
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से.....
रोम एक दिन में नहीं बना...
दूसरा दिन इतना आसान नहीं था, क्योंकि वीज़ा की प्रक्रिया बाक़ी थी। मैंने अपना सामान टटोला तो देखा कि हेल्थ इंश्योरेंस के काग़ज़ और पेन ड्राइव भी नदारद थे। यह कब और कैसे हुआ समझ में नहीं आया। मेरी समस्या यह थी कि मेरा वीज़ा नॉर्वे से मिला था, लेकिन इस वक्त मैं नॉर्वे की यात्रा ख़त्म कर आयी थी, और विएना जाने के लिए ऑस्ट्रिया जाना चाहती थी। फिर भी मैंने नॉर्वे दूतावास से वीज़ा की मांग की थी, और साथ में पेपर की कटिंग भी दी, जिसमें नॉर्वे के अख़बार में मेरे बारे में रिपोर्ट दी गयी थी।
वीज़ा बनाने में उन लोगों को ऐतराज़ तो नहीं था, लेकिन उनका इंटरनेट सिस्टम डाउन था। उन्होंने हमसे ऑस्ट्रिया के दूतावास में कोशिश करने को कहा। इसलिए मैं और रॉबर्टो सबसे पहले ऑस्ट्रिया के दूतावास में गये। वहाँ काफ़ी देर बैठाये रखने के बाद हमें कह दिया गया कि वे वीज़ा नहीं बना सकते। रॉबर्टो आपा खो बैठे, और मेरा तो रोना ही छूट गया। मैंने घर में प्रदीप को फ़ोन करके इंश्योरेंस की एक कॉपी, जो कि मेरे कंप्यूटर में थी, भेजने को कहा। प्रदीप ऑफ़िस में थे, और हैदराबाद के लिए निकलने वाले थे, वे झल्ला उठे। भाग्यवश उनकी फ्लाइट डिले हो गयी, और वे तुरंत घर गये और इंश्योरेंस के पेपर को PDF फ़ाइल बनाकर भेज दिया।
जब काम बिगड़ना होता है, तो बिगड़ता जाता है और जब ठीक होना होता है तो हर पल सहायक बनता जाता है। हमें 2 बजे से पहले नॉर्वे के दूतालय पहुँचना था, क्योंकि वहाँ से ख़बर आ गयी थी कि उनका कंप्यूटर ठीक हो गया है, और वे तीन बजे से पहले आने पर वीज़ा दे देंगे। जैसे ही नॉर्वे के दफ़्तर में बैठी ऑफ़िसर ने मुझसे कहा कि आप बैठिए, हम 20 मिनट में वीज़ा दे देंगे, मेरा बाँध टूट गया और आँखों से आँसू टपकने लगे। इतने वक़्त में जो टेंशन मेरे भीतर जमा हुआ था, वह बहने लगा। उस महिला ने बड़े प्रेम से मुझसे कहा कि मुझे आपकी समस्या का भान है, पर कल आपका वक़्त सही नहीं था। आज जितना वक़्त है उसका फ़ायदा उठाओ। चार बजे जब हम निकले, हमारे पास वीज़ा था।
रॉबर्टो ने लपककर वक़्त को अपने हाथ में ले लिया और सबसे पहले पास के एक पार्क में ले आया, जो इतालवी अभिनेत्री के नाम समर्पित किया गया था। रॉबर्टो बताने लगे कि वे अपने बचपन में इस पार्क में आकर घण्टों बैठा करते थे। यहाँ से रोम पूरा का पूरा दिखायी देता है। रोम शहर सात पहाड़ियों पर 21 अप्रैल 753 BC को बसाया गया था, इन पहाड़ियों के नाम हैं: the Aventine Hill, the Caelian Hill, the Capitoline, the Esquiline Hill, the Palatine Hill, the Quirinal Hill, और the Viminal Hill।

