satire tradition in folk literature blog by arun arnaw khare
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....

लोकसाहित्य में व्यंग्य परंपरा व स्वरूप-2

         पिछले अंक में हमने लोकगीतों और लोककाव्य को दृष्टिगत रखते हुए व्यंग्य उपस्थिति की परंपरा और स्वरूप के विषय पर चर्चा की थी। इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अब लोक प्रचलित गद्य साहित्य पर दृष्टिपात करते हैं।

लोककथाओं में व्यंग्य

भारतीय लोककथाओं में “पंचतंत्र” और “हितोपदेश” का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इन कथाओं में नीति और शिक्षा के साथ-साथ व्यंग्य का भी प्रभावी प्रयोग मिलता है। यह व्यंग्य, पशु-पक्षियों और काल्पनिक पात्रों के माध्यम से मनुष्य के स्वभाव, सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक षड्यंत्रों पर संकेतात्मक रूप में व्यक्त होता है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के अनुसार – “लोककथाएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक बुद्धि और आलोचनात्मक दृष्टि का दर्पण हैं।”

पंचतंत्र की रचना परंपरागत रूप से विष्णु शर्मा के नाम से संबद्ध मानी जाती है। इसका उद्देश्य राजकुमारों को नीति और व्यवहारिक बुद्धि का ज्ञान देना था। इसी कारण इसकी कथाओं में केवल उपदेशात्मकता के साथ-साथ सामाजिक आलोचना भी मिलती है। उदाहरण के लिए “नीला सियार” की कथा, सत्ता और दिखावे पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। एक सियार रंग के घड़े में गिरकर नीला हो जाता है और अन्य पशुओं को यह विश्वास दिला देता है कि वह ईश्वर का दूत है। पशु उसे राजा बना लेते हैं, किंतु जब वह सियारों की आवाज़ सुनकर स्वयं हुआँ-हुआँ करने लगता है, तब उसकी असलियत सामने आ जाती है। यह कथा उन व्यक्तियों पर व्यंग्य करती है जो बाहरी आडंबर और छल के माध्यम से सत्ता प्राप्त कर लेते हैं।

इसी प्रकार एक अन्य कथा “सिंह, बैल और सियार”, दरबारी राजनीति और चापलूसी पर व्यंग्य करती है। सियारों की चालाकी के कारण सिंह अपने ही मित्र बैल को शत्रु समझ बैठता है और मार देता है। इस कथा के माध्यम से सत्ता के निकट रहने वाले स्वार्थी सलाहकारों और दरबारी षड्यंत्रों की आलोचना की गई है। यहाँ व्यंग्य का लक्ष्य पात्र नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें छल और चापलूसी, सत्य और मित्रता पर भारी पड़ जाते हैं। “ब्राह्मण और तीन ठग” कथा सामाजिक अंधविश्वास, भीड़-मानसिकता और विवेकहीनता पर व्यंग्य करती है। तीन ठग बार-बार झूठ बोलकर ब्राह्मण को भ्रमित कर देते हैं कि उसके कंधे पर बकरी नहीं बल्कि कुत्ता है। अंततः ब्राह्मण अपनी बकरी छोड़ देता है।

हितोपदेश मूलतः पंचतंत्र की कथाओं से प्रेरित नीति-कथाओं का संग्रह है, जिसकी रचना नारायण पंडित ने की मानी जाती है। इनमें नीति और व्यंग्य का सुंदर संयोजन मिलता है। उदाहरण के लिए “मूर्ख मित्र” की कथा में एक बंदर अपने स्वामी के चेहरे पर बैठी मक्खी को भगाने के लिए पत्थर फेंक देता है, जिससे राजा की मृत्यु हो जाती है। यह कथा इस बात पर व्यंग्य करती है कि मूर्ख मित्र पर भरोसा करना कितना घातक हो सकता है। इसी संदर्भ में प्रचलित नीति-वाक्य है – मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु भला। इसी प्रकार “बगुला और केकड़ा” की कथा धार्मिक पाखंड और ढोंग पर व्यंग्य करती है। बगुला स्वयं को तपस्वी बताकर मछलियों को छलपूर्वक खाता है, किंतु केकड़ा उसकी चाल समझकर उसका वध कर देता है। यह कथा उन लोगों पर व्यंग्य करती है जो धर्म और नैतिकता का मुखौटा पहनकर स्वार्थ साधते हैं। राजनीति, दरबारी-षड्यंत्र और स्वार्थी सलाहकारों पर व्यंग्य करती एक अन्य कथा में बताया गया है कि सिंह के दरबार आश्रय पाने वाला एक ऊँट, सिंह के मंत्रियों (विशेषतः सियार) की चालबाज़ी का शिकार बन जाता है। भूख लगने पर ये मंत्री षड्यंत्र रचकर उसी ऊँट को मरवा देते हैं। यह कथा सत्ता के निकट रहने वाले स्वार्थी सलाहकारों और दरबारी राजनीति पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है।

