
- October 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
हिंदी-उर्दू के कुछ विशिष्ट हस्ताक्षरों का जन्म 1926-27 में हुआ। हालांकि कुंवर नारायण, नामवर सिंह, ख़लील-उर-रहमान आज़मी, साजिदा ज़ैदी, रमानाथ अवस्थी, मोहम्मद अल्वी, नरेश कुमार शाद, गुलज़ार देहलवी, इब्ने-इंशा, विजयदान देथा, ख़दीजा मस्तूर जैसे नाम जन्म-शती सूची में हैं, लेकिन इनसे अलग कुछ और आवाज़ों का ज़िक्र आज की चिंताओं के संदर्भ में...
भवेश दिलशाद की कलम से....
साहित्य में मुख्यधारा के सवाल
बेकारी, ग़रीबी, बीमारी जैसे अज़ाबों से जूझ रहे देश के स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर एक कवि सम्मेलन हो रहा था। एक कवि ने बढ़-चढ़कर गौरव-गान छेड़ दिया। पता चला है वह श्रीमान सोम ठाकुर थे। तब मुकुटबिहारी सरोज कुछ ही पलों में भड़क उठे। माइक छीना और त्वरित टिप्पणी की तरह कविता सुनाने लगे, ‘कवि तू झूठ बोलता है’। ऐसे एक नहीं सरोज जी के कई क़िस्से हैं, जो एक कवि के तेवर और आत्मसम्मान की याद दिलाते हैं।
सरोज जी को याद करना दरअसल एक नागरिक की मज़बूत नैतिकता को याद करना भी रहा है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति, प्रश्न और आलोचना अपराध नहीं, औज़ार हैं, जिन्हें इस्तेमाल करके मूरत को और सुंदर किये जाने की चेष्टा की जाती है। सरोज जी की सुपुत्री मान्यता से बात हुई तो उन्होंने याद दिलाया कि आला नेताओं की मौजूदगी में जहां सीधे व्यंग्य से बचना ही कवियों के लिए सुरक्षित उपाय था, सरोज जी कटाक्ष वाली कविता पढ़ देते थे। ‘इन्हें प्रणाम करो, यह बड़े ही महान हैं’… एक बड़े मंच से उन्होंने पढ़ दी। अंजाम हुआ कि उन्हें सरकारी आयोजनों, दूरदर्शन, रेडियो और किसी भी क़िस्म की सहायता से वंचित कर दिया गया।
इसके ठीक उलट आज हम देख रहे हैं सत्ता, पुरस्कार, सम्मान और शासकीय संरक्षण के लिए साहित्यिक समाज ख़ुद को कैसे रीढ़विहीन किये जा रहा है। अशोक वाजपेयी को श्रीकांत वर्मा सम्मान से नवाज़े जाने के बाद जो बखेड़ा हुआ है, उसे भी इस संदर्भ में एक ताज़ा मिसाल की तरह देखना चाहिए। वास्तव में, हमें अपने पुरखे कवियों से विरासत में लेना तो था सच कहने का सलीक़ा, तेवर और आत्मसम्मानी कवि वाली ठसक और हमने… अमानत की ठीक से हिफ़ाज़त नहीं की।
अब प्रश्न यह है अगर सत्ता-लोलुपता है, स्वार्थ ही पुरुषार्थ है और सारा आतिशी लहजा एक छद्म-छवि भर है, तो ऐसी प्रवृत्तियों वाले उपक्रमों को साहित्य या साहित्य की मुख्यधारा कहना और मानना कहां तक ठीक है और कब तक? ख़ेमेबाज़ी, साहित्य में हद पार देने वाली राजनीति लाने जैसे रवैयों के लिए नामवर सिंह की आज खुलकर आलोचना की जाती है, ऐसे में हम क्या आज उन नामों के गुज़र जाने का इंतज़ार कर रहे हैं, जिनकी आलोचना अभी की जा सकती है? कब तक हम अशोक वाजपेयी जैसे नामों को सर चढ़ाकर मुख्यधारा या शीर्ष कवि कहेंगे?
