
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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यह लेख दिखाता है कैसे चयनात्मक घटनाएँ, भावनात्मक भाषा, दोहराये गये नैरेटिव और समन्वित ऑनलाइन प्रवर्धन" (coordinated online amplification) मिलकर जनता का भरोसा पारंपरिक खाद्य व्यवस्था से कमज़ोर कर सकते हैं। और ठीक उसी समय, उच्च-तकनीकी कृषि, जैव-प्रौद्योगिकी साझेदारी, एआई-संचालित खेती और निजी-क्षेत्र-नीत "समाधान" को भविष्य के मॉडल के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
'ज़हरीले खाने' का डर, क्या है पूरा सच?
भारत में खाद्य मिलावट एक वास्तविक समस्या है। लेकिन 2026 में जिस तरह नक़ली पनीर, सिंथेटिक दूध, मिलावटी घी और “ज़हरीले भोजन” की ख़बरों की बाढ़ सोशल मीडिया और टीवी पर दिखी, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या हम केवल जागरूकता देख रहे हैं, या भय का सुनियोजित प्रवर्धन (amplification)?
सवाल सिर्फ़ मिलावट का नहीं है। सवाल यह भी है — डर किसे फ़ायदा पहुँचाता है और भारत की खाद्य व्यवस्था किस दिशा में मोड़ी जा रही है?
एफ़एसएसएआई (FSSAI) में भ्रष्टाचार कोई नयी बात नहीं है। इस पर वर्षों से चर्चा और दस्तावेज़ीकरण होता रहा है। वैसे FSSAI की महानता अपने आप में विकट है। मसलन यह संस्था मल्टीनेशनल के उत्पादों की ओर तो सामान्यतः आंख बंद किये रहती है लेकिन अगर आम इथाईलीन की मात्रा ज़्यादा हो जाये तो हंगामा हो जाता है। इसके बारे में आगे बात करेंगे।
हमें जो जानने को मिलता है कि “फलानी जगह अमुक मात्रा का अमुक मूल्य का मिलावटी पनीर, मावा ज़ब्त हुआ”। इसका कोई ज़िक्र नहीं होता कि क्या मिलाया गया था, कितना मिलाया गया और ये किन परीक्षण के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया तथा उन व्यक्तियों के ख़िलाफ़ क्या कार्यवाही हुई। ख़ैर, ये लोग FSSAI के हैं, दिव्य दृष्टि प्राप्त होगी, मुझे नहीं पता। लेकिन सोशल मीडिया पर उठायी जाने वाली हर खाद्य-सुरक्षा चिंता तथ्यात्मक या वैज्ञानिक आधार पर सही हो, ऐसा ज़रूरी नहीं। कुछ अकाउंट्स ऐसे दावे करते हैं मानो वे रोज़मर्रा के प्राकृतिक और पारंपरिक खाद्य पदार्थों को लेकर व्यापक डर पैदा करने के लिए समन्वित तरीक़े से काम कर रहे हों। इससे आम लोगों में अनावश्यक भय पैदा होता है। लोग यह तक सोचने लगते हैं कि जो दूध, पनीर, घी या अन्य चीज़ें वे खा रहे हैं, क्या वे सचमुच सुरक्षित हैं या नहीं।
पिछले कुछ महीनों में X (Twitter) पर कुछ अकाउंट लगातार नक़ली पनीर, सिंथेटिक दूध, मिलावटी घी, मसाले, “ज़हर वाला खाना” और FSSAI को निष्क्रिय या भ्रष्ट बताने वाले पोस्ट साझा कर रहे हैं। यह कोई एक-दो पोस्ट की बात नहीं लगती। कुछ अकाउंट बार-बार समान विषयों को उठाते दिखायी देते हैं — अक्सर लगभग समान भाषा और भावनात्मक ढांचे के साथ। अलग-अलग हैंडल होने के बावजूद नैरेटिव की संरचना काफ़ी मिलती-जुलती दिखती है।
इन पोस्टों में बार-बार “ज़हर”, “माफ़िया”, “सिस्टम फ़ेल”, “FSSAI सो रहा है” जैसी शब्दावली दिखायी देती है। यह केवल संयोग नहीं बल्कि संदेश की एकरूपता वाले पैटर्न जैसा प्रतीत होता है। कुछ उदाहरण:
कई मामलों में घटनाओं को उनके वास्तविक संदर्भ से हटाकर बड़े राष्ट्रीय संकट की तरह प्रस्तुत किया गया। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में एक टैंकर से कूलेंट लीक होने की घटना में 14 लोगों की दुखद मृत्यु हुई। यह एक स्थानीय और आकस्मिक घटना थी, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे जानबूझकर खाद्य मिलावट और पूरे देश की दूध-पनीर व्यवस्था के असुरक्षित होने के प्रमाण की तरह प्रस्तुत किया गया। वास्तविक घटना को कहीं अधिक व्यापक निष्कर्ष से जोड़ दिया गया।
