रहने ही देते हैं।” अनिकेत का दूसरा प्रस्ताव भी ख़ारिज हो गया.. यक़ीनन उसे तो ख़ारिज होना ही था।

छवि के अड़ियलपन से अनिकेत वैसे भी आहत रहता है। ‘ये भी नापसंद, वो भी बेकार’, वाला रवैया अपनाने वाली छवि किसी बात पर एक राय कब होती है भला..! माहौल को हल्का-फुल्का रखने के लिए उसने फिर घर के दूसरे कमरों की बात की, “अच्छा चलो ड्राइंग रूम पर आते हैं.. ड्राइंग रूम तो घर की समृद्धि का आईना होता है ना। ड्राइंग रूम में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे हम।” उसे लगा था सजा-संवरा ड्राइंग रूम तो हर नारी का सपना होता ही है। इस पर तो कुछ विचार-विमर्श होगा ही… लेकिन अनिकेत इस बार फिर ग़लत साबित हुआ।

“कैसी बातें करते हैं आप? आज के मॉडर्न युग में कोई किसी के घर भी आता है भला.. और फिर हम ही कहाँ उपलब्ध हैं किसी का स्वागत करने के लिए… घर पर अब वह चाय-नाश्ते और स्वागत के ज़माने चले गये..। किसी को मिलना भी होता है तो किसी रेस्टोरेंट में मीटिंग फ़िक्स होती है। क्या आप मुझसे आज भी कमर में पल्ला खोंसकर चाय-नाश्ते की ट्रे संभालकर आने की कल्पना कर रहे हैं? ना बाबा ना… यह ड्राइंग रूम, यह स्वागत, वेलकम उस समय हुआ करते थे जब महिलाएं घर में बैठी लड्डू, मठरी बनाकर आने वाले के इंतज़ार में बेताब रहती थीं… अरे भाई यही तो उनके टाइम पास का ज़रिया था। ज़्यादा कंफ़र्टेबल ड्राइंग रूम बनाओगे तो भूला-बिसरा आया मेहमान, जल्दी से जाने को भी तैयार नहीं होगा। अब यह ड्राइंग रूम-व्राइंग रूम पुराने ज़माने की बातें हैं…आप तो इसे लिविंग रूम कहो, लिविंग रूम।” रूखे व्यवहार वाली छवि ने नक़्शे को ध्वस्त करने में अपना एक और तीर चला दिया था, जो अनिकेत के मन को घायल कर रहा था। मिलनसार अनिकेत अपनी बेटरहाफ़ के संकुचित व्यवहार के कारण वैसे भी अब लोगों से, दोस्तों-यारों से कम मिलने-जुलने लगा था।

“आँगन के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है..? मेरी माँ कहती थी बिना आँगन के भी भला कोई घर होता है? कितना बड़ा चाहिए और किस दिशा में चाहिए, यह भी तय कर लें.. जब बात मकान के नक़्शे की हो रही है तो इस पर भी विचार कर ही लें।” हालांकि अभी तक की सारी बातों में अनिकेत ने जिस बारे में भी विचार करने की बात कही, छवि ने इसे पहले सिरे से ही नकार दिया था।

“तुम्हारी माँ किस ज़माने को बिलॉन्ग करतीं हैं…कहने की ज़रूरत नहीं है। आज के समय में किसी के घर में आँगन देखा है क्या? और आँगन कितना इनसिक्योर होता है? चोर-उचक्कों के आने का डर बना रहता है.. ज़रा इस पर भी तो ग़ौर कर लो और फिर वही चिड़िया, छिपकली, बिल्ली, बंदर और चूहों के आने का ज़रिया बन जाएगा। आंधी-तूफ़ान में धूल-मिट्टी, कचरे से भर जाता है और अब तो कपड़े भी मशीन में लगभग सूखे ही निकलते हैं… चिप्स, बड़ी, पापड़ रेडीमेड आते हैं तो फिर आँगन जैसी मुसीबत मकान में रखी ही क्यों जाये..?”