स्वप्न के मेले सजाते ही न रहना,
सत्य के ईमान का भी ध्यान रखना…
गीत का मस्तक झुकाते ही न रहना,
गीत के सम्मान का भी ध्यान रखना
चंबल के एक और कवि वीरेंद्र मिश्र की ये पंक्तियां भी उसी शायराना तेवर के हक़ में हैं, जो साहित्य के नाम पर झूठी, मक्कार और स्तरहीन लफ़्फ़ाजियों को निशाने पर लेता है। एक और छंद है, जिसमें वीरेंद्र मिश्र कहते हैं कि गीत यानी साहित्य कोई भीख नहीं है, कोई चंदा या किसी के अहसान से दबकर नहीं लिखा जाता।

पत्रकारिता, थिएटर, सिनेमा वग़ैरह के साथ साहित्य की आवाज़ का बेअसर हो जाना हमारे दौर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक चिंता है। कहा तो यह भी जाना चाहिए कि यह सांस्कृतिक संस्थाओं के पतन का संकट-काल है। इस बीच हम साहित्य के गुज़रे अध्यायों को पलटने लगें तो सवाल उठेगा ही कि आख़िर क्यों?
आता हुआ कल हवाई क़िला नहीं होता बल्कि बीते हुए कल में जड़ें रखता है। गहरी और स्वस्थ जड़ें एक मज़बूत पेड़ की सनद होती हैं। ज़रूरत है काव्य सृजन अब ऐसे स्वरों और उस चेतना की ओर लौटे, जो उसकी थाती रही है। यह बात एक और मुद्दे को छेड़ती है। हमारे साहित्य में ऐसे नामों का अभाव है, जिन्हें विश्वसनीय और कालातीत आवाज़ माना जा सके। अब भी हमारे पाठ्यक्रमों में ‘आधुनिक काव्य’ के संकलन 1960-70 के दशक तक ही हांफ जाते हैं। आधुनिक काव्य पिछले 50 वर्षों में उल्लेखनीय क्यों नहीं हो सका? गद्य साहित्य की हालत भी ऐसी ही है…
सिर्फ़ सिंहावलोकन नहीं बल्कि एक आत्मावलोकन का समय है कि हम कहां-कहां चूक रहे हैं। जड़ों से आ रही पुकारों को ध्यान से सुनने में देर करने से हालात और बदतर ही होंगे। जहां से आत्मा को स्वर मिलते हैं, जब तक उस गहराई को सुना नहीं जाएगा, हम अपने समय के साथ न्याय शायद नहीं कर पाएंगे। और फिर सिर्फ़ कविता ही क्यूं हर रूप में साहित्य का एक काम अपने समय को पुकारना है। इस पुकार में विद्रोह के साथ प्रेम, व्यंजना के साथ करुणा और जंग के बीच अम्न का आह्वान होता है।
महाभारत की कथा को धर्मवीर भारती ने अपने समय की विडंबनाओं के हिसाब से ‘अंधा युग’ जब कहा होगा तब कितना कुछ सहा होगा। उनके भीतर का कवि कितना दहा होगा। तभी शायद आज भी इससे ज़्यादा मारक या सटीक रूपक हम खोज नहीं पा रहे।
यह वाक्य भी अतिशय नहीं कि भारती वह रचनाकार रहे, जिन्होंने इंसानियत के हक़ में वक़्त-वक़्त पर पुकार लगायी। ‘युद्ध-यात्रा’ लिखी, तो उसमें रोमांच, युद्ध विवरणों और हिंसा की रंजित गाथा के बीच शांति का संदेश छुपा दिया। इस यात्रा के अंतिम पन्नों तक आते-आते युद्ध के दृश्यों से हताहत महसूस कर पूरे पन्ने में लिखते हैं, युद्ध किसी भी लक्ष्य के लिए हो, कोई भी करे, रक्त-गाथा निर्दोष बच्चों, विवश औरतों और सभ्यता की नींव को पुख़्ता करने वाले किसानों, शिल्पियों, कामगारों की छाती पर ही लिखी जाती है।
शौपेनहार हों या ऑस्कर वाइल्ड, कई विद्वानों का मत रहा कि दोयम दर्जे के हुए बग़ैर लोकप्रियता मिलना तक़रीबन नामुमकिन है। ‘गुनाहों का देवता’ भले ही इस तरह की कृति रही, लेकिन इससे धर्मवीर भारती का महत्व कम नहीं होता। धर्मवीर भारती की ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ जैसी कृतियां जनपक्ष के नज़रिये से अहम हैं।
मौजूदा हालात में, साहित्य के सामने जो प्रमुख चिंताएं हैं, उनमें एक, युद्ध के विरुद्ध बल्कि यूं कहें कि मानवता, प्रेम और दर्दमंदाना अहसास के पक्ष में एक सशक्त आवाज़ बनना तो एक, जनपक्ष में साहित्य का ईमानदारी से आना भी है।