पंचतंत्र और हितोपदेश की कथाओं में व्यंग्य सामान्यतः प्रत्यक्ष नहीं होता, बल्कि वह रूपक और प्रतीक के माध्यम से व्यक्त होता है। पशु-पक्षियों के चरित्र वास्तव में मनुष्यों के व्यवहार का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिंह सत्ता का प्रतीक है, सियार चापलूसी और षड्यंत्र का, जबकि अन्य पशु समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार इन कथाओं में व्यंग्य सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को उजागर करने का माध्यम बनता है। इनकी एक विशेषता यह भी है कि अधिकांश कथाएँ किसी नीति-वचन या शिक्षा के साथ समाप्त होती हैं, जिससे पाठक को जीवनोपयोगी ज्ञान प्राप्त होता है। यही कारण है कि ये कथाएँ आज भी प्रासंगिक और लोकप्रिय हैं।

पंचतंत्र और हितोपदेश के अतिरिक्त भारतीय लोककथाओं में तेनालीराम, अकबर–बीरबल और शेख चिल्ली की कथाएँ भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। इनमें व्यंग्य प्रत्यक्ष रूप में नहीं, बल्कि हास्य, चातुर्य और बुद्धि-विनोद के माध्यम से व्यक्त होता है। तेनालीराम की कथाएँ दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेव राय के दरबार से संबंधित मानी जाती हैं। तेनालीराम को एक बुद्धिमान विदूषक और कवि के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी कथाओं में सामाजिक पाखंड, धार्मिक आडंबर और बनावटी विद्वत्ता पर तीखा व्यंग्य मिलता है। उदाहरण के लिए “विद्वानों की परीक्षा” जैसी कथाओं में तेनालीराम घमंडी पंडितों को सरल प्रश्नों में उलझाकर उनकी वास्तविक अज्ञानता उजागर कर देते हैं। यह कथा दिखावटी ज्ञान और पांडित्य के दंभ पर व्यंग्य करती है। इसी प्रकार कुछ कथाओं में लोभी पुजारियों तथा स्वार्थी दरबारियों को उपहास का पात्र बनाकर धार्मिक पाखंड और लोभ पर कटाक्ष किया गया है।

अकबर–बीरबल की कथाएँ मुगल सम्राट अकबर और उनके दरबारी बीरबल की बुद्धिमत्ता से जुड़ी लोककथाएँ हैं। इनमें बीरबल की तीक्ष्ण बुद्धि और तर्कशीलता के माध्यम से दरबारी चापलूसी, सामाजिक अन्याय और सत्ता के अहंकार पर व्यंग्य किया गया है। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध कथा “बीरबल की खिचड़ी” में एक व्यक्ति ठंडे पानी में रात भर खड़े रहने की शर्त पूरी करता है, लेकिन उसके यह कहने पर कि वह राजमहल के दीपक को देखते हुए रात पानी में खड़ा रहा, अकबर उसे इनाम देने से मना कर देते हैं। उन्हें लगा कि दीपक की गर्मी के कारण ही वह सर्दी से बच सका। यह सुनकर बीरबल दूर जलती हुई आग के सहारे खिचड़ी पकाने का नाटक करके यह सिद्ध करते हैं कि यदि दूर की आग से खिचड़ी नहीं पक सकती, तो दूर के दीपक से व्यक्ति को गर्मी भी नहीं मिल सकती। इस कथा में शासकीय तर्क की विसंगति और न्याय की विडंबना पर व्यंग्य किया गया है।