कहा जाता है तेवेरे नदी के अलावा एक और नदी शहर के बीच में से गुज़रती थी, जिसका नाम था Aniene जो बाद में जाकर तेवेरे में मिल जाती थी। शायद यही कारण है कि रोम के हर चौराहे पर कोई न कोई फ़व्वारा देखने को मिल जाता है। न जाने कितने भग्नावशेष, न जाने कितनी इमारतें, हर किसी में पानी का फ़व्वारा।
रॉबर्टो ने घड़ी देखी, और कहा कि अभी हमारे पास वक़्त है, हम The Colosseum or Roman Coliseum चलते हैं, जो रोमन साम्राज्य की अनेक गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए शहर के बीचो-बीच खड़ा है, न जाने कितने साम्राज्यों का पतन इसने देखा, न जाने कितनी धार्मिक आँधियाँ सहीं, और भूकम्पों से टकराया, लेकिन भग्नावशेष में भी धरती का आश्चर्य बना हुआ है। इसका निर्माण 70 और 72 AD में सम्राट Vespasian द्वारा आरम्भ किया गया और निर्माण पूरा 80 AD में सम्राट Titus के शासन काल में हुआ।
Amphitheatrum Flavium नाम Vespasian और Titus सम्राटों के पारिवारिक नामों पर पड़ा। हम लोग कोलोसियम के बाहर टिकट की लाइन में खड़े हुए। रॉबर्टो पचहत्तर बरस के हैं, लेकिन अपनी उम्र से कम लगते हैं। रोम में पैंसठ साल के ऊपर के लोगों को टिकट नहीं देना पड़ता है। रॉबर्टो अपना परिचय पत्र साथ रखते हैं, जिससे उनकी असली उम्र के बारे में पता चल सके। जब वे खिड़की पर पहुँचते हैं और मेरे लिए एक टिकट ख़रीदकर अपने लिए पास माँगते हैं तो खिड़की के भीतर बैठी महिला आश्चर्य से कहती है, लेकिन आप तो सीनियर सिटिज़न नहीं लगते। रॉबर्टो अपना परिचय पत्र निकालकर दिखाते हैं। दोनों में इतालवी भाषा में संवाद होता है। एक हल्का-फुलका मज़ाक़ भी।
मैं देखती हूँ रोम में लोग काफ़ी खुल कर हँसी-मज़ाक़ कर लेते हैं। रॉबर्टो तो हर किसी से बेहद खुलकर बात करते हैं, चाहे वह टैक्सी ड्राइवर हो या दुकानदार। उनकी आत्मा उस नगर में रची बसी है। कोलोसियम का टिकट नौ यूरो का था, जो करीब साढ़े पाँच सौ का हो जाता है, जबसे मेरे पैसे खोये, मैंने अपने पास पैसे रखने बन्द कर दिये। चलने से पहले मैं पैसे रॉबर्टो को संभलवा देती हूँ, शाम को वे बता देते हैं कि कितने पैसे बाक़ी हैं। रॉबर्टो रिटायर्ड हैं, उनकी पत्नी को देखकर यह लगता है कि उनका महीने का ख़र्चा काफ़ी होता होगा, इसलिए मैंने इस बात का ध्यान रखा कि रॉबर्टो का ख़र्चा न हो। रॉबर्टो भी बेहद संभलकर ख़र्च कर रहे थे।
हम लोग कोलोसियम की सीढ़ियों पर चल कर ऊपर जाते हैं, पतली संकरी सीढ़ियाँ लखनऊ की भूलभुलैया की सीढ़ियों की याद दिलाती हुई-सी। कोलोसियम अर्धचक्राकार आकृति का है जिसकी लम्बाई करीब 640 रोमन फीट और चौड़ाई 528 रोमन फीट है, इसके आधार का क्षेत्रफल 24000 मीटर स्क्वायर है। बाहरी दीवारों की ऊँचाई 165 रोमन फीट है। इसके अर्धचन्द्राकार थिएटर में जाने के कई रास्ते हैं, जिससे यह आपदावस्था में आसानी से ख़ाली किया जा सके। इसमें एक वक़्त में क़रीब 50,000 लोग बैठ सकते थे। इसके अस्सी द्वार हैं, जिनमें से छियत्तर आम आदमी के लिए थे और बाक़ी चार राजकीय दर्शकों के लिए थे।
