
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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याद बाक़ी... तरुणा मिश्रा की कलम से....
गोविंद सर की यादों का गुलशन
मोहतरम गोविंद गुलशन सर से मेरी पहली मुलाक़ात, साल 2013 में हुई थी, मैंने उसी साल अपने बेटे के मेडिकल कॉलेज में सेलेक्शन के बाद निशस्तों में शिरकत करना शुरू किया था। उनके साथ पहली मुलाक़ात के दिन ही उनकी संजीदा शायरी और दिल-आवेज़ तरन्नुम ने मुझ पर ये तो ज़ाहिर कर दिया था कि वो कोई आम शख़्स नहीं हैं।
उसके बाद तो तक़रीबन ग़ाज़ियाबाद में होने वाली हर गोष्ठी और निशस्त में उनको सुनने का मौक़ा मिलने लगा और ये मालूमात भी हुई कि वो स्वर्गीय कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब के शागिर्द हैं, उनसे ग़ज़ल पर थोड़ी-बहुत बातें भी होने लगीं, यदा-कदा उनकी दाद मिल जाती थी और मुझे उस दिन ऐसा लगता था कि जैसे मैं ज़मीन से 2 इंच ऊपर उठ गयी हूँ…
उसी दौरान 2016 में मेरे एक शेर पर उन्होंने भरपूर दाद भी दी और बताया कि गहवारा-ए-ग़ज़ल नाम से उनका एक व्हाट्सएप ग्रुप है और यदि मैं चाहूँ तो उसमें शामिल हो जाऊँ, उन्होंने कहा आपको ग़ज़ल कहना आ गया है, मैं चाहता हूँ कि ‘क्या नहीं कहना है’ वो भी आप सीखें। उनका एक शेर है-
क़रीब जाने से चलता है शख़्सियत का पता
ज़मीं से चाँद ज़रा सा दिखाई देता है
और वाक़ई उस ग्रुप में शामिल होने के बाद उनकी शख़्सियत की बहुत सारी पर्तें मुझ पर खुलने लगीं, वो रवायती शायरी के अलमबरदार थे, कृष्णबिहारी नूर साहब की शायरी के रूहे-रवां थे। उस्तादे मोहतरम जनाब गोविंद गुलशन साहब ने तक़रीबन हर मौज़ू पर शेर कहा है, जब भी कुछ नया कहती तो वो उसे ध्यान से सुनते और उसी मफ़हूम पर अपना एक शेर ज़रूर सुनाते।

मैंने उन लम्हात को मन में संजोकर रख लिया था और आज भी उनकी यादों की ख़ुशबू मेरे मन को महका देती है। उनके साथ मुशायरों और निशस्तों के लिए बहुत सारे सफ़र भी किये और सफ़र के दौरान भी शेर-ओ-शायरी का दौर चलता ही रहता था, शायद उन अस्फ़ार की ही वज्ह से मैंने भी सफ़र पर कई शेर कहे हैं। अच्छा शेर सुनते ही अपने बटुए से जो नोट भी हाथ में आ जाये, वो देना सर कभी नहीं भूलते थे।
8 नवंबर को नूर साहब की यौमे-विलादत होती है, उस दिन वो ज़्यादातर अपने उस्ताद को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए निशस्त रखते थे और उस वक़्फ़े के दौरान नूर साहब से जुड़ी छोटी से छोटी बातें हम सबसे साझा करते थे। यही नहीं गुलशन सर अपने हाथों से बेहद लज़ीज़ व्यंजन बनाते थे और अपने मुअज़्ज़िज़ मेहमानों को अपने हाथों से परोसते भी थे। उस वक़्त उनमें ग़ज़ब का उत्साह होता था जैसे कि एक बच्चे में और यक़ीन मानिए उनके लज़ीज़ व्यंजनों में भी वही ज़ायक़ा होता था, जो उनकी ग़ज़लों में।
शायरी, खाना, खाने-खिलाने के शौक़ के अलावा उनको मौसीक़ी की भी गहरी समझ थी, बचपन से रात-रात भर अनूप शहर (जहाँ के वो रहने वाले थे) में होने वाले उर्स को सुनने की आदत ने शायद उनके इस शौक़ को और हवा दी। उन्होंने मौसीक़ी की बाक़ायदा कोई तालीम नहीं ली लेकिन अपने हारमोनियम पर वो हर गाने की धुन बड़ी आसानी से निकाल लेते थे, उन्होंने अपनी ग़ज़लों के लिए भी आपने कई नायाब तरन्नुम ईजाद किये थे।
एक और ख़ास बात उनमें थी, वो किसी को भी ऐसे ही शागिर्द नहीं बनाते थे, बिना सीखने और समझने की ललक, सलाहीयत, इम्कान और मेहनत नहीं है तो वो शागिर्द नहीं बनाते थे। मेरे सामने की बात है, कई लोग उनके पास आते थे कि वो ग़ज़ल कहकर दे दें तो सर साफ़ इनकार कर देते थे, अगर शेर में कोई बात नहीं बनी तो वो दुबारा, तिबारा कहने के लिए बोलते थे और जब शेर हो जाता तो, पहला जुमला होता था “ये हुई न बात”….