शेख चिल्ली की कथाएँ भी भारतीय लोककथाओं की हास्य-व्यंग्य परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन कथाओं में शेख चिल्ली का चरित्र एक भोले, कल्पनाशील और कभी-कभी मूर्ख व्यक्ति के रूप में चित्रित हुआ है। उनकी कथाओं में व्यंग्य मुख्यतः मानवीय मूर्खता और अव्यावहारिक कल्पनाओं पर केंद्रित मिलता है। प्रसिद्ध कथा “दूध का घड़ा” में शेख चिल्ली भविष्य के सपनों में इतना खो जाता है कि सिर पर रखा दूध का घड़ा ही गिराकर तोड़ देता है। यह कथा अव्यावहारिक योजनाओं और कल्पनाशील मूर्खता पर व्यंग्य करती है।

लोकसाहित्य की इन लोककथाओं में व्यंग्य का स्वर अलग-अलग रूपों में व्यक्त होता है। अकबर–बीरबल की कथाओं में व्यंग्य मुख्यतः राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवहार पर केंद्रित है। तेनालीराम की कथाओं में यह धार्मिक पाखंड, विद्वत्ता के दंभ और सामाजिक आडंबर पर प्रहार करता है। वहीं शेख चिल्ली की कथाओं में व्यंग्य का लक्ष्य मानवीय मूर्खता और अव्यावहारिक सोच होती है। लोकजीवन के अनुभवों से जन्मी ये कथाएँ सरल भाषा और रोचक घटनाओं के माध्यम से गहरे सामाजिक और नैतिक संदेश देती हैं। इसलिए अकबर–बीरबल, तेनालीराम और शेख चिल्ली की कथाएँ भारतीय लोकसाहित्य में हास्य-व्यंग्य की एक सशक्त और जीवंत परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं।

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लोकोक्तियों और कहावतों में व्यंग्य

लोकोक्तियाँ हमारे पूर्वजों के अनुभवों का निचोड़ हैं। लोकसमाज में प्रचलित वह कथन, जो किसी विशेष प्रसंग या स्थिति पर सटीक बैठता है और जिसमें गहरा जीवनानुभव निहित होता है, लोकोक्ति कहलाता है। लोकोक्ति अपने आप में एक पूर्ण वाक्य होती है। इसका प्रयोग किसी कथन की पुष्टि करने, उसका खंडन करने या किसी प्रकार का उपदेश देने के लिए किया जाता है। इसे ‘कहावत’ या ‘जनश्रुति’ भी कहा जाता है।

लोकोक्तियों का कोई एक निश्चित रचयिता नहीं होता। इनका निर्माण लोकानुभवों के संचय से होता रहा है। लोकोक्तियाँ प्रायः नीति, व्यंग्य, चेतावनी, उपालंभ और जीवन-उपदेश से संबंधित होती हैं। लोग अपने कथन को अधिक प्रभावी, तार्किक, लालित्यपूर्ण और संप्रेषणीय बनाने के लिए लोकोक्तियों का सहारा लेते हैं। अपनी संक्षिप्तता, तीखे व्यंग्य और मार्मिक कटाक्ष के कारण अनेक लोकोक्तियाँ अपने आप में पूर्ण व्यंग्य का प्रभाव उत्पन्न करती हैं। उदाहरणस्वरूप “नाच न जाने आँगन टेढ़ा” को देखिए। यह लोकोक्ति उन लोगों पर व्यंग्य करती है जो अपनी कमी या अयोग्यता का दोष परिस्थितियों पर मढ़ देते हैं। एक अन्य लोकोक्ति “ऊँट के मुँह में जीरा”, बड़ी आवश्यकता के सामने बहुत कम या नगण्य साधन उपलब्ध होने के बीच की विसंगति पर व्यंग्य करती है।। “घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध” कहावत उस मानसिकता पर कटाक्ष करती है जिसमें अपने लोगों की उपेक्षा और बाहरी लोगों का अतिमूल्यांकन किया जाता है। ऐसी ही कुछ और लोकोक्तियों और कहावतों को देखते हैं –

अंधों में काना राजा – यह उस स्थिति पर व्यंग्य करती है जहाँ अयोग्य लोगों के बीच अल्प योग्य व्यक्ति भी विशेष मान लिया जाता है।

जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई – यह लोकोक्ति उन लोगों पर व्यंग्य है जो दूसरों के दुख को बिना अनुभव किए समझने का दावा करते हैं।

न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी – यह लोकोक्ति उन लोगों पर व्यंग्य है जो असंभव शर्तें रखकर किसी कार्य से बचना चाहते हैं।

जिसकी लाठी उसकी भैंस – यह कहावत समाज में शक्ति और अधिकार के दुरुपयोग पर कटाक्ष करती है।