कोलोसियम रोम के क्रूर मनोरंजन की गाथा कहता है। यहाँ दासों को जंगली जानवरों से लड़वाया जाता था। थियेटर के नीचे की मंज़िल में क्रूर जानवर रखे जाते थे, जिन्हें दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से पकड़कर लाया जाता था। दूसरी ओर दासों को पाला जाता था। लड़ाई एक पक्ष की मृत्यु तक चलती थी। जीतने वाले की ज़िंदगी भी राजा के हाथ में होती थी।
रॉबर्टो जब कथा कह रहे थे, मेरा रोम-रोम सिहर रहा था। क्रूर मनोरंजन भारतीय संस्कृति में नहीं के बराबर रहा है। मुझे लगा यही कारण होगा कि भारत में अहिंसा को स्थान मिला और कई धर्मों का उदय भी हुआ।
कोलोसियम के ऊपर म्यूज़ियम था, जिसको देखने में काफी वक़्त बीत गया। रॉबर्टो इतिहास से गुज़रे व्यक्ति हैं, वे लगातार कुछ न कुछ बताते जा रहे हैं, जैसे कि यहूदियों के दास बनने की कथा, तरह-तरह के दरवाज़े जहाँ पर राजाओं ने अपनी विजय के चिह्न खोदे हैं। मेरा दिमाग़ सुन्न होता जा रहा है, बस एक दृश्य दिख रहा है – दर्शकों की वहशी चीख़ें, भूखे जानवरों की पीड़ा और दासों का जीवन संघर्ष….
सवाल यह है कि क्या हम अपनी क्रूरता को पीछे छोड़ आये या फिर आज भी नक़ली मुखौटे में छिपाये हुए हैं।
कोलोसियम कई बार टूटा, कई बार बनाया गया, युद्धों से लेकर भूकम्पों तक ने इसे चकनाचूर करने की कोशिश की, लेकिन आदमी की सर्वविजयी बनने की आकांक्षा की तरह पूर्णतया नष्ट नहीं हो पाया। एकड़ों भूमि में पसरे इस थिएटर में आज भी मृतकों की चीखें घूमती होंगी। कहा जाता है यहाँ खेले गये क्रूर खेलों में कम से कम 50,000 मनुष्य और एक लाख जानवर मारे गये होंगे। मुझे अपने देश के पुरी के खंडहर याद आते हैं, जहाँ चीखों की जगह संगीत की लहरें उभरती रही हैं। कहा जाता है यहाँ पानी भरकर सामुद्रिक खेल भी खेले गये।
हम कोलोसियम की छत पर जाते हैं जहाँ से पूरा रोम दिखायी देता है। रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ है, न जाने कितनी सदियों की गाथा है इसमें। हम लोग खंडहरों के बीच घूमते-घूमते न जाने किस इतिहास के दरवाज़े में घुसते हैं, और न जाने किसमें से बाहर निकलते हैं। हर सम्राट अपनी जीत की कथा दरवाज़ा बनाकर लिखता है, सोचता होगा कि वह इन दरवाज़ों के द्वारा इतिहास की अमिट रेखा बन जाएगा, रॉबर्टो हर युद्ध के परिणाम विजय द्वार के बारे में बताते हैं। दरवाज़ों पर खुदे विजय चिह्नों को समझाते हैं, कुछ दरवाज़े टूट-फूट गये, कुछ अभी भी बाकी हैं, मेरे दिमाग़ में नाम नहीं घुसते, बस युद्ध का घोष घुन्नाता है। कान सुन्न होने लगे हैं, मन खट्टा हो रहा है…
हम लोग लौट आते हैं, रात रीटा के घर खाना है, उससे पहले वियना के लिए टिकट भी बुक करना है।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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