परचमों में क़ैद होकर रह गया हर रंग है
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

परचमों में क़ैद होकर रह गया हर रंग है

रंग ज़िन्दगी को तालीम भी देते हैं और तरबीयत भी। रंग होंठों पर मुस्कान बिखेरते हैं। जीना सिखाते हैं। ज़िन्दगी को बेहतर ढंग से गुज़ारने का हुनर भी रंगों के क़रीब होता है। ज़रूरी यह है कि रंगों को ठीक से समझा जाये। यह दौर रंगों को बांटने, अलग करने और उनकी एक अलग पहचान क़ायम करने का है।‌ रंग हमारी ज़िन्दगी में जितनी मधुरता घोल सकते हैं, आज उन रंगों को उतना ख़राब बताया जा रहा है। इन्हें हमारी ज़िन्दगी में एक खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है। रंगों का यह पतन इंसानियत के उस दौर का पतन है, जहां रंगों के ज़रिये इंसान को ज़िन्दगी की बेहतरी से वाक़िफ कराने का पैग़ाम दिया जाता है।

हमारी तहज़ीब और रवायत रंगों के ज़रिये किसी मंज़र के क़रीब जाने की है। हम आसमान से लेकर ज़मीन तक, सुब्ह से शाम तक, फूल से तितली तक न जाने कितने रंगों को देखते हैं। उनसे अपने जीवन को बेहतर रंग देने की कोशिश करते हैं। इन रंगों में कभी हमने तेरा-मेरा नहीं किया। मगर आज नज़ारा ऐसा नहीं है। अमित गोस्वामी इसी दर्द को इन मिसरों में उभारते हैं-

चार-सू फैला है अब तो एक बस फ़ुर्क़त का रंग
अब तलक यक-रंग तस्वीर-ए-जहाँ ऐसी न थी

तमाम रंगों के बीच मौजूद सादगी का रंग उन रंगों को मज़बूत बनाता है। शाइरी उन्हीं रंगों को पढ़ती है और उन्हीं के साथ ज़िन्दगी के सूत्र जोड़ती है। एक शाइर के यहां रंग कई अर्थों में आता है। कई-कई तरह से अभिव्यक्त होता है। वही रंग उसकी शाइरी को बेहतरीन बनाता है। अपना ही एक शेर याद आता है-

ये गुलाबी लाल पीले रंग तो दिखने के हैं
रंग हैं ‘आशीष’ कितने सादगी के रंग में

इस सादगी के रंग को आज बचाने की ज़रूरत महसूस होती है। हर रंग ईमान का रंग होता है। उसमें सदाकत मौजूद होती है। ज़िन्दगी के बहुत क़रीब होकर ईमान का रंग इंसान को मुकम्मल बनाता है। उसे जीने का हौसला देता है और भीड़ से अलग भी करता है।
नसीम सिद्दीक़ी तभी तो कहते हैं-

मस्लहत का ये कफ़न रखता है बे-दाग़ हमें
अहल-ए-ईमान हैं हम रंग से डर लगता है

रंग सिर्फ़ चेहरे पर मलने के, परचम बनाने के या बदनाम करने के ही नहीं होते। रंग ज़िन्दगी में इस तरह शामिल होते हैं जिस तरह हवा, पानी। जैसे हमारी धड़कनें। जैसे हमारी सांसें। जैसे हमारे रिश्ते। जैसे हमारी ज़मीन। जैसे हमारी आदतें। रंगों के बिना जीवन अधूरा है। जीवन का हर रंग कहता है इंसान अगर उससे वाबस्ता हो तो उसकी ज़िन्दगी के मायने ही बदल सकते हैं। लेकिन आज इंसान उस रंग से वाक़िफ़ तो है मगर उसमें मिलने के बजाय उस रंग को बदरंग करने की कोशिश कर रहा है। रंगों के ग़लत आंकलन के कारण रंगों की गरिमा घट रही है तो आदमी की सूरत बदसूरत भी हो रही है।

अज़ीज़ नबील कहते हैं-
साँस लेता हुआ हर रंग नज़र आएगा
तुम किसी रोज़ मिरे रंग में आओ तो सही

रंगों के दौर में ज़रूरत इसी बात की है कि हर इंसान इंसानियत के रंग में रंगा हो, उसका सलीक़ा इंसानियत के पक्ष में हो। वह इंसान के हक़ में खड़ा रहे और एक इंसान होकर इंसानियत का रंग पूरे समाज और दुनिया में फैलाये।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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