थोथा चना बाजे घना – यह कहावत उन लोगों पर व्यंग्य करती है जिनमें वास्तविक ज्ञान या क्षमता कम होती है, लेकिन दिखावा अधिक करते हैं।

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे – यह कहावत उन लोगों पर व्यंग्य है जो असफल होने पर क्रोध या झुंझलाहट में दूसरों को दोष देते हैं।

ऊँची दुकान फीका पकवान – यह लोकोक्ति दिखावे और वास्तविकता के अंतर पर व्यंग्य करती है।

अधजल गगरी छलकत जाए – यह कहावत अल्पज्ञानी या अधूरे ज्ञान वाले व्यक्तियों के अत्यधिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करती है।

अक्ल बड़ी या भैंस – यह कहावत बल पर बुद्धि की श्रेष्ठता को व्यंग्यात्मक ढंग से व्यक्त करती है।

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है – यह सामाजिक और संगति के प्रभाव पर व्यंग्य है।

घर का भेदी लंका ढाए – यह कहावत अपने ही लोगों के साथ विश्वासघात पर व्यंग्य करती है।

ऐसी सैकड़ों लोकोक्तियाँ और कहावतें हिंदी साहित्य में दर्ज हैं जो लोकजीवन के अनुभवों से जन्मीं और साहित्य की धरोहर बन गईं। कम शब्दों में गहरी बात कह देने की क्षमता ही इन्हें व्यंग्य का प्रभावी माध्यम बनाती है।

पहेलियों में व्यंग्य

पहेलियाँ लोकसाहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं। इनमें किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना या स्थिति का वर्णन संकेत, रूपक और प्रतीक के माध्यम से इस प्रकार किया जाता है कि श्रोता या पाठक को उसका अर्थ समझने के लिए विचार करना पड़े। सामान्यतः पहेलियाँ संक्षिप्त, रोचक और लयात्मक होती हैं। इनका उद्देश्य मनोरंजन के साथ ही बुद्धि की परीक्षा लेना, कल्पनाशक्ति को विकसित करना और जीवन के अनुभवों को चुटीले ढंग से व्यक्त करना होता है।

भारतीय लोकपरंपरा में पहेलियाँ प्रायः चौपाल, उत्सवों और पारिवारिक मनोरंजन के अवसरों पर पूछी जाती हैं। कई पहेलियों में हास्य के साथ-साथ व्यंग्य की भी सूक्ष्म उपस्थिति होती है, जिसके माध्यम से सामाजिक व्यवहार, मानवीय मूर्खता, लालच और पाखंड पर चुटीला कटाक्ष किया जाता है। उदाहरणस्वरूप –

– ऐसी कौन चीज है, जो खुद तो चलता नहीं, पर सबको चलाता है। (उत्तर: पैसा) यह पहेली समाज में धन के प्रभाव और लालच पर व्यंग्य करती है।

– न खुद पढ़े, न लिखना जाने, फिर भी सबको ज्ञान बताए। (उत्तर: ढोंगी पंडित) यह उन लोगों पर व्यंग्य है जो बिना ज्ञान के भी विद्वान बनने का दिखावा करते हैं।

– खाता नहीं, पीता नहीं, फिर भी पेट बढ़ाए। जितना इसमें डालो भाई, उतना ही मुँह फैलाए। (उत्तर: लालच) यह मनुष्य की अतृप्त इच्छाओं और लोभ पर व्यंग्य करता है।

– सोने की वह चीज है, पर बेचे नहीं सुनार। मोल तो ज्यादा है नहीं, बहुत है उसका भार। (उत्तर: चारपाई) यहाँ ‘सोने की चीज’ शब्द में द्विअर्थता है जो शब्द-व्यवस्था पर भाषिक व्यंग्य उत्पन्न करता है।

– करती नहीं यात्रा दो गज़, फिर भी दिन भर चलती है। रसवंती है नाजुक भी, लेकिन गुफा में रहती है। (उत्तर: जीभ) इस पहेली में अधिक बोलने की प्रवृत्ति और वाचालता पर व्यंग्य है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि लोकोक्तियाँ और पहेलियाँ केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि इनमें लोकबुद्धि, अनुभव और व्यंग्यात्मक दृष्टि का समन्वय होता है। संकेतात्मक भाषा और चुटीले रूपकों के माध्यम से ये समाज की कमजोरियों, मानवीय स्वभाव और व्यवहार की विसंगतियों पर प्रभावी व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार लोकसाहित्य में व्यंग्य एक सचेतक और मार्गदर्शक भूमिका निभाता है।