लो अब इस तर्क का तो कोई तोड़ अनिकेत के पास था ही नहीं और फिर पहले भी जब कभी उसने विरोध कर छवि से अपनी बात धीरे से रखनी चाही… उसे छवि ने पंगा लेने की कोशिश का नाम दिया… विरोध बहस में बदल जाता है और फिर उसे अति परंपरावादी, सनकी और गँवार ठहरा दिया जाता है… इसलिए ‘एक चुप सौ को हरावे…’ यहाँ पर भी उसे शांत ही रह जाना था।

“अब आँगन ना सही.. एक प्यारी सी बगिया तो चाहोगी ना तुम अपने आशियाने में?” अनिकेत को लगा गार्डन की बात करते ही छवि ख़ुश हो जाएगी।

“कर दी ना फिर वही नासमझों वाली बात! अरे घर में गार्डन बनाकर गिलहरी, जौंक, गिरगिट, सांप और नेवले को पनाह नहीं देनी है हमें… और फिर बगीचे की साफ़-सफ़ाई और पौधों को पानी देने के लिए सेवकों की मनुहार करो… हम जितना काम बढ़ा लेंगे, हमें नौकरों की उतनी ही जी-हज़ूरी करनी पड़ेगी। कॉलोनी के ये वेल मेंटेंड पार्क किसलिए होते हैं भाई? कभी पेड़-पौधों से रिश्ता जोड़ना होगा तो पहुँच जाएंगे ना पार्क में।” छवि से जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

“अच्छा चलो, कोई बात नहीं… तुम्हारे सारे फ़ैसले सर-आँखों पर लेकिन एक बात तो बताओ इतने बड़े ज़मीन के टुकड़े पर एक प्यारा-सा आरामदायक गेस्टरूम तो बनाएंगे ना हम?” अनिकेत बहुत व्यवहार-कुशल और रिश्तों की समझ और मान-मर्यादा को मानने वाला युवक है इसलिए उसके अनुसार उसके घर में एक नहीं अनेक-गेस्ट रूम होने चाहिए… लेकिन छवि के सीमित, संकुचित और दंभी व्यवहार को देखकर उसने सिर्फ़ एक गेस्ट रूम बनाने की बात रखी थी।

“गेस्ट रूम? आज के ज़माने में किसको फ़ुर्सत है जो अपना घर परिवार और शहर छोड़कर किसी दूसरे के घर पर रहने आये और फिर सभी कॉलोनी में इसीलिए तो इतने गेस्ट हाउसेस उपलब्ध हैं… कभी गाहे-बगाहे आये हुए मेहमानों को हम गेस्ट हाउस में भी तो रख सकते हैं ना… उनकी और हमारी प्राइवेसी भी कायम रहेगी.. उनके साथ बाहर घूमना-फिरना, खा-पीकर लौटना और अपने अपने रूम्स में आराम करना… यही तो चलन है आजकल।” छवि ने बदलते दौर के सभी एकाकी करते उपायों को बहुत जल्दी अपना लिया था।

“अच्छा चलो मेहमानों को मारो गोली… लेकिन हमारे माता-पिता तो हमारे ही परिवार का हिस्सा हैं ना..? भले ही वह हमसे दूर रहते हैं लेकिन हमारे दरवाज़े उनके लिए हमेशा खुले रहने चाहिए क्योंकि हम पर और हमारे घर पर उनका पूरा पूरा अधिकार है इसलिए हमारे पापा-मम्मी का कमरा तो होना ही चाहिए ना?” अनिकेत ने जानबूझकर ‘मेरे’ माता-पिता की जगह ’हमारे’ माता-पिता का ज़िक्र किया था…वरना बात का रुख़ किसी और दिशा में चला जाता और तब छवि, नारी सशक्तिकरण और समानता की सारी डोज़ पिलाकर ही दम लेती।