इसी प्रकार, एक वायरल वीडियो में किसी पदार्थ को तवे पर रखकर उसके पिघलने को मिलावट का प्रमाण बताया गया। जबकि वीडियो में तापमान, पदार्थ की वास्तविक संरचना या नियंत्रित वैज्ञानिक परिस्थितियों का कोई विवरण नहीं था। केवल पिघलने का व्यवहार, बिना वैज्ञानिक परीक्षण के, मिलावट का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता। लेकिन जब हर घटना को “राष्ट्रीय खाद्य संकट” के रूप में पेश किया जाता है, तब वास्तविक बड़े ख़तरे और अलग-थलग घटनाओं के बीच का अंतर धुंधला पड़ जाता है। इससे जनता की वास्तविक जोखिम पहचानने की क्षमता कमज़ोर होती है।
सोशल मीडिया पर यह दावा भी बड़े पैमाने पर फैलाया गया कि भुने चने में पीला रंग देने के लिए ऑरामाइन मिलाया जा रहा है। एक सांसद ने भी रिपोर्ट होने का दावा किया, लेकिन वे रिपोर्ट महीनों बाद भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं करायी गयी।
माइक्रोप्लास्टिक्स का उदाहरण भी इसी पैटर्न में देखा जा सकता है। माइक्रोप्लास्टिक्स आज मिट्टी, पानी, हवा, समुद्र और जीवित शरीरों तक लगभग हर पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद हैं। हर वर्ष लाखों टन माइक्रोप्लास्टिक्स पर्यावरण में जाते हैं और डिब्बाबंद भोजन उनके प्रमुख स्रोतों में शामिल है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर नमक जैसे सरल लक्ष्यों को अधिक केंद्रित तरीक़े से प्रस्तुत किया जाता है।

आम के मामले में भी इसी प्रकार का नैरेटिव देखने को मिला। सीज़न शुरू होने से पहले एक सप्लायर को पकड़ा गया, आरोप था कि उसने आम पकाने के लिए एथिलीन गैस के अधिक (5 के बदले 6) सैशे का उपयोग किया। इसके बाद मीडिया और सोशल मीडिया पर ख़बरें फैल गयीं कि “ज़हरीले तरीक़े से पकाये गये आम” पकड़े गये हैं। जबकि एथिलीन स्वयं एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है, जिसे फल पकने के दौरान स्वाभाविक रूप से भी उत्पन्न करते हैं।
पैटर्न को समझना ज़रूरी
एक और महत्वपूर्ण पैटर्न “Aggregation Bias” का दिखायी देता है। अलग-अलग शहरों और समय की ज़ब्तियों को जोड़कर एक सामूहिक प्रभाव तैयार किया जाता है — मानो “हर चीज़ नक़ली है, हर जगह।” उदाहरण के तौर पर, हज़ारों किलो पनीर और सैकड़ों किलो घी की ज़ब्ती के आँकड़े साझा किये जाते हैं। यदि सचमुच इतने बड़े पैमाने पर विषाक्तता हो रही होती, तो अस्पतालों में बीमारी के क्लस्टर और बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकेत भी व्यापक रूप से दिखायी देने चाहिए थे। लेकिन पोस्टों में अक्सर यह संदर्भ अनुपस्थित रहता है। परिणामस्वरूप वास्तविक प्रभाव से कहीं अधिक भय का वातावरण बनता है।
एक और पैटर्न यह है कि समान विषय अलग-अलग अकाउंट्स पर लगभग एक ही समय में दिखायी देते हैं। पोस्ट शब्दशः समान नहीं होतीं, लेकिन उनका एंगल और संदेश काफ़ी मिलता-जुलता होता है। यह echo-loop जैसी स्थिति पैदा करता है। लगभग हर पोस्ट एक ही संरचना का पालन करती दिखती है — घटना, फिर स्वास्थ्य का डर, फिर गुस्सा और अंत में पूरे सिस्टम पर हमला। यह संरचना सूक्ष्म चर्चा के बजाय वायरल होने के लिए अधिक उपयुक्त लगती है।
यह पूरा पैटर्न यह संकेत देता है कि खाद्य सुरक्षा और FSSAI को लेकर एक लगातार सक्रिय नैरेटिव क्लस्टर काम कर रहा है, जो दोहराव, चयनात्मक फ्रेमिंग और आवेग के माध्यम से जनधारणा को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।
रिसर्च पेपर एजेंडा हैं?
