
- April 18, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
महिला आरक्षण की अधूरी यात्रा और लोकतंत्र
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता और समावेशिता है। लेकिन जब लोकसभा में ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का संविधान संशोधन वर्षों तक पारित नहीं हो सका, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारा लोकतंत्र वास्तव में आधी आबादी को बराबरी का अवसर देने की इच्छा रखता है।
विधेयक का महत्व : महिला आरक्षण विधेयक केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि यह भारतीय राजनीति में समानता और न्याय की दिशा में ऐतिहासिक क़दम होता। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% सीटें मिलतीं तो उनकी आवाज़ अधिक मज़बूती से गूँजती। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर नीतियाँ अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक बनतीं।
आज भी संसद में महिलाओं की संख्या 15% से कम है। यह आँकड़ा बताता है कि लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी कितनी सीमित है। आरक्षण से यह अंतर मिटने का अवसर मिलता।
असफलता के कारण
विधेयक पारित न हो पाने के पीछे कई कारण रहे, जिनमें राजनीतिक असहमति प्रमुख है। कुछ दलों ने जनगणना आधारित सीटों के पुनर्वितरण (परिसीमन) पर आपत्ति जतायी। भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष को दोधारी तलवार पर खड़ा कर दिया। उनके लिए संविधान संशोधन हेतु ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाना कठिन साबित हुआ। सपा जैसे कुछ दलों को आशंका थी कि आरक्षण से उनके पारंपरिक वोट बैंक प्रभावित होंगे, इसलिए वे विरोध में रहे।
इन कारणों ने मिलकर एक ऐतिहासिक अवसर का गर्भपात कर दिया।
2023 का नया अध्याय
लंबे संघर्ष और बहस के बाद 2023 में संसद ने आख़िरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित कर दिया था। इसमें यह प्रावधान है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% सीटें मिलेंगी, लेकिन यह आरक्षण परिसीमन (delimitation) और जनगणना के बाद ही लागू होगा। इस शर्त ने इसे एक अधूरी जीत बना दिया है, क्योंकि वास्तविक प्रभाव तब तक नहीं दिखेगा, जब तक नयी जनगणना और सीटों का पुनर्वितरण पूरा नहीं होता।
समकालीन परिप्रेक्ष्य
2024 के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी, लेकिन प्रतिनिधित्व अब भी सीमित रहा। महिला संगठनों ने 2023 के विधेयक को “ऐतिहासिक लेकिन अधूरा” कहा। कई राजनीतिक दलों ने इसे समर्थन दिया, पर साथ ही यह मांग भी उठी कि इसे शीघ्र लागू किया जाये ताकि केवल काग़ज़ी प्रावधान न रह जाये।
असर और चुनौती
महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना और फिर विलंबित रूप से पारित होना कई स्तरों पर असर डालता है। महिला नेतृत्व का अवसर फ़िलहाल टल गया लगता है। महिला संगठनों और नागरिक समाज में गहरी निराशा है। राजनीतिक दलों पर इसे शीघ्र लागू करने का दबाव बढ़ेगा।
लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना केवल एक विधायी पराजय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की अधूरी प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसमें राजनीति व्यापक राष्ट्रहित से बड़ी सिद्ध हुई। जब तक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तब तक नीतियाँ समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएँगी।
भारत की आधी आबादी को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी भी है। यह विधेयक पारित होना हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी राजनीति वास्तव में समावेशी है।
महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक चुनौती है। यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर इस मुद्दे पर सहमति बनाएँ। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% प्रतिनिधित्व देना भारतीय लोकतंत्र को अधिक सशक्त, न्यायपूर्ण और संतुलित बनाएगा। आज नहीं तो कल यह होकर रहेगा क्योंकि यह जन आकांक्षा है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