“अब मेरे पापा-मम्मी को तो आने की फ़ुर्सत है नहीं… जब भी गुंजाइश होती है… मैं ही उनके पास रहने पहुँच जाती हूँ। यह तुम अच्छी तरह से जानते हो। हाँ,तुम्हारे पापा-मम्मी अपने क़स्बे की प्रदूषण रहित आबो-हवा और अपने खेत-खलिहानों को छोड़कर यहाँ रहने तो न आएंगे और इस आधुनिक शहर में तुम्हारे पापा-मम्मी बहुत असहज भी महसूस करते हैं। उन्हें वहीं पर खुलकर जीने दीजिए…उन्हें शहरों की भागदौड़ और घुटन से मुक्त ही रखिए। हम दोनों तो यहां रहते हुए भी ऑफ़िस जाने की तैयारी और घर आने के बाद अपनी थकान में व्यस्त रहते हैं…वह आएंगे तो यह घर उनके लिए खुली जेल जैसा ही साबित होगा.. नहीं-नहीं उन्हें यहाँ आने के लिए मजबूर मत करना।”

अनिकेत जानता है छवि के मुँहफट और स्वार्थी स्वभाव के कारण उसकी ममतामयी माँ यहाँ आने से कतराती हैं और उनके गाँव जाने पर भी सहमी-सी प्रयास करती रहती हैं कि छवि को किसी प्रकार की तकलीफ़ ना हो और उसे दोबारा यहाँ ना आने का कोई बहाना ना मिल जाये।

“अच्छा, अब यह तो बताओ कि हम पहले दो से एक हो गये हैं और जल्दी ही दो से तीन होने का प्लान भी तो बनाएंगे और फिर तीन से चार। बच्चों के कमरे की प्लानिंग रखोगी कि नहीं मोहतरमा?” अनिकेत ने फिर मूड बदलने के लिए एक नये कमरे की प्लानिंग रख दी थी। उसे लगा था बच्चों की बात करते ही छवि किसी फ़िल्मी हीरोइन की तरह शर्मा जाएगी और कहेगी…” अब जैसा आप ठीक समझें।” लेकिन उसका सपाट-सा चेहरा देखकर अनिकेत अपनी इस सोच पर ही शर्मिंदा हो गया! आख़िर वह छवि को…उसकी मानसिकता को वह समझता क्यों नहीं…? हद दर्जे की आत्मकेंद्रित है वो.. सेल्फ़िश कहते हैं ऐसे लोगों को। इतनी तरह से वह अपनी सोच को प्रदर्शित कर चुकी है फिर भी उससे कैसी उम्मीद?

“बच्चों की प्लानिंग करना मतलब अपने करियर को ख़त्म करना है… क्या करियर को बरबाद करने के लिए किताबों में सिर खपाया है…? डायपर, दूध की बोतल, दिन-रात उनकी देखभाल… कैसे होगा यह सब? बच्चों के बारे में ही सोचना था तो कोई घरेलू लड़की लेकर आते… हम दोनों लाइफ़ पार्टनर हैं, आपको मेरी ज़िंदगी प्लान करने का कोई हक़ नहीं..|”

हक्का-बक्का रह गया था अनिकेत छवि के दो-टूक जवाब पर… नारी सशक्तिकरण के दौर में सामंजस्य किस चिड़िया का नाम है शायद समाज का हर परिवार ये संस्कार अपनी बेटियों को देना भूलता ही जा रहा है। बचपन से लाड़ली को ‘मेरा बेटा-मेरा बेटा’ कहकर पालने वाले परिवार, ना तो उसे बिटिया ही रहने देते हैं और ना ही पूरे तौर पर बेटा ही बना पाते हैं। ‘मेरी बेटी मेरा अभिमान’ कहने वाले पिता बेटियों को इतना अभिमानी बना देते हैं कि वे रिश्तों का मान-सम्मान ही भूल जाती हैं और उसके बाद चाहते हैं कि उसका विवाह पूरे रीति-रिवाज के साथ एक साधन-सम्पन्न युवक के साथ हो। विवाह संस्कार में कोई भी भारतीय परंपरा और शुभ कार्य भूल न जाएं, इस बात का ध्यान भी रखते हैं जबकि बच्चों को संस्कार और परंपरा सौंपने की जगह अड़ियल रवैया और बेसब्रापन सौंप देते हैं…