यह केवल छोटे सोशल मीडिया अकाउंट्स तक सीमित नहीं दिखता। हल्दी का उदाहरण इसका बड़ा रूप माना जा सकता है। “How to stop turmeric from killing people” जैसी हेडलाइन The Economist में प्रकाशित हुई 2023 में और नवंबर 2025 से इस प्रकार की पोस्ट 22 बार दोहरायी गयी। लेख का मूल संदेश यह था कि भारतीय लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए हल्दी का उपयोग करते हैं, लेकिन उसमें lead chromate मिलाया जा रहा है, जो ज़हरीला है।
2013 से इस विषय पर कई रिपोर्टें और शोधपत्र प्रकाशित होते रहे, लेकिन 2019 के बाद गति तेज़ हुई, विशेष रूप से Jenna E. Forsyth के कार्यों के बाद। इसके बाद मीडिया, UNICEF और Pure Earth जैसे संगठनों के माध्यम से यह धारणा उभरने लगी कि हल्दी भारत में बच्चों के कम IQ का एक प्रमुख कारण हो सकती है।
UNICEF ने एक meta-analysis का हवाला देते हुए दावा किया कि भारत में बच्चों के IQ में lead exposure के कारण औसतन लगभग 4 अंकों की कमी हो सकती है। हालांकि आलोचकों का कहना है जिस meta-analysis का उपयोग किया गया, उसमें कुछ महत्वपूर्ण अध्ययनों को बाहर रखा गया था। Erickson et al. (2021) के विश्लेषण में 57,887 बच्चों के डेटा की समीक्षा की गयी थी, लेकिन स्वयं लेखकों ने माना था कि अधिकांश डेटा सीमित भौगोलिक क्षेत्रों से लिया गया था। इसके बावजूद निष्कर्षों को पूरे भारत की विशाल आबादी पर लागू किया गया।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन शोधपत्रों को उस meta-analysis में शामिल किया गया, उनमें किसी ने सीधे यह दावा नहीं किया कि हल्दी lead exposure का मुख्य कारण है। बाद में Jenna E. Forsyth के शोधपत्रों ने हल्दी और lead exposure के बीच संबंध को प्रमुखता से रखा। हालांकि उनका अधिकांश शोध बांग्लादेश पर आधारित था, लेकिन मीडिया में बार-बार भारत को केंद्र में रखा गया।
2019 से 2023 के बीच Forsyth ने पाँच शोधपत्र प्रकाशित किये, जिनमें यह निष्कर्ष प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया कि बच्चों के रक्त में lead का स्रोत हल्दी हो सकती है। एक तकनीकी रूप से मज़बूत अध्ययन में isotopic lead tracing का उपयोग कर यह निष्कर्ष निकाला गया कि lead यानी सीसा मुख्यतः हल्दी से आ रहा था। लेकिन मुझे सोचने के बाद शंका हुई कि यदि सीसा मुख्यतः lead chromate से आ रहा होता, तो chromium स्तर भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए था, जबकि समकालीन रिपोर्टों में ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं दिखा।
वास्तविक समस्या बनाम प्रचार
इन सभी घटनाओं को कुछ लोग एक व्यापक पैटर्न के रूप में देखते हैं — बाहरी फ़ंडिंग, स्थानीय विषाक्तता की पहचान, शोध और नैरेटिव निर्माण, फिर नियामक दबाव और अंततः स्थानीय अनौपचारिक क्षेत्रों पर प्रभाव। जबकि बड़े वैश्विक सप्लाई चेन या अपस्ट्रीम संरचनाएँ अपेक्षाकृत चर्चा से बाहर रहती हैं। उदाहरण के तौर पर, जंक फ़ूड से मोटापा बढ़ने की चर्चा के बीच अक्सर दोष केवल “कार्ब्स और फ़ैट” पर डाल दिया जाता है।
Pure Earth को एक फ़ील्ड एनजीओ के रूप में देखा जाता है, जो प्रदूषण संबंधी ज़मीनी परियोजनाएँ चलाता है। वहीं GiveWell जैसे प्लेटफ़ॉर्म निजी धन को NGOs तक पहुँचाने का काम करते हैं। आलोचकों के अनुसार यह संरचना “private wealth → GiveWell → NGOs → local interventions” जैसी शृंखला बनाती है।