और ये लोग कौन हैं, जिन्हें अवाम कहा जाता है या आम जन! हम अपने परिवेश, अपने आस-पास का मुआयना करें तो पाएंगे कि हम लगातार एक युद्ध के बीच ही हैं। हमारे रोज़मर्रा के समाज में किसी न किसी स्तर पर एक युद्ध चल रहा है। भाषा, जाति, मज़हब, लैंगिकता, प्रांत जैसे और भी कुछ मुद्दे हैं, जिनसे हम दिन भर में कहीं न कहीं टकरा ही रहे हैं।
“यार, ये बताओ कि अमेरिकी साम्राज्यवाद हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने में सूत्रधार का काम नहीं कर रहा है क्या? इसमें देश के मल्टी-नैशनल की कोई भूमिका नहीं है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जमाते-इस्लामी तथा विश्व हिन्दू परिषद् दोनों के हेडक्कार्टर अमेरिका में हैं। फ़र्क़ इतना है कि एक वाया सऊदी अरब आता है, दूसरा नेपाल से। इस पर हम लोग क्यों नहीं सोचते?” (पृ.-42, सिरजे जिनने सपने)
यह उस किताब से एक पत्र का अंश है, जो उन्हीं कुंवरपाल सिंह ने लिखी, जिनके नाम ‘आधा गांव’ समर्पित की थी डॉ. राही मासूम रज़ा ने। आम आदमी के तमाम द्वंद्वों और हालात की बात करने वाली इस आवाज़ के बारे में वरिष्ठ लेखक नमिता सिंह ने आब-ओ-हवा पर अगस्त माह में जो ब्लॉग लिखा, उसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। उपर्युक्त अंश इसी ब्लॉग से लिया गया है, जिसमें वह बताती हैं राही साहब के शब्दों में हिन्दुस्तान किस तरह धड़कता था।
इस हिन्दुस्तानियत का एक अहम पहलू वो गंगा-जमुनी तहज़ीब रही है, जिसका साझा चूल्हा बाले रखने में हिंदी-उर्दू दोनों ज़ुबानों ने दम लगाया। आब-ओ-हवा पर ही अपने ब्लॉग में डॉ. आज़म ने प्रतिष्ठित उर्दू आलोचक क़मर रईस के इन शब्दों का हवाला दिया था…
“क़ुर्रतुल-ऐन हैदर ऐसी साझा संस्कृति के गुण गाती रहीं और अपने तहदार किरदारों में ऐसे हिन्दुस्तान को उजागर करती रहीं, कि कई नस्लें इस सांस्कृतिक मेलजोल के लिए आभारी रहेंगी।”
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तू सामने है अपने बता कि तू कहाँ है
किस तरह तुझको देखूं नज़्ज़ारा दर्मियाँ है
(ऐनी आपा की मशहूर कहानी ‘नज़्ज़ारा दर्मियाँ है’ में आया शे’र)
बीच में डाल दिये गये इन नज़्ज़ारों को किस तरह देखा जाये? अक्सर खड़े किये जाने वाले उन विवादों के रूप में देखा जा सकता है, जिनकी आड़ में हम सांस्कृतिक फैलाव और उसकी आत्मा से जुड़ने के लक्ष्य से भटक जाया करते हैं। याद आता है दूरदर्शन पर महाभारत के प्रसारण का दौर। एक तरफ़ प्रतिक्रिया में ग़ुस्सा और अलगाव उफनता कि एक मुसलमान लेखक (राही मासूम रज़ा) से संवाद क्यों लिखवाये! तो दूसरी तरफ़ इसी वजह पर दर्शक/श्रोता सुखद आश्चर्य से भर जाते कि यह तो ऐतिहासिक सांस्कृतिक कारनामा है।

हम ऐसे दौर में हैं, जिसका सबसे प्रमुख आयाम ध्रुवीकरण है। सियासत ही नहीं, समाज और संस्कृति के हर कोने तक पसरा हुआ। तो, इस समय साहित्य के सामने एक चिंता आपसदारी की इस तहज़ीब को ज़िंदा रखने की भी है। आब-ओ-हवा बग़ैर किसी शोर-शराबे के ऐसी ही एक विनम्र कोशिश है। मुझे लगता है इन कोशिशों को प्रमुख और मज़बूत सुर बनाने की ज़रूरत है।
इसी तहज़ीब के विचार पर कहीं बहसें और साज़िशें हो रही हैं तो कहीं-कहीं बदस्तूर मासूम कोशिशें भी हैं। देश यानी जन-मानस इसी तरह धड़कता रहता है। सहमतियों-असहमतियों के बीच। बहसें एक ज़िंदा लोकतंत्र के लिए ज़रूरी हैं लेकिन आधार में एक वाजिब चिंता और साफ़ नीयत के बग़ैर यही बहसें जानलेवा तक हो जाती हैं।
बहस का मतलब मॉब लिंचिंग नहीं होता। पिछले लंबे समय से मीडिया के एक बड़े हिस्से ने बहस के नाम पर जो करतूतें की हैं, लगातार आलोचना के कठघरे में रही हैं। ऐसी बहसों के बीच अक्सर याद आते हैं ‘देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता’ कहने वाले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना…
खूँटियों पर ही टँगा
रह जाएगा क्या आदमी?