उनके स्मार्टफ़ोन के अधकचरा ज्ञान ने उन्हें अनुभवहीन महत्वाकांक्षी बनाया है और कॉलेज से मिली बेहिसाब किताबों के बोझ तले दबाकर मानसिकता को इतना कुंठित कर दिया जाता है कि वे कोई भी सामंजस्य… अपने अधिकार का हनन मान बैठती हैं जबकि इसी ज़माने का अनिकेत, भावना और स्नेह से भरा संस्कारी युवक है। इस बात के लिए वो अपने माता-पिता का आभार मानता है जिन्होंने शिक्षा के साथ संस्कार भी सौंपे हैं। अनिकेत और छवि के विवाह को तीन साल हो चुके हैं। उसे लगता था वह नादान छवि के दिल को जीत लेगा…प्यार देगा तो बदले में प्यार मिलेगा…लेकिन बात बन ही नहीं रही है…हर बात का विरोध पूरे तर्क-कुतर्क के साथ करके, वह जब-तब अनिकेत को प्रताड़ित करती रहती है। ज़िद्दी और दंभी छवि, अनिकेत को बस अपने इशारों पर नचाना चाहती है।

भला ऐसा घर होता है कहीं? रसोई की महक नहीं हो….मेहमानों का आना नहीं हो, रिश्तेदारों के लिए कोई जगह नहीं… माता-पिता को पहले सिरे से नकार दिया और बच्चों को अपनी प्रगति का अवरोध माना… पेड़-पौधे, प्रकृति से दूर-दूर का नाता नहीं…उफ़्फ़! कैसे जी सकेगा वह ऐसी संकीर्ण विचारों वाली छवि के साथ..? सलाह, साथ, सहयोग और विचार-विमर्श जैसे शब्दों और भावनाओं का छवि के जीवन में कोई स्थान नहीं…इतना समय काफ़ी होता है एक-दूसरे को समझने के लिए।

छवि को नारी सशक्तिकरण के सांचे में इस तरह से ढाला गया है कि अब उसमें कोई भी बदलाव संभव नहीं और अब अनिकेत को यह बात समझ में आने लगी थी कि अगर पत्थर से बार बार सिर टकराओगे तो ख़ुद का सिर लहूलुहान हो जाता है और पत्थर अपनी कठोरता के साथ किसी भी आघात से अविचलित ही बना रहता है। इन परिस्थितियों में कोमल दिल वाले अनिकेत का उसके साथ रहना कितना मुश्किल हो रहा था यह उसका दिल ही जानता है… घुटन हो रही है ऐसे जीवनसाथी के साथ… बेमेल विवाह के बाद भी तलाक़ लेने की कोशिश से वह ख़ुद को और अपने परिवार को और अधिक परेशानी में नहीं लाना चाहता था। मुख्य मुद्दे से अलग दहेज प्रताड़ना, नारी प्रताड़ना के आरोप-प्रत्यारोप कहीं ज़्यादा घायल कर देंगे।

जब अनिकेत ने छवि के मकान बनाने की बात पर चर्चा आरंभ की थी तो लगा था कि ईंट-ईंट जोड़कर मकान का रूप देकर हम एक ख़ुशनुमा घर बनाएंगे। नये सिरे से ज़िंदगी आरंभ करेंगे.. लेकिन अब यह तय हो गया था कि ऐसे विचारों वाली गृह-स्वामिनी के साथ ये ईंटों का समूह नकारात्मकता से भरा मकान ही रह जाएगा… ऐसे मकान का क्या फ़ायदा जहां बड़े-बुज़ुर्गों का आना ही संभव न हो सके… और अगर आ भी जाएं तो अपमानित महसूस करें… इसलिए कुछ दिनों से जिस प्रोजेक्ट पर वो मस्तिष्क मंथन कर रहा था और उस प्रोजेक्ट को न लेने का मन बना चुका था.. वहीं आज इस चर्चा के बाद निर्णय पर पहुंच गया था कि हां, वह इस प्रोजेक्ट को स्वीकार कर 5 साल के लिए स्वीडन चला जाएगा।

