एक दिन का सफ़र: स्त्री व्यथा-कथा के विविध रूप
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

एक दिन का सफ़र: स्त्री व्यथा-कथा के विविध रूप

     हाल-फ़िलहाल में प्रकाशित ‘एक दिन का सफ़र’ लेखिका कल्पना मनोरमा का पहला कहानी संग्रह है। अध्यापन और पत्रकारिता में विभिन्न पदों पर काम करते हुए मुख्यत: उनकी पहचान कविता के क्षेत्र में है। उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और दो प्रकाशनाधीन हैं। पुरुष-पीड़ा जैसे विशेष संदर्भों पर आधारित दो कहानी संग्रह उन्होंने संपादित भी किये हैं। पुरुष-पीड़ा के बाद यह कहानी संग्रह स्त्री की व्यथा-कथा के विभिन्न रूपों पर केंद्रित है। संग्रह की इन बारह कहानियों में स्त्री-यातना और प्रताड़ना के विविध चित्र मिलते हैं, जहां पारिवारिक संरचना हमारे आसपास की, जानी-पहचानी लगती है।

स्त्री-संदर्भों में हम लेखन की बात करें तो उन्नीसवीं सदी की महिलाओं ने जब स्चयं के जीवन के बारे में बात करना शुरू किया तो साहित्य की एक नयी धारा ने जन्म लिया। यह नव-जागरणकालीन हिंदुस्तानी समाज का बदलता क्रांतिकारी परिवेश था, जहां एक ओर देश की आज़ादी के लिए कहीं मुखर तो कहीं दबी-छिपी सुगबुगाहट थी तो कहीं यह चेतना साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में, शब्द संसार के नवोन्मेष के ज़रिये समाज को प्रभावित कर रही थी। 1882 में ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ द्वारा ‘सीमन्तनी उपदेश’ तथा मराठी में ताराबाई शिन्दे की पुस्तक ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ लिखी गयी। इन्हीं के आसपास राससुंदरी देवी की ‘आमार जीबोन’ प्रकाशित हुई। ये युगों से चले आ रहे पितृसत्तात्मक समाज में अदृश्य रहने वाली औरतों की गाथाएं थीं, जो अस्तित्वहीन और बेनाम थीं। यह समाज-सुधार आंदोलनों का प्रभाव था। इन आंदोलनों के केंद्र में स्त्री-शिक्षा और बराबरी के प्रश्न थे तो दूसरी ओर सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा का विरोध और विधवा-पुनर्विवाह के मुद्दे थे। बंगाल में रुक़ैया सख़ावत हुसैन बांग्ला और अंग्रेज़ी में हिंदुस्तानी समाज और स्त्री के चित्र उकेर रही थीं। उनकी ‘अवरोध वासिनी’ हिंदू और मुस्लिम समाज की स्त्रियों की पर्दा प्रथा और उसके पीछे की यातनाओं की कहानी है। पंडिता रमाबाई की अनेक पुस्तकों के बीच ‘लाइफ़ ऑफ़ हाई कास्ट हिंदू वूमन’ पुस्तक भी परंपरा और पितृसत्तात्मक सोच तथा व्यवहार से ग्रसित हिंदू समाज की पहली महिला डॉक्टर आनंदी बाई जोशी का जीवन प्रस्तुत करती है। आनंदी बाई जोशी अमरीका से डॉक्टरी पढ़कर आयीं लेकिन रूढ़िवादी विचार और रहन-सहन के कारण, लौटने के बाद शीघ्र मृत्यु को प्राप्त हो गयीं।

बीसवीं सदी में निर्मला (प्रेमचंद), त्यागपत्र (जैनेंद्र) जैसे उपन्यासों के केंद्र में भी स्त्री का परंपरागत त्रासद जीवन ही था। डॉ. रशीद जहां ने ‘पर्दे के पीछे’ उर्दू नाटक में पर्दानशीं औरतों के पारिवारिक जीवन की यातना को प्रस्तुत किया तो उनके नाक-कान काटने का फ़तवा जारी कर दिया गया। ललितांबिका अंतर्जनम ने ‘अग्निसाक्षी’ (मलयालम) में उच्चवर्गीय ब्राह्मण समाज में परिवारों के भीतर स्त्री-त्रासदी को कथा रूप में प्रस्तुत किया तो हलचल होना स्वाभाविक था। आज़ादी के बाद निश्चित रूप से स्त्री-जीवन का परिदृश्य बदला। शिक्षित, आत्मनिर्भर और स्वयंचेता स्त्री अपने अधिकारों के प्रति सचेत थी तो दूसरी ओर परंपरागत सामाजिक रूढ़ियों से उसका संघर्ष भी था।

स्त्री चेतना आज इक्कीसवीं सदी में विविध आयामों के साथ साहित्य में प्रतिबिंबित हो रही है। पचास-साठ साल पहले की स्त्री और उसके पारिवारिक जीवन से भिन्न आज स्त्री का रूप और उसकी भूमिका, उसका सोच एक दूसरे धरातल पर है। इसके बावजूद वे पंरपरावादी अंधेरे पक्ष और सामन्ती पुरुषवादी मानसिकता के रूप अभी भी समाज में मौजूद हैं।