भारत में खाद्य मिलावट वास्तविक और पुरानी समस्या है। लेकिन 2026 की शुरूआत से जिस तरह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और बड़े टीवी चैनलों पर नक़ली तेल, नक़ली पनीर, नक़ली घी और ख़राब दवाओं की ख़बरों की बाढ़ आयी, उसने जनता में यह भावना पैदा कर दी कि “अब कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा।”
सरकार द्वारा लगातार छापेमारी और ज़ब्तियाँ की जा रही हैं, लेकिन इतने बड़े दावों के बावजूद पूरे देश में फ़ूड पॉइज़निंग या गंभीर अस्पताल मामलों में उसी अनुपात की वृद्धि स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं दी। आंध्र प्रदेश की बड़ी घटना भी दुर्घटनावश हुआ लीक थी, न कि जानबूझकर ज़हर मिलाने की घटना। इसके बावजूद भय का नैरेटिव लगातार बढ़ता गया।
कुछ लोग इसे coordinated amplification के रूप में देखते हैं, जिसमें अलग-अलग राजनीतिक झुकाव वाले अकाउंट भी शामिल हो सकते हैं। एक ही वीडियो और कहानियाँ बार-बार दोहराकर मौजूदा खाद्य व्यवस्था के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा पैदा किया जाता है। समस्याएँ वास्तविक हैं, लेकिन भय शायद वास्तविक नुक़सान से अधिक तेज़ी से फैल रहा है।
और समानांतर परिदृश्य…
इसी समय नवंबर 2025 में NITI Aayog ने “Reimagining Agriculture” रोडमैप प्रस्तुत किया, जिसमें सरकार को facilitator और private companies को innovation driver के रूप में दिखाया गया। इसमें climate-resilient seeds, AI tools, drones, robotics, digital systems और precision farming को बड़े पैमाने पर लागू करने की बात की गयी। आलोचकों के अनुसार यह पारंपरिक खेती से नियंत्रण को धीरे-धीरे टेक-आधारित और private-sector dominated मॉडल की ओर ले जाता है।
इसी दौरान ABLE ने अमेरिकी biotech संगठनों और Iowa आधारित समूहों के साथ साझेदारी की। इसे GM seeds, advanced breeding technologies और biotech feed की दिशा में बढ़ते सहयोग के रूप में देखा गया। ABLE को केवल एक उद्योग संगठन नहीं बल्कि कंपनियों, निवेशकों, शोध संस्थानों, लॉ फ़र्मों और अकादमिक संस्थाओं को जोड़ने वाले ecosystem node के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके नेताओं में बायोटेक उद्यमी, वैज्ञानिक और उद्योग प्रतिनिधि शामिल हैं, जो सरकार, वैश्विक भागीदारों और उद्योग के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
इन सबके बीच कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि एक तरफ़ मीडिया में खाद्य-सुरक्षा का भय बढ़ाया जा रहा है और दूसरी तरफ़ high-tech कृषि नीतियाँ, biotech partnerships और बड़े funding initiatives को समाधान के रूप में आगे लाया जा रहा है।
वास्तविक समस्याएँ अवश्य मौजूद हैं और उनका समाधान भी आवश्यक है। लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि भय के इस वातावरण से सबसे अधिक लाभ किसे मिलता है और भारत की खाद्य एवं कृषि व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ रही है।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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