सोचता, उसका नहीं यह खूँटियों का दोष है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह क्या ग़ज़ब का देश है।
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में छायावाद के बाद प्रगतिवाद और फिर प्रयोगवाद की धाराएं आती हैं। इस समय में कविता छन्द को बंधन कहना सीखती है और बहुत जल्द उसे छोड़ना, तोड़ना। इस तोड़-फोड़ के दौरान बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसे हम काव्य के साथ अनाचार कह सकते हैं। फिर भी, इस बीच जो कुछ स्वर वाक़ई कविताई का दामन थामे दिखते हैं और अपने हिस्से की अभिव्यक्ति से काव्य-संसार को समृद्ध करते हैं, उनमें एक नाम सर्वेश्वर दयाल का ज़रूर है।
उनके यहां कविता को वह तेवर, वह आवाज़ और वह रंग मिलता है, जिसे युग-बोध की ज़रूरत भी कहा जा सके और नये भारत की लोक-धुन भी। आज भी सड़क से संसद तक उनकी कुछ काव्य पंक्तियां गूंजती हैं। कितना सुखद है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही उनके काव्य को अपना हथियार बनाते दिखते हैं। यही कविता की असल ताक़त है कि वह किसी एक दल या पक्ष नहीं बल्कि अवाम की प्रतिनिधि बन जाती है।
अब सवाल यह है कि इस दौर में क्या कविता या साहित्य वृहत्तर समाज का प्रतिनिधि स्वर है? अवाम की आवाज़ है? क्या व्यवस्था के लिए इस आवाज़ का कोई अर्थ है? विशेष तौर से, हिंदी-उर्दू पट्टी वाले समाज में साहित्य किन मूल्यों पर खड़ा है? उसकी क्या गूंज है और उसके पास आवाज़ बनने के लिए किस तरह का साहस या बल है? और यह भी कि साहित्य और समाज एक-दूसरे के लिए क्या अपना फ़र्ज़ समझ और निभा पा रहे हैं?
हिंदी पट्टी के समाज की मानसिकता का मुआयना ज़रूरी है। इस समाज ने अपने श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ कलाओं और श्रेष्ठ चिंतनों को अपेक्षानुरूप महत्व और सम्मान नहीं दिया। आब-ओ-हवा पर पत्रकार अजय शर्मा के लेखों की हालिया सीरीज़ (#ख़बरनामा) बताती है कि इसी समाज की पत्रकारिता (जो इस साल 200 वर्ष की हुई है) अनेक चिंताओं और प्रश्नों से जूझ रही है और जूझती रही है। कहा जा सकता है इस समाज ने एक विश्वसनीय, प्रगतिशील और ज़िंदा रहने वाले स्वरों को पैदा करने में, पोसने में हमेशा कोताही से ही काम लिया।
जो साहित्यकार शीर्ष पर विराजमान हैं, उनके चरित्र, पक्षधरता, प्रगतिशीलता, नैतिक मूल्य आदि मुद्दे बन जाते हैं। या फिर एक लाजवाब सवाल की तरह मुंह चिढ़ाते नज़र आते हैं। तो, हिंदी संबंधी अंतरराष्ट्रीय आयोजनों और विस्तार के शोर के पीछे कुछ वास्तविक सवाल हमें लगातार पूछते रहने होंगे ताकि हिंदी साहित्य दिशाभ्रम का शिकार होने से किसी हद तक तो बच सके।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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