उसने तो छवि से इस प्रोजेक्ट के बारे में बात ही नहीं की थी। उसे लगा था कि मेरे लिए और मेरे करियर के लिए तो यह एक बहुत सुखद अवसर है, लेकिन ज़िंदगी के ये 5 सुनहरे साल छवि मेरे बिना कैसे रह सकेगी? लेकिन आज उसे समझ आ गया कि अहंकारी और अपने करियर के लिए अति स्वार्थी छवि केवल उसे इस्तेमाल कर रही है…प्यार के लिए नहीं… अपनी ज़रूरतों के लिए… जिसमें उसे कोई सलाह या विमर्श नहीं चाहिए…बस चाहिए तो हाँ में हाँ मिलाने वाला एक वेल सेटल्ड अच्छे पैकेज वाला हस्बैंड। ज़रा-सी समझाइश पर नारी सशक्तिकरण और सदियों से नारी प्रताड़ना के कारण आहत हो रही नारियों का विमर्श एक लंबे-चौड़े भाषण के रूप में सामने रख दिया जाता था। दम घुट रहा है अनिकेत का अब तो… स्वीडन जाने से उसे छवि से तो मुक्ति मिल जाएगी लेकिन उसके माता-पिता..? अब क्या सोचे उनके बारे में… वह यहां रहकर भी तो माता-पिता से दूर ही है, कहाँ समय दे पाता है उन्हें! इस कशमकश में अनिकेत को एक मज़बूत निर्णय लेने के लिए पूर्ण रूप से तैयार कर दिया।

“सुनो छवि, तुम न खाने के लिए जीती हो, न जीने के लिए खाती हो…तुम्हें रसोई नहीं चाहिए और सच तो ये है कि तुम्हें अपने आस-पास कोई भी नहीं चाहिए…न पेड़ पौधे, न कोई रिश्तेदार, न परिंदे…हाँ, तुम अपने आसपास मुझे ज़रूर बर्दाश्त करती हो क्योंकि मैं तुम्हारे काम आता हूँ.. तुम्हारी उंगली पर नाचना मेरी मजबूरी नहीं बल्कि प्यार से तुम्हारा दिल जीतने का जतन है। मेरी इस चुप्पी का तुमने जी भर के नाजायज़ फ़ायदा उठाया है। तुमने इस ओर भी ध्यान नहीं दिया कि सभी कमरों की बात मैंने तुमसे की, लेकिन बेडरूम तक आते-आते मैंने घर बनाने की बात ही ख़त्म कर दी…

मैं बेडरूम की बात कैसे करता तुमसे..? तुम्हारे साथ एक ही कमरे में रहने की सोच पर ही अब मुझे घुटन हो रही है…अगर मैं बैडरूम की प्लानिंग की बात भी करता तो मुमकिन है कि तुम एसी, पावर पॉइंट, चार्जर प्वाइंट सब कुछ अपनी तरफ़ के सिरहाने रखने की बात करतीं.. और यह भी मुमकिन था कि तुम इस बात के लिए ज़ोर देतीं कि बेडरूम हमारा नहीं …बल्कि मेरा-तुम्हारा अलग-अलग होना चाहिए। हां, मैं मानता हूं कि रिश्तों में एक स्पेस होना चाहिए लेकिन यह कौन-सा तरीक़ा है कि तुम अपने निर्णय में मुझे शामिल नहीं करना चाहती जबकि मेरे सारे निर्णय तुम ही लेना चाहती हो। मैं नारी स्वतंत्रता का हिमायती हूं.. लेकिन स्वतंत्रता और मानसिक स्वच्छंदता में एक अदृश्य-सी लकीर होती है, जिसे तुम जब चाहे पार करती रही हो। तुम आर्थिक रूप से सक्षम हो और सामाजिक सक्षमता की तुम्हें ज़रूरत ही महसूस नहीं होती। तुम्हारे निर्णय लेने के तौर-तरीक़े और क्षमता ने मुझे भी एक निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित किया है…उस छोटे से क़स्बे में रह रही मेरी मां को आर्थराइटिस है और पिता हाई ब्लड प्रेशर के मरीज़ हैं… हम दोनों अगर साथ में रहेंगे तो तुम्हारे मुताबिक़, उनके लिए हमारे मकान और तुम्हारे दिल में कोई जगह नहीं है…