उनकी ग़ज़लों जैसे ही उनका लिबास भी होता था, उन्हें बेहतरीन और चटख रंगों के कुर्ते पहनने का बहुत शौक़ था। उनकी हर बात कमाल की होती थी, चाहे वो सब्ज़ियाँ खरीदना हो या आम, एक एक बात में उनकी नफ़ासत नज़र आती थी।
2018 में, मेरी किताब लाने की तक़रीबन तैयारी थी लेकिन कुछ पारिवारिक कारणों से उस वक़्त वो किताब नहीं आ पायी, फिर कोरोना के दौर में मिलना-जुलना कम हो गया था मगर सर हर अच्छे-बुरे वक़्तों में हमेशा हमारे साथ खड़े रहे।
2018 में ही एक दिन चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि अब आपको इस्लाह की ज़रूरत नहीं है। आपको कभी भी कुछ पूछना हो तो मैं हमेशा रहूँगा लेकिन अब आप इस क़ाबिल हो गयी हैं कि बिना किसी को दिखाये आप अपनी ग़ज़लें पढ़ें और कहें, जैसे एक चिड़िया बच्चों को उड़ना सिखाकर पूरा आकाश खुला छोड़ देती है, वैसे ही सर भी करते थे।
2 नवंबर, 24 को मेरा पहला शेरी मजमूआ आया और मुझे ख़ुशी है कि उस्तादे मोहतरम और मशहूर और मारूफ़ शायर मोहतरम गोविंद गुलशन साहब के रहते हुए ये काम हो गया। बग़ैर उनकी सरपरस्ती के इस ख़्वाब को हक़ीक़त का रूप देना नामुमकिन था, ये उनका प्यार, आशीर्वाद और सरपरस्ती ही थी कि हम इसे अंजाम दे पाये।
उनके जल्दी जाने से अदबी दुनिया में जो ख़ला पैदा हुआ है, उसे भर पाना तो नामुमकिन है, मेयारी और रवायती शायरी में न तो उनका कोई जोड़ था और न होगा।
हम सबने तो शायरी को ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा ही माना लेकिन उनके लिए शायरी पूजा थी, इबादत थी या यूँ कहिए कि ज़िंदगी ही थी। पिछले एक-दो सालों में उनको वो मक़बूलियत मिलनी भी शुरू हो गयी थी जिसके वो हक़दार थे, सर अभी आपको नहीं जाना था। अभी-अभी तो ईश्वर ने आपकी तपस्या का फल देना शुरू किया था, अभी तो हम सभी को आपके सरमाये की ज़रूरत थी।
जिस अनूपशहर की तारीफ़ करते वक़्त उनकी आँखों में चमक आ जाती थी, वहीं उनका अंतिम संस्कार भी हुआ और वो पंचतत्व में विलीन हो गये, लेकिन हमारी बातों, यादों और ख़यालों से आप कभी दूर नहीं जा सकेंगे।

तरुणा मिश्रा
ग़ज़ल, गीत, लेख, कहानी आदि विधाओं में 2009 से पूर्णत: सक्रिय तरुणा मिश्रा भौतिक विज्ञान में गोल्ड मेडलिस्ट रही हैं। 13 बरस की उम्र में पहला शेर कहा था: मुद्दतों ज़िंदगी तलाशा किये/मौत आयी तो ज़िंदगी दे दी। 15 साल अध्यापन के बाद नौकरी छोड़कर लेखन में ही समर्पित। आप भारत के दर्जन भर प्रमुख शहरों में मुशायरे पढ़ चुकी हैं और जश्ने रेख़्ता, जश्ने अदब और जश्ने हिंद जैसी महफ़िलों में भी। कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी तरुणा मिश्रा विभिन्न टीवी चैनलों, आकाशवाणी से भी प्रसारित होती हैं।
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