कल्पना मनोरमा के इस संग्रह की कहानियां पुराने परंपरागत परिवार और पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित पुरुष समाज के बीच स्त्री-त्रासदी के विविध आयाम चित्रित करती हैं। स्त्री कहीं पिता, कहीं पुत्र तो कहीं पति के वर्चस्ववादी व्यवहार से पीड़ित है। परिवार में मां, दादी जैसे स्त्री-पात्र भी उन्हीं परंपरागत संस्कारों से पोषित हैं, इसलिए वे भी पुरुषवादी सोच और समाज का हिस्सा हैं। इन कहानियों के ये दबे-संकुचित स्त्री पात्र अपने स्तर पर संघर्षरत हैं और स्थितियों को बदलने में सफल भी होते हैं, विशेष रूप से नयी युवा पीढ़ी सजग है और नया रास्ता खोजती है।

‘कितनी क़ैदें’ उस मिन्नी की कहानी है जो एक बड़े घर की लड़की माधवी से दोस्ती कर बैठती है। माधवी ख़ुशमिज़ाज है और स्वतंत्र परिवेश में पली-बढ़ी है। मिन्नी उसकी सोहबत में बिगड़ जाएगी, अत: उसका स्कूल छुड़ा दिया जाता है और फिर अंतिम नियति शादी। पति शराबी है और निकम्मा है। मिन्नी की मां चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाती और सभी बंधन तोड़कर मिन्नी मृत्यु को प्राप्त होती है। अंत में उसकी छोटी बहन जो अपनी ज़िद से पढ़ लिख नौकरी कर रही है, वह मिन्नी की बेटी को अपने साथ ले जाती है ताकि उसे क़ैदख़ानों से बचाया जा सके। ‘गुनिता की गुड़िया’ तीन पीढ़ियों की कहानी है जहां दादी गुनिता अपनी पोती वान्या को ‘प्रेगनेंट बार्बी डॉल’ के साथ खेलते देख रही है। उसे अपने दिन याद आते हैं जब गुड़िया के खेल में भी फ़ैशन का निषेध था और शीलवती गुड़िया का रूप था। नये ज़माने में सब कुछ खुला है, कोई संकोच नहीं — बंदिश नहीं। ‘हंसो जल्दी हंसो’ स्मृतियों में बसी नानी की कहानी है। पितृसत्तात्मक समाज में औरतों की उपेक्षा सहज स्वीकार्य होती है। मोतियाबिंद का इलाज समय से न हो सकने के कारण नानी अंधी हो गयी है और अब हर ठोकर के साथ, हर उपेक्षा और अभाव के जवाब में नानी हंसती है — सिर्फ़ हंसती है। उनकी हर हंसी वेदना का एक इतिहास है। ‘जीवन का लैंडस्केप’ भी पितृसत्तात्मक समाज के रंग-रूप पर है, जहां बेटा ही सब कुछ है। बेटे को भी अपनी बहन से कोई स्नेह नहीं, उसका रिश्ता केवल स्वार्थपूर्ति के लिए है। इन सभी कहानियों का परिवेश जाना-पहचाना मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्ग का है, जहां आर्थिक समस्याओं के बीच पहली बलि कन्या संतान की होती है।

‘दुख का बोनसाई’ में लेखिका अपनी मां और दादी के रिश्तों को याद करती है, जहां परिवार में लड़की का जन्म अभिशाप है। उसके पिता, भाई और दादी भी उसी स्त्री विरोधी मानसिकता में पगे हैं, जहां स्त्री जात कमतर है। ऐसी ही उपेक्षिता पत्नी की कहानी है ‘आख़िरी सिगरेट’, जिसमें पति ने कभी पत्नी को स्नेह और सम्मान नहीं दिया। थोड़ा भिन्न कथानक है ‘कोचिंग रूम’ कहानी का, जिसमें अध्यापिका सुचेता अपनी डरी-सहमी छात्रा पिंकू के प्रति सहृदय है। पिंकू अमीर घर की लड़की है लेकिन पिता की ओर से उपेक्षिता है और सौतेली मां तथा उसके प्रेमी के अत्याचारों की शिकार है। यह उस लड़की को हौसला देने की कहानी है। शीर्षक कहानी ‘एक दिन का सफ़र’ में घर परिवार और आफ़िस की व्यस्तता में फंसी युवती सपना की परेशानी यह है कि एक महीने से उसकी मेमोग्राफ़ी की रिपोर्ट अस्पताल में पड़ी है और घर में पति-बेटे सहित उसे भी फ़ुर्सत नहीं है कि वह रिपोर्ट लाये।

इन कहानियों में परंपरागत सामाजिक परिवेश है लेकिन समकालीनता बोध के साथ स्त्री पात्र स्थितियों को बदलने के लिए प्रयासरत भी हैं। नैराश्यपूर्ण वातावरण के बीच पराधीनता की बेड़ियां तोड़ने का प्रयास भी है। ‘आख़िरी मोड़ पर’, ‘जीवन का लैंडस्केप’, ‘नमक भर कुछ और’ कहानियां ऐसा ही सकारात्मक संदेश देती हैं।

आशा है कल्पना मनोरमा अपनी अगली कहानियों में स्त्री को पारंपरिक संरचना से निकालकर जीवन के अन्य क्षेत्रों में स्थापित कर, अन्य रूपों में भी उनकी छवि चित्रित करेंगी, जहां पितृसत्तात्मकता के अलावा दूसरे संदर्भ भी रेखांकित होंगे।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

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