लोकनाट्य और लोक रंगमंच में व्यंग्य

भारतीय लोकनाट्य परंपरा में व्यंग्य की अत्यंत प्रभावी उपस्थिति रही है। नौटंकी, स्वांग, जात्रा, तमाशा, भवाई, यक्षगान जैसी लोकनाट्य विधाओं में समाज की विसंगतियों, सत्ता के व्यवहार, धार्मिक पाखंड और सामाजिक कुरीतियों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया जाता है। इन लोकनाट्यों में व्यंग्य प्रायः हास्य, चुटीले संवाद, विदूषक पात्रों और गीतों के माध्यम से व्यक्त होता है। नीचे इन विधाओं में व्यंग्य की उपस्थिति का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत है।

“नौटंकी” उत्तर भारत, विशेषतः उत्तर प्रदेश और हरियाणा व पंजाब में प्रचलित एक लोकप्रिय लोकनाट्य शैली है। इसकी कथाएँ प्रायः ऐतिहासिक, प्रेमकथात्मक या सामाजिक विषयों पर आधारित होती हैं। नौटंकी में हास्य पात्रों और चुटीले संवादों के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों, दरबारी जीवन और सत्ता के दंभ पर व्यंग्य किया जाता है। “इंदरसभा” तथा “अमरसिंह राठौर” जैसी प्रसिद्द नौटंकी-प्रस्तुतियों में दरबारी आडंबर, चापलूसी और सामाजिक असमानताओं पर व्यंग्यात्मक प्रसंग मिलते हैं।

“स्वांग” उत्तर भारत विशेषकर राजस्थान की एक प्राचीन लोकनाट्य शैली है, जिसमें कलाकार किसी देवी, देवता, पौराणिक अथवा ऐतिहासिक पात्र का रूप धरकर संवाद, गीत और अभिनय के माध्यम से कथा प्रस्तुत करते हैं। स्वांग रचाने वाले व्यक्ति को बहुरूपिया कहा जाता है। स्वांग मूलत: हास्य प्रधान शैली है जिसमें व्यंग्य की भी भूमिका होती है। स्वांग नाटकों में पंडित, बनिया, सैनिक या जमींदार जैसे पात्रों के माध्यम से समाज की कुरीतियों और आर्थिक शोषण पर व्यंग्य किया जाता है। पाखंडी साधुओं और लोभी साहूकारों को अक्सर उपहास का पात्र बनाया जाता है। कश्मीर में स्वांग करने वालों को भांड कहा जाता है। इनके द्वारा किए गए नाटकों में आदमी ही औरतों के पात्र भी निभाते हैं।

“जात्रा” बंगाल और पूर्वी भारत की प्रमुख लोकनाट्य परंपरा है। इसकी प्रस्तुतियों में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है। आधुनिक जात्रा नाटकों में भ्रष्ट राजनीति, सामाजिक अन्याय और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर पर खुलकर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की जाती है।

“तमाशा” महाराष्ट्र का प्रसिद्ध लोकनाट्य है। इसमें संगीत, नृत्य और हास्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य किया जाता है। तमाशा में “सांगत” या हास्य पात्र अक्सर सामाजिक व्यवहार, पाखंड और लालच पर चुटीले कटाक्ष करते हैं।

“भवाई” गुजरात का लोकनाट्य है जिसमें सामाजिक व्यंग्य प्रमुख तत्व के रूप में उपस्थित रहता है। इसमें “रंगलो” नामक पात्र के माध्यम से समाज के उच्च वर्ग, पाखंडी साधुओं और भ्रष्ट अधिकारियों पर व्यंग्य किया जाता है। भवाई का स्वर प्रायः लोक-आधारित, प्रत्यक्ष और आलोचनात्मक होता है।

“यक्षगान” कर्नाटक की पारंपरिक नाट्य शैली है, जिसमें पौराणिक कथाओं का मंचन किया जाता है। यद्यपि इसका मुख्य स्वर वीरता और भक्ति से जुड़ा होता है, फिर भी इसमें ‘हास्यगारा’ नामक पात्र के माध्यम से सामाजिक व्यवहार, मानवीय कमजोरियों और समकालीन स्थितियों पर व्यंग्यपूर्ण टिप्पणियाँ की जाती हैं।