हाँ, यह भी सच है उन्हें उस छोटे शहर की आबो-हवा रास आती है। मैं उनका बेटा हूँ, केवल मेरी ही आंखों ने नहीं, उनकी आंखों में भी मैंने अपने भविष्य के सपने देखे हैं… तुम्हारे साथ जीवन की सुखद शुरूआत करने के लिए मैंने बहुत प्रयास करके देख लिया।तुम्हारे स्वार्थ का एक कड़ा कवच है तुम्हारे चारों ओर। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ज़रूरत पड़ने पर तुम अपने माता-पिता के भी काम नहीं आ पाओगी क्योंकि तुम्हें अपने अलावा किसी के भी बारे में सोचने की आदत जो नहीं है… तुम अपना समय, पैसा, सोच… कुछ भी किसी और पर ख़र्च करने में इच्छुक नहीं हो, अब यह मेरा फ़ैसला है कि हमारा! एक छत के नीचे साथ में रहना नामुमकिन है… लेकिन मैं किसी के साथ तो रहना ही चाहूंगा ना… मैं तुम्हारी तरह अकेले रहने का साहसी नहीं हूँ। तुम्हारे साथ के लिए माता-पिता को छोड़ा था और अब माता-पिता के साथ रहने के लिए मैं स्वीडन के प्रोजेक्ट को छोड़ रहा हूँ। मेरी कंपनी ने फ़िलहाल वर्क फ्रॉम होम का ऑप्शन भी दिया है। मैं अब अपने माता-पिता के साथ रहूँगा…नौकरी की व्यस्तता में उनका बहुत ध्यान तो न रख सकूँगा लेकिन साथ का भरोसा ही सच्चा सुख है।”

यह कहते-कहते अनिकेत लैपटॉप को ऑन कर ‘वर्क फ्रॉम होम’ की रिक्वेस्ट अपनी कंपनी को ईमेल कर चुका था। यह निर्णय अनिकेत का अपना था… मशवरे की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि छवि के व्यवहार ने ये ऑप्शन ही बन्द कर दिया था। छवि अवाक खड़ी अनिकेत को देख रही थी…अनिकेत की भावनाओं को ठगने वाली…आज ख़ुद को ठगा-सा महसूस कर रही थी। सोच रही थी सामंजस्य को भूले हुए आज के नारी सशक्तिकरण के दौर में… यह पुरुष सशक्तिकरण का दौर अचानक कैसे आ गया?

सुनीता पाठक, sunita pathak

सुनीता पाठक

शि​क्षक एवं लेखक। विगत दो दशक से साहित्य सृजन में सक्रिय इस दौरान कहानी, कविता, ललित निबंध, लघुकथा, सामायिक लेख एवं व्यंग्य आदि राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पूर्व उद्घोषिका, दूरदर्शन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से कार्यक्रम लेखन एवं प्रस्तोता के तौर पर बीस वर्षों की भागीदारी। कथा और काव्य के आधा दर्जन से अधिक संग्रह प्रकाशित। अनेक सरकारी व ग़ैर-सरकारी संस्थाओं से सम्मानित। संपर्क: sunitapathak24@gmail.com

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