इन लोकनाट्य शैलियों के अतिरिक्त देश में अनेक अन्य लोकनाट्य परंपराएँ भी प्रचलित हैं, जिनमें कठपुतली, रम्मत, रासलीला, रामलीला, बिदेसिया, गवरी, कूडियाट्टम्, करियाला, मुडियेट्टू, भओना, माच और भांड पाथेर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कठपुतली राजस्थान की प्रसिद्ध शैली है, जिसमें पुतलों के माध्यम से ऐतिहासिक, सामाजिक और व्यंग्यात्मक कथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। रम्मत और माच (राजस्थान एवं मध्य भारत) में लोकजीवन, वीरता और सामाजिक प्रसंगों का नाट्यरूप मिलता है। रासलीला और रामलीला उत्तर भारत की प्रमुख धार्मिक लोकनाट्य शैलियाँ हैं, जिनमें कृष्ण और राम के जीवन प्रसंगों के साथ नैतिक मूल्यों और सामाजिक संदेशों का संप्रेषण होता है। रासलीला में ‘मनसुखा’ जैसे विदूषक पात्र अपनी भाव-भंगिमाओं और संवादों के माध्यम से हास्य और व्यंग्य का वातावरण निर्मित करते हैं। गवरी राजस्थान का एक अनुष्ठानिक लोकनाट्य है, जिसमें भील समुदाय देव-पूजा के साथ सामाजिक प्रतीकों का प्रस्तुतीकरण करता है। बिहार की लोकनाट्य शैली ‘बिदेसिया’ में विदूषक पात्र, जिसे ‘लबार’ कहा जाता है, अपनी अभिनय-कुशलता और सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के कारण दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। केरल में कूडियाट्टम् संस्कृत नाट्य परंपरा का जीवंत रूप है, जबकि मुडियेट्टू देवी-पूजा से जुड़ा अनुष्ठानिक नाट्य है। मुडियेट्टू में कुछ प्रसंगों में हास्य-तत्व और सामाजिक संकेतों के माध्यम से व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। असम की भओना, शंकरदेव की वैष्णव परंपरा से संबंधित है, जिसमें धार्मिक कथाओं के साथ नैतिक संदेश निहित होते हैं। हिमाचल प्रदेश के ‘करियाला’ लोकनाट्य में विदूषक या हास्य पात्र सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करता है। कश्मीर की भांड पाथेर शैली में हास्य और व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक एवं राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा कटाक्ष किया जाता है। इस प्रकार ये सभी लोकनाट्य शैलियाँ सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और सामाजिक आलोचना की सशक्त वाहक हैं, जिनमें व्यंग्य प्रायः प्रत्यक्ष और तीखे रूप में नहीं, बल्कि प्रसंगानुसार सूक्ष्म, संकेतात्मक और लोक-स्वाभाविक शैली में अभिव्यक्त होता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य और लोकसंस्कृति में व्यंग्य एक सतत, सजीव और प्रभावी अभिव्यक्ति के रूप में विद्यमान रहा है। लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों, पहेलियों और लोकनाट्य परंपराओं से लेकर भक्तिकालीन और रीतिकालीन काव्य तक, व्यंग्य ने समाज की विसंगतियों, पाखंडों, सत्ता के दंभ और मानवीय कमजोरियों पर सूक्ष्म से लेकर तीखे प्रहार किए हैं। इसकी विशेषता रही है कि यह सामूहिक अनुभव और जनबुद्धि का दर्पण बनकर, आत्मचिंतन और सुधार की प्रेरणा भी देता है।

संदर्भ:
भारतीय लोकसाहित्य: ले. डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय
हिंदी लोकोक्ति कोश: ले. श्यामसुंदर दास – ।
भारतीय लोकसाहित्य: ले. डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी –
हिंदी लोकोक्ति संग्रह: ले. रामनरेश त्रिपाठी –
माइंड ओर लॉजिक.कॉम (वेबसाइट)
सुनो कहानी.कॉम (वेबसाइट)
बुंदेलखंड विश्वकोश (वेबसाइट)
बुंदेलखंड के लोकगीत: ले. देवेन्द्र सत्यार्थी
स्वांग और नौटंकी: ले. रामनारायण अग्रवाल
Traditional Indian Theatre: Author Kapila Vatsyayan

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

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